क्या Negotiable Instruments Act की धारा 143A के तहत अंतरिम मुआवज़ा देना अदालत की मजबूरी है या विवेकाधीन अधिकार?
Supreme Court ने Rakesh Ranjan Shrivastava बनाम झारखंड राज्य (2024) में यह तय किया कि Negotiable Instruments Act, 1881 की धारा 143A(1) में अदालत को जो शक्ति दी गई है कि वह चेक बाउंस (Cheque Bounce) के मामलों में अंतरिम मुआवज़ा (Interim Compensation) देने का आदेश दे सकती है वह अनिवार्य (Mandatory) है या विवेकाधीन (Discretionary)। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इस धारा में प्रयुक्त “may” (कर सकती है) शब्द को अनिवार्य नहीं माना जा सकता। इस निर्णय ने इस कानून के दुरुपयोग को रोकने और निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में मार्गदर्शन किया है। धारा 143A का कानून में स्थान धारा 143A को 2018 में एक संशोधन अधिनियम (Amendment Act) के ज़रिए जोड़ा गया था। इसका उद्देश्य यह था कि ऐसे लोग जो जानबूझकर भुगतान टालते हैं, उन्हें कानून के ज़रिए समय पर जवाबदेह बनाया जा सके और पीड़ित पक्ष (Complainant) को कुछ आर्थिक राहत (Financial Relief) मुकदमे के दौरान ही मिल सके। यह संशोधन इसीलिए लाया गया ताकि चेक प्रणाली (Cheque System) में लोगों का विश्वास बना रहे और झूठे बचाव के बहाने से मामले लंबित न हों।
धारा 143A का ढाँचा (Structure of Section 143A) यह धारा अदालत को यह अधिकार देती है कि वह आरोपी से चेक की रकम का अधिकतम 20% तक अंतरिम मुआवज़ा दिलवा सके। यह आदेश तभी दिया जा सकता है जब आरोपी दोषी साबित नहीं हुआ हो लेकिन शिकायत का जवाब दे चुका हो या उस पर आरोप तय हो चुके हों। यह मुआवज़ा 60 दिनों के भीतर देना होता है और विशेष कारणों से 30 दिन और मिल सकते हैं। यदि बाद में आरोपी बरी हो जाता है, तो शिकायतकर्ता को पूरी राशि वापस करनी होती है, साथ ही Reserve Bank of India की दर से ब्याज भी देना होता है। यह राशि CrPC की धारा 421 के तहत 'Fine' की तरह वसूली जा सकती है। Also Read - भारतीय प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 16-17: महानिदेशक और आयोग के अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति “May” बनाम “Shall” – विवेकाधीन बनाम अनिवार्य प्रावधान (Directory v. Mandatory) इस मामले का मूल प्रश्न था क्या अदालतें हर मामले में धारा 143A के तहत मुआवज़ा देने के लिए बाध्य हैं? Supreme Court ने कहा कि "may" शब्द सामान्यतः विवेकाधीन होता है, परंतु कभी-कभी परिस्थितियों के अनुसार उसे "shall" (अनिवार्य) भी माना जा सकता है। लेकिन इस धारा में ऐसा करना अनुचित होता। यदि इसे अनिवार्य माना जाए तो दोष साबित होने से पहले ही आरोपी पर वित्तीय बोझ (Financial Burden) डाल दिया जाएगा, जो Article 14 (समानता का अधिकार) और Article 21 (न्यायपूर्ण प्रक्रिया का अधिकार) का उल्लंघन हो सकता है। अतः Court ने इसे Directory (विवेकाधीन) माना और स्पष्ट किया कि यह निर्णय हर मामले में परिस्थिति देखकर ही लिया जाना चाहिए।
