Thursday, 29 October 2026

आर्बिट्रेशन क्लॉज़ होने से आपराधिक मामला दर्ज करने पर रोक नहीं लगती: सुप्रीम कोर्ट 17 Oct 2026

आर्बिट्रेशन क्लॉज़ होने से आपराधिक मामला दर्ज करने पर रोक नहीं लगती: सुप्रीम कोर्ट  17 Oct 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि किसी समझौते में 'आर्बिट्रेशन क्लॉज़' (मध्यस्थता खंड) होने का मतलब यह नहीं है कि आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतों को सबसे पहले यह देखना चाहिए कि क्या लगाए गए आरोपों में अपराध के ज़रूरी तत्व मौजूद हैं या नहीं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब वह गुवाहाटी हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रहे थे। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने चाय कंपनी के CEO के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला रद्द करने से इनकार किया था। यह मामला चाय बागान की एक ऐसी डील से जुड़ा था, जो सफल नहीं हो पाई। 

अपीलकर्ता 'दार्जिलिंग ऑर्गेनिक टी एस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड' के CEO थे। 'CR ट्रेडर्स' (प्रतिवादी 1/R1) के मालिक ने चाय बागान को लेकर अपीलकर्ता की कंपनी के साथ बातचीत की थी। 2021 में समझौते से पहले, उन्होंने UCO बैंक को पत्र लिखकर उस चाय बागान और बैंक के पास उसके गिरवी (मॉर्गेज) होने के बारे में पूछा। कंपनी और CR ट्रेडर्स के बीच 'मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' (MoU) पर हस्ताक्षर हुए, जिस पर अपीलकर्ता ने कंपनी के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के रूप में दस्तखत किए। जून 2021 में, R1 ने दो किश्तों (39,95,000 रुपये और 5,000 रुपये) में कंपनी के खाते में कुल 40,00,000 रुपये ट्रांसफर किए। 

 विवाद इसी MoU के पालन को लेकर है। कंपनी ने यह कहते हुए MoU को खत्म किया कि R1 इसकी शर्तों का पालन करने में विफल रहा है। 2022 में R1 ने आपराधिक शिकायत दर्ज कराई। इसमें आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता ने उन्हें यह भरोसा दिलाकर 40,00,000 रुपये देने के लिए राजी किया कि चाय बागान कंपनी का है। जबकि असल में वह किसी और कंपनी का था और उसे लेकर UCO बैंक के साथ कानूनी कार्यवाही चल रही थी। इसके बाद कोर्ट ने समन जारी किया। 

इसके बाद अपीलकर्ता ने 'कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर, 1973' (CrPC) की धारा 482 ('भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023' यानी BNSS की धारा 528 है) के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दलील दी कि यह विवाद पूरी तरह से अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) से जुड़ा है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि MoU कंपनी द्वारा किया गया, न कि व्यक्तिगत रूप से उनके द्वारा, और पैसा भी कंपनी के खाते में गया। उन्होंने इस बात की ओर भी इशारा किया कि कंपनी को आरोपी नहीं बनाया गया। 

 सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की केंद्र सरकार की आपत्ति यह मानते हुए कि भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 417 और 420 (भारतीय न्याय संहिता, 2023/BNS की धारा 318(2) और 318(4)) के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है, और MoU में मौजूद आर्बिट्रेशन क्लॉज़ (मध्यस्थता खंड) मामले को रद्द करने का आधार नहीं हो सकता, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की। हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के नजरिए से सहमत तो था, लेकिन उसने इसे निर्णायक नहीं माना। कोर्ट ने इस प्रकार टिप्पणी की: “हाईकोर्ट का यह कहना सही था कि केवल आर्बिट्रेशन क्लॉज़ होने से आपराधिक कार्यवाही नहीं रुक जाती। हालांकि, यह बात असली सवाल का जवाब नहीं देती। कोर्ट को सबसे पहले यह तय करना होगा कि क्या लगाए गए आरोपों से उस आपराधिक अपराध के जरूरी तत्व सामने आते हैं या नहीं। इस मामले में उपलब्ध सामग्री से ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिलता, जिससे यह माना जा सके कि लेन-देन की शुरुआत में ही अपीलकर्ता की मंशा बेईमानीपूर्ण थी, जो कि धोखाधड़ी (Cheating) के अपराध के लिए जरूरी है।” 'जी. स्वामीनाथन और अन्य बनाम राज्य' (जिसमें पुलिस सब-इंस्पेक्टर और अन्य पक्ष थे) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया, “धोखाधड़ी का अपराध साबित करने के लिए शिकायतकर्ता को यह दिखाना होगा कि वादा करते समय या कोई बात कहते समय आरोपी की मंशा कपटपूर्ण या बेईमानीपूर्ण है।” कोर्ट ने कानूनी स्थिति को इस प्रकार स्पष्ट किया: “अनुबंध के उल्लंघन (Breach of Contract) और धोखाधड़ी के अपराध के बीच का अंतर पूरी तरह स्पष्ट है। IPC की धारा 417 और 420 के तहत अपराध के लिए लेन-देन की शुरुआत में ही कपटपूर्ण या बेईमानीपूर्ण मंशा होनी चाहिए। इसी मंशा के कारण शिकायतकर्ता ने अपनी संपत्ति (या पैसा आदि) सामने वाले को दी हो। बाद में अनुबंध की शर्तों को पूरा न कर पाना, अपने आप में ऐसी मंशा का सबूत नहीं माना जा सकता।” बेंच ने माना कि शिकायत में अपीलकर्ता के खिलाफ धोखाधड़ी के जरूरी तत्व नहीं दिखते हैं। MoU, R1 और कंपनी के बीच हुआ था, और अपीलकर्ता ने इस पर केवल कंपनी के CEO और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता (Authorized Signatory) के रूप में हस्ताक्षर किए। बेंच ने आगे कहा, "सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 40,00,000 रुपये (चालीस लाख रुपये) की रकम सीधे कंपनी के खाते में ट्रांसफर की गई। ऐसा कोई आरोप नहीं है कि अपीलकर्ता को इसमें से कोई हिस्सा मिला या उसने अपने निजी फायदे के लिए इसका इस्तेमाल किया।" बेंच ने यह भी गौर किया कि शिकायत के अनुसार, अपीलकर्ता को अच्छी तरह पता था कि चाय बागान और चाय फैक्ट्री कंपनी की नहीं हैं। इस बात को पूरे लेन-देन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। बेंच ने यह भी ध्यान दिया कि R1 को पता था कि चाय बागान UCO बैंक के पास गिरवी (mortgaged) है। MoU में ही UCO बैंक के बकाया और देनदारियों को चुकाने और अंततः चाय बागान का अधिग्रहण करने की बात कही गई थी। रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह भी पता चलता है कि चाय बागान कंपनी के कब्जे में था, कंपनी ही उसे चला रही थी और उस पर कंपनी के काफी दावे भी थे। कोर्ट ने कहा, "इन परिस्थितियों में केवल यह कह देना कि अपीलकर्ता को पता था कि दी गई जानकारी गलत है, यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि लेन-देन की शुरुआत से ही उसका इरादा बेईमानी का था।" इसके अलावा, बेंच ने कहा कि क्या अनुबंध (Contract) को खत्म करना सही था, और क्या R1 भुगतान की गई रकम वापस पाने या किसी अन्य राहत का हकदार है - ये सभी दीवानी (Civil) मामले हैं। केवल इसलिए कि बाद में उनके बीच का अनुबंध टूट गया, इन मामलों को आपराधिक (Criminal) नहीं माना जा सकता। उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया और अपीलकर्ता के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने कहा, "हमारी राय में अपीलकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का मतलब होगा - मुख्य रूप से अनुबंध से जुड़े विवाद को आपराधिक मामले का रूप देना। अपीलकर्ता के खिलाफ IPC की धारा 417 और 420 के तहत अपराध के तत्व नहीं बनते हैं। इसलिए इस कार्यवाही को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।" पीठ ने निष्कर्ष निकाला, “12. तदनुसार, अपील स्वीकार की जाती है। हाईकोर्ट द्वारा आपराधिक याचिका संख्या 32/2022 में 13.05.2025 को पारित निर्णय और आदेश रद्द किया जाता है। 13. परिणामस्वरूप, दीमापुर, नागालैंड की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत में लंबित सी.आर. केस संख्या 17/2022, और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही, अपीलकर्ता के संबंध में रद्द की जाती है। यह स्पष्ट किया जाता है कि इस आदेश से प्रतिवादी संख्या 1 को अपने दीवानी या संविदात्मक दावों के संबंध में कानून के तहत उपलब्ध किसी भी उपाय को अपनाने से नहीं रोका जाएगा।” 

