Thursday, 28 August 2025

एमपी हाई कोर्ट का आदेश, न्यायालय में केस होने के कारण विभागीय जांच नहीं रोकी जा सकती

एमपी हाई कोर्ट का आदेश, न्यायालय में केस होने के कारण विभागीय जांच नहीं रोकी जा सकती, कर्मचारियों की याचिका ख़ारिज

शिकायतकर्ता ओमप्रकाश चंद्रवंशी की शिकायत पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने अप्रैल 2023 में दोनों कर्मचारियों  *अभिषेक पारे और गौरीशंकर मीणा* को रिश्वत लेते हुए को रंगे हाथ पकड़ा था।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एफसीआई के दो कर्मचारियों की याचिका को ख़ारिज कर उन्हें झटका दिया है, कोर्ट ने कहा भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में किसी भी विभागीय जाँच को इस आधार पर नहीं रोका नहीं जा सकता कि मामला कोर्ट में चल रहा है।

फूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया के दो कर्मचारियों ने हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर उनके खिलाफ चल रही विभागीय जांच रोकने का अनुरोध किया था, याचिका में कर्मचारियों ने कहा कि विभागीय जांच के कारण कोर्ट केस में उन्हें अपना बचाव करने में उन्हें मुश्किल होगी।

FCI के दो कर्मचारियों ने DE रोकने की की मांग  

बता दें FCI के दो कर्मचारियों अभिषेक पारे और गौरीशंकर मीणा को CBI ने अप्रैल 2023 में एक शिकायत के आधार पर रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा था, सीबीआई ने भ्रष्टाचार के इस मामले में दोनों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की और फिर जून 2023 में अदालत में चालान पेश किया।

करोड़ों रुपये खर्च कर एयरपोर्ट का विस्तार, नहीं बढ़ी फ्लाइट की संख्या, हाई कोर्ट ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय को जारी किया नोटिस

याचिकाकर्ताओं ने दिया ये तर्क 

सीबीआई द्वारा एफआईआर दर्ज होने के बाद एफसीआई ने दोनों कर्मचारियों के खिलाफ आरोप पत्र जारी किये और विभागीय जांच के आदेश दिए, इसी विभागीय जाँच को रुकवाने दोनों कर्मचारी हाई कोर्ट पहुंच गए, उन्होंने तर्क दिया कि विभागीय जाँच और आपराधिक मुकदमा साथ साथ चलने से उन्हें परेशानी हो रही है।

हाई कोर्ट ने ख़ारिज की याचिका 

जस्टिस विवेक जैन की अदलत में हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ताओं संजय अग्रवाल, मुकेश अग्रवाल और उत्कर्ष अग्रवाल ने पक्ष रखते हुए विभागीय जाँच को रोकने का अनुरोध किया लेकिन अदालत ने उनकी अनुरोध को स्वीकार नहीं किया, कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोपों में विभागीय जांच को रोका नहीं जा सकता, इतना कहकर अदालत ने याचिका ख़ारिज कर दी।

जबलपुर से संदीप कुमार की रिपोर्ट 

Tuesday, 19 August 2025

सिविल मामले में अपराधिक मामला बनाकर धन की वसूली के संबंध में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिए गए आदेश निरस्त किये - सुप्रीम कोर्ट

सिविल  मामले में अपराधिक मामला बनाकर धन की वसूली के संबंध में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिए गए आदेश निरस्त किये - सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस पारदीवाला ने कहा, हाई कोर्ट जज को आपराधिक काम से दूर रखा जाए, केवल डीबी में सीनियर जज के साथ ही बिठाया जाये

