Monday, 11 May 2026

Order VII Rule 11 CPC | यह देखने के लिए कि क्या कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग से छिपाया गया, वाद-पत्र को ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट 2026-05-10

Order VII Rule 11 CPC | यह देखने के लिए कि क्या कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग से छिपाया गया, वाद-पत्र को ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट 2026-05-10 

CPC के आदेश VII नियम 11 के दायरे पर महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को वाद-पत्र की "ध्यान से और पूरी तरह" जांच करनी चाहिए ताकि यह देखा जा सके कि क्या किसी कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए छिपाया गया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर तथ्यों को जान-बूझकर छिपाया गया हो तो वाद-पत्र को खारिज किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा,

"ट्रायल कोर्ट को ऐसे बेतुके मुकदमों को रोकना चाहिए, जो कानून द्वारा वर्जित हैं। साथ ही ऐसे मामलों को भी, जहां कार्रवाई का कारण (Cause of Action) केवल एक भ्रम हो। इसके लिए उन्हें चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के पीछे छिपे सच को उजागर करना होगा और वाद-पत्र तथा उसके साथ लगे दस्तावेजों को ध्यान से और पूरी तरह पढ़ना होगा - बेहतर होगा कि यह काम मुकदमे के शुरुआती चरण में ही कर लिया जाए।"

इस मामले में कोर्ट ने दो आधारों पर वाद-पत्र खारिज किया - पहला, 'बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम' के तहत लगी रोक को छिपाने की कोशिश की गई, जिसके लिए मुकदमे को इस तरह से पेश किया गया जैसे वह किसी वसीयत पर आधारित हो। दूसरा, वादी ने यह तथ्य छिपाया था कि वह वसीयतकर्ता की हत्या का आरोपी है।

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अदालतों को कार्रवाई के असली कारण और चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए गढ़े गए झूठे कारण के बीच फर्क करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि CPC के आदेश VII नियम 11 के तहत जांच करते समय वाद-पत्र के केवल रूप या भाषा पर नहीं, बल्कि उसके मूल तत्व (Substance) पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"अगर चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए कोई मनगढ़ंत कारण खड़ा करके कानून के तहत लगी रोक को छिपाने की कोशिश की जाती है तो कोर्ट के लिए उस वाद-पत्र को खारिज करना अनिवार्य हो जाता है।"

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों का फैसला आमतौर पर मुकदमे के शुरुआती चरण में नहीं किया जा सकता, फिर भी अदालतों को यह जांचने का अधिकार है कि क्या वादी द्वारा किए गए दावे का मूल आधार कानूनी रूप से सही और मान्य है।

न्यायालय ने टिप्पणी की,

“एक बार जब वाद-पत्र (Plaint) संस्थापन के लिए प्रस्तुत किया जाता है तो इसे स्वीकार किए जाने से पहले यह ट्रायल कोर्ट का कर्तव्य है कि वह वाद-पत्र की सामग्री को सत्यापित करे और यह सुनिश्चित करे कि वाद-पत्र को स्वीकार करने से पहले सभी कानूनी आवश्यकताओं को पूरा किया गया। एक ट्रायल कोर्ट यांत्रिक रूप से वाद-पत्र को स्वीकार नहीं कर सकता और वाद को पंजीकृत नहीं कर सकता। वाद-पत्र की स्वीकृति एक यांत्रिक प्रक्रिया नहीं हो सकती, जिसके द्वारा रजिस्ट्री के नोट को न्यायालय द्वारा केवल अनुमोदित कर दिया जाए। यदि, वाद-पत्र की स्वीकृति के चरण पर ट्रायल कोर्ट वाद-पत्र को ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि वाद-पत्र अस्वीकृत किए जाने योग्य है तो वह वाद-पत्र को अस्वीकृत कर देगा। ट्रायल कोर्ट के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह प्रतिवादी के उपस्थित होने और वाद-पत्र की अस्वीकृति की मांग करने की प्रतीक्षा करे। एक बार जब न्यायालय यह पाता है कि वाद तुच्छ है, अधिकार-क्षेत्र से बाहर है, पूर्व-शर्तों का पालन किए बिना दायर किया गया, कार्रवाई का कोई वास्तविक कारण (Cause of Action) प्रकट करने में विफल रहता है, महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाता है, या कानून द्वारा वर्जित है लेकिन कार्रवाई का कारण होने का भ्रम पैदा करने के लिए चालाकी से तैयार किया गया है तो उसे वाद-पत्र को लागत (Costs) सहित अस्वीकृत कर देना चाहिए।”

Cause Title: MANJULA AND OTHERS VERSUS D.A. SRINIVAS

Friday, 1 May 2026

तलाक वाद में मुद्दे तय किए बिना निर्णय देना केवल अनुमान आधारित आकलन: पटना हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया

 तलाक वाद में मुद्दे तय किए बिना निर्णय देना केवल अनुमान आधारित आकलन: पटना हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक संबंधी वाद में यदि ट्रायल कोर्ट स्पष्ट मुद्दे तय किए बिना निर्णय देता है तो ऐसा निर्णय विधिसम्मत नहीं माना जा सकता और वह केवल “अनुमान आधारित आकलन” बनकर रह जाता है।


जस्टिस नानी टैगिया और जस्टिस आलोक कुमार पांडे की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए मुजफ्फरपुर फैमिली कोर्ट द्वारा पति की तलाक याचिका खारिज करने का आदेश रद्द किया। निर्णय जस्टिस आलोक कुमार पांडे ने लिखा।


पति ने क्रूरता, परित्याग और व्यभिचार के आधार पर विवाह विच्छेद की मांग की थी। उसका कहना था कि जून 2007 में विवाह के बाद कुछ समय साथ रहने के पश्चात पत्नी वैवाहिक घर छोड़कर मायके चली गई और वापस नहीं लौटी।


पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी का किसी अन्य व्यक्ति से अवैध संबंध है तथा समझौते के प्रयासों के बावजूद उसने वैवाहिक जीवन पुनः शुरू करने से इनकार किया।


वहीं पत्नी ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उसे पति और उसके परिवार द्वारा दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया तथा शारीरिक और मानसिक क्रूरता के कारण उसे मायके में शरण लेनी पड़ी। उसने अवैध संबंध के आरोपों को भी निराधार बताया और वैवाहिक जीवन जारी रखने की इच्छा जताई।


हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच करते हुए पाया कि फैमिली कोर्ट ने पक्षकारों की विस्तृत दलीलों और परस्पर विरोधी तथ्यों के बावजूद धारा 13 के वैधानिक आधारों के अनुरूप कोई विशिष्ट मुद्दे तय नहीं किए।


अदालत ने कहा,


“विशिष्ट मुद्दे तय किए बिना दिया गया निष्कर्ष केवल एक अनुमान आधारित आकलन है, जो रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के अनुरूप नहीं है।”


खंडपीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने तथ्यों और साक्ष्यों का समग्र परीक्षण करने के बजाय चुनिंदा परिस्थितियों के आधार पर निष्कर्ष निकाल लिया, जिससे निर्णय प्रक्रिया मूलतः त्रुटिपूर्ण हो गई।


हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक जैसे मामलों में, विशेषकर जब क्रूरता, परित्याग और व्यभिचार जैसे गंभीर आरोप हों, ट्रायल कोर्ट का दायित्व है कि वह पक्षकारों की दलीलों के आधार पर स्पष्ट मुद्दे तय करे और प्रत्येक आधार पर स्वतंत्र रूप से साक्ष्य का परीक्षण करे।


इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का निर्णय और डिक्री रद्द करते हुए मामला पुनर्विचार हेतु वापस भेज दिया।


फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के अनुरूप विशिष्ट मुद्दे तय कर मामले का नए सिरे से यथाशीघ्र, अधिमानतः छह माह के भीतर निस्तारण करे।


अदालत ने पक्षकारों को यह स्वतंत्रता भी दी कि वे अपने वर्तमान वैवाहिक स्थिति संबंधी अतिरिक्त अभ्यावेदन ट्रायल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं।

Monday, 27 April 2026

7 साल तक की सजा वाले गैर-जमानती अपराधों में धारा 480(3) BNSS की शर्तें लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट 27 Apr 2026

7 साल तक की सजा वाले गैर-जमानती अपराधों में धारा 480(3) BNSS की शर्तें लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट 27 Apr 2026

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे गैर-जमानती अपराध जिनमें अधिकतम सजा सात वर्ष तक है, उनमें जमानत देते समय Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 480(3) के तहत निर्धारित शर्तें लागू नहीं की जा सकतीं। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोपी को Madhya Pradesh Excise Act (मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम) के तहत अवैध शराब रखने के आरोप में जमानत दी गई थी। इस अपराध में अधिकतम सजा तीन वर्ष निर्धारित है। 

 मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, इंदौर पीठ ने आरोपी की जमानत इस आधार पर रद्द कर दी थी कि उसने धारा 480(3) के तहत लगाई गई शर्तों का उल्लंघन किया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब संबंधित अपराध में सजा सात वर्ष से कम है, तो धारा 480(3) की शर्तें प्रारंभ से ही लागू नहीं होतीं। इसलिए इन शर्तों के उल्लंघन के आधार पर जमानत रद्द करना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने कहा कि धारा 480(3) के तहत शर्तें केवल उन्हीं गैर-जमानती अपराधों में लागू होती हैं, जिनमें सजा सात वर्ष या उससे अधिक हो। चूंकि इस मामले में अधिकतम सजा तीन वर्ष है, इसलिए ऐसी शर्तें लगाना ही विधि के अनुरूप नहीं था। 

 मामले की पृष्ठभूमि में, आरोपी को पहले हाईकोर्ट ने जमानत देते समय उक्त शर्तों के साथ राहत दी थी। बाद में राज्य ने यह आरोप लगाते हुए जमानत रद्द करने का आवेदन किया कि आरोपी ने दोबारा समान अपराध किया है। इस आधार पर हाईकोर्ट ने जमानत रद्द कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि जब शर्तें ही लागू नहीं थीं, तो उनके उल्लंघन का प्रश्न ही नहीं उठता। इसी आधार पर न्यायालय ने उच्च न्यायालय का आदेश निरस्त करते हुए आरोपी की जमानत बहाल कर दी।


https://hindi.livelaw.in/supreme-court/supreme-court-bail-section-4803-bharatiya-nagarik-suraksha-sanhita-non-bailable-offences-531900

Sunday, 26 April 2026

अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय कोर्ट आरोपी को सरेंडर करने का निर्देश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय कोर्ट आरोपी को सरेंडर करने का निर्देश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

2026-04-26 

सुप्रीम कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय किसी आरोपी को ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश देने का अधिकार कोर्ट के पास नहीं है।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"अगर कोर्ट अग्रिम ज़मानत खारिज करना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है, लेकिन कोर्ट के पास यह कहने का अधिकार नहीं है कि याचिकाकर्ता को अब सरेंडर कर देना चाहिए।"

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ऐसे व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिस पर धोखाधड़ी और जालसाज़ी का आरोप है। यह याचिका झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई, जिसमें उसकी अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज की थी और उसे सरेंडर करके नियमित ज़मानत मांगने के लिए कहा गया था।

शिकायतकर्ता ने 2021 में मजिस्ट्रेट के सामने निजी शिकायत दायर की, जिसमें ज़मीन विवाद के सिलसिले में IPC की धारा 323 (जानबूझकर चोट पहुंचाना), 420 (धोखाधड़ी), 467 (कीमती दस्तावेज़ की जालसाज़ी), 468 (धोखाधड़ी के मकसद से जालसाज़ी), 471 (जाली दस्तावेज़ का इस्तेमाल करना), और 120B (धारा 34 के साथ पठित) के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया।

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दूसरी अग्रिम ज़मानत याचिका इस आधार पर खारिज की कि कोई नई परिस्थितियां सामने नहीं आई थीं। कोर्ट ने अपने पिछले आदेश पर भरोसा किया, जिसमें उसने याचिकाकर्ता की पहली अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज की थी और याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करे और 'सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम CBI' मामले में दिए गए फैसले के अनुसार नियमित ज़मानत मांगे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा निर्देश पूरी तरह से अधिकार क्षेत्र से बाहर था। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई कोर्ट अग्रिम ज़मानत खारिज करने का फैसला करता है तो वह ऐसा कर सकता है, लेकिन वह आरोपी को सरेंडर करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।

कोर्ट ने समझाया कि एक बार जब कोई मजिस्ट्रेट संज्ञान लेता है और प्रक्रिया जारी करता है तो सामान्य तरीका समन जारी करना होता है। साथ ही आरोपी को केवल कोर्ट के सामने पेश होने और कार्यवाही में हिस्सा लेने की ज़रूरत होती है।

CrPC, 1973 की धारा 87 का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि समन के बजाय या उसके अतिरिक्त वारंट केवल तभी जारी किया जा सकता है, जब कोर्ट के पास यह मानने के उचित कारण हों कि आरोपी फरार हो गया है या वह समन का पालन नहीं करेगा, या यदि आरोपी को समन तामील होने के बावजूद बिना किसी उचित कारण के कोर्ट में पेश होने में विफल रहता है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस के पास किसी शिकायत वाले मामले में आरोपी को गिरफ़्तार करने का कोई अधिकार नहीं है, जब तक कि कोर्ट से कोई गैर-जमानती वारंट जारी न हो जाए। कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि CrPC की धारा 202 के तहत जांच के दौरान भी, जहां मजिस्ट्रेट कोई प्रक्रिया शुरू करने से पहले पुलिस रिपोर्ट माँग सकते हैं, पुलिस आरोपी को गिरफ़्तार नहीं कर सकती।

कोर्ट ने पाया कि इस कानूनी स्थिति के बावजूद, अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ियाँ नियमित रूप से दायर की जा रही हैं और उन पर सुनवाई हो रही है - खासकर बिहार और झारखंड में - जिसके चलते बेवजह के मुक़दमे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच रहे हैं।

कोर्ट ने कहा,

"बेवजह अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ियों पर सुनवाई की जाती है, और जब वे खारिज हो जाती हैं तो मुक़दमा लड़ने वालों को इस देश की सबसे बड़ी अदालत तक का सफ़र तय करना पड़ता है। हम हाईकोर्ट को यह भी याद दिलाते हैं कि याचिकाकर्ता को कोर्ट के सामने सरेंडर करके नियमित ज़मानत माँगने का जो निर्देश दिया गया, वह भी पूरी तरह से अधिकार क्षेत्र से बाहर है।"

चूंकि इस मामले में मुक़दमा पहले से ही चल रहा था, इसलिए कोर्ट ने यह देखते हुए याचिका का निपटारा किया कि अब और किसी आदेश की ज़रूरत नहीं है।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस आदेश की एक प्रति बिहार और झारखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जाए, ताकि वे इसे अपने-अपने चीफ जस्टिस के सामने रख सकें। कोर्ट ने राज्य के वकील से यह भी कहा कि वे इस मुद्दे की जांच करें और उसी के अनुसार राज्य को उचित सलाह दें।

Case Title – Om Prakash Chhawnika @ Om Prakash Chabnika @ Om Prakash Chawnika v. State of Jharkhand & Anr.