Case Title : Indroneel Goho v Razouvonuo Thong & Anr

https://hindi.livelaw.in/supreme-court/arbitration-clause-does-not-bar-criminal-case-supreme-court-555127

फैमिली पेंशन का अधिकार सेवा नियमों से तय होगा, उत्तराधिकार कानून से नहीं

फैमिली पेंशन का अधिकार सेवा नियमों से तय होगा, उत्तराधिकार कानून से नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट 16 Oct 2026 

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 372 के तहत उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी करने की अर्जी पर सुनवाई करने वाली अदालत यह अंतिम रूप से तय नहीं कर सकती कि किसी मृत कर्मचारी की पारिवारिक पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य रिटायरमेंट लाभ पाने का हकदार कौन है। ये अधिकार संबंधित सेवा नियमों से तय होते हैं और इन पर फैसला सक्षम प्राधिकारी को लागू नियमों के आधार पर करना होगा, न कि उत्तराधिकार के सामान्य कानून के आधार पर। 

जस्टिस अनिल कुमार-X ने स्पष्ट किया कि मृत व्यक्ति का कानूनी वारिस कौन है और किसी विशेष सेवा लाभ को पाने का हकदार कौन है, ये दोनों अलग-अलग सवाल हैं। कानूनी वारिस होने का निर्धारण उत्तराधिकार कानून के तहत हो सकता है जबकि किसी खास सेवा लाभ का अधिकार उस लाभ पर लागू वैधानिक नियमों के अनुसार तय किया जाएगा। मामले में अपीलकर्ता शशि ने उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल रहे दिवंगत सुशील कुमार के विभाग के पास जमा 2,64,521 रुपये में आधे हिस्से के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र मांगा था। यह रकम पेंशन, ग्रेच्युटी, समूह बीमा और अन्य सेवा लाभों से संबंधित थी। 

हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा शशि का दावा था कि उनकी शादी सुशील कुमार से 16 जून 1994 को हुई और वह तथा सुशील कुमार की मां सोना देवी ही उनके कानूनी वारिस थे। हालांकि, सोना देवी और अन्य लोगों ने इस दावे का विरोध किया। उन्होंने देव सहगल को सुशील कुमार का बेटा बताया, जिसका जन्म मन्नू देवी के साथ उनके संबंध से हुआ। ट्रायल कोर्ट ने शशि को सुशील कुमार की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी माना और कहा कि अलग रहने से पत्नी का यह दर्जा अपने आप समाप्त नहीं हो जाता। पारिवारिक रजिस्टर और अन्य दस्तावेजों के आधार पर अदालत ने देव सहगल को भी सुशील कुमार का बेटा माना। 

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 16 का हवाला देते हुए अदालत ने उसे पिता के सेवा लाभों का हकदार माना था। नाबालिग देव को उसके अभिभावक सोना देवी के माध्यम से फैमिली पेंशन देने का निर्देश दिया गया। वहीं, ग्रेच्युटी, सामान्य भविष्य निधि (GPF) और समूह बीमा की रकम शशि, सोना देवी और नाबालिग के बीच देय मानी गई। हाईकोर्ट में शशि की ओर से दलील दी गई कि नाबालिग देव कानूनी वारिस नहीं है और उत्तर प्रदेश पुलिस असाधारण पेंशन नियम, 1961 के तहत फैमिली पेंशन मृत कर्मचारी की विधवा को मिलनी चाहिए। 

 दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 16 के तहत अमान्य विवाह से जन्मे बच्चे को वैध संतान का दर्जा मिलता है और उसे अपने पिता के सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि पेंशन और मृत्यु के बाद मिलने वाले अन्य सेवा लाभ कानून के तहत बनाए गए अलग प्रकार के अधिकार हैं। ये लाभ कर्मचारी की जिंदगी में उसकी निजी संपत्ति का हिस्सा नहीं होते, बल्कि संबंधित नियम यह तय करते हैं कि किसे परिवार का सदस्य माना जाएगा और कौन किसी खास लाभ को पाने का पात्र होगा। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के जोध सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और श्रीमती वायलेट इसाक बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामलों का भी उल्लेख किया। इन फैसलों में स्पष्ट किया गया कि फैमिली पेंशन संबंधित नियमों के तहत पात्र व्यक्ति की स्थिति के आधार पर मिलती है, न कि मृत व्यक्ति की संपत्ति के हिस्से के रूप में। हाईकोर्ट ने कहा कि जब नियम बनाने वाले प्राधिकारी ने किसी लाभ के लिए पात्र व्यक्तियों की श्रेणी स्पष्ट रूप से तय की तो उत्तराधिकार के सामान्य कानून का इस्तेमाल करके उस श्रेणी का विस्तार नहीं किया जा सकता। इसलिए कोई व्यक्ति मृतक का कानूनी वारिस होने के बावजूद किसी विशेष सेवा लाभ का हकदार न भी हो सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि उत्तराधिकार अधिनियम के भाग 10 के तहत जारी होने वाला उत्तराधिकार प्रमाणपत्र मुख्य रूप से कर्ज और प्रतिभूतियों से संबंधित होता है। इसलिए निचली अदालत पक्षकारों के वारिस होने की स्थिति के आधार पर फैमिली पेंशन और अन्य सेवा लाभों का अंतिम अधिकार तय नहीं कर सकती थी। इसी तरह, देव सहगल का सुशील कुमार का बेटा होना अपने आप उसे सेवा नियमों के विपरीत फैमिली पेंशन पाने का अधिकार नहीं देता। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार की और सहारनपुर के अपर जिला जज, कोर्ट नंबर 10 के 24 सितंबर 2011 के आदेश को उस सीमा तक रद्द किया, जिसमें फैमिली पेंशन और अन्य सेवा लाभों का अंतिम हकदार तय किया गया। अदालत ने निर्देश दिया कि सक्षम प्राधिकारी सभी पक्षों के दावों पर लागू सेवा नियमों के अनुसार नए सिरे से फैसला करे और निचली अदालत की उन टिप्पणियों से प्रभावित न हो, जिन्हें हाईकोर्ट ने इस संबंध में रद्द किया।


https://hindi.livelaw.in/allahabad-highcourt/allahabad-high-court-justice-anil-kumar-x-family-pension-retiral-benefits-indian-succession-act-555008