 "इस मामले के किसी भी दृष्टिकोण से चूंकि माननीय सीजेआई से लिखित अनुरोध प्राप्त हुआ है। उसी के अनुरूप, हम 4 अगस्त 2025 के अपने आदेश से पैरा 25 और 26 को हटाते हैं। आदेश में तदनुसार सुधार किया जाए। हम इन पैराग्राफों को हटाते हुए अब इस मामले की जांच का काम इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पर छोड़ते हैं। हम पूरी तरह से स्वीकार करते हैं कि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ही रोस्टर जारी करते हैं। ये निर्देश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की प्रशासनिक शक्ति में बिल्कुल भी हस्तक्षेप नहीं करते हैं। जब मामले कानून के शासन को प्रभावित करने वाली संस्थागत चिंताओं को जन्म देते हैं तो यह न्यायालय हस्तक्षेप करने और सुधारात्मक कदम उठाने के लिए बाध्य हो सकता है।" हालांकि, खंडपीठ ने कहा कि विवादित आदेश "विकृत" और "अवैध" था। खंडपीठ ने रिखब ईरानी मामले में पूर्व सीजेआई संजीव खन्ना और जस्टिस संजय खन्ना की खंडपीठ द्वारा हाल ही में पारित आदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा नागरिक अपराधों पर FIR दर्ज करने पर चिंता व्यक्त की गई थी। खंडपीठ ने निष्कर्ष में कहा, "हमें उम्मीद है कि भविष्य में हमें किसी भी हाईकोर्ट से इस तरह के विकृत और अन्यायपूर्ण आदेश का सामना नहीं करना पड़ेगा। हाईकोर्ट का प्रयास हमेशा कानून के शासन को बनाए रखना और संस्थागत विश्वसनीयता बनाए रखना होना चाहिए। यदि न्यायालय के भीतर ही कानून के शासन को बनाए नहीं रखा जाता या संरक्षित नहीं किया जाता है तो यह देश की संपूर्ण न्याय प्रणाली का अंत होगा। किसी भी स्तर के जजों से अपेक्षा की जाती है कि वे कुशलतापूर्वक काम करें, अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करें और हमेशा अपनी संवैधानिक शपथ को पूरा करने का प्रयास करें।" 

Case Details: M/S. SHIKHAR CHEMICALS v THE STATE OF UTTAR PRADESH AND ANR|SLP(Crl) No. 11445/2025


https://hindi.livelaw.in/supreme-court/after-cjis-request-supreme-court-recalls-direction-to-remove-allahabad-hc-judge-from-criminal-jurisdiction-300303

Sunday, 17 August 2025

रजिस्टर्ड वसीयत की प्रामाणिकता की धारणा होती है, इसकी वैधता पर विवाद करने वाले पक्ष पर सबूत का भार: सुप्रीम कोर्ट

रजिस्टर्ड वसीयत की प्रामाणिकता की धारणा होती है, इसकी वैधता पर विवाद करने वाले पक्ष पर सबूत का भार: सुप्रीम कोर्ट 

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (21 जुलाई 2025) को दोहराया कि रजिस्टर्ड 'वसीयत' के उचित निष्पादन और प्रामाणिकता की धारणा होती है और सबूत का भार वसीयत को चुनौती देने वाले पक्ष पर होता है। ऐसा मानते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया, जिसमें विवादित भूमि में अपीलकर्ता/लासुम बाई का हिस्सा कम कर दिया गया था और रजिस्टर्ड वसीयत और मौखिक पारिवारिक समझौते के आधार पर उनका पूर्ण स्वामित्व बरकरार रखा।