Friday, 24 April 2026

बार-बार सर्विस के बावजूद खराब बाइक ठीक न करने पर डीलर पर ₹30,000 का मुआवजा

बार-बार सर्विस के बावजूद खराब बाइक ठीक न करने पर डीलर पर ₹30,000 का मुआवजा: उपभोक्ता आयोग 23 Apr 2026

 जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, त्रिशूर ने एक मामले में डीलर को सेवा में कमी का दोषी ठहराते हुए मुआवजा देने का आदेश दिया, क्योंकि वह कई बार सर्विस के बावजूद मोटरसाइकिल की खामियां दूर करने में असफल रहा। शिकायतकर्ता, जो एक दिहाड़ी मजदूर है, ने 6 जनवरी 2021 को ₹87,000 में Hero Passion Pro 110 मोटरसाइकिल खरीदी थी, लेकिन जल्द ही उसमें मीटर और फ्यूल गेज की खराबी, पेट्रोल भरने में दिक्कत, ओवरहीटिंग और लगभग 60 किमी/घंटा की रफ्तार पर नियंत्रण में समस्या जैसी दिक्कतें आने लगीं। 

 कई बार सर्विस कराने के बावजूद समस्याएं बनी रहीं, जिसके बाद उसने उपभोक्ता आयोग का रुख किया। सुनवाई के दौरान विशेषज्ञ जांच में वाहन में तकनीकी खामियां पाई गईं, जबकि डीलर और निर्माता आयोग के समक्ष पेश नहीं हुए और मामला एकतरफा चला। आयोग ने माना कि डीलर द्वारा खामियां दूर न करना सेवा में कमी है, जबकि निर्माता के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला। 

इसके बाद आयोग ने डीलर को ₹20,000 मुआवजा, ₹10,000 मुकदमे का खर्च और शिकायत की तारीख से 9% ब्याज देने का निर्देश दिया।


https://hindi.livelaw.in/consumer-cases/consumer-commission-thrissur-defective-bike-case-service-deficiency-dealer-531476

अपील कोर्ट आरोपी की अपील के बिना भी सज़ा को पलट/बदल सकता है: सुप्रीम कोर्ट

अपील कोर्ट आरोपी की अपील के बिना भी सज़ा को पलट/बदल सकता है: सुप्रीम कोर्ट  24 Apr 2026

 सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अगर आरोपी सज़ा को चुनौती देने वाली अपील नहीं भी करता है तो भी अपील कोर्ट को सज़ा पलटने से रोका नहीं जा सकता। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, “अपील कोर्ट को यह अधिकार है कि वह ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए नतीजों और सज़ा की सच्चाई की जांच करे और न्याय के हित में उसे पलटे, बदले या पक्का करे।” यह बात असम राज्य की तरफ से एक मर्डर-रेप केस में रेस्पोंडेंट को बरी किए जाने के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए कही। 

 हाईकोर्ट, जिसने आरोपी को मर्डर और रेप के अपराधों से बरी किया था, उसे IPC की धारा 201 (सबूत गायब करना) के तहत किए गए अपराध के लिए दोषी ठहराया था। प्रतिवादी के खिलाफ़ आपत्तिजनक सामग्री की पहचान में गंभीर चूक के कारण बरी करने को बरकरार रखते हुए कोर्ट ने फिर भी प्रतिवादी को IPC की धारा 201 के तहत अपराध के लिए बरी कर दिया, भले ही उसके सामने सज़ा को चुनौती नहीं दी गई थी। कोर्ट के सामने एक सवाल यह आया कि क्या कोर्ट के लिए सज़ा को पलटना जायज़ है, जब प्रतिवादी-आरोपी ने उसे चुनौती नहीं दी थी। 

सकारात्मक उत्तर देते हुए जस्टिस मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि “आरोपी-प्रतिवादी द्वारा अपील न करना अपने आपमें इस कोर्ट को उसके अपीलीय अधिकार क्षेत्र से वंचित नहीं करता है”, ताकि सज़ा देने वाली अदालत द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्षों और सच्चाई की जांच की जा सके। कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 386 के तहत (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 427) अपील कोर्ट को ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए नतीजों और सज़ा की सच्चाई की जांच करने और न्याय के हित में उन्हें पलटने, बदलने या पक्का करने का अधिकार है। 

कोर्ट ने सज़ा में दखल सही ठहराते हुए कहा, “हमारा मानना है कि हाईकोर्ट ने IPC की धारा 201 के तहत सज़ा वाले अपराध के लिए आरोपी-प्रतिवादी की सज़ा को पक्का करने में साफ़ तौर पर गलती की है…ऊपर बताई गई अपील शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए हम IPC की धारा 201 के तहत आरोपी-प्रतिवादी की सज़ा और सज़ा में दखल देना सही समझते हैं, जैसा कि ऊपर बताया गया।” 

Cause Title: THE STATE OF ASSAM VERSUS MOINUL HAQUE @ MONU



 

पुलिस शिकायत वाले मामलों में आरोपी को तब तक गिरफ्तार नहीं कर सकती, जब तक समन के साथ-साथ गैर-जमानती वारंट जारी न हो जाए: सुप्रीम कोर्ट

पुलिस शिकायत वाले मामलों में आरोपी को तब तक गिरफ्तार नहीं कर सकती, जब तक समन के साथ-साथ गैर-जमानती वारंट जारी न हो जाए: सुप्रीम कोर्ट 24 Apr 2026

 सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (23 अप्रैल) को बिहार और झारखंड में गंभीर प्रक्रियात्मक अनियमितता की ओर ध्यान दिलाया। कोर्ट ने पाया कि शिकायत वाले मामलों में मुकदमेबाज़ इस आशंका से सेशंस कोर्ट / हाई कोर्ट में अग्रिम ज़मानत के लिए जाते हैं कि केवल प्रक्रिया (process) जारी होने से ही उनकी गिरफ्तारी हो जाएगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक बार प्रक्रिया जारी हो जाने के बाद मुकदमेबाज़ को केवल उस प्रक्रिया का पालन करना होता है, क्योंकि शिकायत वाले मामले में तब तक गिरफ्तारी नहीं हो सकती, जब तक प्रक्रिया को लागू करने के लिए गैर-जमानती वारंट जारी न किया गया हो। 

 जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने टिप्पणी की, "एक बार जब कोर्ट संज्ञान ले लेता है और समन जारी कर देता है तो आरोपी को बस इतना करना होता है कि वह उस कोर्ट के सामने पेश हो और कार्यवाही में शामिल हो। आरोपी को सेशंस कोर्ट या हाईकोर्ट (जैसा भी मामला हो) में जाकर अग्रिम ज़मानत की गुहार क्यों लगानी चाहिए? शिकायत वाले मामले में आरोपी को गिरफ्तार करने की पुलिस के पास कोई शक्ति नहीं होती, जब तक कि उस कोर्ट द्वारा समन के साथ-साथ गैर-जमानती वारंट जारी न किया गया हो।" 

 खंडपीठ ने यह टिप्पणी झारखंड हाईकोर्ट द्वारा अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ दायर एक अपील की सुनवाई करते हुए की। झारखंड हाईकोर्ट ने न केवल शिकायत वाले मामले में अग्रिम ज़मानत याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार किया और फिर खारिज किया, बल्कि अपीलकर्ता को ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश भी दिया; जिसके परिणामस्वरूप आरोपी व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। हाईकोर्ट के उस निर्देश को अस्वीकृत करते हुए, जिसमें अपीलकर्ता को शिकायत वाले मामले में ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करके नियमित ज़मानत मांगने के लिए कहा गया था, कोर्ट ने चिंता व्यक्त की कि इस तरह के दृष्टिकोण के कारण उसके सामने अनावश्यक अपीलें आ रही हैं। कोर्ट ने इसका कारण हाई कोर्ट द्वारा कानून के गलत अनुप्रयोग को बताया। 

Cause Title: OM PRAKASH CHHAWNIKA @ OM PRAKASH CHABNIKA @ OM PRAKASH CHAWNIKA VERSUS THE STATE OF JHARKHAND & ANR.



सिर्फ़ FIR के आधार पर हथियार का लाइसेंस रद्द नहीं किया जा सकता

सिर्फ़ FIR के आधार पर हथियार का लाइसेंस रद्द नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट  24 Apr 2026

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि हथियार का लाइसेंस सिर्फ़ FIR के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसमें हथियार के गलत इस्तेमाल या उसे चलाने का कोई ज़िक्र न हो। इलाहाबाद हाईकोर्ट के पिछले फ़ैसले राजीव कुमार @ मोनू शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (प्रधान सचिव, गृह और अन्य के ज़रिए) पर भरोसा करते हुए जस्टिस इरशाद अली ने कहा: “यह बिल्कुल साफ़ है कि सिर्फ़ FIR के आधार पर—जहां साफ़ तौर पर हथियार का कभी इस्तेमाल नहीं हुआ और हथियार के गलत इस्तेमाल के कोई आरोप नहीं हैं—लाइसेंस रद्द नहीं किया जा सकता।” 

 कहा- परेशान करने वाला चलन याचिकाकर्ता को उसके हथियार का लाइसेंस रद्द करने के संबंध में 'कारण बताओ नोटिस' जारी किया गया, जिसका आधार यह था कि हथियार का इस्तेमाल किसी अपराध में किया गया। याचिकाकर्ता ने जवाब दिया कि उसने नोटिस में बताए गए अपराध में अपने हथियार का इस्तेमाल नहीं किया और उसे झूठा फँसाया जा रहा है। याचिकाकर्ता का लाइसेंस कथित तौर पर मामले की खूबियों पर विचार किए बिना और उसके जवाब को नज़रअंदाज़ करते हुए रद्द कर दिया गया। 

 इससे दुखी होकर याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। राजीव कुमार @ मोनू शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (प्रधान सचिव, गृह और अन्य के ज़रिए) मामले में यह स्थापित करने के लिए कई केस लॉ का हवाला दिया गया था कि सिर्फ़ किसी आपराधिक मामले के लंबित होने से हथियार का लाइसेंस रद्द नहीं हो जाएगा। यह फ़ैसला दिया गया कि यह दिखाना ज़रूरी है कि ऐसे आपराधिक मामले में शामिल होना सार्वजनिक शांति और व्यवस्था के लिए हानिकारक होगा। 

 कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि इस बात को साबित करने के लिए कोई सामग्री मौजूद नहीं थी कि याचिकाकर्ता द्वारा हथियार का गलत इस्तेमाल किए जाने की संभावना थी और सहायक सामग्री के अभाव में यह निष्कर्ष मनमाना है। यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता को दो आपराधिक मामलों में बरी किया गया, कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा 'हथियार अधिनियम' (Arms Act) का उल्लंघन किए जाने का निष्कर्ष अवैध, मनमाना और ठोस कारणों पर आधारित नहीं है। तदनुसार, रिट याचिका स्वीकार की गई। 

Case Title: Aman Ullah v. State of U.P Thru Prin Secy Home Lko and Ors



CrPC की धारा 125 के तहत अंतिम भरण-पोषण आदेश हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अंतरिम राहत पर प्रभावी होगा

CrPC की धारा 125 के तहत अंतिम भरण-पोषण आदेश हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अंतरिम राहत पर प्रभावी होगा: कर्नाटक हाईकोर्ट 2026-04-23

कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक ही अवधि के लिए पति पर दो अलग-अलग मामलों में भरण-पोषण का बोझ नहीं डाला जा सकता। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दिया गया अंतिम भरण-पोषण आदेश हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) की धारा 24 के तहत दिए गए अंतरिम भरण-पोषण आदेश पर प्राथमिकता रखेगा।

जस्टिस डॉ. के. मनमधा राव की सिंगल बेंच ने कहा कि धारा 125 के तहत पारित आदेश साक्ष्यों के आधार पर अंतिम निर्णय होता है।इसलिए इसे प्रमुखता दी जानी चाहिए।

अदालत ने टिप्पणी की,

“एक ही अवधि के लिए समानांतर भरण-पोषण आदेश जारी रखना कानूनन सही नहीं है। इससे पति पर अनावश्यक दोहरा आर्थिक बोझ पड़ता है।”

मामला उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें पति ने परिवार अदालत द्वारा पत्नी को 10,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने के आदेश को चुनौती दी थी। साथ ही उसने अलग से चल रहे वैवाहिक विवाद में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत दिए गए 10,000 रुपये के अंतरिम भरण-पोषण आदेश को भी चुनौती दी थी।

अदालत ने कहा कि CrPC की धारा 125 का उद्देश्य जरूरतमंद व्यक्ति को स्थायी आर्थिक सहायता देना है, जबकि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत दी जाने वाली राशि केवल मुकदमे के दौरान अस्थायी सहायता के रूप में होती है।

हाईकोर्ट ने माना कि दोनों आदेशों को एक साथ लागू रखना डबल मेंटेनेंस की स्थिति पैदा करता है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है। इसलिए अदालत ने अधिनियम की धारा 24 के तहत दिए गए अंतरिम भरण-पोषण आदेश रद्द की।

हालांकि, अदालत ने पत्नी को दिए गए 20,000 रुपये के मुकदमे खर्च (लिटिगेशन खर्च) को बरकरार रखा और CrPC की धारा 125 के तहत दिए गए 10,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण को ही प्रभावी माना।

अदालत ने पति की पुनर्विचार याचिका खारिज की, जबकि अंतरिम भरण-पोषण के खिलाफ दायर याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया।

Monday, 13 April 2026

भूमि अधिग्रहण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि रेफरेंस कोर्ट (संदर्भ न्यायालय) को कलेक्टर के अवॉर्ड को निरस्त कर मामले को दोबारा कलेक्टर के पास भेजने (रिमांड) का अधिकार नहीं है।

 Allahabad Highcourt: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि रेफरेंस कोर्ट (संदर्भ न्यायालय) को कलेक्टर के अवॉर्ड को निरस्त कर मामले को दोबारा कलेक्टर के पास भेजने (रिमांड) का अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति संदीप जैन ने यह टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार की अपील को स्वीकार कर लिया। यह मामला सिद्धार्थनगर जिले के इटवा तहसील स्थित ग्राम तेनुआ ग्रांट में मैनाराजवाहा के निर्माण के लिए अधिग्रहित भूमि से जुड़ा है। वर्ष 2010 में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई थी और कलेक्टर ने 13 नवंबर 2019 को लगभग 1.14 करोड़ रुपये का मुआवजा निर्धारित किया था।


केस का सही स्वरूप (Reconstructed Case Info)

न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

न्यायाधीश: न्यायमूर्ति संदीप जैन (संभवतः, पर यहां पुष्टि आवश्यक है)

विषय: Land Acquisition Reference – Remand Power

स्थान: ग्राम तेनुआ ग्रांट, तहसील इटवा, जिला सिद्धार्थनगर (UP)

मुख्य प्रश्न: क्या Reference Court मामला वापस Collector को भेज सकता है?

⚖️ प्रतिपादित सिद्धांत (Correct Legal Principles)

Reference Court = Civil Court Powers (Limited Scope):

यह केवल मुआवजा तय करने के लिए है, न कि प्रशासनिक कार्य (remand) करने के लिए।

Remand Power नहीं है: Reference Court कलेक्टर के अवॉर्ड को रद्द कर वापस नहीं भेज सकता।

Duty to Decide: कोर्ट को खुद साक्ष्य लेकर अंतिम मुआवजा तय करना ही होगा।

Award is only an Offer: कलेक्टर का अवॉर्ड अंतिम नहीं, बल्कि प्रारंभिक प्रस्ताव होता है।

Avoid Delay: Remand से अनावश्यक विलंब होता है, जो न्याय के विपरीत है।

पत्नी का भविष्य के भरण-पोषण का अधिकार छोड़ने का समझौता सार्वजनिक नीति के खिलाफ, CrPC की धारा 125 के तहत दावा करने से नहीं रोकता

पत्नी का भविष्य के भरण-पोषण का अधिकार छोड़ने का समझौता सार्वजनिक नीति के खिलाफ, CrPC की धारा 125 के तहत दावा करने से नहीं रोकता: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट।

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि कोई भी ऐसा समझौता, जिसमें पत्नी किसी तय रकम के बदले भविष्य में पति से भरण-पोषण का दावा करने का अपना अधिकार छोड़ देती है, वह सार्वजनिक नीति के खिलाफ है। साथ ही यह समझौता उसे CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा करने से नहीं रोक सकता, क्योंकि यह एक कानूनी अधिकार है।

जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल की बेंच ने पति द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए कहा,

"पत्नी द्वारा भरण-पोषण के अधिकार को छोड़ देने से भरण-पोषण के उसके दावे पर कोई असर नहीं पड़ेगा।"

याचिकाकर्ता ने होशियारपुर की फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज द्वारा दिए गए उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें उनकी पत्नी को उसके आवेदन की तारीख से हर महीने ₹6,000 का भरण-पोषण भत्ता देने का आदेश दिया गया।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि पत्नी ने पति के साथ हुए एक समझौते के तहत अपने पिछले, मौजूदा और भविष्य के भरण-पोषण के लिए पहले ही एकमुश्त ₹60,000 की रकम ले ली थी। इस समझौते के तहत उसने प्रभावी रूप से भविष्य में भरण-पोषण का दावा करने का अपना अधिकार छोड़ दिया था।

उन्होंने आगे यह भी तर्क दिया कि पत्नी शारीरिक रूप से सक्षम महिला है और उसने खुद यह स्वीकार किया कि वह एक निजी नौकरानी के तौर पर काम करती है। इसलिए वह अपना भरण-पोषण खुद कर सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि वह दिहाड़ी मजदूर है और हर महीने सिर्फ ₹10,000/- ही कमा पाता है।

दूसरी ओर, पत्नी ने यह स्वीकार किया कि उसने पहले नौकरानी के तौर पर काम किया था, लेकिन उसकी कमाई से उसकी खाने-पीने और कपड़ों जैसी बुनियादी ज़रूरतें भी मुश्किल से ही पूरी हो पाती थीं। इन बातों को ध्यान में रखते हुए बेंच ने कहा कि "अपनी शारीरिक मेहनत के दम पर" गुज़ारा करने की उसकी कोशिश उसे भरण-पोषण का दावा करने से नहीं रोक सकती।

कोर्ट ने इस संबंध में निम्नलिखित टिप्पणी की:

"चूंकि पति अपनी पत्नी को किसी भी तरह का भरण-पोषण नहीं दे रहा था, इसलिए अपनी शारीरिक मेहनत के दम पर गुज़ारा करने की उसकी कोशिश उसे पति से भरण-पोषण का दावा करने से नहीं रोक सकती। न ही यह माना जा सकता है कि वह 'अपना भरण-पोषण खुद करने में असमर्थ' होने की श्रेणी में नहीं आती है। जब तक कोर्ट पति को भरण-पोषण भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं कर देता, तब तक पत्नी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह हाथ पर हाथ धरे बैठी रहे और भूखी मरे।"

पति के इस तर्क के संबंध में कि पत्नी ने भविष्य में भरण-पोषण के अपने अधिकार को छोड़ दिया, बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के 1978 के फैसले 'बाई ताहिरा बनाम अली हुसैन फिदाअली चोथिया' पर भरोसा किया।

इसमें यह कहा गया:

"...पत्नी और पति के बीच किया गया कोई भी समझौता—चाहे वह कोर्ट में दायर किसी समझौते के हिस्से के तौर पर हो या किसी और तरह से—जिसके तहत पत्नी, कुछ रकम मिलने के बदले भविष्य में पति से भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार छोड़ देती है या माफ कर देती है, वह 'लोक नीति' (Public Policy) के खिलाफ है और उसे भरण-पोषण का दावा करने से नहीं रोक सकता।"

नतीजतन, कोर्ट ने कहा कि पत्नी द्वारा भरण-पोषण के अधिकार को छोड़ देने से उसका दावा खारिज नहीं हो जाएगा। कोर्ट ने आगे कहा कि पहले ₹60,000 की रकम मिलना उसे अपने अधिकारों का दावा करने से नहीं रोकता, क्योंकि वह रकम पूरी ज़िंदगी के लिए काफी नहीं थी और वह अपर्याप्त थी।

इसके अलावा, बेंच ने ज़रूरी चीज़ों की बढ़ती कीमतों और जीवन-यापन की लागत को ध्यान में रखा और पाया कि फैमिली कोर्ट द्वारा पति की आय का अनुमान ₹20,000 प्रति माह लगाना उचित था।

सिंगल जज ने कहा,

"पति ने खुद माना कि उसने 10+2 (12वीं) तक पढ़ाई की है और उसके पास इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा है। वह स्वस्थ और शारीरिक रूप से सक्षम है। वह एक कुशल कारीगर है और गांव में राजमिस्त्री का काम करता है। राज्य सरकार द्वारा एक कुशल कारीगर के लिए तय की गई न्यूनतम मज़दूरी को देखते हुए उसकी आय का अनुमान ₹20,000 प्रति माह लगाना ज़्यादा नहीं कहा जा सकता।"

इसके साथ ही कोर्ट ने पत्नी की उचित ज़रूरतों—जिसमें उसके भोजन, कपड़े, रहने की जगह और इलाज का खर्च शामिल है—को ध्यान में रखते हुए ₹6,000 प्रति माह की भरण-पोषण राशि को बरकरार रखा। इस प्रकार, याचिका खारिज कर दी गई।

Friday, 10 April 2026

Ex-Parte भरण-पोषण आदेश को चुनौती देने से पहले धारा 145(2) BNSS के तहत रिकॉल अर्जी जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट 5 Apr 2026

Ex-Parte भरण-पोषण आदेश को चुनौती देने से पहले धारा 145(2) BNSS के तहत रिकॉल अर्जी जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट  5 Apr 2026 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि धारा 144 BNSS/धारा 125 CrPC के तहत पारित एकतरफा (ex parte) भरण-पोषण आदेश को चुनौती देने के लिए सीधे हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण (criminal revision) दाखिल नहीं किया जा सकता। जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पहले संबंधित फैमिली कोर्ट या न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 145(2) BNSS/धारा 126(2) CrPC के तहत आवेदन देकर आदेश को निरस्त (recall) कराने का प्रयास करना होगा। 

 मामला क्या था? मामले में पति ने देवरिया की फैमिली कोर्ट द्वारा पारित एकतरफा आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे पत्नी को ₹4,000 और दो नाबालिग बच्चों को ₹2,000-₹2,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट का अवलोकन: कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने विधि अनुसार नोटिस की सेवा के बाद आदेश पारित किया था और पति के पास वैकल्पिक वैधानिक उपाय उपलब्ध था। ऐसे में बिना उस उपाय का उपयोग किए सीधे हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल करना स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि कानून के तहत पक्षकार को पर्याप्त कारण दिखाकर एकतरफा आदेश को निरस्त कराने और मामले की मेरिट पर सुनवाई का अवसर पाने का अधिकार है। आदेश: हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए पति को संबंधित फैमिली कोर्ट के समक्ष जाने का निर्देश दिया। साथ ही, देरी होने की स्थिति में विलंब माफी (condonation of delay) के लिए आवेदन देने की भी अनुमति दी गई।


https://hindi.livelaw.in/allahabad-highcourt/allahabad-high-court-ex-parte-maintenance-order-section-125-crpc-529037

Tuesday, 7 April 2026

S.528 BNSS | विश्वसनीय सबूत आरोपों को गलत साबित कर दें तो आपराधिक कार्यवाही रद्द की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट

S.528 BNSS | विश्वसनीय सबूत आरोपों को गलत साबित कर दें तो आपराधिक कार्यवाही रद्द की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (6 अप्रैल) को फैसला सुनाया कि जहां अभियोजन पक्ष ऐसे विश्वसनीय और अकाट्य सबूतों का खंडन करने में विफल रहता है, जो शिकायत के तथ्यात्मक आधार को प्रभावी ढंग से कमजोर करते हैं, वहां कोर्ट के लिए कार्यवाही रद्द करने की अपनी शक्ति का प्रयोग करना उचित होगा। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने उन अपीलकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की, जिन पर एक बुजुर्ग व्यक्ति पर हमला करने का आरोप था। कोर्ट ने पाया कि CCTV फुटेज काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ, क्योंकि यह शिकायतकर्ता के उस बयान के विपरीत था, जिसका अभियोजन पक्ष ने कोई खंडन नहीं किया था। 

 कोर्ट ने टिप्पणी की, "जहां विश्वसनीय और अकाट्य सबूत स्पष्ट रूप से आरोपों के तथ्यात्मक आधार को गलत साबित कर देते हैं और अभियोजन पक्ष प्रभावी ढंग से उनका खंडन करने में असमर्थ रहता है, वहां अन्याय को रोकने के लिए कोर्ट अपनी अंतर्निहित अधिकारिता का प्रयोग करने में उचित होगा। ऐसा दृष्टिकोण न केवल आरोपी को न्याय दिलाता है, बल्कि उन कार्यवाहियों पर कीमती न्यायिक समय की बर्बादी को भी रोकता है, जिनका उपलब्ध सबूतों के आधार पर, दोषसिद्धि में परिणत होने का कोई उचित अवसर नहीं होता।" 

 यह मामला अक्टूबर, 2022 में कोलकाता के अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में हुए विवाद से जुड़ा है। 77 वर्षीय शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि कई लोगों ने उन पर और उनके परिवार पर हमला किया और उन्हें धमकाया, जिसके परिणामस्वरूप IPC की कई धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई, जिनमें गैर-कानूनी जमावड़ा, चोट पहुंचाना और आपराधिक धमकी शामिल हैं। हालांकि, कलकत्ता हाईकोर्ट ने विशिष्ट आरोपों के अभाव में दो सह-आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही रद्द की थी, लेकिन उसने तीन अपीलकर्ताओं को ऐसी ही राहत देने से इनकार किया, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 

अपील स्वीकार करते हुए जस्टिस मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में CCTV फुटेज की बारीकी से जांच की गई। यह फुटेज अभियोजन पक्ष की अपनी चार्जशीट का ही हिस्सा था। कोर्ट ने पाया कि फुटेज अपीलकर्ताओं के खिलाफ अभियोजन पक्ष के आरोपों का समर्थन नहीं करता। इसके विपरीत, फुटेज से यह साबित हुआ कि अपीलकर्ता हिंसा में शामिल होने के बजाय स्थिति को शांत करने का प्रयास कर रहे थे। अदालत ने टिप्पणी की, “वह फुटेज, जिस पर बहस के दौरान दोनों पक्षकारों ने काफी भरोसा किया, बारीकी से जांच करने पर यह नहीं दिखाता कि अपीलकर्ता किसी भी तरह के हमले या खुले तौर पर आक्रामकता वाले काम में शामिल थे। इस तरह उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की तथ्यात्मक बुनियाद काफी हद तक कमज़ोर हो जाती है। यह सामग्री किसी भी सार्थक तरीके से गलत साबित नहीं हुई। इसका स्वरूप ऐसा है कि इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता, यहां तक कि उस चरण में भी जब अदालत किसी आपराधिक मामले की कार्यवाही को शुरू में ही रद्द करने की याचिका पर विचार कर रही हो।” 

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया 'राजेश अग्रवाल' फैसला प्रदीप कुमार केसरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2025 LiveLaw (SC) 880 में तय किए गए कानून को लागू करते हुए—जिसमें अदालत ने वे कदम बताए, जिन पर हाईकोर्ट को CrPC की धारा 482 (अब BNSS की धारा 528 ) के तहत रद्द करने वाली याचिकाओं की सुनवाई करते समय विचार करना चाहिए—अदालत ने टिप्पणी की कि “ऐसी कार्यवाही को जारी रखना, जबकि उन्हें कथित अपराधों से जोड़ने वाली कोई भी विश्वसनीय सामग्री पूरी तरह से मौजूद नहीं है, आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।” प्रदीप कुमार केसरवानी (उपर्युक्त) मामले में, जो कसौटी तय की गई, वह इस प्रकार थी: 

"(i) पहला चरण: क्या अभियुक्त द्वारा जिस सामग्री पर भरोसा किया गया है, वह ठोस, तर्कसंगत और निर्विवाद है? यानी, क्या वह सामग्री अत्यंत उच्च और त्रुटिहीन गुणवत्ता की है? 

(ii) दूसरा चरण: क्या अभियुक्त द्वारा जिस सामग्री पर भरोसा किया गया, वह अभियुक्त पर लगाए गए आरोपों में निहित कथनों को खारिज करती है? यानी, क्या वह सामग्री शिकायत में निहित तथ्यात्मक कथनों को अस्वीकार करने और रद्द करने के लिए पर्याप्त है? यानी, क्या वह सामग्री ऐसी है जो किसी भी समझदार व्यक्ति को आरोपों के तथ्यात्मक आधार को झूठा मानकर खारिज करने और निंदा करने के लिए प्रेरित करे? 

(iii) तीसरा चरण: क्या अभियुक्त द्वारा जिस सामग्री पर भरोसा किया गया, उसका अभियोजन पक्ष/शिकायतकर्ता द्वारा खंडन नहीं किया गया? और/या क्या वह सामग्री ऐसी है, जिसका अभियोजन पक्ष/शिकायतकर्ता द्वारा उचित रूप से खंडन नहीं किया जा सकता है? 

(iv) चौथा चरण: क्या मुकदमे की कार्यवाही को आगे बढ़ाने से न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और क्या इससे न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं होगी? यदि इन सभी चरणों का उत्तर 'हाँ' में है तो हाईकोर्ट की न्यायिक अंतरात्मा को उसे ऐसी आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। ऐसा उसे CrPC की धारा 482 के तहत प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए करना चाहिए।" 

तदनुसार, अपील स्वीकार की गई और लंबित कार्यवाही रद्द की गई।

 Cause Title: SAJAL BOSE VERSUS THE STATE OF WEST BENGAL AND ORS.




Tuesday, 31 March 2026

सिर्फ एक ही पूर्वज होना पर्याप्त नहीं, संपत्ति को संयुक्त परिवार की नहीं माना जा सकता: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट 2026-03-31

सिर्फ एक ही पूर्वज होना पर्याप्त नहीं, संपत्ति को संयुक्त परिवार की नहीं माना जा सकता: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट 2026-03-31 

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया कि केवल यह तथ्य कि सभी पक्ष एक ही पूर्वज से संबंधित हैं, अपने आप में यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि संपत्ति संयुक्त परिवार की है।

जस्टिस विवेक जैन की पीठ ने कहा कि संयुक्त पारिवारिक संपत्ति होने का दावा करने वाले पक्ष पर यह जिम्मेदारी है कि वह इसका प्रथम दृष्टया प्रमाण प्रस्तुत करे।

अदालत ने कहा, *“केवल इसलिए कि मूल पूर्वज महादेव थे, यह नहीं माना जा सकता कि उनके वंशजों के नाम दर्ज कोई भी भूमि संयुक्त परिवार की संपत्ति है, जब तक इसके समर्थन में कोई दस्तावेज प्रस्तुत न किया जाए।”*

यह मामला शहदोल जिले की 8 जमीनों से जुड़ा था, जिसमें याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि वे और प्रतिवादी सभी एक संयुक्त हिंदू परिवार के सदस्य हैं और संपत्ति का कभी बंटवारा नहीं हुआ।

ट्रायल कोर्ट ने प्रारंभिक रूप से याचिकाकर्ताओं के पक्ष में अस्थायी निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) जारी करते हुए प्रतिवादियों को जमीन में हस्तक्षेप या उसे बेचने से रोका था।

हालांकि, अपीलीय अदालत ने इस आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि केवल वंश परंपरा के आधार पर संपत्ति को संयुक्त नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ताओं के पूर्वज संबंधित जमीन पर दर्ज थे या उनका उस पर अधिकार था।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि संयुक्त पारिवारिक संपत्ति साबित करने का भार याचिकाकर्ता पर ही है और केवल सामान्य पूर्वज का होना पर्याप्त आधार नहीं है।

Sunday, 29 March 2026

पहले का खरीदार बाद की बिक्री रद्द करने की मांग कर सकता है, बाद के सौदे पहले के अधिकारों को खत्म नहीं कर सकते: दिल्ली हाईकोर्ट 2026-03-29

पहले का खरीदार बाद की बिक्री रद्द करने की मांग कर सकता है, बाद के सौदे पहले के अधिकारों को खत्म नहीं कर सकते: दिल्ली हाईकोर्ट 2026-03-29 

दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि पहले के सौदे के तहत कोई खरीदार उसी विक्रेता द्वारा उसी प्रॉपर्टी की बाद में की गई बिक्री को चुनौती देने और उसे रद्द करवाने का हकदार है। कोर्ट ने इस बात की पुष्टि की कि ऐसे बाद के सौदे पहले के अधिकारों को खत्म नहीं कर सकते।

जस्टिस मिनी पुष्करणा ने अपने 86 पेज के फैसले में यह टिप्पणी की:

“जहां एक ही अचल संपत्ति के दो लगातार ट्रांसफर किए गए हों, वहां कानून में उस ट्रांसफर को प्राथमिकता मिलती है, जो समय के हिसाब से पहले हुआ हो, न कि उस ट्रांसफर को जो बाद में हुआ हो। यह प्रावधान एक लैटिन कहावत — 'qui prior est tempore potior est jure' — को दर्शाता है, जिसका अर्थ है कि जो व्यक्ति समय के हिसाब से पहले और पूर्ववर्ती है, कानून में उसकी स्थिति अधिक मजबूत होती है और उसे कानूनन बेहतर अधिकार प्राप्त होते हैं।”

इस मामले में 'सुबुदिनी कर बनाम श्रीमती सावित्री रानी देब' (2012) मामले का हवाला दिया गया, जिसमें गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 'संपत्ति अंतरण अधिनियम' (Transfer of Property Act) से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया कि जब अलग-अलग समय पर दो व्यक्तियों के पक्ष में समान अधिकार सृजित किए जाते हैं तो जिस व्यक्ति को समय के हिसाब से बढ़त हासिल है, उसे कानून में भी बढ़त मिलनी चाहिए।

हाईकोर्ट पश्चिम दिल्ली स्थित प्रॉपर्टी से जुड़े विवाद के संबंध में दायर अपील पर सुनवाई कर रहा था। इस मामले में प्रॉपर्टी के मूल मालिक ने सबसे पहले वर्ष 1988 में वादी (Plaintiff) के पक्ष में कुछ दस्तावेज निष्पादित किए, जिनमें 'बिक्री का करार' (Agreement to Sell), 'मुख्तारनामा' (Power of Attorney), वसीयत और अन्य सहायक दस्तावेज शामिल थे।

लगभग दो दशक बाद प्रॉपर्टी के सह-मालिकों में से एक की मृत्यु हो जाने पर उसी विक्रेता ने वर्ष 2006 में किसी तीसरे पक्ष (खरीदार) के पक्ष में दस्तावेजों का एक और सेट निष्पादित किया।

बाद वाले खरीदार (अपीलकर्ता) ने निचली अदालत के उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें वर्ष 2006 में किए गए 'बिक्री के करार' को 'शून्य और अमान्य' घोषित कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा:

“प्रस्तुत मामले में दोनों ही पक्षकारों के पास अपने नाम से रजिस्टर्ड 'बिक्री विलेख' (Sale Deed) मौजूद नहीं है। इसके बजाय, दोनों ही पक्ष विवादित प्रॉपर्टी पर अपने अधिकार और हित का दावा करने के लिए अन्य दस्तावेजों पर निर्भर हैं। रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद यह बात स्पष्ट रूप से जाहिर होती है कि प्रतिवादी नंबर 1 का विवादित प्रॉपर्टी पर बेहतर अधिकार है।”

अपीलकर्ता ने यह तर्क दिया कि चूंकि पहले वाला खरीदार (प्रतिवादी नंबर 1) वर्ष 2006 में हुए सौदे का पक्षकार नहीं था, इसलिए उसे उस सौदे या करार को रद्द करवाने की मांग करने का कोई अधिकार नहीं था। हालांकि, कोर्ट ने 'स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट' की धारा 31 का हवाला दिया, जो "किसी भी व्यक्ति" को, जिसे किसी लिखित दस्तावेज़ से नुकसान पहुंच सकता है, उसे रद्द करवाने की अनुमति देती है।

कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि किसी बाद के खरीदार को 'बोना फाइड' (नेक-नीयत) खरीदार माने जाने के लिए उसे यह साबित करना होगा कि उसे पहले हुए कॉन्ट्रैक्ट के बारे में कोई जानकारी नहीं थी - चाहे वह जानकारी प्रत्यक्ष हो, अप्रत्यक्ष हो या आरोपित हो।

कोर्ट ने कहा,

"...जहां कोई बाद का खरीदार सिर्फ़ बेचने वाले के बयानों पर भरोसा करता है और प्रॉपर्टी में मौजूद अन्य अधिकारों के बारे में आगे कोई जांच-पड़ताल करने से परहेज़ करता है तो वह 'मान ली गई जानकारी' (Deemed Notice) के परिणामों से बच नहीं सकता... चूंकि अपीलकर्ता खुद यह स्वीकार करता है कि उसने सिर्फ़ प्रतिवादी नंबर 2 के मौखिक आश्वासनों पर भरोसा किया। साथ ही खुद संबंधित अधिकारियों से रिकॉर्ड की जांच कभी नहीं की, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उसने 18 अगस्त, 2006 के 'बिक्री के समझौते' (Agreement to Sell) में शामिल होने से पहले उचित सावधानी बरती थी।"

इस प्रकार, कोर्ट ने पहले खरीदार के पक्ष में दिए गए फ़ैसले को बरकरार रखा और अपील खारिज की।

Case title: Rajeev Miglani v. Urmil Gujral & Anr.