Sunday, 4 October 2026

पोता पोती को भी अनुकंपा नियुक्ति दी जा सकती है सुप्रीम कोर्ट ने HC का फैसला रखा बरकरार


*पोता पोती को भी अनुकंपा नियुक्ति दी जा सकती है सुप्रीम कोर्ट ने HC का फैसला रखा बरकरार*

 

सुप्रीम कोर्ट के याचिका खारिज करने से हाई कोर्ट का 25 फरवरी 2026 का फैसला बरकरार है जिसमें पोते को अनुकंपा नियुक्ति देने पर विचार करने का आदेश दिया गया था। हाई कोर्ट के आदेश में पोते को निकट संबंधी के रूप में अनुकंपा नियुक्ति दिए जाने के बारे में नियम कानून का विस्तार से जिक्र किया गया है।

इस मामले में रेलवे ने जितेन्द्र वर्मा को दादी की मृत्यु के बाद उनकी जगह अनुकंपा नियुक्ति देने से मना कर दिया था। मामले के मुताबिक जितेन्द्र के दादा की 2002 में मृत्यु हो गई उसके पिता की भी 2006 में मृत्यु हो गई।

जितेन्द्र का पालन पोषण उनकी दादी छमा बाई ने किया जो कि पश्चिम मध्य रेलवे के भोपाल मंडल में हेल्पर-2/खलासी के तौर पर नौकरी करती थीं। 19 जून 2016 को नौकरी के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई।

दादा की जगह पोते को मिली थी नौकरी 

जितेन्द्र का नाम 2007 में छमा बाई के सर्विस रिकार्ड में उत्तराधिकारी/नामिनी के रूप में दर्ज हो चुका था। जितेन्द्र ने 30 जनवरी 2018 को सिविल कोर्ट से उत्ताराधिकार प्रमाणपत्र भी हासिल किया। दादी की जगह अनुकंपा नियुक्ति का दावा किया।

हालांकि रेलवे ने उत्तराधिकार प्रमाणपत्र को सेवानिवृत्ति संबंधी बकाया के भुगतान तक सीमित मानते हुए नियुक्ति के लिए स्वीकार नहीं किया। हालांकि इसमें विवाद नहीं था कि जितेन्द्र परिवार का अकेला जीवित सदस्य था।

जितेन्द्र ने अनुकंपा नियुक्ति के दावे में कहा था कि वह छमा बाई का गोद लिया हुआ बेटा है। लेकिन रेलवे ने गोद लेने की वैधता पर सवाल उठाया और बाद में उसका दावा खारिज कर दिया।

अनुकंपा नियुक्ति नीति की शर्ते क्या हैं?

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि रेलवे की अनुकंपा नियुक्ति नीति के क्लॉज-तीन में केवल पुत्र, पुत्री, विधवा या विधुर ही नहीं, बल्कि निर्धारित शर्तों के तहत 'निकट संबंधी' तथा वैध रूप से गोद लिए गए पुत्र-पुत्री को भी नियुक्ति का लाभ देने का प्रविधान है। कहा कि जितेंद्र को दत्तक पुत्र न मानने की स्थिति में भी वह मृत कर्मचारी का पोता होने के कारण निकट संबंधी की श्रेणी में आता है।

हाईकोर्ट ने रेलवे द्वारा बार-बार दावा खारिज किए जाने पर भी आपत्ति जताई और कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य ही समय पर राहत देना है। 30 दिन में अनुकंपा नियुक्ति देने तथा 10 हजार रुपये मुकदमा खर्च देने का निर्देश दिया था। रेलवे ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

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 कोर्ट ने SLP में हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया है। इसलिए इसका अनुपात (ratio) तथ्य-विशिष्ट है। 

1. मुख्य सुप्रीम कोर्ट केस

Case: Union of India & Ors. v. Jitendra Verma

Court: Supreme Court of India

SLP: SLP (C) Diary No. 52008/2026

निर्णय दिनांक: 28 सितम्बर 2026

Bench: Hon'ble Mr. Justice Manoj Misra एवं Hon'ble Mr. Justice Vijay Bishnoi. 

सुप्रीम कोर्ट का मुख्य आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने Article 136 के अंतर्गत हाईकोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया और Special Leave Petition dismiss कर दी। 

महत्वपूर्ण कानूनी बात: यह आदेश बहुत संक्षिप्त/non-speaking dismissal है। अतः इसे ऐसा निर्णय नहीं माना जाना चाहिए जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र रूप से यह घोषित कर दिया हो कि “पोता होना मात्र अनुकंपा नियुक्ति के लिए पर्याप्त है।” बल्कि हाईकोर्ट का आदेश इस मामले में कायम रहा। 

2. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य Citation

Union of India & Others v. Jitendra Verma

Court: Madhya Pradesh High Court, Jabalpur

Case No.: Misc. Petition No. 4473 of 2025

Neutral Citation: 2026:MPHC-JBP:16281

Decision Date: 25 February 2026

Coram: Justice Vivek Rusia एवं Justice Pradeep Mittal. 

हाईकोर्ट का मुख्य प्रतिपादित सिद्धांत

“Near Relative” की श्रेणी में उपयुक्त परिस्थितियों में पोता भी आ सकता है, विशेषकर जब:

1. मृत कर्मचारी ने उसे अपने परिवार/Service Record में दर्ज किया हो।

2. वह वास्तव में मृत कर्मचारी पर निर्भर रहा हो।

3. उसके माता-पिता उपलब्ध न हों।

4. वह परिवार का एकमात्र जीवित/निकट संबंधी हो।

5. लागू Railway Compassionate Appointment Policy में “near relative” को नियुक्ति का लाभ देने का प्रावधान हो।

6. केवल यह कहकर दावा खारिज नहीं किया जा सकता कि वह “पोता” है। 

3. इस मामले में Railway Master Circular No.16 का महत्व

हाईकोर्ट ने Master Circular No.16, Clause III को निर्णायक माना।

इसमें सामान्यतः ये व्यक्ति पात्र हैं:

पुत्र

पुत्री

विधवा

विधुर

लेकिन इसके अतिरिक्त नीति में यह भी प्रावधान है कि:

> “near relative/adopted son/daughter”

को भी निर्धारित शर्तों के अधीन अनुकंपा नियुक्ति दी जा सकती है। 

“Near Relative” के संबंध में महत्वपूर्ण सिद्धांत

हाईकोर्ट ने माना कि यदि व्यक्ति वैध दत्तक पुत्र सिद्ध नहीं भी होता, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसका दावा स्वतः समाप्त हो जाएगा।

यदि वह मृत कर्मचारी का एकमात्र निकट संबंधी और उस पर आश्रित व्यक्ति है, तो उसकी पात्रता को “near relative” के रूप में जांचना आवश्यक है। 

4. Jitendra Verma मामले के विशेष तथ्य

यह हिस्सा भविष्य के मामलों में बहुत महत्वपूर्ण है।

तथ्य स्थिति

दादा की मृत्यु 18.08.2002

पिता की मृत्यु 12.08.2006

दादी Chhama Bai

दादी की नौकरी Helper-II/Khalsi, West Central Railway, Bhopal Division

दादी की मृत्यु 19.06.2016

जितेन्द्र का Service Record में नाम 12.03.2007

स्थिति Legal heir/Nominee

Succession Certificate 30.01.2018

परिवार में स्थिति एकमात्र जीवित सदस्य

दावा दत्तक पुत्र/निकट संबंधी

Railway का विरोध पोते को अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान नहीं

