Saturday, 12 September 2026

पति स्वस्थ, सक्षम एवं कार्य करने योग्य होने के बावजूद पत्नी एवं नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण से केवल इस आधार पर बच नहीं सकता कि वर्तमान में उसकी कोई आय नहीं है अथवा वह बेरोजगार है।

 

आवेदिका की ओर से लिखित तर्क


विषय : पति स्वस्थ, सक्षम एवं कार्य करने योग्य होने के बावजूद पत्नी एवं नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण से केवल इस आधार पर बच नहीं सकता कि वर्तमान में उसकी कोई आय नहीं है अथवा वह बेरोजगार है।

1. विधिक स्थिति

यह स्थापित विधि है कि भरण-पोषण का प्रावधान सामाजिक न्याय का उपाय है। इसका उद्देश्य पत्नी एवं बच्चों को आर्थिक असहायता, अभाव, वंचना तथा भटकाव से बचाना है। वर्तमान में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144 के अंतर्गत यह अधिकार प्रवर्तनीय है। पूर्व में यही क्षेत्र दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के अंतर्गत आता था।

केवल यह तथ्य कि पति की वर्तमान आय शून्य बताई गई है, अपने-आप में उसे पत्नी एवं बच्चे के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त नहीं करता। न्यायालय पति की शारीरिक क्षमता, शैक्षणिक योग्यता, कार्य करने की क्षमता, पूर्व रोजगार, पूर्व आय, संपत्ति, जीवन-स्तर तथा वास्तविक earning capacity को देख सकता है।

A. माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्याय-दृष्टांत

1. Bhuwan Mohan Singh v. Meena & Ors.

Criminal Appeal No. 1331 of 2014

निर्णय दिनांक : 15.07.2014

Citation : (2015) 6 SCC 353; AIR 2014 SC 2875

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 125 CrPC का प्रमुख उद्देश्य सामाजिक न्याय प्रदान करना तथा पत्नी एवं बच्चों को destitution और vagrancy से बचाना है। न्यायालय ने यह भी प्रतिपादित किया कि सक्षम पति पत्नी के भरण-पोषण के दायित्व से इस प्रकार बच नहीं सकता कि उसके पास वर्तमान में पर्याप्त आय नहीं है। सक्षम एवं स्वस्थ व्यक्ति को आवश्यकता होने पर शारीरिक श्रम करके भी धन अर्जित करना होगा। न्यायालय ने धारा 125 को केवल तकनीकी प्रावधान न मानकर सामाजिक न्याय का प्रभावी साधन माना। उक्त निर्णय में पूर्ववर्ती निर्णयों, विशेषतः Chaturbhuj v. Sita Bai, को भी स्वीकार किया गया।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

यदि अनावेदक स्वस्थ है, किसी शारीरिक अथवा मानसिक अक्षमता से ग्रस्त नहीं है और कार्य करने में सक्षम है, तो केवल बेरोजगारी का कथन करके वह पत्नी एवं बच्चे के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता।

2. Shamima Farooqui v. Shahid Khan

Criminal Appeal Nos. 564-565 of 2015

निर्णय दिनांक : 06.04.2015

Citation : (2015) 5 SCC 705; (2015) 3 SCC (Civ) 274; (2015) 2 SCC (Cri) 785

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पत्नी के भरण-पोषण के संबंध में पति के दायित्व को अत्यंत स्पष्ट किया। न्यायालय ने माना कि भरण-पोषण की राशि ऐसी होनी चाहिए जिससे पत्नी सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सके। केवल पति की आर्थिक कठिनाई अथवा सेवानिवृत्ति आदि का आधार लेकर भरण-पोषण की राशि को अनुचित रूप से कम नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि पत्नी के वास्तविक जीवन-यापन के खर्च को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

अनावेदक यदि यह कहता है कि वह वर्तमान में कोई आय अर्जित नहीं कर रहा है, तो उसे अपनी वास्तविक आर्थिक स्थिति, कार्य करने की क्षमता तथा आय अर्जित करने में असमर्थता का विश्वसनीय प्रमाण देना होगा। मात्र मौखिक कथन पर्याप्त नहीं है।

3. Reema Salkan v. Sumer Singh Salkan

Civil/Criminal Maintenance Proceedings; Supreme Court

निर्णय वर्ष : 2019

Citation : (2019) 12 SCC 312

इस मामले में पति ने स्वयं को बेरोजगार बताया था। वह उच्च शिक्षित तथा able-bodied व्यक्ति था। सर्वोच्च न्यायालय ने उसके बेरोजगारी के दावे को परिस्थितियों के संदर्भ में देखा। न्यायालय ने पाया कि पति उच्च शिक्षित था, पूर्व में पर्याप्त आय अर्जित करता था और उसके द्वारा बेरोजगार होने का दावा पर्याप्त प्रमाण से समर्थित नहीं था। न्यायालय ने यह सिद्धांत स्वीकार किया कि शिक्षित एवं सक्षम पति केवल बेरोजगारी का दावा करके अपनी पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बाहर नहीं हो सकता। इस प्रकरण में उच्च न्यायालय द्वारा पति की earning capacity के आधार पर notional income का विचार किया गया था; सर्वोच्च न्यायालय ने quantum निर्धारित करते समय पति के पूर्व जीवन-स्तर, पूर्व आय, योग्यता और परिस्थितियों को भी महत्वपूर्ण माना।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