*अदालत ने कहा* 

पारिवारिक समझौते (जिसके संबंध में अदालत ने कहा, पारिवारिक समझौते (जिसके संबंध में मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत किए गए) और रजिस्टर्ड वसीयत के अनुसार संपत्तियों का वितरण लगभग समान अनुपात में है। वसीयत रजिस्टर्ड दस्तावेज है और इसलिए इसकी प्रामाणिकता के बारे में एक अनुमान है। निचली अदालत ने अपने समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर वसीयत के निष्पादन को स्वीकार कर लिया। चूंकि वसीयत रजिस्टर्ड दस्तावेज है, इसलिए उस पक्षकार, जिसने इसके अस्तित्व पर विवाद किया था, जो इस मामले में प्रतिवादी-मुथैया होगा, पर यह स्थापित करने का दायित्व होगा कि वसीयत कथित तरीके से निष्पादित नहीं की गई या ऐसी संदिग्ध परिस्थितियां थीं, जिनके कारण यह संदिग्ध हो गई। हालांकि, प्रतिवादी-मुथैया ने अपने साक्ष्य में रजिस्टर्ड वसीयत पर दिखाई देने वाले हस्ताक्षरों को अपने पिता एम. राजन्ना के हस्ताक्षरों के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वादी-लसुम बाई के पास 6 एकड़ और 16 गुंटा ज़मीन थी, जो वसीयत के अनुसार उनके हिस्से में आती थी। इस पृष्ठभूमि में निचली अदालत का यह मानना सही था कि एम. राजन्ना ने अपनी मूर्त संपत्ति का अपने कानूनी उत्तराधिकारियों के बीच उचित वितरण किया था। 24 जुलाई, 1974 की वसीयत और मौखिक पारिवारिक समझौते को निष्पादित करते हुए। हमारा मानना है कि अभिलेखों में उपलब्ध साक्ष्य मौखिक पारिवारिक समझौते के अस्तित्व और उसकी ठोस प्रकृति को पुष्ट करते हैं, जिसकी पुष्टि विवादित संपत्ति सहित मुकदमे की अनुसूची की संपत्तियों के कब्जे के तथ्य से होती है, जो स्वीकार्य रूप से वादी-लसुम बाई और बाद में क्रेता यानी जनार्दन रेड्डी के पास थी।" 

तदनुसार, अदालत ने निचली अदालत का फैसला बहाल कर दिया, जिससे अपीलकर्ता/लसुम बाई को संपत्ति का पूर्ण स्वामी घोषित कर दिया गया।


 Cause Title: METPALLI LASUM BAI (SINCE DEAD) AND OTHERS VERSUS METAPALLI MUTHAIH(D) BY LRS

Friday, 15 August 2025

शादी का असाध्य रूप से टूटना' अनुच्छेद 142 शक्तियों का उपयोग करते हुए विवाह को भंग करने का आधार: सुप्रीम कोर्ट

'शादी का असाध्य रूप से टूटना' अनुच्छेद 142 शक्तियों का उपयोग करते हुए विवाह को भंग करने का आधार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक खंडपीठ ने महत्वपूर्ण फैसले में सोमवार को कहा कि वह भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग कर सकता है, जो विवाह के असाध्य रूप से टूटने के आधार पर तलाक दे सकता है, जो अभी तक वैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त आधार नहीं है। कोर्ट ने कहा, "हमने माना कि इस अदालत के लिए विवाह के असाध्य रूप से टूटने के आधार पर विवाह को भंग करना संभव है। यह सार्वजनिक नीति के विशिष्ट या मौलिक सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करेगा।"

न्यायालय ने माना कि इसने उन कारकों को निर्दिष्ट किया है, जिनके आधार पर विवाह को असाध्य रूप से टूटा हुआ माना जा सकता है और भरण-पोषण, गुजारा भत्ता और बच्चों के अधिकारों के संबंध में इक्विटी को कैसे संतुलित किया जाए। विशेष रूप से खंडपीठ ने यह भी कहा कि आपसी सहमति से तलाक के लिए छह महीने की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि को पिछले निर्णयों में निर्धारित आवश्यकताओं और शर्तों के अधीन किया जा सकता है। जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस ए.एस. ओका, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेके माहेश्वरी की संवैधानिक खंडपीठ ने फैसला सुनाया।

जस्टिस संजय खन्ना ने फैसले के ऑपरेटिव हिस्से को पढ़कर सुनाया। संविधान पीठ को भेजा गया मूल मुद्दा यह था कि क्या हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13बी के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि को माफ किया जा सकता है। हालांकि, सुनवाई के दौरान, संविधान पीठ ने इस मुद्दे पर विचार करने का निर्णय लिया कि क्या विवाहों के असाध्य रूप से टूटने के आधार पर भंग किया जा सकता है। संविधान पीठ ने 20 सितंबर, 2022 को पारित अपने आदेश में दर्ज किया,