हाईकोर्ट का आदेश नियुक्ति देने का निर्देश

समय 30 दिन

Costs ₹10,000

इन तथ्यों को हाईकोर्ट ने विशेष रूप से ध्यान में रखा। 

5. इससे निकलने वाला मुख्य कानूनी सिद्धांत

Principle No. 1

पोता/पोती होना अपने-आप में अनुकंपा नियुक्ति का पूर्ण अधिकार नहीं देता।

लेकिन यदि लागू सेवा नियम/नीति में “near relative” का प्रावधान है और पोता/पोती उस श्रेणी की निर्धारित शर्तों को पूरा करता है, तो उसके दावे पर विचार किया जा सकता है।

Principle No. 2

Dependency अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इस मामले में जितेन्द्र का पालन-पोषण दादी ने किया था और वह उन पर निर्भर था। CAT ने भी माना कि उपलब्ध दस्तावेज उसकी dependency सिद्ध करते हैं। 

Principle No. 3

यदि मृत कर्मचारी ने अपने Service Record में पोते/पोती को family member/legal heir/nominee के रूप में दर्ज कराया हो, तो यह महत्वपूर्ण supporting circumstance है।

Principle No. 4

यदि माता-पिता पहले ही मर चुके हों और claimant ही परिवार का एकमात्र surviving near relative हो, तो उसका मामला और मजबूत हो जाता है।

Principle No. 5

Succession Certificate और Compassionate Appointment दो अलग-अलग विषय हैं।

Succession Certificate मुख्यतः estate/dues प्राप्त करने के लिए हो सकता है। उससे अपने-आप अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार पैदा नहीं होता। लेकिन इस मामले में succession certificate सहित अन्य परिस्थितियाँ claimant के legal-heir status के समर्थन में महत्वपूर्ण थीं। 

Principle No. 6

दत्तक पुत्र होने का दावा असफल होने पर भी दावा पूरी तरह समाप्त नहीं होता, यदि संबंधित व्यक्ति “near relative” के रूप में पात्रता रखता हो।

Principle No. 7

अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य परिवार को तत्काल आर्थिक संकट से राहत देना है। इसलिए सक्षम प्राधिकारी को बार-बार तकनीकी आधार पर claim reject करके व्यक्ति को वर्षों तक litigation में नहीं धकेलना चाहिए।

हाईकोर्ट ने इसी कारण Railway के बार-बार rejection को गंभीरता से लिया और 30 दिन में नियुक्ति देने का निर्देश दिया। 

6. एक बहुत महत्वपूर्ण सावधानी — इसे “Universal Precedent” न मानें

यह सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु है।

सुप्रीम कोर्ट का 28.09.2026 का आदेश SLP dismissal है। उसने हाईकोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत reasoning देकर यह नहीं कहा कि:

> “हर deceased employee के grandson/granddaughter को compassionate appointment मिलेगी।”

इसलिए किसी अन्य मामले में केवल इस citation के आधार पर यह कहना कि “पोता होने के कारण नियुक्ति का वैधानिक अधिकार है”, सही नहीं होगा। 

बल्कि सही proposition होगा:

> “Where the governing compassionate appointment scheme extends the benefit to a ‘near relative’, a grandson/granddaughter may be considered within that category depending upon the facts, particularly dependency, absence of nearer eligible family members and the claimant's status as the surviving near relative.”

7. पहले के महत्वपूर्ण निर्णय जिन पर इस मामले में reliance लिया गया

Jitendra Verma के CAT आदेश में निम्न निर्णयों का उल्लेख हुआ है:

(1) Kishan v. Union of India & Another

2016 SCC OnLine CAT 4433

मुद्दा: Dependent Relative / compassionate appointment

उपयोग: “near/dependent relative” की अवधारणा के समर्थन में। 

(2) Rajvansh v. Union of India & Others

OA No. 638 of 2020

15.07.2023

Allahabad Bench, CAT

मुद्दा: Grandson और compassionate appointment। 

(3) Madhya Pradesh High Court – WP No. 5656/2021

04.01.2024

CAT के आदेश में इस निर्णय का उल्लेख है।

इसमें भी grandson के compassionate appointment claim के संदर्भ में सहायता ली गई। 

(4) Yashvant v. Union of India & Others

OA No. 203/929/2014

28.11.2017

Grandson को land acquisition employment के संदर्भ में eligible माना गया।

बाद में Chhattisgarh High Court, WP(S) No.1349/2018, decided 03.04.2018 ने उस आदेश को uphold किया। 

8. सबसे उपयोगी Citation कैसे लिखें

यदि आपको किसी आवेदन/रिट/अपील/लिखित बहस में इसे cite करना हो तो मैं इसे इस प्रकार लिखने की सलाह दूंगा:

> Union of India & Ors. v. Jitendra Verma, M.P. High Court, Jabalpur, Misc. Petition No.4473/2025, decided on 25.02.2026, Neutral Citation No. 2026:MPHC-JBP:16281.

और उसके बाद:

> SLP (C) Diary No.52008/2026, Union of India & Ors. v. Jitendra Verma, Supreme Court of India, order dated 28.09.2026.

कानूनी proposition: जहाँ लागू compassionate appointment scheme में “near relative” को नियुक्ति की अनुमति है, वहाँ केवल इस आधार पर कि claimant पोता/पोती है, claim को स्वतः अस्वीकार नहीं किया जा सकता; उसकी dependency, surviving family status तथा scheme की शर्तों के अनुसार पात्रता का परीक्षण आवश्यक है। 


Monday, 21 September 2026

PC Act बिचौलिये को रिश्वत देना सरकारी कर्मचारी का अपराध साबित करने के लिए काफ़ी नहीं: सुप्रीम कोर्ट 17 Sept 2026

PC Act  बिचौलिये को रिश्वत देना सरकारी कर्मचारी का अपराध साबित करने के लिए काफ़ी नहीं: सुप्रीम कोर्ट 17 Sept 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (16 सितंबर) को कहा कि सिर्फ़ यह साबित हो जाने से कि शिकायतकर्ता और बिचौलिये (जिसने किसी सरकारी कर्मचारी का नाम लिया था) के बीच पैसों का लेन-देन हुआ, यह साबित नहीं होता कि उस सरकारी कर्मचारी ने रिश्वत ली है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने भ्रष्टाचार के मामले में पूर्व रेलवे सुरक्षा बल (RPF) अधिकारी भरत राज मीणा को बरी करते हुए यह टिप्पणी की। अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि अपीलकर्ता ने बिचौलिये के ज़रिए गैर-कानूनी तौर पर पैसे की मांग की, या उसे स्वीकार किया [देखें नीरज दत्ता बनाम राज्य (NCT दिल्ली सरकार) 2022 LiveLaw (SC) 1029]। 

यह मामला CBI के ट्रैप से जुड़ा है, जिसमें RPF कर्मचारी पी.पी. नंदकुमार ने आरोप लगाया कि पोस्टिंग पाने के लिए ₹10,000 की मांग की गई। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी मीणा ने कॉन्स्टेबल अनंत नारायणन के ज़रिए पैसे की मांग की। बाद में कॉन्स्टेबल को रिश्वत के पैसे लेते हुए पकड़ा गया। ट्रायल कोर्ट द्वारा 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' की धारा 7 और 13(2) के साथ धारा 13(1)(a) के तहत सुनाई गई सज़ा को केरल हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखने के फ़ैसले से नाराज़ होकर आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। 