यदि अनावेदक स्वस्थ एवं कार्य करने योग्य है, तो उसकी वर्तमान आय शून्य बताने मात्र से उसकी earning capacity समाप्त नहीं हो जाती।

4. Rajnesh v. Neha & Anr.

Criminal Appeal No. 730 of 2020

निर्णय दिनांक : 04.11.2020

Citation : (2021) 2 SCC 324

यह भरण-पोषण के विषय में वर्तमान समय का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं व्यापक निर्णय है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने maintenance proceedings के लिए विस्तृत guidelines निर्धारित कीं। न्यायालय ने income disclosure affidavit, maintenance determination के factors, विभिन्न कार्यवाहियों में overlapping maintenance तथा बच्चों की शिक्षा एवं आवश्यकताओं सहित अनेक पहलुओं को व्यवस्थित किया। न्यायालय ने यह सिद्धांत स्वीकार किया कि able-bodied husband को पत्नी एवं बच्चों के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त आय अर्जित करने में सक्षम माना जा सकता है और वह अपनी कमाने की क्षमता को जानबूझकर निष्क्रिय करके maintenance liability से बच नहीं सकता।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

अनावेदक की वास्तविक आय स्पष्ट न होने पर न्यायालय उसकी qualification, occupation, previous employment, assets, lifestyle तथा earning capacity को ध्यान में रखकर उचित maintenance निर्धारित कर सकता है।

5. Anju Garg & Anr. v. Deepak Kumar Garg

Civil Appeal/Criminal proceedings concerning maintenance

निर्णय दिनांक : 28.09.2022

Citation : 2022 SCC OnLine SC 1314

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा कि पति का पत्नी एवं नाबालिग बच्चों को आर्थिक सहायता प्रदान करना उसका sacrosanct duty है। यदि पति able-bodied है तो उसे आवश्यकता पड़ने पर physical labour से भी धन अर्जित करना होगा और वह केवल यह कहकर अपने दायित्व से नहीं बच सकता कि उसके पास पर्याप्त आय नहीं है। न्यायालय ने Chaturbhuj v. Sita Bai तथा Bhuwan Mohan Singh v. Meena के सिद्धांतों को लागू किया और माना कि Section 125 CrPC सामाजिक न्याय का प्रावधान है।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

यदि अनावेदक स्वस्थ व्यक्ति है और कोई प्रमाणित अक्षमता नहीं है, तो उसका यह कहना कि “मैं कुछ नहीं कमाता” उसके maintenance obligation का बचाव नहीं हो सकता।

B. माननीय उच्च न्यायालय के न्याय-दृष्टांत

6. Sandeep Kumrawat v. Smt. Antima Kumrawat

High Court of Madhya Pradesh, Bench at Indore

Criminal Revision No. 825 of 2020

निर्णय दिनांक : 19.10.2023

Presiding Judge : Hon'ble Shri Justice Prem Narayan Singh

इस महत्वपूर्ण निर्णय में पति ने स्वयं को बेरोजगार बताया और maintenance कम करने का आग्रह किया। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने उसके तर्क को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि यदि पति कमाने में सक्षम है तो केवल नौकरी छोड़ देने अथवा बेरोजगार होने के आधार पर वह पत्नी एवं बच्चे के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता। न्यायालय ने Shamima Farooqui, Rajnesh v. Neha तथा अन्य सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के सिद्धांतों को लागू किया। विशेष रूप से न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि पति यदि B.Tech/Diploma Engineer जैसे योग्य व्यक्ति होने के बावजूद नौकरी छोड़ देता है, तो केवल नौकरी छोड़ देना maintenance liability से बचने का आधार नहीं बन सकता।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

यदि वर्तमान अनावेदक स्वयं स्वस्थ एवं सक्षम है और उसने अपनी इच्छा से रोजगार नहीं किया है अथवा रोजगार छोड़ दिया है, तो यह उसकी अपनी पसंद है और इसका आर्थिक भार पत्नी एवं बच्चे पर नहीं डाला जा सकता।