"हम मानते हैं कि अन्य प्रश्न जिस पर विचार करने की आवश्यकता होगी, वह यह होगा कि क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्ति किसी भी तरह से ऐसे परिदृश्य में बाधित है जहां न्यायालय की राय में विवाह का असाध्य रूप से टूटना है, लेकिन पक्षकार शर्तों पर सहमति नहीं दे रहे हैं।" सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह, कपिल सिब्बल, वी गिरी, दुष्यंत दवे और मीनाक्षी अरोड़ा को मामले में एमीसी क्यूरी नियुक्त किया गया। जबकि जयसिंह ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों के प्रयोग में असाध्य रूप से टूटे हुए विवाहों को भंग किया जाना चाहिए।


दवे ने तर्क देने के लिए विपरीत दृष्टिकोण प्रस्तुत किया कि न्यायालयों को ऐसी शक्ति का प्रयोग नहीं करना चाहिए जब संसद ने अपने विवेक में तलाक के लिए इस तरह के आधार को मान्यता नहीं दी। गिरि ने तर्क दिया कि विवाह के असाध्य रूप से टूटने को मोटे तौर पर क्रूरता के आधार के रूप में माना जा सकता है, जिसे मानसिक क्रूरता को शामिल करने के लिए न्यायिक रूप से व्याख्या की गई है। सिब्बल ने तर्क दिया, "पुरुषों और महिलाओं को अपने जीवन को खोने से रोकने के लिए भरण-पोषण और कस्टडी को निर्धारित करने की प्रक्रिया को तलाक की कार्यवाही से पूरी तरह से अलग किया जाना चाहिए।" अरोड़ा ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 142 के तहत अपने असाधारण अधिकार क्षेत्र को सक्रिय करने के बाद सुप्रीम कोर्ट वैधानिक कानून से बाध्य नहीं है, जैसे कि कहा गया कि न्याय, इक्विटी और अच्छे विवेक की धारणाओं को शामिल किया। संविधान पीठ ने 29 सितंबर, 2022 को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया। उल्लेखनीय है कि पिछले हफ्ते दो न्यायाधीशों की पीठ ने माना कि विवाह के अपरिवर्तनीय रूप से टूटने को विवाह भंग करने के लिए 'क्रूरता' के आधार के रूप में माना जा सकता है। 


केस टाइटल: शिल्पा सैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन [टीपी (सी) नंबर 1118/2014] और अन्य जुड़े मामले


https://hindi.livelaw.in/category/news-updates/fine-court-proceedings-black-magic-tis-hazari-court-301029

मजिस्ट्रेट/सेशन कोर्ट डिफ़ॉल्ट बेल देने में सक्षम, भले ही नियमित जमानत याचिका हाईकोर्ट में लंबित हो: P&H हाईकोर्ट

*मजिस्ट्रेट/सेशन कोर्ट डिफ़ॉल्ट बेल देने में सक्षम, भले ही नियमित जमानत याचिका हाईकोर्ट में लंबित हो: P&H हाईकोर्ट*

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय, जैसा भी मामला हो, किसी अभियुक्त को डिफ़ॉल्ट ज़मानत देने का अधिकार रखता है, भले ही नियमित ज़मानत आवेदन सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में लंबित हो। यह घटनाक्रम एक नियमित ज़मानत याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें आवेदन के लंबित रहने के दौरान, अभियुक्त ने 3 महीने पूरे कर लिए थे और मजिस्ट्रेट ने सीआरपीसी की धारा 167(2) के तहत डिफ़ॉल्ट ज़मानत दे दी थी, जो धारा 187(3) बीएनएसएस के अनुरूप है।