सज़ा रद्द करते हुए जस्टिस कोटिश्वर सिंह द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि आरोपी की ओर से किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा रिश्वत के पैसे लेना, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि आरोपी ने रिश्वत ली है। कोर्ट ने गौर किया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि बिचौलिये को मिले पैसे अंततः अपीलकर्ता तक पहुंचने वाले थे या वास्तव में अपीलकर्ता तक पहुँचे थे। कोर्ट ने R.P.S. यादव बनाम CBI मामले में 2015 के अपने फ़ैसले का हवाला देते हुए यह बात कही, 

 “सिर्फ़ पैसे की मांग करना और उसे किसी बीच के व्यक्ति को सौंपना काफ़ी नहीं है; ठोस सबूतों के ज़रिए इस पूरी कड़ी को उस बिंदु तक साबित करना ज़रूरी है, जहां यह दिखे कि पैसा असल में आरोपी तक पहुंचा या उसे आरोपी के लिए ही दिया गया। ऐसा न होने पर सज़ा बरकरार नहीं रखी जा सकती।” कोर्ट ने कहा, “इसलिए ऊपर बताई गई वजहों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि अभियोजन पक्ष ने अपीलकर्ता के ख़िलाफ़ मामला 'उचित संदेह से परे' (Beyond Reasonable Doubt) साबित किया, इसलिए अपीलकर्ता की सज़ा... बरकरार नहीं रखी जा सकती।” 

इसके अनुसार, कोर्ट ने अपील मंज़ूर की। कोर्ट ने कहा, “इसलिए हमारा मानना है कि ऊपर चर्चा किए गए उचित संदेहों को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि अपीलकर्ता के ख़िलाफ़ आरोप 'उचित संदेह से परे साबित होने' के सिद्धांत के तहत पूरी निश्चितता के साथ साबित हुए हैं। इसलिए PW-11 N.P. गोपी कुमार से जुड़े लेन-देन के मामले में अपीलकर्ता की सज़ा को एक्ट की धारा 7 के तहत बरकरार नहीं रखा जा सकता, और अपीलकर्ता इस लेन-देन में भी बरी किए जाने का हकदार है।” 

Cause Title: BHARAT RAJ MEENA VERSUS CENTRAL BUREAU OF INVESTIGATION



Saturday, 12 September 2026

पति स्वस्थ, सक्षम एवं कार्य करने योग्य होने के बावजूद पत्नी एवं नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण से केवल इस आधार पर बच नहीं सकता कि वर्तमान में उसकी कोई आय नहीं है अथवा वह बेरोजगार है।

 

आवेदिका की ओर से लिखित तर्क


विषय : पति स्वस्थ, सक्षम एवं कार्य करने योग्य होने के बावजूद पत्नी एवं नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण से केवल इस आधार पर बच नहीं सकता कि वर्तमान में उसकी कोई आय नहीं है अथवा वह बेरोजगार है।

1. विधिक स्थिति

यह स्थापित विधि है कि भरण-पोषण का प्रावधान सामाजिक न्याय का उपाय है। इसका उद्देश्य पत्नी एवं बच्चों को आर्थिक असहायता, अभाव, वंचना तथा भटकाव से बचाना है। वर्तमान में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144 के अंतर्गत यह अधिकार प्रवर्तनीय है। पूर्व में यही क्षेत्र दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के अंतर्गत आता था।

केवल यह तथ्य कि पति की वर्तमान आय शून्य बताई गई है, अपने-आप में उसे पत्नी एवं बच्चे के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त नहीं करता। न्यायालय पति की शारीरिक क्षमता, शैक्षणिक योग्यता, कार्य करने की क्षमता, पूर्व रोजगार, पूर्व आय, संपत्ति, जीवन-स्तर तथा वास्तविक earning capacity को देख सकता है।

A. माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्याय-दृष्टांत

1. Bhuwan Mohan Singh v. Meena & Ors.

Criminal Appeal No. 1331 of 2014

निर्णय दिनांक : 15.07.2014

Citation : (2015) 6 SCC 353; AIR 2014 SC 2875

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 125 CrPC का प्रमुख उद्देश्य सामाजिक न्याय प्रदान करना तथा पत्नी एवं बच्चों को destitution और vagrancy से बचाना है। न्यायालय ने यह भी प्रतिपादित किया कि सक्षम पति पत्नी के भरण-पोषण के दायित्व से इस प्रकार बच नहीं सकता कि उसके पास वर्तमान में पर्याप्त आय नहीं है। सक्षम एवं स्वस्थ व्यक्ति को आवश्यकता होने पर शारीरिक श्रम करके भी धन अर्जित करना होगा। न्यायालय ने धारा 125 को केवल तकनीकी प्रावधान न मानकर सामाजिक न्याय का प्रभावी साधन माना। उक्त निर्णय में पूर्ववर्ती निर्णयों, विशेषतः Chaturbhuj v. Sita Bai, को भी स्वीकार किया गया।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

यदि अनावेदक स्वस्थ है, किसी शारीरिक अथवा मानसिक अक्षमता से ग्रस्त नहीं है और कार्य करने में सक्षम है, तो केवल बेरोजगारी का कथन करके वह पत्नी एवं बच्चे के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता।

2. Shamima Farooqui v. Shahid Khan

Criminal Appeal Nos. 564-565 of 2015

निर्णय दिनांक : 06.04.2015

Citation : (2015) 5 SCC 705; (2015) 3 SCC (Civ) 274; (2015) 2 SCC (Cri) 785

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पत्नी के भरण-पोषण के संबंध में पति के दायित्व को अत्यंत स्पष्ट किया। न्यायालय ने माना कि भरण-पोषण की राशि ऐसी होनी चाहिए जिससे पत्नी सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सके। केवल पति की आर्थिक कठिनाई अथवा सेवानिवृत्ति आदि का आधार लेकर भरण-पोषण की राशि को अनुचित रूप से कम नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि पत्नी के वास्तविक जीवन-यापन के खर्च को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

अनावेदक यदि यह कहता है कि वह वर्तमान में कोई आय अर्जित नहीं कर रहा है, तो उसे अपनी वास्तविक आर्थिक स्थिति, कार्य करने की क्षमता तथा आय अर्जित करने में असमर्थता का विश्वसनीय प्रमाण देना होगा। मात्र मौखिक कथन पर्याप्त नहीं है।

3. Reema Salkan v. Sumer Singh Salkan

Civil/Criminal Maintenance Proceedings; Supreme Court

निर्णय वर्ष : 2019

Citation : (2019) 12 SCC 312

इस मामले में पति ने स्वयं को बेरोजगार बताया था। वह उच्च शिक्षित तथा able-bodied व्यक्ति था। सर्वोच्च न्यायालय ने उसके बेरोजगारी के दावे को परिस्थितियों के संदर्भ में देखा। न्यायालय ने पाया कि पति उच्च शिक्षित था, पूर्व में पर्याप्त आय अर्जित करता था और उसके द्वारा बेरोजगार होने का दावा पर्याप्त प्रमाण से समर्थित नहीं था। न्यायालय ने यह सिद्धांत स्वीकार किया कि शिक्षित एवं सक्षम पति केवल बेरोजगारी का दावा करके अपनी पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बाहर नहीं हो सकता। इस प्रकरण में उच्च न्यायालय द्वारा पति की earning capacity के आधार पर notional income का विचार किया गया था; सर्वोच्च न्यायालय ने quantum निर्धारित करते समय पति के पूर्व जीवन-स्तर, पूर्व आय, योग्यता और परिस्थितियों को भी महत्वपूर्ण माना।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