धारा 148 से तुलना – कब “May” का अर्थ “Shall” हो सकता है? Supreme Court ने धारा 148 के साथ भी तुलना की, जो अपील के दौरान अदालत को यह अधिकार देती है कि वह दोष सिद्ध व्यक्ति से कम से कम 20% राशि जमा करवाए। धारा 148 दोष सिद्ध होने के बाद लागू होती है, जबकि 143A केवल आरोप तय होने के समय। इसलिए दोनों स्थितियाँ अलग हैं और "may" शब्द का मतलब भी दोनों जगह अलग होगा। Surinder Singh Deswal बनाम Virender Gandhi (2019) और Jamboo Bhandari बनाम MP State Industrial Development Corp. (2023) जैसे मामलों में भी Court ने यही कहा कि कानून की भाषा को उसके उद्देश्य और स्थिति के अनुसार पढ़ा जाना चाहिए। न्यायिक विवेक के मानक (Judicial Discretion) – अदालत कैसे तय करे? Court ने यह तय किया कि जब भी कोई शिकायतकर्ता अंतरिम मुआवज़ा माँगे, तो अदालत को निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए:
1. शिकायतकर्ता की बातों और आरोपी की प्रतिक्रिया को देखकर यह तय किया जाए कि Prima Facie (प्रथम दृष्टया) कोई मजबूत आधार है या नहीं।
2. आरोपी की वित्तीय स्थिति देखी जाए कि क्या वह भुगतान करने में सक्षम है।
3. मुआवज़ा की मात्रा (Quantum) तय करते समय यह देखा जाए कि हमेशा 20% देना ज़रूरी नहीं है।
4. लेन-देन की प्रकृति, पक्षों के बीच संबंध और कोई अन्य दीवानी (Civil) विवाद लंबित हो तो उसे भी ध्यान में रखा जाए।
5. मुआवज़ा देने या न देने के निर्णय का संक्षिप्त कारण आदेश में दर्ज किया जाए।
यह भी कहा गया कि केवल NI Act की धारा 139 के तहत मौजूद Presumption (पूर्व-मान्यता) के आधार पर मुआवज़ा नहीं दिया जा सकता, क्योंकि वह केवल सुनवाई के दौरान जांचा जा सकता है। यदि मुआवज़ा नहीं दिया गया तो क्या होगा? (Effect of Non-Payment) Supreme Court ने यह स्पष्ट किया कि यदि आरोपी अंतरिम मुआवज़ा नहीं देता, तो उसे मुकदमे से बाहर नहीं किया जा सकता। लेकिन CrPC की धारा 421 के अनुसार, मुआवज़ा की वसूली Fine की तरह की जा सकती है, जिसमें चल-अचल संपत्ति की कुर्की (Attachment) और बिक्री भी शामिल है। अगर बाद में आरोपी बरी हो जाता है और उसकी संपत्ति पहले ही बेच दी गई हो, तो उसे हानि की भरपाई नहीं हो सकती। इसीलिए Court ने विवेकाधीन तरीका अपनाने की बात कही ताकि कोई निर्दोष व्यक्ति पहले ही नुकसान न झेले। Supreme Court का अंतिम निर्णय (Final Ruling) Supreme Court ने कहा कि: – धारा 143A(1) एक Directory Provision है, न कि Mandatory। – अदालतें मुआवज़ा देने से पहले विवेक और स्थिति का ध्यान रखें। – यदि कोई याचिका लगाई जाए तो उस पर Reasoned Order (कारण सहित आदेश) दिया जाए। – Rakesh Ranjan मामले में ₹10 लाख का मुआवज़ा बिना किसी विचार के दे दिया गया था, जो कानून के अनुसार गलत था, अतः वह आदेश रद्द (Set Aside) कर दिया गया। – मामला वापस Magistrate को भेजा गया ताकि उपयुक्त परीक्षण करके दोबारा निर्णय लिया जा सके। Rakesh Ranjan Shrivastava का यह निर्णय एक संतुलन स्थापित करता है जहाँ शिकायतकर्ता को राहत देने की कोशिश की जाती है, वहीं आरोपी के अधिकारों की भी रक्षा की जाती है। यह फैसला यह सुनिश्चित करता है कि अंतरिम मुआवज़ा स्वचालित (Automatic) न होकर न्यायिक जांच (Judicial Scrutiny) के बाद ही दिया जाए। अब देश भर की Trial Courts को इस निर्णय का पालन करते हुए ऐसे मामलों में संतुलित और न्यायोचित निर्णय देने होंगे, जिससे चेक बाउंस मामलों में तेज़ और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित हो सके।
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