"जब नियमित ज़मानत याचिका उच्च न्यायालय में लंबित थी, तब भी सत्र न्यायालय डिफ़ॉल्ट ज़मानत देने के लिए सक्षम है, जिसे बाध्यकारी ज़मानत या वैधानिक ज़मानत भी कहा जाता है, और इसी प्रकार मजिस्ट्रेट डिफ़ॉल्ट ज़मानत देने के लिए सक्षम है, भले ही नियमित ज़मानत याचिका सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में लंबित थी।" एम. रविन्द्रन बनाम खुफिया अधिकारी, राजस्व खुफिया निदेशालय सहित कई निर्णयों का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया गया कि यदि अभियुक्त ने जमानत के लिए आवेदन किया है, तो डिफ़ॉल्ट जमानत पर रिहा होने का अधिकार लागू रहता है, भले ही जमानत आवेदन लंबित हो; या अभियोजन पक्ष द्वारा न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र या समय विस्तार की मांग वाली रिपोर्ट बाद में दाखिल की गई हो; या उस अंतराल के दौरान आरोप पत्र दाखिल किया गया हो जब जमानत आवेदन की अस्वीकृति को चुनौती उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित हो।

न्यायालय ने बिक्रमजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य (2020) का भी उल्लेख किया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि, "डिफ़ॉल्ट ज़मानत का अधिकार, जैसा कि इस न्यायालय के निर्णयों द्वारा सही ढंग से माना गया है, संहिता की धारा 167(2) के प्रथम प्रावधान के अंतर्गत केवल वैधानिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का हिस्सा है, जो, इसलिए, धारा 167(2) के प्रथम प्रावधान की शर्तें पूरी होने पर अभियुक्त को ज़मानत पर रिहा करने का एक मौलिक अधिकार है।"

न्यायाधीश ने कहा कि, "डिफ़ॉल्ट ज़मानत का वैधानिक अधिकार भारत के क्षेत्राधिकार में प्रत्येक व्यक्ति को प्रदत्त मौलिक अधिकारों से उत्पन्न होता है।" अदालत ने आगे कहा कि भले ही ऐसे कोई विशिष्ट नियम और निर्देश हों जिनके अनुसार किसी भी न्यायालय में ज़मानत याचिका दायर करते समय, उच्च न्यायालय में ज़मानत याचिका के लंबित रहने की जानकारी संबंधित न्यायालय को दी जानी चाहिए, फिर भी ऐसे कोई भी नियम, आदेश या निर्देश मजिस्ट्रेट और सत्र न्यायालय की डिफ़ॉल्ट ज़मानत देने की वैधानिक शक्तियों को ज़रा भी कम या कम नहीं कर सकते, क्योंकि ये भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों में गहराई से अंतर्निहित हैं। अदालत ने कहा कि, सीआरपीसी की धारा 167(2) या बीएनएसएस की धारा 187(2) के तहत प्रदत्त शक्तियां तब तक प्रभावी नहीं होतीं जब तक कि विधानमंडल द्वारा निर्दिष्ट समय-सीमा के भीतर पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती। अदालत ने आगे बताया कि, "धारा 187(2) बीएनएसएस, 2023 के तहत दी गई डिफ़ॉल्ट ज़मानत का अधिकार, जो सीआरपीसी, 1973 की धारा 167(2) के अनुरूप है, पुलिस रिपोर्ट के अभाव में 60 दिन, 90 दिन या 180 दिन की वैधानिक अवधि से अधिक या कुछ क़ानूनों के तहत आगे की अवधि के विस्तार, जैसा भी मामला हो, से अधिक हिरासत की अनुमति नहीं देता है।"