यदि अनावेदक स्वस्थ एवं कार्य करने योग्य है, तो उसकी वर्तमान आय शून्य बताने मात्र से उसकी earning capacity समाप्त नहीं हो जाती।

4. Rajnesh v. Neha & Anr.

Criminal Appeal No. 730 of 2020

निर्णय दिनांक : 04.11.2020

Citation : (2021) 2 SCC 324

यह भरण-पोषण के विषय में वर्तमान समय का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं व्यापक निर्णय है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने maintenance proceedings के लिए विस्तृत guidelines निर्धारित कीं। न्यायालय ने income disclosure affidavit, maintenance determination के factors, विभिन्न कार्यवाहियों में overlapping maintenance तथा बच्चों की शिक्षा एवं आवश्यकताओं सहित अनेक पहलुओं को व्यवस्थित किया। न्यायालय ने यह सिद्धांत स्वीकार किया कि able-bodied husband को पत्नी एवं बच्चों के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त आय अर्जित करने में सक्षम माना जा सकता है और वह अपनी कमाने की क्षमता को जानबूझकर निष्क्रिय करके maintenance liability से बच नहीं सकता।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

अनावेदक की वास्तविक आय स्पष्ट न होने पर न्यायालय उसकी qualification, occupation, previous employment, assets, lifestyle तथा earning capacity को ध्यान में रखकर उचित maintenance निर्धारित कर सकता है।

5. Anju Garg & Anr. v. Deepak Kumar Garg

Civil Appeal/Criminal proceedings concerning maintenance

निर्णय दिनांक : 28.09.2022

Citation : 2022 SCC OnLine SC 1314

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा कि पति का पत्नी एवं नाबालिग बच्चों को आर्थिक सहायता प्रदान करना उसका sacrosanct duty है। यदि पति able-bodied है तो उसे आवश्यकता पड़ने पर physical labour से भी धन अर्जित करना होगा और वह केवल यह कहकर अपने दायित्व से नहीं बच सकता कि उसके पास पर्याप्त आय नहीं है। न्यायालय ने Chaturbhuj v. Sita Bai तथा Bhuwan Mohan Singh v. Meena के सिद्धांतों को लागू किया और माना कि Section 125 CrPC सामाजिक न्याय का प्रावधान है।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

यदि अनावेदक स्वस्थ व्यक्ति है और कोई प्रमाणित अक्षमता नहीं है, तो उसका यह कहना कि “मैं कुछ नहीं कमाता” उसके maintenance obligation का बचाव नहीं हो सकता।

B. माननीय उच्च न्यायालय के न्याय-दृष्टांत

6. Sandeep Kumrawat v. Smt. Antima Kumrawat

High Court of Madhya Pradesh, Bench at Indore

Criminal Revision No. 825 of 2020

निर्णय दिनांक : 19.10.2023

Presiding Judge : Hon'ble Shri Justice Prem Narayan Singh

इस महत्वपूर्ण निर्णय में पति ने स्वयं को बेरोजगार बताया और maintenance कम करने का आग्रह किया। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने उसके तर्क को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि यदि पति कमाने में सक्षम है तो केवल नौकरी छोड़ देने अथवा बेरोजगार होने के आधार पर वह पत्नी एवं बच्चे के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता। न्यायालय ने Shamima Farooqui, Rajnesh v. Neha तथा अन्य सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के सिद्धांतों को लागू किया। विशेष रूप से न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि पति यदि B.Tech/Diploma Engineer जैसे योग्य व्यक्ति होने के बावजूद नौकरी छोड़ देता है, तो केवल नौकरी छोड़ देना maintenance liability से बचने का आधार नहीं बन सकता।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

यदि वर्तमान अनावेदक स्वयं स्वस्थ एवं सक्षम है और उसने अपनी इच्छा से रोजगार नहीं किया है अथवा रोजगार छोड़ दिया है, तो यह उसकी अपनी पसंद है और इसका आर्थिक भार पत्नी एवं बच्चे पर नहीं डाला जा सकता।

7. Kamal v. State of U.P.

Allahabad High Court

Criminal Revision No. 461 of 2023

निर्णय दिनांक : 25.01.2024

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने Anju Garg v. Deepak Kumar Garg के सिद्धांत को लागू करते हुए माना कि स्वस्थ एवं सक्षम पति यदि यह कहे कि उसके पास नौकरी अथवा अन्य स्रोत से कोई आय नहीं है, तब भी वह पत्नी के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त नहीं होता। न्यायालय ने यह भी माना कि यदि पति शारीरिक श्रम भी करे तो वह न्यूनतम मजदूरी अर्जित कर सकता है; अतः पूर्णतः स्वस्थ व्यक्ति द्वारा “मेरी कोई आय नहीं है” का कथन अपने-आप में पर्याप्त बचाव नहीं है।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

अनावेदक को अपनी पत्नी एवं बच्चे के भरण-पोषण के लिए वैध साधनों से आय अर्जित करने का प्रयास करना होगा। बेरोजगारी को पत्नी एवं बच्चे के विरुद्ध हथियार नहीं बनाया जा सकता।

8. Naresh v. Seema

Delhi High Court

Criminal Revision Petition No. 195 of 2024

निर्णय वर्ष : 2024

दिल्ली उच्च न्यायालय ने Anju Garg, Rajnesh, Bhuwan Mohan Singh और Shamima Farooqui के सिद्धांतों को लागू करते हुए कहा कि able-bodied husband अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण के लिए legitimate means से आय अर्जित करने के लिए बाध्य है। पति द्वारा यह कहना कि उसका व्यवसाय बंद हो गया है अथवा वर्तमान में आय का कोई स्रोत नहीं है, अपने-आप में maintenance liability समाप्त नहीं करता।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

अनावेदक स्वस्थ है तो उसकी earning capacity को ध्यान में रखा जाना चाहिए और पत्नी तथा नाबालिग बच्चे को केवल इसलिए अभाव में नहीं छोड़ा जा सकता कि पति वर्तमान में आय अर्जित नहीं कर रहा है।

3. समेकित विधिक सिद्धांत

उपरोक्त सभी न्याय-दृष्टांतों से निम्न विधिक सिद्धांत पूर्णतः स्थापित होते हैं—

(i) पत्नी एवं नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण करना पति/पिता का वैधानिक दायित्व है।

(ii) पति का स्वस्थ एवं able-bodied होना अत्यंत महत्वपूर्ण परिस्थिति है।

(iii) केवल “मैं बेरोजगार हूँ” अथवा “मेरी कोई आय नहीं है” कहना maintenance से बचने का वैध आधार नहीं है।

(iv) पति को अपनी पत्नी एवं बच्चों के भरण-पोषण हेतु वैध साधनों से आय अर्जित करने का प्रयास करना होगा।

(v) आवश्यकता होने पर सक्षम पति को physical labour से भी आय अर्जित करनी पड़ सकती है।

(vi) maintenance निर्धारित करते समय केवल disclosed income नहीं बल्कि पति की earning capacity, qualification, past employment, previous income, assets, lifestyle एवं सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी देखी जा सकती है।

(vii) पत्नी की आय होने मात्र से भी उसका maintenance claim स्वतः समाप्त नहीं होता; यह देखा जाना आवश्यक है कि वह वास्तव में स्वयं को किस सीमा तक maintain कर सकती है।