Monday, 23 March 2026

केवल एक ही वारिस हो और कोई प्रतिस्पर्धी दावा न हो, वहां उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए ज़मानत की आवश्यकता नहीं

केवल एक ही वारिस हो और कोई प्रतिस्पर्धी दावा न हो, वहां उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए ज़मानत की आवश्यकता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट  2026-03-22 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 375 के तहत उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने के लिए ज़मानत की शर्त हर मामले में बिना सोचे-समझे नहीं लगाई जा सकती। कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में केवल एक ही वारिस हो, या किसी एक वारिस को प्रमाण पत्र जारी करने पर कोई आपत्ति न हो, वहां ऐसी शर्तें नहीं लगाई जानी चाहिए।

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 372 उन आवेदनों के बारे में बताती है, जो उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए ज़िला जज के समक्ष किए जा सकते हैं। धारा 373 ऐसे आवेदनों की प्रक्रिया बताती है और धारा 374 आवेदन की सामग्री बताती है।

अधिनियम की धारा 375 ज़िला जज को यह अधिकार देती है कि वह ऐसे मामलों में, जिन्हें वह उचित समझे, प्रमाण पत्र प्राप्त करने वाले व्यक्ति पर बॉन्ड के रूप में सुरक्षा संबंधी शर्तें लगा सके।

अधिनियम की धारा 375 का हवाला देते हुए जस्टिस मनीष कुमार निगम ने कहा,

“कोई शर्त तब लगाई जाती है, जब कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि यह किसी भी उद्देश्य के लिए आवश्यक है, जिसमें किसी ऋण का भुगतान, कोई अन्य दावेदार, वैधानिक अधिकारियों को कोई बकाया आदि शामिल हैं। हालांकि, किसी शर्त को लगाने पर विचार प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। किसी शर्त पर बिना सोचे-समझे ज़ोर नहीं दिया जा सकता, विशेष रूप से ऐसी स्थितियों में जहाँ लाभार्थी एकमात्र लाभार्थी हो, या अन्य उपयुक्त मामलों में, यदि लाभार्थी मृतक का स्वाभाविक वारिस हो और अन्य दावेदारों की ओर से कोई आपत्ति न हो।”

याचिकाकर्ता और प्रतिवादी सगी बहनें हैं और अपनी माँ की कानूनी वारिस हैं। वादी-याचिकाकर्ता ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 372 के तहत एक मामला दायर किया, जिसमें अपने पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने की प्रार्थना की गई। प्रतिवादी उपस्थित हुई और उसने याचिकाकर्ता के पक्ष में अपनी सहमति दी। तदनुसार, सिविल जज ने आवेदन स्वीकार की और निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता उस राशि के लिए एक सुरक्षा बॉन्ड और एक व्यक्तिगत बॉन्ड जमा करती है, जिसके लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी किया जा रहा है तो उसे प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाए।

इस शर्त को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

अदालत ने टिप्पणी की,

“ISA की धारा 375 को देखने से यह साफ़ पता चलता है कि सिक्योरिटी/ज़मानत/क्षतिपूर्ति बॉन्ड की शर्त लगाने का मकसद उन लोगों को क्षतिपूर्ति देना या उनके हितों की रक्षा करना है, जो कर्ज़ और सिक्योरिटी के पूरे या किसी हिस्से के हकदार हो सकते हैं।”

यह मानते हुए कि यह शर्त सभी मामलों में बिना सोचे-समझे लागू नहीं की जा सकती, अदालत ने फ़ैसला दिया कि चूंकि सर्टिफ़िकेट लेने वाला केवल एक ही वारिस था और दूसरी बेटी ने याचिकाकर्ता के पक्ष में अपनी सहमति दी थी, इसलिए बॉन्ड की शर्त लगाने का कोई औचित्य नहीं था।

याचिकाकर्ता को बिना ज़मानत के उत्तराधिकार सर्टिफ़िकेट जारी करने का निर्देश देते हुए अदालत ने रिट याचिका स्वीकार की।

Case Title: Smt. Alka Singhania Versus Smt. Shilpi Agarwal 2026 LiveLaw (AB) 120

Monday, 16 March 2026

चार्जशीट दाखिल होते ही नौकरी से हटाना सही नहीं

चार्जशीट दाखिल होते ही नौकरी से हटाना सही नहीं: मध्य प्रदेश हाइकोर्ट 2026-03-16 

मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि किसी आपराधिक मामले में केवल चार्जशीट दाखिल होने के आधार पर सरकारी कर्मचारी को स्वतः सेवा से बर्खास्त नहीं किया जा सकता।

अदालत ने एक होमगार्ड सैनिक को सेवा से हटाने का आदेश रद्द कर दिया।

जस्टिस आशीष श्रोती की पीठ ने कहा कि किसी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करते समय संबंधित प्राधिकारी को आरोपों की गंभीरता और उपलब्ध प्रारंभिक साक्ष्यों का आकलन करना जरूरी है। केवल FIR दर्ज होने और चालान पेश होने के आधार पर सेवा से हटाना उचित नहीं है।

मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ उसकी पत्नी ने क्रूरता, सार्वजनिक स्थान पर अश्लील कृत्य और धमकी देने सहित भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं तथा दहेज प्रतिषेध कानून की धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया था।

याचिकाकर्ता ने मध्य प्रदेश होमगार्ड नियम, 2016 के अनुसार FIR दर्ज होने की सूचना जिला कमांडेंट को दी।

इसके बाद उसे कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा गया कि नियमों के तहत उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए।

याचिकाकर्ता ने अपने जवाब में FIR दर्ज होने की परिस्थितियों की जानकारी दी लेकिन इसके बावजूद जनवरी में आदेश जारी कर उसे सेवा से हटा दिया गया।

अदालत ने कहा कि नियमों के अनुसार यदि किसी होमगार्ड के खिलाफ कोई अपराध दर्ज होता है तो उसे 48 घंटे के भीतर जिला कमांडेंट को इसकी सूचना देनी होती है। साथ ही किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से पहले कर्मचारी को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाना आवश्यक है।

हाइकोर्ट ने कहा कि दंड तय करते समय प्राधिकारी को आरोपों की गंभीरता और उनके समर्थन में उपलब्ध सामग्री पर विचार करना चाहिए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यहां तक कि यदि किसी कर्मचारी को दोषी ठहराया भी जाता है, तब भी हर मामले में सेवा से बर्खास्त करना अनिवार्य नियम नहीं है।

अदालत ने कहा कि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता अभी दोषी सिद्ध नहीं हुआ है और केवल FIR दर्ज हुई तथा चालान पेश किया गया। ऐसे में सेवा से हटाने का आदेश नियमों के अनुरूप नहीं है।

इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने सेवा से हटाने का आदेश रद्द करते हुए मामले को जिला कमांडेंट के पास वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि अदालत की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए नया आदेश पारित किया जाए।

Wednesday, 11 March 2026

वादी ज़रूरी जानकारी छिपाकर 'साफ़ हाथों' से कोर्ट नहीं आता, उसे 'विशिष्ट पालन' का अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट 2026-03-11

वादी ज़रूरी जानकारी छिपाकर 'साफ़ हाथों' से कोर्ट नहीं आता, उसे 'विशिष्ट पालन' का अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

2026-03-11 

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (10 मार्च) को 'विशिष्ट पालन' (Specific Performance) के लिए दायर एक मुकदमा खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि जो वादी ज़रूरी जानकारी छिपाकर 'साफ़ हाथों' (Unclean Hands) से कोर्ट नहीं आता, उसे 'विशिष्ट पालन' जैसी न्यायसंगत राहत पाने का अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने कहा,

"विशिष्ट पालन के मुकदमे में पक्षकारों का आचरण बहुत मायने रखता है। इससे कोर्ट को सबूतों का मूल्यांकन करने में मदद मिलती है ताकि यह पता चल सके कि समझौते के समय पक्षकारों की नीयत (Bona Fides) कैसी थी। अगर कोर्ट के मन में ज़रा सा भी शक पैदा होता है कि वादी की नीयत साफ़ नहीं थी। उसने समझौते से जुड़ी ज़रूरी बातें—जिनका समझौते पर सीधा असर पड़ता है—समझौते में और कोर्ट से भी छिपाकर रखी हैं, तो उसे यह न्यायसंगत और विवेकाधीन राहत नहीं दी जा सकती।"

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें अपीलकर्ता-वादी ने 'बिक्री के समझौते' (Agreement to Sell) के विशिष्ट पालन की मांग की थी। हालांकि, उसने अपने और प्रतिवादी-अभियुक्त के बीच हुए एक अहम 'समझौता ज्ञापन' (MoU) को छिपाकर रखा था। यह MoU उसके इस दावे के बिल्कुल उलट था कि यह लेन-देन एक असली बिक्री थी।

प्रतिवादी-अभियुक्त ने दलील दी कि पक्षों के बीच हुआ MoU यह दिखाता है कि यह लेन-देन असल में अपीलकर्ता द्वारा दिए गए कर्ज़ के लिए 'ज़मानत' (security) मात्र था। इसलिए MoU में लिखी शर्तों को छिपाकर अपीलकर्ता 'बिक्री के समझौते' को लागू करवाने की मांग नहीं कर सकता।

प्रतिवादी की दलील में दम पाते हुए जस्टिस मिश्रा द्वारा लिखे गए फ़ैसले में हाई कोर्ट के उस निर्णय को सही ठहराया गया, जिसमें अपीलकर्ता-वादी को विशिष्ट राहत देने से मना कर दिया गया। हाईकोर्ट ने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि वादी ने MoU की शर्तें छिपाकर रखी थीं। कोर्ट ने MoU को इस लेन-देन की असली प्रकृति का पता लगाने के लिए एक बहुत ही अहम दस्तावेज़ माना था।

कोर्ट ने कहा,

"जो वादी 'साफ़ हाथों' से कोर्ट नहीं आता—जैसा कि इस मौजूदा मामले में हुआ है, जहां वादी ने एक दस्तावेज़, यानी MoU (Exhibit B-2) को छिपाकर रखा; क्योंकि मुकदमे की अर्ज़ी (plaint) में इसका कहीं भी ज़िक्र नहीं था—यह मामला 'विशिष्ट पालन' की राहत देने से मना करने के लिए बिल्कुल सही था। हाईकोर्ट ने प्रतिवादी/अभियुक्त द्वारा दायर अपील सही ठहराते हुए, ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए फ़ैसले और आदेश रद्द करके बिल्कुल सही किया।"

नतीजतन, हाईकोर्ट के फ़ैसले में दखल देने का कोई आधार न पाते हुए अपील खारिज की।

Cause Title: MUDDAM RAJU YADAV VERSUS B. RAJA SHANKER (D) THROUGH LRS. & ORS.

Monday, 9 March 2026

पब्लिक सर्वेंट की शिकायत में CrPC की धारा 202 की जांच ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

पब्लिक सर्वेंट की शिकायत में CrPC की धारा 202 की जांच ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

 2026-03-09 12:13 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि मजिस्ट्रेट को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाले आरोपी को समन जारी करने से पहले CrPC की धारा 202 (अब BNSS की धारा 225) के तहत कानूनी जांच करने की ज़रूरत नहीं है, जो किसी पब्लिक सर्वेंट की अपनी ड्यूटी निभाते हुए की गई शिकायत के आधार पर हो।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की बेंच ने केरल हाईकोर्ट का फैसला खारिज किया, जिसने मजिस्ट्रेट के समन ऑर्डर को इस आधार पर रद्द कर दिया था कि मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाले रेस्पोंडेंट-आरोपी को समन जारी करने से पहले CrPC की धारा 202 के तहत कोई जांच नहीं की गई थी।

CrPC की धारा 202(1) के मुताबिक, किसी प्राइवेट शिकायत के आधार पर कॉग्निजेंस लेने पर मजिस्ट्रेट के लिए यह ज़रूरी है कि वह आरोपी को समन जारी करने से पहले जांच करे, जो उसके इलाके के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहता है। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि जब शिकायत किसी पब्लिक सर्वेंट ने फाइल की हो तो मजिस्ट्रेट के इलाके के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाले आरोपी को समन जारी करने से पहले जांच ज़रूरी नहीं होगी।

मामला

यह मामला केरल में एक ड्रग्स इंस्पेक्टर द्वारा रेस्पोंडेंट-M/s पैनेशिया बायोटेक लिमिटेड और दूसरों के खिलाफ ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत पेंटावैलेंट वैक्सीन की कथित मिसब्रांडिंग के लिए फाइल की गई शिकायत से शुरू हुआ। आरोपी कंपनियों ने हाईकोर्ट में समन ऑर्डर को चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि चूंकि वे त्रिशूर में चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (CJM) के इलाके के अधिकार क्षेत्र से बाहर थीं, इसलिए मजिस्ट्रेट CrPC की धारा 202(1) के तहत जांच करने के लिए कानूनी तौर पर मजबूर थे।

जवाब देने वालों ने कहा कि 2005 के अमेंडमेंट के बाद यह प्रोविज़न एक ज़रूरी चीज़ थी, जिसने उन मामलों में ऐसी जांच को ज़रूरी बना दिया, जहां आरोपी मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहता हो। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि अमेंडमेंट में पब्लिक सर्वेंट्स के लिए कोई साफ़ छूट नहीं दी गई।

हालांकि, केरल राज्य ने जवाब दिया कि CrPC की धारा 202 के तहत प्रोसीजर को यह तर्क देते हुए किसी पब्लिक सर्वेंट के लिए ज़रूरी नहीं माना जा सकता कि वे "एक अलग जगह पर खड़े हैं"। इसके साथ ही कोर्ट ने केमिनोवा इंडिया लिमिटेड बनाम पंजाब राज्य (2021) 8 SCC 818 में सेट मिसाल पर भरोसा किया।

हाईकोर्ट के समन ऑर्डर को रद्द करने के फैसले से नाराज़ होकर राज्य सुप्रीम कोर्ट चला गया।

सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला

उस आदेश को रद्द करते हुए जस्टिस अमानुल्लाह के लिखे फ़ैसले में CrPC की धारा 200 के साथ धारा 202 की सही व्याख्या की गई। इसमें कहा गया कि जब धारा 200 का प्रोविज़ो मजिस्ट्रेट को शिकायत करने वाले और गवाहों से पूछताछ करने का अधिकार नहीं देता है, अगर कोई सरकारी कर्मचारी अपनी सरकारी ड्यूटी निभा रहा है या ऐसा करने का दावा कर रहा है या कोर्ट ने शिकायत की है तो मजिस्ट्रेट के इलाके के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाले आरोपी को समन जारी करने से पहले सरकारी कर्मचारी की शिकायत के आधार पर जांच करना गलत होगा।

कोर्ट ने केमिनोवा इंडिया लिमिटेड बनाम पंजाब राज्य में अपने पहले के फ़ैसले पर काफ़ी भरोसा किया और कहा कि लेजिस्लेचर ने सरकारी कर्मचारी को “अलग जगह” पर रखा है। कोर्ट ने कहा कि हालांकि CrPC की धारा 202 के तहत जांच का मकसद बेगुनाह लोगों को बेवजह परेशानी से बचाना है, लेकिन CrPC की धारा 200 का प्रोविज़ो सरकारी कर्मचारियों की शिकायतों को ऐसी शुरुआती जांच से छूट देता है। इसलिए मजिस्ट्रेट के इलाके के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाले आरोपी को समन जारी करने से पहले अलग जांच पर ज़ोर देने से ऐसे मामलों में कानूनी स्कीम का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

कोर्ट ने कहा,

“यह मामला एक अधिकारी की लिखित शिकायत से निकला है। कोड की धारा 200 के अनुसार, अगर कोई सरकारी कर्मचारी अपनी सरकारी ड्यूटी निभा रहा है या ऐसा करने का दावा कर रहा है या कोर्ट ने शिकायत की है तो मजिस्ट्रेट को शिकायतकर्ता और गवाहों से पूछताछ करने की ज़रूरत नहीं है। यहां राज्य सरकार की मंज़ूरी पर एक सरकारी शिकायत की गई। इस असल स्थिति में प्रोसेस जारी करने को टालने पर विचार करते समय कोड की धारा 202 को कोड की धारा 200 के साथ सही तरह से समझना होगा।”

इसलिए अपील मान ली गई और मजिस्ट्रेट का पास किया गया समन ऑर्डर सही ठहराया गया।


Cause Title: THE STATE OF KERALA & ANR. v. M/s. PANACEA BIOTEC LTD. & ANR.