7. Kamal v. State of U.P.

Allahabad High Court

Criminal Revision No. 461 of 2023

निर्णय दिनांक : 25.01.2024

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने Anju Garg v. Deepak Kumar Garg के सिद्धांत को लागू करते हुए माना कि स्वस्थ एवं सक्षम पति यदि यह कहे कि उसके पास नौकरी अथवा अन्य स्रोत से कोई आय नहीं है, तब भी वह पत्नी के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त नहीं होता। न्यायालय ने यह भी माना कि यदि पति शारीरिक श्रम भी करे तो वह न्यूनतम मजदूरी अर्जित कर सकता है; अतः पूर्णतः स्वस्थ व्यक्ति द्वारा “मेरी कोई आय नहीं है” का कथन अपने-आप में पर्याप्त बचाव नहीं है।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

अनावेदक को अपनी पत्नी एवं बच्चे के भरण-पोषण के लिए वैध साधनों से आय अर्जित करने का प्रयास करना होगा। बेरोजगारी को पत्नी एवं बच्चे के विरुद्ध हथियार नहीं बनाया जा सकता।

8. Naresh v. Seema

Delhi High Court

Criminal Revision Petition No. 195 of 2024

निर्णय वर्ष : 2024

दिल्ली उच्च न्यायालय ने Anju Garg, Rajnesh, Bhuwan Mohan Singh और Shamima Farooqui के सिद्धांतों को लागू करते हुए कहा कि able-bodied husband अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण के लिए legitimate means से आय अर्जित करने के लिए बाध्य है। पति द्वारा यह कहना कि उसका व्यवसाय बंद हो गया है अथवा वर्तमान में आय का कोई स्रोत नहीं है, अपने-आप में maintenance liability समाप्त नहीं करता।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

अनावेदक स्वस्थ है तो उसकी earning capacity को ध्यान में रखा जाना चाहिए और पत्नी तथा नाबालिग बच्चे को केवल इसलिए अभाव में नहीं छोड़ा जा सकता कि पति वर्तमान में आय अर्जित नहीं कर रहा है।

3. समेकित विधिक सिद्धांत

उपरोक्त सभी न्याय-दृष्टांतों से निम्न विधिक सिद्धांत पूर्णतः स्थापित होते हैं—

(i) पत्नी एवं नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण करना पति/पिता का वैधानिक दायित्व है।

(ii) पति का स्वस्थ एवं able-bodied होना अत्यंत महत्वपूर्ण परिस्थिति है।

(iii) केवल “मैं बेरोजगार हूँ” अथवा “मेरी कोई आय नहीं है” कहना maintenance से बचने का वैध आधार नहीं है।

(iv) पति को अपनी पत्नी एवं बच्चों के भरण-पोषण हेतु वैध साधनों से आय अर्जित करने का प्रयास करना होगा।

(v) आवश्यकता होने पर सक्षम पति को physical labour से भी आय अर्जित करनी पड़ सकती है।

(vi) maintenance निर्धारित करते समय केवल disclosed income नहीं बल्कि पति की earning capacity, qualification, past employment, previous income, assets, lifestyle एवं सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी देखी जा सकती है।

(vii) पत्नी की आय होने मात्र से भी उसका maintenance claim स्वतः समाप्त नहीं होता; यह देखा जाना आवश्यक है कि वह वास्तव में स्वयं को किस सीमा तक maintain कर सकती है।

(viii) नाबालिग बच्चे का maintenance स्वतंत्र अधिकार है और बच्चे की food, clothing, residence, medical तथा educational requirements पर विशेष रूप से विचार किया जाना आवश्यक है।

4. वर्तमान मामले में निष्कर्ष

अतः यदि वर्तमान प्रकरण में यह तथ्य अभिलेख पर है कि—

1. अनावेदक पति स्वस्थ है;

2. वह किसी ऐसी बीमारी अथवा शारीरिक/मानसिक अक्षमता से ग्रस्त नहीं है जिससे वह कार्य न कर सके;

3. वह कार्य करने योग्य आयु एवं क्षमता में है;

4. उसके पास पर्याप्त शैक्षणिक/व्यावसायिक योग्यता अथवा पूर्व कार्य का अनुभव है;

5. वह अपनी पत्नी एवं नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण नहीं कर रहा है; और

6. उसने अपनी वास्तविक आय अथवा assets का पूर्ण एवं सत्य disclosure नहीं किया है,

तो केवल यह कथन कि “मैं कुछ नहीं कमाता” उसे maintenance liability से मुक्त नहीं करता।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Bhuwan Mohan Singh, Shamima Farooqui, Reema Salkan, Rajnesh v. Neha तथा Anju Garg में प्रतिपादित सिद्धांतों के आलोक में अनावेदक की earning capacity को उसकी वर्तमान घोषित आय से अलग करके देखा जाना आवश्यक है।