कोर्ट ने कहा, 

"विधायी मंशा बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि किसी को एकतरफा आरोपों पर गिरफ्तार किया गया है, तो जांच क़ानून द्वारा जांच एजेंसियों को प्रदान की गई समय-सीमा के भीतर पूरी की जानी चाहिए। यदि जांचकर्ता निर्दिष्ट समय-सीमा के भीतर अपनी जांच पूरी करने में असमर्थ हैं, तो ऐसे अभियुक्त को, यदि गिरफ्तार किया गया है और हिरासत में है, तो क़ानून द्वारा निर्दिष्ट समय-सीमा से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है।" न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कार्यालय आदेश, अधिसूचनाएं जारी करने या नियम बनाने से भी मजिस्ट्रेटों को बीएनएसएस, 2023 की धारा 187 या सीआरपीसी, 1973 की धारा 167 के तहत डिफ़ॉल्ट ज़मानत देने के उनके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। उपरोक्त के आलोक में, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि, "उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय में ज़मानत याचिका लंबित रहने से मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय, जैसा भी मामला हो, बीएनएसएस, 2023 की धारा 187(2) या सीआरपीसी, 1973 की धारा 167(2) के तहत उनकी वैधानिक शक्तियों से वंचित नहीं होंगे।" इसके विपरीत, पीठ ने कहा, "यदि मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय ऐसी परिस्थितियों में डिफ़ॉल्ट ज़मानत नहीं देते हैं, तो ऐसे न्यायालय द्वारा मौलिक अधिकार का उल्लंघन या माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का उल्लंघन करने की संभावना हो सकती है।"


https://hindi.livelaw.in/punjab-and-haryana-high-court/haryana-ssc-prima-facie-guilty-of-contempt-not-conducting-candidates-biometric-verification-high-court-recall-of-exam-results-300912

Wednesday, 13 August 2025

तलाक के बाद आपराधिक कार्यवाही जारी रखना बेकार - सुप्रीम कोर्ट

 माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित किया है कि *तलाक के बाद आपराधिक कार्यवाही जारी रखना बेकार* तलाक  हो जाने के बाद अपराधिक प्रकरण का औचित्य नहीं। रिस्तेदारो के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई समाप्त की गई।

मांगे राम विरुद्ध मध्य प्रदेश राज्य व अन्य, SLP(C) 10817/2024 निर्णय दिनांक 12/08/2025 

Saturday, 9 August 2025

आरोपी के लिए अग्रिम जमानत की याचिका दाखिल करने से पहले सत्र न्यायालय जाना अनिवार्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

आरोपी के लिए अग्रिम जमानत की याचिका दाखिल करने से पहले सत्र न्यायालय जाना अनिवार्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया है कि किसी आरोपी के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि वह अग्रिम जमानत की मांग को लेकर पहले सत्र न्यायालय जाए और तभी उच्च न्यायालय का रुख करे। अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दो आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि हाईकोर्ट इस बात की जांच करने में विफल रहा कि क्या इन मामलों में सीधे उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का उपयोग उचित था।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने की, जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 482 के तहत दायर अग्रिम जमानत याचिकाओं पर उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेशों के खिलाफ दायर आपराधिक अपीलों की सुनवाई कर रही थी।

अपीलों का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“विवादित आदेश यह दर्शाते हैं कि उच्च न्यायालय ने इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया कि अग्रिम जमानत देने के संबंध में वह सत्र न्यायालयके साथ समान अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करता है।”

अदालत ने कनुमूरी रघुरामा कृष्णम राजू बनाम आंध्र प्रदेश राज्य [(2021) 13 SCC 822] तथा अरविंद केजरीवाल बनाम प्रवर्तन निदेशालय [2024 INSC 512] में दिएअपने पूर्व निर्णयों का हवाला दिया, और कहा: “यह आवश्यक नहीं है कि आरोपी पहले सत्र न्यायालय में जाए और तभी नियम के रूप में

उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत की याचिका दाखिल करे।” पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि उच्च न्यायालय की पाँच-न्यायाधीशों वाली वृहद पीठ ने हालही में इस स्थिति को स्पष्ट किया है कि यह संबंधित न्यायाधीश पर निर्भर करता है कि वह यह आकलन करे कि क्या किसी विशेष मामले में “विशेष परिस्थितियाँ” मौजूद हैं जो सीधे उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को उचित ठहराती हैं। पीठ ने कहा:“यह संबंधित न्यायाधीश का अधिकार होगा कि वह प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर यह राय बनाए कि क्या विशेष परिस्थितियाँ वास्तव में मौजूदहैं और प्रमाणित हैं।” (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); इस पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय को यह जांच करनी चाहिए थी


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