Saturday, 7 March 2026

किशोर संबंधों में अक्सर लड़कों को भुगतने पड़ते हैं परिणाम”: POCSO के दुरुपयोग को रोकने के लिए जागरूकता जरूरी

“किशोर संबंधों में अक्सर लड़कों को भुगतने पड़ते हैं परिणाम”: POCSO के दुरुपयोग को रोकने के लिए जागरूकता जरूरी — मद्रास हाईकोर्ट  7 Mar 2026 

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में एक युवक की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया, जिसे निचली अदालत ने आईपीसी की धारा 366 तथा Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 की धारा 5(l) सहपठित धारा 6 के तहत एक नाबालिग लड़की के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप में दोषी ठहराया था। जस्टिस एन माला ने कहा कि यह मामला दो किशोरों के बीच सहमति से बने संबंध का प्रतीत होता है, जो अंततः माता-पिता के विरोध के कारण विवाद में बदल गया। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में अक्सर परिणामों का सामना केवल लड़कों को करना पड़ता है। 

मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी अदालत ने कहा, “यह एक सामान्य मामला है जिसमें किशोरों के बीच सहमति से बने संबंध का अंत माता-पिता के मतभेद के कारण हुआ। ऐसे मामलों में अक्सर लड़की पर परिवार का दबाव होता है और बाद में उसकी शादी कहीं और करा दी जाती है, जिसके बाद लड़के के खिलाफ POCSO के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज करा दिया जाता है, जिससे उसे लंबी अवधि तक जेल में रहना पड़ता है।” अदालत ने यह भी कहा कि यदि POCSO अधिनियम की धारा 43 के तहत कानून के प्रावधानों और उसकी कठोरता के बारे में व्यापक जागरूकता फैलाई जाए तो ऐसे मामलों में कमी लाई जा सकती है। न्यायालय ने कहा कि इस कानून के कठोर प्रावधानों की जानकारी के अभाव में इसका दुरुपयोग होने की संभावना बढ़ जाती है। 

 इसी संदर्भ में अदालत ने Chief Secretary of Tamil Nadu को निर्देश दिया कि वे POCSO अधिनियम की धारा 43 का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कदम उठाएं और आम जनता, बच्चों तथा अभिभावकों में कानून के प्रति जागरूकता बढ़ाएं। अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि सरकारी और निजी स्कूलों तथा कॉलेजों में जागरूकता शिविर आयोजित किए जाएं, ताकि कानून और उसके परिणामों के बारे में जानकारी दी जा सके। यह मामला उस अपील से संबंधित था जिसमें आरोपी ने Special Court for POCSO Cases, Nagercoil के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे दोषी ठहराया गया था। 

अभियोजन के अनुसार, घटना के समय लड़की की उम्र 16 वर्ष थी। आरोपी, जो लड़की के भाई का मित्र था, उससे परिचित हुआ और बाद में उससे प्रेम का इज़हार करते हुए विवाह की इच्छा जताई। लड़की ने बताया कि उसके माता-पिता उसकी इच्छा के विरुद्ध शादी कराना चाहते हैं, जिसके बाद आरोपी उसे घर से ले गया और अपने रिश्तेदार के घर में उससे विवाह कर लिया। बाद में जिला बाल संरक्षण अधिकारी को एक गुमनाम कॉल मिलने पर दोनों को हिरासत में लिया गया। 

हालांकि अपील में आरोपी ने तर्क दिया कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था और लड़की ने स्वेच्छा से उसके साथ जाने का निर्णय लिया था। उसने यह भी कहा कि लड़की के शुरुआती बयानों में उसके खिलाफ कोई आरोप नहीं था और निचली अदालत ने उसके विरोधाभासी बयान पर भरोसा करके गलती की। अदालत ने पाया कि लड़की की उम्र साबित करने के लिए अभियोजन ने जन्म प्रमाणपत्र और ट्रांसफर सर्टिफिकेट की केवल फोटोकॉपी पेश की थी, जबकि उनके मूल दस्तावेज उपलब्ध थे। अदालत ने कहा कि जब मूल दस्तावेज मौजूद हों तो बिना उचित कारण के द्वितीयक साक्ष्य (फोटोकॉपी) स्वीकार नहीं किए जा सकते। न्यायालय ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा इन फोटोकॉपी दस्तावेजों को स्वीकार कर पीड़िता की उम्र तय करना एक गंभीर त्रुटि थी। चूंकि पीड़िता की उम्र साबित नहीं हो सकी, जो इस मामले का मूल तथ्य था, इसलिए अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपी की दोषसिद्धि रद्द कर दी।


https://hindi.livelaw.in/madras-high-court/madras-high-court-pocso-act-misuse-525512



POCSO / सहमति वाले किशोर प्रेम-संबंध (consensual relationship) से जुड़े 10 महत्वपूर्ण निर्णय (5 सुप्रीम कोर्ट + 5 हाईकोर्ट) दिए जा रहे हैं। हर केस के साथ टाइटल और 4–5 लाइन का कोर्ट-उपयोगी पैराग्राफ भी दिया गया है ताकि  इन्हें लिखित बहस / जमानत / अपील में सीधे उपयोग कर सकें।

1️⃣ सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय

1. Mahadeo s/o Kerba Maske v. State of Maharashtra

सिद्धांत :

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिपादित किया कि POCSO अथवा यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता की आयु का निर्धारण अत्यंत महत्वपूर्ण है और आयु सिद्ध करने हेतु ठोस व विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक है। केवल अनुमान अथवा अपूर्ण दस्तावेजों के आधार पर दोषसिद्धि उचित नहीं मानी जा सकती।

2. Independent Thought v. Union of India

सिद्धांत :

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा कानून का मूल उद्देश्य है, किन्तु न्यायालयों को सामाजिक परिस्थितियों और वास्तविकताओं को भी ध्यान में रखना चाहिए ताकि कानून का प्रयोग न्यायपूर्ण ढंग से हो।

3. Satish v. State of Maharashtra

सिद्धांत :

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि POCSO के अपराधों में यौन आशय (sexual intent) का परीक्षण महत्वपूर्ण है और प्रत्येक मामले के तथ्यों व परिस्थितियों का समुचित मूल्यांकन आवश्यक है।

4. S. Varadarajan v. State of Madras

सिद्धांत :

सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिपादित किया कि यदि लड़की स्वयं आरोपी के साथ जाती है और आरोपी द्वारा कोई बल अथवा प्रलोभन नहीं दिया गया है, तो ऐसी स्थिति को स्वतः अपहरण नहीं माना जा सकता।

5. Alamelu v. State

सिद्धांत :

न्यायालय ने कहा कि आयु सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों की विश्वसनीयता का परीक्षण आवश्यक है और यदि आयु के संबंध में संदेह हो तो आरोपी को उसका लाभ दिया जाना चाहिए।

2️⃣ हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय

6. Sabari v. Inspector of Police

सिद्धांत :

मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि किशोरावस्था में प्रेम संबंध होना सामाजिक वास्तविकता है और ऐसे मामलों में न्यायालयों को परिस्थितियों का संवेदनशीलता के साथ मूल्यांकन करना चाहिए।

7. Mahesh v. State

सिद्धांत :

कोर्ट ने टिप्पणी की कि सहमति वाले किशोर प्रेम संबंधों को अपराध बनाने का खामियाजा अक्सर लड़कों को भुगतना पड़ता है। POCSO का उद्देश्य बच्चों के शोषण को रोकना है, न कि स्वेच्छा से बने प्रेम संबंधों को दंडित करना।

8. Raja v. State of Karnataka

सिद्धांत :

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि यदि लड़की स्वयं आरोपी के साथ गई हो और संबंध सहमति से स्थापित हुआ हो, तो न्यायालय को समग्र परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निर्णय करना चाहिए।

9. Anversinh v. State of Gujarat

सिद्धांत :

गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि प्रेम संबंध और यौन शोषण में स्पष्ट अंतर है और प्रत्येक मामले को कठोर आपराधिक दृष्टिकोण से देखने के बजाय उसके तथ्यों का सूक्ष्म परीक्षण आवश्यक है।

10. Court on its Own Motion v. State

सिद्धांत :

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO के अंतर्गत बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आते हैं जो वास्तव में सहमति वाले किशोर प्रेम संबंध होते हैं, इसलिए न्यायालयों को प्रत्येक मामले में परिस्थितियों का सावधानीपूर्वक परीक्षण करना चाहिए।

⚖️ कोर्ट में उपयोग करने योग्य निष्कर्ष (बहस के लिए)

उपरोक्त न्यायिक दृष्टांतों से यह सिद्ध होता है कि न्यायालयों ने समय-समय पर यह प्रतिपादित किया है कि POCSO कानून का उद्देश्य बालकों को यौन शोषण से संरक्षण देना है, न कि सहमति से स्थापित किशोर प्रेम संबंधों को कठोर आपराधिक अपराध के रूप में दंडित करना। अतः जहाँ परिस्थितियों से यह स्पष्ट हो कि संबंध स्वेच्छा से स्थापित हुआ था और उसमें बल, प्रलोभन अथवा शोषण का तत्व नहीं है, वहाँ न्यायालय को तथ्यों का समग्र मूल्यांकन करते हुए आरोपी को दोषमुक्त करने पर विचार करना चाहिए।

जय मीनेष 🌹

Tuesday, 3 March 2026

लोक सेवकों के वेतन की जानकारी आरटीआई में देना अनिवार्य

 MP High Court: लोक सेवकों के वेतन की जानकारी आरटीआई में देना अनिवार्य, हाईकोर्ट का अहम आदेश 👇


मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने अपने अहम आदेश में कहा है कि सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत लोक सेवकों के वेतन की जानकारी देना अनिवार्य है। यह जानकारी सार्वजनिक महत्व की है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने अपने अहम आदेश में कहा है कि सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत लोक सेवकों के वेतन की जानकारी देना अनिवार्य है। यह जानकारी सार्वजनिक महत्व की है, जिसे गोपनीय मानकर मना नहीं किया जा सकता। इसलिए सूचना आयोग और लोक सूचना अधिकारी द्वारा पूर्व में पारित आदेश निरस्त किया जाता है। एकलपीठ ने याचिकाकर्ता द्वारा अपेक्षित जानकारी एक माह के भीतर प्रदान करने के निर्देश दिए हैं। याचिकाकर्ता छिंदवाड़ा निवासी एमएम शर्मा की ओर से अधिवक्ता ने पक्ष रखा। जिन्होंने बताया कि लोक सेवकों के वेतन की जानकारी को सार्वजनिक करना सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा-4 के तहत अनिवार्य है। लोक सेवकों के वेतन की जानकारी को धारा 8 (1) (जे) का हवाला देकर व्यक्तिगत या तृतीय पक्ष की सूचना बताकर छिपाना अधिनियम के उद्देश्यों और पारदर्शिता के सिद्धांतों के विपरीत है। याचिकाकर्ता ने वन परिक्षेत्र छिंदवाड़ा में कार्यरत दो कर्मचारियों को हुए वेतन भुगतान के संबंध में जानकारी मांगी थी। इस पर लोक सूचना अधिकारी ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा का हवाला देते हुए जानकारी को निजी और तृतीय पक्ष की जानकारी बताते हुए मना कर दिया। यह भी तर्क दिया गया कि संबंधित कर्मचारियों से उनकी सहमति मांगी गई थी, लेकिन उत्तर न मिलने के कारण जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा सकती। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में उक्त याचिका दायर की गई थी। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए पूर्व में पारित आदेशों को निरस्त करते हुए उक्त निर्देश जारी किए।

Thursday, 26 February 2026

सिविल विवाद को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता- सुप्रीम कोर्ट 2026

 वंदना जैन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य

Criminal Appeal No. 1127/2026 (SLP (Crl.) No. 6670/2021)

1️⃣ निर्णय का संक्षिप्त विवरण (Case background)

यह अपील इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दिनांक 30.07.2021 के आदेश के विरुद्ध थी, जिसमें FIR रद्द करने की याचिका खारिज की गई थी। 

FIR संख्या 0112/2021, दिनांक 14.03.2021, थाना हजरतगंज, लखनऊ में दर्ज की गई थी। 

धाराएँ: 406, 420, 467, 468, 471 IPC. 

विवाद 2010 के Joint Venture Agreement (JVA) से उत्पन्न हुआ था, जिसमें भूमि विकास परियोजना हेतु समझौता हुआ था। 

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यह विवाद मूलतः दीवानी प्रकृति का था, जिसे आपराधिक रंग दिया गया। 

अतः:

अपील स्वीकार

हाईकोर्ट का आदेश निरस्त

FIR तथा उससे उत्पन्न सभी कार्यवाहियाँ रद्द। 

2️⃣ सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित प्रमुख सिद्धांत (Judicial Principles)

(न्यायिक भाषा में बिंदुवार)

(i) सिविल विवाद को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता

जहां विवाद का मूल स्वरूप संविदात्मक/व्यावसायिक (contractual) हो, वहाँ उसे आपराधिक अपराध का रूप देकर दंडात्मक प्रक्रिया प्रारंभ करना विधि का दुरुपयोग है। �

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(ii) FIR में अपराध के आवश्यक तत्वों का होना अनिवार्य

यदि FIR के आरोपों को पूर्णतः सत्य मान भी लिया जाए और वे IPC की धाराओं के आवश्यक तत्व स्थापित न करें, तो आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रह सकती। �

Juris Hour

(iii) धोखाधड़ी (Cheating) हेतु प्रारंभिक बेईमान मंशा आवश्यक

मात्र अनुबंध का उल्लंघन (breach of contract) धोखाधड़ी नहीं है; इसके लिए प्रारंभ से ही बेईमानी की मंशा (mens rea) सिद्ध होनी चाहिए। 

(iv) Forgery के आरोप हेतु ठोस सामग्री आवश्यक

धारा 467/468 IPC तभी लागू होंगी जब दस्तावेज़ को धारा 464 IPC के अर्थ में जाली (forged) सिद्ध किया जाए; केवल आरोप पर्याप्त नहीं। 

(v) दीर्घकालिक विलंब FIR की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाता है

यदि कथित अपराध के कई वर्षों बाद FIR दर्ज हो, तो यह संकेत करता है कि विवाद सिविल प्रकृति का हो सकता है। 

(vi) आपराधिक प्रक्रिया का उपयोग दबाव बनाने हेतु नहीं

दंड प्रक्रिया का उपयोग किसी पक्ष को अनुबंध पूरा करने या आर्थिक लाभ लेने हेतु दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता।

(vii) हाईकोर्ट की भूमिका – FIR का समुचित परीक्षण

धारा 482 CrPC के अंतर्गत हाईकोर्ट को यह देखना आवश्यक है कि FIR वास्तव में अपराध प्रकट करती है या केवल सिविल विवाद है; इस परीक्षण में असफलता न्यायिक त्रुटि है। 

(viii) “Abuse of process of law” का सिद्धांत

जब आपराधिक कार्यवाही का उद्देश्य न्याय न होकर प्रतिशोध या दबाव हो, तो उसे निरस्त करना न्यायालय का कर्तव्य है।

3️⃣ न्यायालय के निष्कर्ष (Findings)

सुप्रीम कोर्ट ने निम्न प्रमुख निष्कर्ष दिए:

JVA से उत्पन्न विवाद मूलतः सिविल था।

FIR में धोखाधड़ी या जालसाजी का प्रथम दृष्टया कोई तत्व नहीं।

आरोप अनुबंध के उल्लंघन से संबंधित हैं, न कि आपराधिक मंशा से।

हाईकोर्ट ने FIR व समझौते का समुचित परीक्षण नहीं किया।

आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

अतः:

“FIR केवल सिविल कारण प्रकट करती है; इसलिए FIR तथा उससे उत्पन्न समस्त कार्यवाही निरस्त की जाती है।” 

4️⃣ विधिक महत्व (Legal Significance)

यह निर्णय निम्न सिद्धांतों को पुनः पुष्ट करता है:

Breach of contract ≠ criminal offence

Civil dispute ≠ cheating automatically

FIR quashing jurisprudence (Sec 482 CrPC) को मजबूत किया

Commercial disputes में criminalization पर रोक

5️⃣ प्रासंगिक न्यायिक परीक्षण (Applied Tests)

सुप्रीम कोर्ट ने मूलतः निम्न टेस्ट लागू किए:

Prima facie offence test

Mens rea test

Civil vs criminal distinction test

Abuse of process doctrine

6️⃣ निर्णय का सार (Legal ratio)

“जहाँ विवाद अनुबंध/संपत्ति/व्यावसायिक संबंधों से उत्पन्न हो और आरोप IPC की धाराओं के आवश्यक तत्व स्थापित न करें, वहाँ आपराधिक कार्यवाही विधि का दुरुपयोग मानी जाएगी तथा उसे निरस्त किया जाना चाहिए।”


