Wednesday, 14 January 2026

ससुर की मृत्यु के बाद विधवा बहू भी उसकी संपत्ति से भरण-पोषण की हकदार : सुप्रीम कोर्ट 14 Jan 2026

ससुर की मृत्यु के बाद विधवा बहू भी उसकी संपत्ति से भरण-पोषण की हकदार : सुप्रीम कोर्ट  14 Jan 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि जो बहू अपने ससुर की मृत्यु के बाद विधवा होती है, वह भी अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण पाने की अधिकारी है। यह अधिकार हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत मिलता है। जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस. वी. एन. भट्टी की खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 21(vii) में प्रयुक्त शब्द “पुत्र की कोई भी विधवा” (any widow of his son) बिल्कुल स्पष्ट है और इसमें यह शर्त नहीं है कि पुत्र की मृत्यु ससुर से पहले हुई हो। इसलिए यह तय करना कि पुत्र कब मरा — ससुर से पहले या बाद में — भरण-पोषण के अधिकार के लिए अप्रासंगिक है। 

 मामले की पृष्ठभूमि डॉ. महेन्द्र प्रसाद का निधन दिसंबर 2021 में हुआ। उनकी बहू गीता शर्मा के पति (डॉ. प्रसाद के पुत्र) की मृत्यु मार्च 2023 में हुई। पति की मृत्यु के बाद गीता शर्मा ने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की मांग की। फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी थी कि जब ससुर की मृत्यु हुई थी तब वह विधवा नहीं थीं। हालांकि, हाई कोर्ट ने यह फैसला पलटते हुए कहा कि गीता शर्मा कानून के तहत “निर्भर” (dependent) हैं और उन्हें भरण-पोषण का अधिकार है। 

राज्यों को नियम बनाने का निर्देश दिया अन्य पारिवारिक सदस्यों ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणी अदालत ने यह कानूनी प्रश्न तय किया: “क्या वह बहू, जो अपने ससुर की मृत्यु के बाद विधवा बनी, ससुर की संपत्ति पर निर्भर मानी जाएगी और उससे भरण-पोषण मांग सकती है?” कोर्ट ने कहा कि धारा 21(vii) में “पुत्र की कोई भी विधवा” कहा गया है, न कि “पूर्व-मृत पुत्र की विधवा”। इसलिए अदालत इसमें अतिरिक्त शब्द जोड़ नहीं सकती। 

 “विधायिका ने जानबूझकर 'पूर्व-मृत' शब्द का प्रयोग नहीं किया है ताकि पुत्र की कोई भी विधवा इस दायरे में आ सके। पुत्र की मृत्यु का समय अप्रासंगिक है।” अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि बहुओं को इस आधार पर अलग-अलग वर्गों में बांटा जाए कि उनके पति ससुर से पहले मरे या बाद में, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन होगा। साथ ही, ऐसी व्याख्या अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीवन का अधिकार) का भी हनन करेगी, क्योंकि इससे विधवा महिला को दरिद्रता और सामाजिक असुरक्षा में धकेला जा सकता है। 

“केवल पति की मृत्यु के समय के आधार पर विधवाओं के बीच भेदभाव करना मनमाना है और इसका अधिनियम के उद्देश्य से कोई तर्कसंगत संबंध नहीं है।” अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि गीता शर्मा की भरण-पोषण याचिका पूरी तरह से वैध है और फैमिली कोर्ट को अब इसकी राशि तय करनी होगी। “मृत हिंदू के पुत्र की कोई भी विधवा, धारा 21(vii) के तहत आश्रित है और धारा 22 के अंतर्गत भरण-पोषण की हकदार है।” इस प्रकार सभी अपीलें खारिज कर दी गईं।


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