(viii) नाबालिग बच्चे का maintenance स्वतंत्र अधिकार है और बच्चे की food, clothing, residence, medical तथा educational requirements पर विशेष रूप से विचार किया जाना आवश्यक है।

4. वर्तमान मामले में निष्कर्ष

अतः यदि वर्तमान प्रकरण में यह तथ्य अभिलेख पर है कि—

1. अनावेदक पति स्वस्थ है;

2. वह किसी ऐसी बीमारी अथवा शारीरिक/मानसिक अक्षमता से ग्रस्त नहीं है जिससे वह कार्य न कर सके;

3. वह कार्य करने योग्य आयु एवं क्षमता में है;

4. उसके पास पर्याप्त शैक्षणिक/व्यावसायिक योग्यता अथवा पूर्व कार्य का अनुभव है;

5. वह अपनी पत्नी एवं नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण नहीं कर रहा है; और

6. उसने अपनी वास्तविक आय अथवा assets का पूर्ण एवं सत्य disclosure नहीं किया है,

तो केवल यह कथन कि “मैं कुछ नहीं कमाता” उसे maintenance liability से मुक्त नहीं करता।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Bhuwan Mohan Singh, Shamima Farooqui, Reema Salkan, Rajnesh v. Neha तथा Anju Garg में प्रतिपादित सिद्धांतों के आलोक में अनावेदक की earning capacity को उसकी वर्तमान घोषित आय से अलग करके देखा जाना आवश्यक है।

अतः माननीय न्यायालय से विनम्र निवेदन है कि अनावेदक के केवल बेरोजगार होने के कथन को स्वीकार न करते हुए उसकी वास्तविक आर्थिक क्षमता, योग्यता, पूर्व रोजगार/आय, संपत्ति, रहन-सहन तथा अन्य परिस्थितियों का समुचित मूल्यांकन किया जाए और आवेदिका पत्नी एवं नाबालिग बच्चे के लिए उचित, न्यायसंगत एवं सम्मानजनक भरण-पोषण राशि निर्धारित की जाए।

प्रार्थना

अतः माननीय न्यायालय से प्रार्थना है कि आवेदिका पत्नी एवं नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण हेतु परिस्थितियों एवं अनावेदक की वास्तविक earning capacity को दृष्टिगत रखते हुए उचित राशि प्रदान करने की कृपा की जाए तथा अनावेदक को केवल बेरोजगारी अथवा आय न होने के कथन के आधार पर उसके वैधानिक दायित्व से मुक्त न किया जाए।

दिनांक : ____________

स्थान : ____________

आवेदिका/आवेदक की ओर से

अधिवक्ता

इसी संबंध में हिमाचल पदेश हाई कोर्ट का एक जजमेंट सितंबर 2026 में भी आया है

Wednesday, 9 September 2026

रिटायरमेंट के बाद गवर्नर की मंजूरी के बिना विभागीय कार्रवाई जारी नहीं रह सकती

 रिटायरमेंट के बाद गवर्नर की मंजूरी के बिना विभागीय कार्रवाई जारी नहीं रह सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-09-09

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ उसकी रिटायरमेंट से पहले शुरू की गई विभागीय कार्रवाई रिटायरमेंट के बाद अपने आप जारी नहीं रह सकती। सिविल सर्विस रेगुलेशंस के रेगुलेशन 351-ए के तहत रिटायरमेंट के बाद ऐसी कार्रवाई जारी रखने और उसके आधार पर कोई सजा देने के लिए गवर्नर की मंजूरी जरूरी है।

जस्टिस अनिल कुमार गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ यूपी बनाम श्री कृष्ण पांडे और भागीरथी जेना बनाम बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के फैसलों के साथ-साथ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले हरिहर भोले नाथ मिश्रा बनाम स्टेट पब्लिक सर्विसेज ट्रिब्यूनल पर भरोसा करते हुए यह फैसला सुनाया।

र्ट ने कहा कि रेगुलेशन 351-ए के तहत सरकारी कर्मचारी की रिटायरमेंट के बाद उसके खिलाफ पहले से शुरू की गई विभागीय कार्रवाई स्वतः जारी नहीं रह सकती। उसके आधार पर कोई दंड भी नहीं दिया जा सकता। यहां तक कि पहले से शुरू की गई कार्रवाई को जारी रखने के लिए भी गवर्नर की मंजूरी आवश्यक है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रेगुलेशन 351-ए के तहत कर्मचारी की रिटायरमेंट के चार साल बाद नई विभागीय कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती। पहले से शुरू कार्रवाई को रिटायरमेंट के बाद जारी रखने के लिए भी गवर्नर की मंजूरी लेना अनिवार्य है।

मामला बलिया के जिला समाज कल्याण अधिकारी कार्यालय में तैनात रहे एक वरिष्ठ लिपिक से जुड़ा था। उनके खिलाफ 11 अगस्त 2005 को विभागीय कार्रवाई शुरू की गई। उन्होंने कुछ जरूरी दस्तावेज मांगे थे, लेकिन उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया। इसके बाद 30 अक्टूबर 2006 को एकतरफा जांच रिपोर्ट पेश कर दी गई।

कार्रवाई पूरी होने से पहले ही कर्मचारी 31 मार्च 2008 को रिटायर हो गए। विभागीय कार्रवाई लंबित होने के कारण उनके सेवानिवृत्ति लाभ भी रोक दिए गए।

बाद में एक आदेश जारी कर उन्हें पिछली तारीख से सेवा से हटाया हुआ माना गया। अपील में यह आदेश रद्द कर दिया गया और रेगुलेशन 351-ए के तहत कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया। इसके बाद सामाजिक कल्याण निदेशक ने 27 दिसंबर 2011 के आदेश से कर्मचारी की 50 प्रतिशत पेंशन स्थायी रूप से रोक दी।

स्टेट पब्लिक सर्विसेज ट्रिब्यूनल ने इस आदेश को रद्द किया। इसके खिलाफ राज्य की ओर से दायर याचिका को हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 15 जनवरी 2014 को गवर्नर की मंजूरी नहीं होने के कारण खारिज कर दिया। इसके बाद सामाजिक कल्याण निदेशक ने 13 फरवरी 2014 को विभागीय कार्रवाई समाप्त कर दी।

इसके बावजूद 15 जनवरी 2015 को उसी विभागीय कार्रवाई के आधार पर एक नया आदेश पारित कर कर्मचारी की पेंशन का दो-तिहाई हिस्सा स्थायी रूप से रोक दिया गया। साथ ही 36,98,603 रुपये की वसूली का भी आदेश दिया गया।

हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से पेश वकील यह नहीं बता सके कि कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के बाद गवर्नर की कोई मंजूरी ली गई थी। न तो विवादित आदेश में ऐसी मंजूरी का उल्लेख था और न ही राज्य के जवाबी हलफनामे में इसका कोई प्रमाण पेश किया गया।

कोर्ट ने कहा कि निदेशक इस तथ्य से पूरी तरह अवगत थे कि गवर्नर की मंजूरी नहीं ली गई। इसके बावजूद उन्होंने उसी कार्रवाई के आधार पर आदेश पारित किया। कोर्ट ने इसे कर्मचारी को परेशान करने और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले उसके वैध लाभों को रोकने की जानबूझकर की गई कोशिश माना।

हाईकोर्ट ने 15 जनवरी 2015 के विवादित आदेश रद्द करते हुए याचिका मंजूर की। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि कर्मचारी को उसके सभी देय रिटायरमेंट लाभ 8 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ आठ सप्ताह के भीतर जारी किए जाएं।