णणणणणणणणणणणणणणणण


विषय: सिविल विवाद को आपराधिक रंग देकर दर्ज FIR की वैधता के संबंध में

मान्यवर,

प्रस्तुत वाद में प्रतिवादी द्वारा दर्ज कराई गई FIR वस्तुतः एक संविदात्मक/व्यावसायिक विवाद से उत्पन्न है, जिसे आपराधिक स्वरूप प्रदान कर दिया गया है। इस संदर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वंदना जैन एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य, क्रिमिनल अपील क्रमांक 1127/2026 (एस.एल.पी. (क्रि.) क्रमांक 6670/2021 से उद्भूत) में प्रतिपादित विधि सिद्धांत पूर्णतः लागू होते हैं।


माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त प्रकरण में यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है कि—


1. सिविल विवाद का आपराधिकरण विधि का दुरुपयोग है।

   जहाँ विवाद का मूल स्वरूप संविदात्मक/व्यावसायिक हो, वहाँ उसे आपराधिक अपराध का रूप देकर दंडात्मक प्रक्रिया प्रारंभ करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।


2. FIR में अपराध के आवश्यक तत्वों का होना अनिवार्य है।

   यदि आरोपों को पूर्णतः सत्य मान लेने पर भी भारतीय दंड संहिता की धाराओं के आवश्यक तत्व स्थापित नहीं होते, तो आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रह सकती।


3. धोखाधड़ी (Cheating) के लिए प्रारंभिक बेईमान मंशा (Mens rea) आवश्यक है।

   मात्र अनुबंध का उल्लंघन या भुगतान न होना धोखाधड़ी का अपराध नहीं है, जब तक कि प्रारंभ से ही बेईमानी की मंशा सिद्ध न हो।


4. Forgery के आरोप हेतु ठोस आधार आवश्यक है।

   दस्तावेज़ के जाली होने का प्रथम दृष्टया प्रमाण आवश्यक है; केवल आरोप के आधार पर धारा 467/468/471 IPC लागू नहीं की जा सकती।


5. दीर्घ विलंब से दर्ज FIR की विश्वसनीयता संदिग्ध होती है।

   कई वर्षों पश्चात दर्ज FIR इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि विवाद मूलतः दीवानी प्रकृति का है।


6. दंड प्रक्रिया का उपयोग दबाव बनाने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।

   अनुबंध के पालन या आर्थिक लाभ हेतु आपराधिक कार्यवाही प्रारंभ करना विधि के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है।


7. धारा 482 दं.प्र.सं. के अंतर्गत न्यायालय का कर्तव्य।

   उच्च न्यायालय का दायित्व है कि वह यह परीक्षण करे कि FIR वास्तविक आपराधिक अपराध प्रकट करती है या केवल सिविल विवाद है; अन्यथा न्यायिक त्रुटि मानी जाएगी।


8. Abuse of Process Doctrine

   जब आपराधिक कार्यवाही का उद्देश्य न्याय प्राप्त करना न होकर प्रतिशोध या दबाव बनाना हो, तो उसे निरस्त करना न्यायालय का दायित्व है।


माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने उपर्युक्त सिद्धांतों के आधार पर यह निष्कर्ष दिया कि संबंधित FIR सिविल विवाद से उत्पन्न थी, जिसमें धोखाधड़ी अथवा जालसाजी के आवश्यक तत्व अनुपस्थित थे, अतः FIR तथा उससे उत्पन्न समस्त आपराधिक कार्यवाही निरस्त किए जाने योग्य है।


अतः प्रस्तुत वाद में भी—


- आरोप संविदात्मक दायित्वों से संबंधित हैं,

- प्रारंभिक बेईमानी की मंशा का अभाव है,

- कोई स्वतंत्र आपराधिक कृत्य प्रथम दृष्टया स्थापित नहीं होता,


इसलिए उक्त सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के आलोक में यह निवेदन है कि दर्ज FIR एवं उससे उत्पन्न समस्त आपराधिक कार्यवाही को निरस्त किया जाना न्यायोचित एवं विधिसम्मत होगा।


दिनांक: …………

अधिवक्ता


Monday, 16 February 2026

पत्नी का सिर्फ़ नौकरी करना गुज़ारा भत्ता देने से मना करने का कोई आधार नहीं

पत्नी का सिर्फ़ नौकरी करना गुज़ारा भत्ता देने से मना करने का कोई आधार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-02-15 13:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में पति की क्रिमिनल रिवीजन याचिका खारिज की, जिसमें उसने CrPC की धारा 125 के तहत पत्नी की अर्जी पर पास हुए आदेश को चुनौती दी थी। कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों की कमाई की क्षमता और फाइनेंशियल स्थिति में काफी अंतर है।

बेंच ने कहा कि पत्नी को दी जाने वाली इनकम को इतना काफ़ी नहीं कहा जा सकता कि वह अपनी शादीशुदा ज़िंदगी के दौरान जिस तरह की ज़िंदगी जीती थी, उसे बनाए रख सके।

कोर्ट ने कहा,

"CrPC की धारा 125 का मकसद सिर्फ़ गरीबी को रोकना नहीं है, बल्कि यह पक्का करना है कि पत्नी पति की स्थिति के हिसाब से इज्ज़त से जी सके।"

जस्टिस मदन पाल सिंह की बेंच ने आगे कहा कि सिर्फ़ पत्नी का नौकरी करना या कमाई करना, अपने आप में गुज़ारा भत्ता देने से मना करने का कोई आधार नहीं है। आसान शब्दों में कहें तो रिविज़निस्ट पति ने गाजियाबाद के फैमिली कोर्ट नंबर 1 के एडिशनल प्रिंसिपल जज का ऑर्डर रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। फैमिली कोर्ट ने उसे अर्जी की तारीख से अपनी पत्नी को हर महीने Rs. 15,000/- मेंटेनेंस के तौर पर देने का निर्देश दिया।

हाईकोर्ट के सामने पति ने कहा कि यह रकम गलत है, क्योंकि पत्नी एक पढ़ी-लिखी, काम करने वाली महिला है, जो फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट है।

इस बात के पक्ष में उसके वकील ने मई, 2018 के इनकम टैक्स रिटर्न/फॉर्म-16 का हवाला दिया, जिसमें बताया गया कि पत्नी की सालाना सैलरी Rs. 11,28,780 है।

इसके अलावा, यह भी कहा गया कि पत्नी ने अपनी मर्ज़ी से शादी का घर छोड़ दिया था, वह अपनी शादी की ज़िम्मेदारियों को पूरा करने को तैयार नहीं थी और उसने पति के बूढ़े माता-पिता के साथ रहने से भी मना कर दिया था। अपनी फाइनेंशियल कैपेसिटी के बारे में उसने कहा कि उसे अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी, क्योंकि उसे अपने बीमार माता-पिता की देखभाल करनी थी और उस पर अभी फाइनेंशियल लायबिलिटी का बोझ था, जिसकी वजह से उसके पास मेंटेनेंस देने के लिए काफ़ी साधन नहीं थे।

दूसरी ओर, पत्नी के वकील ने कहा कि रिविज़निस्ट-पति ने कोर्ट के सामने अपनी असली इनकम और रहन-सहन के स्टैंडर्ड के बारे में नहीं बताया था।

यह कहा गया कि ट्रायल कोर्ट के सामने रिकॉर्ड किए गए रिविज़निस्ट के बयान के अनुसार, उसने माना कि अप्रैल, 2018 और अप्रैल, 2020 के बीच वह जेपी मॉर्गन में नौकरी करता था और लगभग 40 लाख रुपये का सालाना पैकेज ले रहा था।

यह भी कहा गया कि सिर्फ़ पत्नी की नौकरी भरण-पोषण से इनकार करने का आधार नहीं हो सकती, खासकर तब जब पार्टियों की इनकम और स्टेटस में साफ़ अंतर हो।

जस्टिस सिंह ने कहा कि पति ने अपनी कमाई की कैपेसिटी में उसी हिसाब से कमी दिखाने के लिए रिकॉर्ड पर कोई पक्का सबूत नहीं रखा था। पत्नी की इनकम के बारे में कोर्ट ने कहा कि यह मान भी लें कि पत्नी के पास इनकम का कोई सोर्स है तो भी रिकॉर्ड से साफ़ पता चलता है कि पार्टियों की कमाने की क्षमता और फाइनेंशियल स्टेटस में "काफ़ी फ़र्क" है।

बेंच ने कहा कि पत्नी को बताई गई इनकम इतनी काफ़ी नहीं है कि वह अपनी शादीशुदा ज़िंदगी के दौरान जिस तरह की ज़िंदगी जी रही थी, उसी तरह का जीवन-यापन कर सके।

पति की कथित फाइनेंशियल तंगी और देनदारियों के बारे में कोर्ट ने इसे "एक बेबुनियाद दावा" कहा, क्योंकि उसने कहा कि रिकॉर्ड में कोई भी ऐसा ठोस या भरोसेमंद सबूत नहीं दिया गया, जिससे यह साबित हो सके कि उसके पास अपनी कानूनी ज़िम्मेदारी से छुटकारा पाने के लिए काफ़ी साधन नहीं थे।

इस पृष्ठभूमि में बेंच ने यह नतीजा निकाला कि फैमिली कोर्ट द्वारा दिया गया भरष-पोषण सही, वाजिब और रिविज़निस्ट की हैसियत और कमाने की क्षमता के हिसाब से था।

यह पाते हुए कि जिस ऑर्डर पर सवाल उठाया गया, उसमें कोई ऐसी गड़बड़ी, गैर-कानूनी या बड़ी गड़बड़ी नहीं थी जिसके लिए दखल देना ज़रूरी हो, कोर्ट ने क्रिमिनल रिविज़न खारिज कर दिया।

Case title - Ravinder Singh Bisht vs. State of U.P. and Another 2026 LiveLaw (AB) 77

Sunday, 15 February 2026

सुप्रीम कोर्ट ने IOCL को लगाई कड़ी फटकार, 30 साल बाद ज़मीन मालिकों को कब्ज़ा लौटाने का दिया आदेश 22 Jan 2026

 सुप्रीम कोर्ट ने IOCL को लगाई कड़ी फटकार, 30 साल बाद ज़मीन मालिकों को कब्ज़ा लौटाने का दिया आदेश  22 Jan 2026 

 Supreme Court of India ने एक अहम फैसले में Indian Oil Corporation Limited (IOCL) को भूमि सुधार कानून के तहत दी गई सुरक्षा पर तीखी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि इस मामले में ज़मीन मालिक को तीन दशकों से अधिक समय तक अपनी ही ज़मीन के कब्ज़े से वंचित रखा गया, जो न्यायसंगत नहीं है। जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने IOCL को निर्देश दिया कि वह एर्नाकुलम (केरल) स्थित लीज़ पर ली गई भूमि का खाली और शांतिपूर्ण कब्ज़ा मूल ज़मीन मालिक के उत्तराधिकारियों को सौंपे। अदालत ने स्पष्ट किया कि कंपनी केरल भूमि सुधार अधिनियम, 1963 की धारा 106 के तहत संरक्षण की हकदार नहीं है। 

 धारा 106 के अनुसार, यदि 20 मई 1967 से पहले वाणिज्यिक या औद्योगिक प्रयोजन हेतु ली गई भूमि पर भवन निर्माण किया गया हो, तो ऐसे पट्टेदार को बेदखली से संरक्षण मिलता है। लेकिन अदालत ने कहा कि इस मामले में IOCL इस शर्त को पूरा करने का कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाई। “यह किस तरह का भूमि सुधार है?” — जस्टिस नागरत्ना जस्टिस नागरत्ना ने बड़े कॉरपोरेट को वाणिज्यिक संपत्ति पर भूमि सुधार संरक्षण दिए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा: 

“यह किस तरह का भूमि सुधार है? हम समझ सकते हैं कि कृषि भूमि के मामले में ऐसा हो। लेकिन यहां तो वाणिज्यिक और औद्योगिक संपत्तियों को भी किरायेदारों—वह भी बड़े कॉरपोरेट—को दिया जा रहा है। यह समाजवाद का चरम रूप है।” मामले की पृष्ठभूमि यह विवाद 1994 में दायर एक मुकदमे से जुड़ा है, जिसमें ज़मीन मालिक ने एर्नाकुलम के एलमकुलम गांव में स्थित लगभग 20 सेंट भूमि का कब्ज़ा वापस पाने की मांग की थी। यह भूमि IOCL को लीज़ पर दी गई थी और वहां एक पेट्रोल पंप डीलर के माध्यम से संचालित किया जा रहा था। लीज़ समाप्त होने के बाद ज़मीन मालिक ने ट्रायल कोर्ट का रुख किया। 

 ट्रायल कोर्ट ने भूमि न्यायाधिकरण (लैंड ट्रिब्यूनल) के निष्कर्षों के आधार पर IOCL के पक्ष में फैसला दिया और धारा 106 के तहत संरक्षण मान लिया। हालांकि, अपील में केरल हाईकोर्ट ने पाया कि 20 मई 1967 से पहले भवन निर्माण के दावे के समर्थन में कोई प्रमाण नहीं है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए ज़मीन मालिक के पक्ष में डिक्री पारित की और खाली कब्ज़ा लौटाने का निर्देश दिया। इसके बाद IOCL ने 2011 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। 

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश सुप्रीम कोर्ट ने IOCL की अपील में कोई दम नहीं पाया और कहा कि हाईकोर्ट का निर्णय पूरी तरह सही था। अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि 1994 से आज तक ज़मीन मालिक को अपनी भूमि का कब्ज़ा नहीं मिल सका। अदालत ने IOCL को निर्देश दिया कि वह छह महीने के भीतर भूमि का खाली कब्ज़ा ज़मीन मालिक के उत्तराधिकारियों को सौंपे। साथ ही, IOCL के जिम्मेदार अधिकारी को तीन सप्ताह के भीतर शपथ-पत्र (undertaking) दाखिल करने का आदेश दिया गया, जिसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि: छह महीने में ज़मीन खाली कर सौंपी जाएगी किसी प्रकार का समय-विस्तार नहीं मांगा जाएगा किराये के सभी बकाये का भुगतान किया जाएगा भूमि पर कोई तृतीय-पक्ष अधिकार (third-party interest) सृजित नहीं किया जाएगा इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि भूमि सुधार कानूनों का दुरुपयोग कर बड़े कॉरपोरेट्स को अनुचित लाभ नहीं दिया जा सकता, और ज़मीन मालिकों के अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि


https://hindi.livelaw.in/supreme-court/supreme-court-of-india-indian-oil-corporation-limited-iocl-kerala-land-reforms-act-1963-520002

Saturday, 14 February 2026

डिस्ट्रिक्ट जजों को जबरदस्ती रिटायरमेंट क्यों देना पड़ता है? जानें सुप्रीम कोर्ट

डिस्ट्रिक्ट जजों को जबरदस्ती रिटायरमेंट क्यों देना पड़ता है? जानें सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

 सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'एक जज का ऑफिस पब्लिक ट्रस्ट का दफ्तर होता है। एक जज को बेदाग ईमानदारी और बिना किसी शक के निष्पक्ष इंसान होना चाहिए।

नई दिल्ली: ट्रायल कोर्ट में न्याय देने की ईमानदारी में लोगों का भरोसा बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि किसी डिस्ट्रिक्ट जज की 'बोलने की मर्यादा' किसी हाई कोर्ट के लिए उसे एक्सटेंशन देने या उसे जबरदस्ती रिटायर करने का फैसला करने में एक जरूरी फैक्टर है।

गुजरात के एक एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज को जुलाई 2016 में 56 साल और 9 महीने की उम्र होने पर 'पब्लिक इंटरेस्ट' में जबरदस्ती रिटायर कर दिया गया था। यह फैसला हाई कोर्ट के तीन जजों की एक कमिटी की रिपोर्ट पर आधारित था, जिसने सर्विस रिकॉर्ड की जांच की थी और 18 ज्यूडिशियल अधिकारियों के समय से पहले रिटायरमेंट की सिफारिश की थी।

जज ने हाई कोर्ट में अपने जबरदस्ती रिटायरमेंट को चुनौती दी थी, लेकिन नाकाम रहे थे। अपील में, उनके वकील मयूरी रघुवंशी ने CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच को बताया कि ज्यूडिशियल अधिकारी अपने जबरदस्ती रिटायरमेंट का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि ‘अनफिट’ टैग को चुनौती दे रहे हैं, जो उनके अनुसार, बदनाम करने वाला था।

बेंच ने कहा, 'कंपलसरी रिटायरमेंट कोई सजा देने वाली कार्रवाई नहीं है और ज्यूडिशियल ऑफिसर की भावनाओं को यह कहकर शांत किया कि उन्हें कंपलसरी रिटायर करने वाले ऑर्डर में की गई बातें रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले फायदों के उनके हक में कोई रुकावट नहीं डालेंगी।'


CJI ने कहा, 'जस्टिस डिलीवरी सिस्टम में लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए ज्यूडिशियल ऑफिसर की इज्जत जरूरी है। एक बार जब जजों की एक कमिटी किसी ज्यूडिशियल ऑफिसर की ईमानदारी पर शक करती है और अगर उसे कंपलसरी रिटायर करने का फैसला लिया जाता है, तो शक का फायदा इंस्टीट्यूशन को मिलना चाहिए, ज्यूडिशियल ऑफिसर को नहीं।' हाई कोर्ट ने कहा था कि 2000 से 2015 तक ज्यूडिशियल ऑफिसर के सर्विस रिकॉर्ड से पता चलता है कि केस का निपटारा ‘ठीक-ठाक’ या ‘खराब’ था।

HC ने कहा, 'हमने उनकी कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट में भी खराब एंट्री देखी हैं। उनके खिलाफ तीन विजिलेंस कंप्लेंट रजिस्टर थीं, हालांकि उन्हें फाइल किया गया था। पिटीशनर को इन सभी खराब बातों के बारे में पता था, और वे फाइनल हो गई हैं। इस स्टेज पर, हम कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट या निपटारे के असेसमेंट में एंट्री को बदल नहीं सकते।'

कोर्ट ने कहा, 'एक जज का ऑफिस पब्लिक ट्रस्ट का ऑफिस होता है। एक जज को बेदाग ईमानदारी और बिना किसी शक के निष्पक्ष इंसान होना चाहिए… एक जज से उम्मीद किया जाने वाला व्यवहार का स्टैंडर्ड एक आम आदमी से बहुत ऊंचा होता है। यह कोई बहाना नहीं है कि चूंकि समाज में स्टैंडर्ड गिर गए हैं, इसलिए समाज से लिए गए जजों से एक जज से जरूरी ऊंचे स्टैंडर्ड और नैतिक मजबूती की उम्मीद नहीं की जा सकती।'

Friday, 13 February 2026

मजिस्ट्रेट सिर्फ़ ज़्यादा सज़ा के कारण केस को सेशंस कोर्ट में नहीं भेज सकता, उसे कारण बताने होंगे

मजिस्ट्रेट सिर्फ़ ज़्यादा सज़ा के कारण केस को सेशंस कोर्ट में नहीं भेज सकता, उसे कारण बताने होंगे: बॉम्बे हाईकोर्ट

2026-02-08 

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 323 के तहत मजिस्ट्रेट को जांच या ट्रायल के किसी भी स्टेज पर केस को सेशंस कोर्ट में भेजने का अधिकार है, लेकिन इस शक्ति का इस्तेमाल बिना सोचे-समझे या सिर्फ़ अपराध के लिए तय सज़ा की गंभीरता के आधार पर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को अपने सामने दर्ज सबूतों पर चर्चा करने के बाद कारणों के साथ एक राय बनानी होगी, ताकि यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि केस की सुनवाई सेशंस कोर्ट में होनी चाहिए।

जस्टिस प्रवीण एस. पाटिल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा 30 अप्रैल, 2024 को दिए गए आदेश को चुनौती देने वाली क्रिमिनल एप्लीकेशन पर सुनवाई कर रहे थे, जिसके तहत रेगुलर क्रिमिनल केस नंबर 224 ऑफ 2018 को सेशंस कोर्ट में भेजा गया। आवेदक भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 34 सपठित धाराओं 420, 467, 468, 471, 170 और 171 के तहत अपराधों के लिए ट्रायल का सामना कर रहा था।

आरोप तय होने और पार्टियों के सबूत दर्ज होने के बाद मामला CrPC की धारा 313 के तहत आरोपी का बयान दर्ज करने के लिए पोस्ट किया गया। उस स्टेज पर मजिस्ट्रेट ने केस को सेशंस कोर्ट में सिर्फ़ इस आधार पर भेज दिया कि IPC की धारा 467 के तहत अपराध के लिए आजीवन कारावास या दस साल तक की कैद की सज़ा है, जबकि मजिस्ट्रेट को सिर्फ़ सात साल तक की सज़ा देने का अधिकार था।

कोर्ट ने CrPC की धारा 323 और 325 की योजना की जांच की और कहा कि दोनों प्रावधानों को एक साथ पढ़ा जाना चाहिए। कोर्ट ने पाया कि धारा 325 के तहत मजिस्ट्रेट को सबूतों पर विचार करने के बाद आरोपी के अपराध पर एक राय बनानी होती है और केस को आगे भेजने से पहले कारण दर्ज करने होते हैं।

इसी सिद्धांत को धारा 323 पर लागू करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक मजिस्ट्रेट को रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों पर चर्चा करनी चाहिए और कम-से-कम संक्षिप्त कारण दर्ज करने चाहिए जो यह दिखाएं कि केस की सुनवाई सेशंस कोर्ट में क्यों होनी चाहिए। कानून के तहत तय अधिकतम सज़ा का सिर्फ़ ज़िक्र करना, आरोपी की भूमिका या पेश किए गए सबूतों का विश्लेषण किए बिना, काफ़ी नहीं है।

कोर्ट ने कहा,

"...उन्हें अपने सामने दर्ज सबूतों के आधार पर राय बनानी चाहिए और अपनी कार्यवाही राय के साथ सेशंस कोर्ट में जमा करनी चाहिए थी।"

कोर्ट ने आगे कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि किसी अपराध में ज़्यादा से ज़्यादा सज़ा का प्रावधान है, इसका मतलब यह नहीं है कि मामले में ज़रूरी तौर पर वही सज़ा दी जाएगी। क्या मजिस्ट्रेट की शक्तियों से ज़्यादा सज़ा देना सही है, यह तथ्यों, परिस्थितियों और पेश किए गए सबूतों पर निर्भर करता है।

कोर्ट ने कहा:

"...कानून के तहत दी गई ज़्यादा से ज़्यादा सज़ा का मतलब यह नहीं है कि आरोपी को ज़्यादा से ज़्यादा सज़ा दी जाएगी... यह हमेशा तथ्यों और परिस्थितियों और अपराध में आरोपी की भूमिका पर निर्भर करता है। इसलिए यह ज़रूरी है कि इस बात के कारण दर्ज किए जाएं कि किस आधार पर उन्हें लगा कि आरोपी को इस मामले में ज़्यादा से ज़्यादा सज़ा दी जानी चाहिए।"

इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने आवेदन को आंशिक रूप से मंज़ूर किया 30 अप्रैल 2024 का आदेश रद्द कर दिया, जिसमें मामला सेशंस कोर्ट को भेजा गया। साथ ही मामले को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि इस मुद्दे पर नए सिरे से विचार किया जाए।

Case Title: Mohammed Javed Abdul Wahab v. State of Maharashtra [CRIMINAL APPLICATION (APL) NO. 911 OF 2024]

चेक बिना तारीख (Undated Cheque) के हों, फिर भी वे ऋण/देयता (Debt or Liability) के अस्तित्व का सशक्त साक्ष्य हो सकते हैं

 भले ही चेक बिना तारीख (Undated Cheque) के हों, फिर भी वे ऋण/देयता (Debt or Liability) के अस्तित्व का सशक्त साक्ष्य हो सकते हैं — यह सिद्धांत मुख्यतः निम्न प्रकरणों में प्रतिपादित किया गया है:

1️⃣ Bir Singh v. Mukesh Kumar

(2019) 4 SCC 197, सुप्रीम कोर्ट

🔹 प्रतिपादित सिद्धांत (Point-wise):

यदि आरोपी द्वारा हस्ताक्षरित चेक वादी के पास पाया जाता है, तो धारा 118 व 139, Negotiable Instruments Act, 1881 के तहत विधिक अनुमान (Statutory Presumption) उत्पन्न होता है कि चेक वैध ऋण/देयता के निर्वहन हेतु दिया गया है।

यह आवश्यक नहीं कि चेक पूरी तरह से आरोपी द्वारा भरा गया हो; यदि हस्ताक्षर स्वीकार हैं तो अनुमान लागू होगा।

भले ही चेक “ब्लैंक” या “अंडेटेड” हो, यदि हस्ताक्षरित है और स्वेच्छा से दिया गया है, तो वह देयता के समर्थन में सशक्त साक्ष्य है।

बाद में तिथि या राशि भर देना मात्र से चेक अवैध नहीं हो जाता।

आरोपी पर यह दायित्व है कि वह इस वैधानिक अनुमान को “preponderance of probabilities” के आधार पर खंडित करे।

केवल यह कहना कि चेक सुरक्षा (security) के रूप में दिया गया था, पर्याप्त नहीं; ठोस साक्ष्य आवश्यक है।

2️⃣ ICDS Ltd. v. Beena Shabeer

(2002) 6 SCC 426

🔹 सिद्धांत:

“Security cheque” भी यदि देयता के निर्वहन हेतु प्रस्तुत किया जाता है और अनादृत (dishonour) होता है, तो धारा 138 लागू हो सकती है।

देयता का अस्तित्व मूल प्रश्न है, न कि चेक का स्वरूप (dated/undated/security)।

3️⃣ Sampelly Satyanarayana Rao v. Indian Renewable Energy Development Agency Ltd.

(2016) 10 SCC 458

🔹 सिद्धांत:

यदि चेक उस समय किसी “existing liability” के संदर्भ में दिया गया हो, तो वह धारा 138 के अंतर्गत दायित्व उत्पन्न करेगा।

सुरक्षा के नाम पर दिया गया चेक भी, यदि देयता विद्यमान हो, तो दंडनीय हो सकता है।

🔎 निष्कर्ष (संक्षेप में)

✔️ Undated या Blank cheque भी वैध साक्ष्य है।

✔️ हस्ताक्षर स्वीकार होने पर विधिक अनुमान स्वतः लागू होगा।

✔️ देयता न होने का भार (burden) आरोपी पर है।

✔️ केवल “security” या “blank” कह देना पर्याप्त बचाव नहीं है।


                            लिखित तर्क

विषय: बिना तारीख (Undated) / रिक्त (Blank) चेक की विधिक वैधता एवं देयता के संबंध में

माननीय न्यायालय के समक्ष विनम्र निवेदन है कि इस प्रकरण में अभियुक्त द्वारा हस्ताक्षरित चेक प्रस्तुत है। यद्यपि अभियुक्त का यह कथन है कि चेक बिना तारीख (Undated) अथवा सुरक्षा (Security) के रूप में दिया गया था, तथापि यह तर्क विधि सम्मत नहीं है और विधि द्वारा स्थापित अनुमान के विपरीत है।

1. वैधानिक अनुमान (Statutory Presumption)

धारा 118 तथा 139 के अंतर्गत यह विधिक अनुमान स्थापित है कि—

चेक विधिसम्मत प्रतिफल (consideration) के लिए निर्गत किया गया है।

चेक किसी विधिक देयता (legally enforceable debt or liability) के निर्वहन हेतु दिया गया है।

अतः एक बार हस्ताक्षर स्वीकार हो जाने पर, देयता के अस्तित्व का अनुमान अभियुक्त के विरुद्ध स्वतः उत्पन्न हो जाता है।

2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत

(क) Bir Singh v. Mukesh Kumar, (2019) 4 SCC 197

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि—

यदि चेक पर अभियुक्त के हस्ताक्षर स्वीकार हैं, तो यह आवश्यक नहीं कि शेष विवरण भी उसी द्वारा भरा गया हो।

भले ही चेक ब्लैंक या अंडेटेड हो, यदि वह स्वेच्छा से हस्ताक्षरित कर सौंपा गया है, तो वह वैध एवं विधिसम्मत है।

अभियुक्त पर यह दायित्व है कि वह संभावनाओं के संतुलन (preponderance of probabilities) के आधार पर वैधानिक अनुमान का खंडन करे।

(ख) ICDS Ltd. v. Beena Shabeer, (2002) 6 SCC 426

माननीय न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया कि—

तथाकथित “Security Cheque” भी, यदि देयता के निर्वहन हेतु प्रस्तुत किया गया हो और अनादृत हो जाए, तो धारा 138 के प्रावधान लागू होंगे।

चेक का स्वरूप नहीं, बल्कि देयता का अस्तित्व निर्णायक तत्व है।

(ग) Sampelly Satyanarayana Rao v. Indian Renewable Energy Development Agency Ltd., (2016) 10 SCC 458

इस निर्णय में यह स्थापित किया गया कि—

यदि चेक निर्गमन के समय विधिक देयता विद्यमान थी, तो भले ही उसे सुरक्षा के नाम पर दिया गया हो, धारा 138 के अंतर्गत उत्तरदायित्व उत्पन्न होगा।

3. वर्तमान प्रकरण पर विधि का अनुप्रयोग

अभियुक्त ने चेक पर अपने हस्ताक्षर से इंकार नहीं किया है।

चेक विधिवत प्रस्तुत किया गया और अनादृत हुआ।

विधि द्वारा स्थापित अनुमान अभियुक्त के विरुद्ध लागू है।

मात्र यह कहना कि चेक “सुरक्षा” या “बिना तारीख” का था, अनुमान को खंडित करने हेतु पर्याप्त नहीं है।

अभियुक्त कोई ठोस, विश्वसनीय एवं संभावनाओं के संतुलन पर आधारित प्रतिरक्षा प्रस्तुत करने में असफल रहा है।

4. निष्कर्ष

अतः यह विनम्र निवेदन है कि—

हस्ताक्षरित चेक, चाहे वह अंडेटेड या रिक्त क्यों न हो, विधिक देयता के समर्थन में सशक्त साक्ष्य है।

अभियुक्त वैधानिक अनुमान का खंडन करने में असफल रहा है।

फलतः धारा 138 के अंतर्गत अपराध सिद्ध किया जाना न्यायोचित होगा।

दिनांक: _______

स्थान: _______

(अधिवक्ता/परिवादी)

Wednesday, 11 February 2026

2013 भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 74 के तहत अपील दायर करने में देरी को माफ़ किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

2013 भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 74 के तहत अपील दायर करने में देरी को माफ़ किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (9 फरवरी) को कहा कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजे और पारदर्शिता के अधिकार अधिनियम, 2013 (2013 अधिनियम) की धारा 74 के तहत अपील दायर करने में देरी को लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 5 के तहत माफ़ किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा,

"2013 अधिनियम की धारा 74, 1963 अधिनियम की धारा 5 के आवेदन को नहीं रोकती है।"

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एससी शर्मा की बेंच ने उन याचिकाओं के समूह की सुनवाई की, जिनमें विभिन्न हाईकोर्ट द्वारा अलग-अलग व्याख्याओं के कारण विवाद पैदा हुआ कि क्या 2013 अधिनियम की धारा 74 के तहत निर्धारित समय सीमा, जो अपील दायर करने के लिए 60 दिन देती है, जिसे और 60 दिनों के लिए बढ़ाया जा सकता है, लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के आवेदन को अप्रत्यक्ष रूप से बाहर करती है, जो अदालतों को पर्याप्त कारण दिखाने पर देरी को माफ़ करने का अधिकार देती है।

कई हाईकोर्ट ने यह राय दी थी कि एक बार जब धारा 74 के तहत 120 दिन की अवधि समाप्त हो जाती है तो अपील पर विचार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि 2013 अधिनियम एक विशेष कानून था जो लिमिटेशन एक्ट पर हावी था।

2013 अधिनियम की धारा 74 भूमि अधिग्रहण पुरस्कारों के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील को नियंत्रित करती है। यह संबंधित निकाय या पीड़ित व्यक्तियों को पुरस्कार के 60 दिनों के भीतर अपील करने की अनुमति देती है, जिसमें "पर्याप्त कारण" के लिए 60 दिन का संभावित विस्तार होता है, कुल मिलाकर अधिकतम 120 दिन।

लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 एक सामान्य प्रावधान है, जो अदालतों को अपील या आवेदन (आदेश XXI CPC को छोड़कर) दायर करने में देरी को माफ़ करने का अधिकार देती है, यदि देरी के लिए "पर्याप्त कारण" दिखाया जाता है। 