कोर्ट ने कहा कि आदेश की प्रमाणित प्रति संबंधित अधिकारी संख्या तीन के समक्ष पेश किए जाने के आठ सप्ताह के भीतर भुगतान नहीं किया गया तो देय राशि पर 12 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होगा।

साबित करने के लिए पर्याप्त... जाति साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज न होने भर से SC-ST को संवैधानिक लाभ से वंचित नहीं कर सकते: केरल हाईकोर्ट

साबित करने के लिए पर्याप्त... जाति साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज न होने भर से SC-ST को संवैधानिक लाभ से वंचित नहीं कर सकते: केरल हाईकोर्ट 7 Sept 2026 

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC/ST) का सदस्य अपनी जातीय पहचान साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर पाया केवल इस आधार पर उसे संविधान के तहत मिलने वाले लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। इसके लिए राज्य को उसके दावे के विपरीत ठोस और स्वतंत्र साक्ष्य पेश करना होगा। डॉ. जस्टिस ए.के. जयशंकरन नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के. की डिवीजन बेंच ने कहा कि केरल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति सामुदायिक प्रमाणपत्र जारी करने के विनियमन अधिनियम 1996 के तहत जाति दावों की जांच करते समय अधिकारियों को SC-ST सदस्यों से वही प्रमाण का बोझ पूरा करने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, जो सामान्य परिस्थितियों में किसी नागरिक से उसकी सामुदायिक पहचान साबित करने के लिए की जाती है। 

  अदालत रिटायर्ड पोस्टल असिस्टेंट की अपील पर सुनवाई कर रही थी। सिंगल बेंच ने उस कार्रवाई को बरकरार रखा, जिसमें उन्हें मलई पंडारम अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं माना गया। अपीलकर्ता को 1980 में पोस्टमैन के पद पर और 1989 में पोस्टल असिस्टेंट के पद पर अनुसूचित जनजाति आरक्षण के तहत नियुक्ति और पदोन्नति मिली थी। यह लाभ तहसीलदार द्वारा जारी सामुदायिक प्रमाणपत्र के आधार पर मिला था, जिसमें उन्हें मलई पंडारम समुदाय का सदस्य बताया गया। 

बाद में सतर्कता जांच में दावा किया गया कि वह मलई पंडारम नहीं, बल्कि पंडारम (वीर शैव) समुदाय से संबंधित हैं, जिसे अन्य पिछड़ा वर्ग में रखा गया। जांच के आधार पर स्क्रूटिनी कमेटी ने उनका सामुदायिक प्रमाणपत्र रद्द करने सहित कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद सरकार ने उनकी सेवा समाप्त करने और कथित झूठा जाति दावा करने के आरोप में अभियोजन चलाने का आदेश दिया। अपीलकर्ता ने अधिकारियों द्वारा भरोसा किए गए दस्तावेजों और सामग्री में विसंगतियां होने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि सतर्कता रिपोर्ट में मुख्य रूप से उनके मामा के कथित बयान पर भरोसा किया गया, जबकि मामा खुद अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित बताए गए। उन्होंने यह भी बताया कि उनके परिवार के अन्य सदस्यों को अनुसूचित जनजाति की पहचान के आधार पर लाभ मिल चुके हैं। अपीलकर्ता ने अपने खिलाफ इस्तेमाल किए गए मूल दस्तावेज देखने की मांग की थी लेकिन प्रतिकूल आदेश पारित करने से पहले उन्हें ये दस्तावेज नहीं दिखाए गए। 

डिवीजन बेंच ने पाया कि अपीलकर्ता की आपत्ति और उसके जवाब पर आदेश पारित करते समय विचार ही नहीं किया गया। अदालत ने राज्य की यह दलील भी खारिज की कि उपलब्ध सामग्री पर्याप्त होने के कारण आपत्ति पर विचार न करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं है। अदालत ने कहा कि 1996 के कानून के नजरिए से भी स्क्रूटिनी कमेटी का दृष्टिकोण सही नहीं था। जाति की गलत जानकारी देकर आरक्षण या अन्य संवैधानिक लाभ हासिल करने के आरोपों की जांच करते समय अधिकारियों को उन सामाजिक कठिनाइयों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए, जिनका सामना SC/ST समुदायों के सदस्यों को अपनी पहचान से जुड़े दस्तावेज हासिल करने में करना पड़ता है। 

 हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जिनमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को पहचान संबंधी दस्तावेजों के अभाव में ही लाभों से वंचित कर दिया जाता है। अदालत ने कहा कि पहचान और जाति प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज हासिल करने में इन समुदायों के लोगों को होने वाली कठिनाइयों को वह अपने समक्ष आने वाले मामलों की संख्या के आधार पर न्यायिक संज्ञान में ले सकती है। अदालत ने कहा कि जाति दावों की जांच करते समय अधिकारियों को समग्र परिस्थितियों पर विचार करते हुए उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इसमें परिवार के अन्य सदस्यों, यहां तक कि विस्तारित परिवार के सदस्यों को सामाजिक सुरक्षा या आरक्षण संबंधी लाभ दिए जाने जैसे पहलुओं को भी देखा जाना चाहिए। डिवीजन बेंच ने कहा कि एक ओर राज्य यह स्वीकार करता है कि SC/ST समुदायों को अन्य नागरिकों के बराबर लाने के लिए सकारात्मक कार्रवाई जरूरी है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं समुदायों के सदस्यों से अपनी पहचान साबित करने के लिए सामान्य नागरिकों के समान कठोर प्रमाण की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि एससी-एसटी सदस्यों को संविधान से मिले लाभों से वंचित करना केवल असाधारण मामलों में उचित होगा, जहां स्पष्ट धोखाधड़ी स्वतंत्र रूप से उपलब्ध सरकारी सामग्री से साबित हो। जहां आवश्यक हो, इसमें उस अधिकारी द्वारा की गई कथित धोखाधड़ी का प्रमाण भी शामिल होना चाहिए, जिसने संबंधित जाति प्रमाणपत्र जारी किया था और जिसके आधार पर व्यक्ति को सेवा संबंधी लाभ मिले। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी दावेदार का अपनी सामुदायिक पहचान साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर पाना, अपने आप में संवैधानिक लाभ छीनने का आधार नहीं हो सकता, जब तक राज्य उसके दावे के विपरीत सकारात्मक और ठोस साक्ष्य पेश न करे। अदालत ने स्क्रूटिनी कमेटी की कार्यवाही और उसके आधार पर सरकार द्वारा पारित आदेश दोनों रद्द कर दिए। कमेटी को मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया गया है। उसे अपीलकर्ता की पहले दी गई आपत्ति और उसके द्वारा पेश की जाने वाली अतिरिक्त सामग्री पर विचार करना होगा तथा उसके खिलाफ इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों के मूल रिकॉर्ड का निरीक्षण करने का अवसर भी देना होगा। नई कार्यवाही हाईकोर्ट के फैसले की प्रति प्राप्त होने से छह महीने के भीतर पूरी करनी होगी। अदालत ने कमेटी को यह भी निर्देश दिया कि वह अपीलकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों पर लागू प्रमाण के बोझ को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणियों को ध्यान में रखे। नई कार्यवाही पूरी होने तक अपीलकर्ता को अस्थायी पेंशन लेते रहने की भी अनुमति दी गई है। डिवीजन बेंच ने इस निर्देश के साथ रिट अपील मंजूर की।


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