मुद्दा 

मुख्य मुद्दा यह था कि क्या 2013 अधिनियम की धारा 74 के तहत देर से दायर की गई अपील को लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के तहत माफ़ किया जा सकता है। फैसला सकारात्मक फैसला देते हुए जस्टिस सुंदरेश द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि 2013 के एक्ट के तहत लिमिटेशन एक्ट का कोई स्पष्ट बहिष्कार नहीं है। इसलिए लिमिटेशन एक्ट की धारा 29(2) के अनुसार, धारा 5 के तहत देरी को माफ करने की शक्ति लागू होती रहेगी। लिमिटेशन एक्ट की धारा 29(2) उन मामलों पर लागू होती है, जहां विशेष या स्थानीय कानून लिमिटेशन एक्ट की अनुसूची से अलग लिमिटेशन अवधि तय करते हैं। यह धारा 4 से 24 (सामान्य प्रावधान, जिसमें देरी की माफी भी शामिल है) को स्थानीय या विशेष कानूनों पर लागू करने की अनुमति देती है, जब तक कि उस विशेष/स्थानीय कानून द्वारा इसे स्पष्ट रूप से बाहर न किया गया हो। कोर्ट ने कहा कि किसी विशेष कानून के लिए लिमिटेशन एक्ट की धारा 4 से 24 के संचालन को बाहर करने के लिए, ऐसा बहिष्कार स्पष्ट होना चाहिए, न कि निहित। कोर्ट ने कहा, "विशेष या स्थानीय कानून के तहत लिमिटेशन की एक विशिष्ट अवधि को शामिल करने का मतलब 1963 के एक्ट का स्पष्ट बहिष्कार नहीं है। बल्कि, यह इंगित करना चाहिए कि 1963 के एक्ट की धारा 4 से 24 को बाहर रखा गया। नियम के अनुसार, ये शब्द विशेष या स्थानीय कानून में मौजूद होने चाहिए। अन्यथा, यह 1963 के एक्ट की धारा 29(2) को रद्द करने जैसा होगा।" चूंकि, 2013 के एक्ट की धारा 74 लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 की प्रयोज्यता को स्पष्ट रूप से बाहर नहीं करती है, इसलिए कोर्ट ने कहा कि लिमिटेशन एक्ट 2013 के एक्ट पर लागू होता है। 2013 के एक्ट के तहत देरी से दायर की गई अपीलों को लिमिटेशन एक्ट के तहत माफ किया जा सकता है। कोर्ट ने आगे कहा, "हम मानते हैं कि 1963 के एक्ट की धारा 29(2) का पालन अनिवार्य है, जिसमें अपवाद केवल एक स्पष्ट बहिष्कार के माध्यम से ही हो सकता है। इसलिए इसके अभाव में उक्त एक्ट की धारा 4 से 24 को ऐसे विशेष या स्थानीय कानून में पढ़ा जा सकता है। हम ऐसा इसलिए कहते हैं, भले ही सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत के बावजूद, क्योंकि धारा 29(2) एक बहुत ही अनोखा प्रावधान है जिसे अन्य कानूनों की व्याख्या में ध्यान में रखा जाना चाहिए।" कोर्ट का लिमिटेशन एक्ट की धारा 29(2) पर भरोसा करने का फैसला, 2013 एक्ट की धारा 103 से सपोर्ट मिला। 2013 एक्ट की धारा 103 में कहा गया कि एक्ट के प्रावधान किसी भी दूसरे मौजूदा कानूनों के अलावा हैं, न कि उनके खिलाफ। इस तरह धारा 29(2) का हवाला देते हुए कोर्ट ने लिमिटेशन एक्ट की धारा 29(2) के फायदेमंद प्रावधान को 2013 एक्ट में शामिल किया ताकि देरी से दायर अपील को लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के तहत जांच के दायरे में लाया जा सके और देरी का सही कारण बताने पर उन्हें माफ किया जा सके। कोर्ट ने कहा, “इसलिए हम मानते हैं कि 1963 एक्ट 2013 एक्ट पर लागू होता है। इसके उलट कोई भी व्याख्या ऐसी स्थिति पैदा करेगी जैसे कि 1963 एक्ट की धारा 29(2) और 2013 एक्ट की धारा 103 दोनों ही संबंधित कानूनों से गायब हो गईं, जो कानून में पूरी तरह से गलत है। हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी व्याख्या जिसका असर मेरिट के आधार पर फैसला मांगने के अधिकार को खत्म करने वाला हो, उसे तब तक नहीं अपनाना चाहिए जब तक कि वह साफ तौर पर ऐसा न दिखे। यहां तक ​​कि जब दो व्याख्याएं संभव हों तो वह व्याख्या जिसे अपील दायर करने में आसानी हो, उसे ही मंजूरी देनी चाहिए।” नतीजतन, अपीलों का निपटारा कर दिया गया, जिसमें 2013 एक्ट की धारा 74 के तहत हाईकोर्ट में पहली अपील दायर करने में देरी की माफी मांगने वाले सभी आवेदनों को स्वीकार करने का फैसला लिया गया। 

Cause Title: THE DEPUTY COMMISSIONER AND SPECIAL LAND ACQUISITION OFFICER VERSUS M/S S.V. GLOBAL MILL LIMITED (with connected appeals)


https://hindi.livelaw.in/supreme-court/delay-in-filing-appeals-under-s-74-of-2013-land-acquisition-act-can-be-condoned-supreme-court-522501

जबरदस्ती या धोखाधड़ी के आधार वाले सिविल वाद को शुरुआती चरण में खारिज नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

जबरदस्ती या धोखाधड़ी के आधार वाले सिविल वाद को शुरुआती चरण में खारिज नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट 2026-02-11 

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (10 फरवरी) को कहा कि केवल इस आधार पर कि किसी सिविल वाद में जबरदस्ती (coercion), अनुचित प्रभाव (undue influence) या मिथ्या प्रस्तुतीकरण (misrepresentation) का आरोप लगाया गया है, उसे सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 11 के तहत प्रारंभिक चरण में खारिज नहीं किया जा सकता।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने मद्रास हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के उन समवर्ती निष्कर्षों को रद्द कर दिया, जिनमें अपीलकर्ता के सिविल वाद को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। वाद में आरोप था कि अचल संपत्ति का बंटवारा जबरदस्ती, अनुचित प्रभाव और मिथ्या प्रस्तुतीकरण के आधार पर असमान रूप से किया गया।

खंडपीठ ने कहा:

“जबरदस्ती, अनुचित प्रभाव और विशेष रूप से मिथ्या प्रस्तुतीकरण के आधार, जिनके परिणामस्वरूप असमान बंटवारा हुआ, उन्हें आदेश VII नियम 11 के आवेदन पर विचार करते समय एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता।”

क्या है विवाद?

विवाद 308 पृष्ठों के एक बंटवारा विलेख (Partition Deed) से जुड़ा है, जिस पर सभी पक्षों के हस्ताक्षर स्वीकार किए गए हैं। प्रतिवादी-वैikunदरजन समूह इसे बाध्यकारी समझौता मानकर लागू कराना चाहता है, जबकि अपीलकर्ता-जेगथीसन समूह का दावा है कि यह दस्तावेज जबरदस्ती, अनुचित प्रभाव और मिथ्या प्रस्तुतीकरण के तहत हस्ताक्षरित कराया गया था और यह केवल एक “अस्थायी मसौदा” था।

मामला 2 जनवरी 2019 के एक सुलह (Conciliation) अवॉर्ड से और जटिल हो गया, जो कथित तौर पर मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 के तहत जारी किया गया था। इसे एक सौतेले भाई ने सुलहकर्ता के रूप में हस्ताक्षरित किया था। प्रतिवादी का तर्क है कि यह दस्तावेज धारा 36 के तहत प्रवर्तनीय सुलह अवॉर्ड है। वहीं अपीलकर्ता का कहना है कि वास्तविक सुलह प्रक्रिया हुई ही नहीं और अवॉर्ड को असमान समझौते को वैध ठहराने के लिए गढ़ा गया।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

ट्रायल कोर्ट ने आदेश VII नियम 11 CPC के तहत वाद खारिज कर दिया था, जिसे हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं ने वाद में ऐसे मुद्दे उठाए हैं जिन पर विधिवत सुनवाई (trial) की आवश्यकता है, विशेषकर बंटवारा विलेख और सुलह अवॉर्ड की वैधता को लेकर।

जस्टिस चंद्रन द्वारा लिखित निर्णय में कहा गया कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने प्रारंभिक स्तर पर वाद खारिज कर गंभीर विधिक त्रुटि की।

अदालत ने कहा:

“हम पाते हैं कि ट्रायल कोर्ट का आदेश, जिसे हाईकोर्ट ने पुष्ट किया, विधि की दृष्टि से गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण है। वाद में प्रथम दृष्टया कारण-ए-कार्रवाई (prima facie cause of action) प्रकट होता है। इसे न तो निरर्थक कहा जा सकता है और न ही प्रक्रिया का दुरुपयोग। वाद के तथ्य, कानूनी आधार और मांगी गई राहत इस स्तर पर अर्थहीन नहीं हैं और यह नहीं कहा जा सकता कि वाद अनिवार्य रूप से विफल होगा।”

इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि वाद में वास्तविक और परीक्षण योग्य मुद्दे उठाए गए हों, तो उसे केवल आरोपों के आधार पर प्रारंभिक स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता।

Tuesday, 10 February 2026

जमानत को रकम जमा करने से नहीं जोड़ा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

जमानत को रकम जमा करने से नहीं जोड़ा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया सिद्धांत, झारखंड हाइकोर्ट का सशर्त आदेश रद्द 10 Feb 2026 

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि नियमित या अग्रिम जमानत को किसी भी प्रकार की धनराशि जमा करने की शर्त से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को दोहराते हुए झारखंड हाइकोर्ट द्वारा पारित सशर्त जमानत आदेशों को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में आरोपियों को जमानत पर रिहा किया जाए। यह मामला एक पिता-पुत्र से जुड़ा है, जिन पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया। शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने क्राफ्ट पेपर खरीदने के बाद 9 लाख का भुगतान नहीं किया। इस संबंध में FIR दर्ज हुई। गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए दोनों आरोपियों ने पहले सेशन कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी दी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद वे झारखंड हाइकोर्ट पहुंचे। 

 हाइकोर्ट ने 13 जनवरी, 2025 और 14 नवंबर, 2025 को पारित अपने आदेशों में आरोपियों को निर्देश दिया कि वे एक पूरक हलफनामा दाखिल करें, जिसमें यह दर्शाया जाए कि शिकायतकर्ता को 9,12,926.84 का भुगतान कर दिया गया। हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि भुगतान दर्शाने वाला हलफनामा दाखिल नहीं किया गया तो अग्रिम जमानत याचिका स्वतः खारिज मानी जाएगी। बाद में आरोपियों द्वारा समय मांगे जाने पर भी इसी शर्त के साथ उन्हें मोहलत दी गई। 

इन आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जहां जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रारंभिक टिप्पणी में ही कहा कि हाइकोर्ट ने असामान्य आदेश पारित किए और वह सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों की अनदेखी करते नजर आते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से अपने हालिया फैसले गजानन दत्तात्रेय गोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य का उल्लेख किया, जिसमें यह साफ कहा गया कि जमानत याचिकाओं का निपटारा मामले के गुण-दोष के आधार पर होना चाहिए न कि आरोपी द्वारा किसी रकम के भुगतान या आश्वासन पर। 

 अदालत ने निराशा जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद हाइकोर्ट इस प्रकार के आदेश पारित करते जा रहे हैं। कोर्ट ने कहा, “यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस न्यायालय द्वारा बार-बार यह कहे जाने के बावजूद कि नियमित या अग्रिम जमानत को किसी भी राशि के जमा करने की शर्त से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। हाइकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से 9,12,926.84 जमा करने को कहा। हमने अपने निर्णय में बिल्कुल स्पष्ट किया कि यदि जमानत का मामला बनता है तो जमानत दी जानी चाहिए और यदि नहीं बनता तो याचिका खारिज की जा सकती है लेकिन कोर्ट को धनराशि जमा करने जैसी शर्त लगाकर विवेकाधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए।” 

 इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाइकोर्ट के दोनों सशर्त आदेशों को रद्द किया और निर्देश दिया कि यदि आरोपियों को गिरफ्तार किया जाता है तो उन्हें जांच अधिकारी द्वारा लगाई जाने वाली सामान्य शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा किया जाए। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस आदेश की एक प्रति झारखंड हाइकोर्ट के मुख्य जस्टिस के समक्ष रखी जाए ताकि इस प्रकार के आदेशों पर भविष्य में रोक लगाई जा सके।


केस-लॉ नोट

Prantik Kumar & Anr. v. State of Jharkhand & Anr.

SLP (Crl.) Diary No. 4297/2026

निर्णय दिनांक: फरवरी, 2026 (Supreme Court of India)

✦ प्रतिपादित विधिक सिद्धांत:

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया कि जमानत (Bail) को किसी धनराशि के जमा करने की शर्त से नहीं जोड़ा जा सकता। न्यायालय ने कहा कि जमानत का उद्देश्य अभियुक्त की न्यायालय में उपस्थिति सुनिश्चित करना है, न कि किसी प्रकार की वसूली (recovery) या क्षतिपूर्ति (compensation) करवाना।

झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा जमानत आदेश में लगभग ₹9,00,000/- जमा करने की शर्त लगाई गई थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने विधि-विरुद्ध और न्यायसंगत सिद्धांतों के विपरीत माना। न्यायालय ने दोहराया कि जमानत आदेश में ऐसी मौद्रिक शर्तें आपराधिक न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांतों को विकृत (distort) कर सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि जमानत प्रदान करते समय न्यायालय को केवल अपराध की प्रकृति, आरोप की गंभीरता, साक्ष्य की स्थिति, अभियुक्त के फरार होने या साक्ष्य से छेड़छाड़ की संभावना जैसे वैधानिक मानकों पर विचार करना चाहिए। जमानत को दंडात्मक या वसूली के साधन में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।

अतः उक्त प्रकरण में उच्च न्यायालय का सशर्त आदेश निरस्त कर दिया गया और बिना धनराशि जमा करने की शर्त के जमानत प्रदान की गई।

Friday, 6 February 2026

धारा 127 CrPC: एकमुश्त राशि स्वीकार करने के बाद भी पत्नी भरण-पोषण बढ़ाने की हकदार

धारा 127 CrPC: एकमुश्त राशि स्वीकार करने के बाद भी पत्नी भरण-पोषण बढ़ाने की हकदार; बॉम्बे हाईकोर्ट ने 5 साल की समय सीमा को स्पष्ट किया 

बॉम्बे हाईकोर्ट (औरंगाबाद बेंच) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि पत्नी द्वारा पूर्व के आदेश के तहत एकमुश्त भरण-पोषण (Lump Sum Maintenance) स्वीकार कर लेने मात्र से वह भविष्य में भरण-पोषण राशि में बढ़ोत्तरी (Enhancement) की मांग करने से वंचित नहीं हो जाती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दी गई एकमुश्त राशि की वैधता एक बार में पांच वर्ष से अधिक नहीं होती है, जिसके बाद पत्नी पुनः राशि बढ़ाने का दावा कर सकती है।


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Sunday, 1 February 2026

अग्रिम जमानत हेतु सेशन कोर्ट जाना अनिवार्य नहीं — सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

*अग्रिम जमानत हेतु सेशन कोर्ट जाना अनिवार्य नहीं — सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय*


सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने Manjeet Singh vs. State of Uttar Pradesh (Criminal Appeal No. ___/2025, @SLP (Crl.) No. 11667/2025) में यह स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत (धारा 482, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023) के लिए पहले सेशन कोर्ट में आवेदन करना कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में लचीलापन और न्याय तक त्वरित पहुँच को सुनिश्चित करता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट और सेशन कोर्ट — दोनों के पास समान अधिकार क्षेत्र है, और "विशेष परिस्थितियों" में आवेदक सीधे हाईकोर्ट में जा सकता है।


अग्रिम जमानत भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है, जिसका उद्देश्य अभियुक्त को गिरफ्तारी से पूर्व ही संरक्षण देना है। परंपरागत रूप से, कई हाईकोर्टों में यह धारणा रही कि पहले सेशन कोर्ट में आवेदन करना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने इस अनिवार्यता को अस्वीकार कर दिया है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक सुगम हो गई है।


2. केस विवरण (Case Details)


न्यायालय: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया


क्षेत्राधिकार: Criminal Appellate Jurisdiction


क्रिमिनल अपील संख्या: Criminal Appeal No. ___ / 2025 (@SLP (Crl.) No. 11667/2025)


मामला: Manjeet Singh vs. State of Uttar Pradesh


संबद्ध अपील: Criminal Appeal No. ___ / 2025 (@SLP (Crl.) No. 11679/2025)


पीठ: न्यायमूर्ति संजय कुमार एवं न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया


निर्णय की तिथि: 8 अगस्त 2025


3. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (Supreme Court’s Ruling)


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:


> "हाईकोर्ट और सेशन कोर्ट, दोनों के पास अग्रिम जमानत देने का समान अधिकार है। आवेदक सीधे हाईकोर्ट जा सकता है, यदि परिस्थितियाँ ऐसा करने को उचित ठहराती हैं।"


4. उद्धृत पूर्व निर्णय (Cited Precedents)


1. Kanumuri Raghurama Krishnam Raju vs. State of A.P., (2021) 13 SCC 822


2. Arvind Kejriwal vs. Directorate of Enforcement, 2024 INSC 512


5. विधिक महत्व (Legal Significance)


प्रक्रियात्मक लचीलापन: अब अभियुक्त को सेशन कोर्ट में पहले जाने का बंधन नहीं है।


न्याय तक त्वरित पहुँच: समय-संवेदनशील मामलों में सीधे हाईकोर्ट से राहत मिल सकती है।


न्यायिक विवेकाधिकार: प्रत्येक मामले में “विशेष परिस्थितियों” का आकलन न्यायालय करेगा


6. निष्कर्ष (Conclusion)


यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण सुधार है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है और न्यायिक पहुँच को आसान बनाता है। यह अधिवक्ताओं और अभियुक्तों दोनों के लिए एक रणनीतिक विकल्प उपलब्ध कराता है।

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संदर्भ सूची (References)


1. Supreme Court of India, Manjeet Singh vs. State of Uttar Pradesh, Criminal Appeal No. ___/2025, @SLP (Crl.) No. 11667/2025, निर्णय दिनांक 08.08.2025.


2. Kanumuri Raghurama Krishnam Raju vs. State of A.P., (2021) 13 SCC 822.


3. Arvind Kejriwal vs. Directorate of Enforcement, 2024 INSC 512.