अतः माननीय न्यायालय से विनम्र निवेदन है कि अनावेदक के केवल बेरोजगार होने के कथन को स्वीकार न करते हुए उसकी वास्तविक आर्थिक क्षमता, योग्यता, पूर्व रोजगार/आय, संपत्ति, रहन-सहन तथा अन्य परिस्थितियों का समुचित मूल्यांकन किया जाए और आवेदिका पत्नी एवं नाबालिग बच्चे के लिए उचित, न्यायसंगत एवं सम्मानजनक भरण-पोषण राशि निर्धारित की जाए।

प्रार्थना

अतः माननीय न्यायालय से प्रार्थना है कि आवेदिका पत्नी एवं नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण हेतु परिस्थितियों एवं अनावेदक की वास्तविक earning capacity को दृष्टिगत रखते हुए उचित राशि प्रदान करने की कृपा की जाए तथा अनावेदक को केवल बेरोजगारी अथवा आय न होने के कथन के आधार पर उसके वैधानिक दायित्व से मुक्त न किया जाए।

दिनांक : ____________

स्थान : ____________

आवेदिका/आवेदक की ओर से

अधिवक्ता

इसी संबंध में हिमाचल पदेश हाई कोर्ट का एक जजमेंट सितंबर 2026 में भी आया है

Wednesday, 9 September 2026

रिटायरमेंट के बाद गवर्नर की मंजूरी के बिना विभागीय कार्रवाई जारी नहीं रह सकती

 रिटायरमेंट के बाद गवर्नर की मंजूरी के बिना विभागीय कार्रवाई जारी नहीं रह सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-09-09

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ उसकी रिटायरमेंट से पहले शुरू की गई विभागीय कार्रवाई रिटायरमेंट के बाद अपने आप जारी नहीं रह सकती। सिविल सर्विस रेगुलेशंस के रेगुलेशन 351-ए के तहत रिटायरमेंट के बाद ऐसी कार्रवाई जारी रखने और उसके आधार पर कोई सजा देने के लिए गवर्नर की मंजूरी जरूरी है।

जस्टिस अनिल कुमार गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ यूपी बनाम श्री कृष्ण पांडे और भागीरथी जेना बनाम बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के फैसलों के साथ-साथ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले हरिहर भोले नाथ मिश्रा बनाम स्टेट पब्लिक सर्विसेज ट्रिब्यूनल पर भरोसा करते हुए यह फैसला सुनाया।

र्ट ने कहा कि रेगुलेशन 351-ए के तहत सरकारी कर्मचारी की रिटायरमेंट के बाद उसके खिलाफ पहले से शुरू की गई विभागीय कार्रवाई स्वतः जारी नहीं रह सकती। उसके आधार पर कोई दंड भी नहीं दिया जा सकता। यहां तक कि पहले से शुरू की गई कार्रवाई को जारी रखने के लिए भी गवर्नर की मंजूरी आवश्यक है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रेगुलेशन 351-ए के तहत कर्मचारी की रिटायरमेंट के चार साल बाद नई विभागीय कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती। पहले से शुरू कार्रवाई को रिटायरमेंट के बाद जारी रखने के लिए भी गवर्नर की मंजूरी लेना अनिवार्य है।

मामला बलिया के जिला समाज कल्याण अधिकारी कार्यालय में तैनात रहे एक वरिष्ठ लिपिक से जुड़ा था। उनके खिलाफ 11 अगस्त 2005 को विभागीय कार्रवाई शुरू की गई। उन्होंने कुछ जरूरी दस्तावेज मांगे थे, लेकिन उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया। इसके बाद 30 अक्टूबर 2006 को एकतरफा जांच रिपोर्ट पेश कर दी गई।

कार्रवाई पूरी होने से पहले ही कर्मचारी 31 मार्च 2008 को रिटायर हो गए। विभागीय कार्रवाई लंबित होने के कारण उनके सेवानिवृत्ति लाभ भी रोक दिए गए।

बाद में एक आदेश जारी कर उन्हें पिछली तारीख से सेवा से हटाया हुआ माना गया। अपील में यह आदेश रद्द कर दिया गया और रेगुलेशन 351-ए के तहत कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया। इसके बाद सामाजिक कल्याण निदेशक ने 27 दिसंबर 2011 के आदेश से कर्मचारी की 50 प्रतिशत पेंशन स्थायी रूप से रोक दी।

स्टेट पब्लिक सर्विसेज ट्रिब्यूनल ने इस आदेश को रद्द किया। इसके खिलाफ राज्य की ओर से दायर याचिका को हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 15 जनवरी 2014 को गवर्नर की मंजूरी नहीं होने के कारण खारिज कर दिया। इसके बाद सामाजिक कल्याण निदेशक ने 13 फरवरी 2014 को विभागीय कार्रवाई समाप्त कर दी।

इसके बावजूद 15 जनवरी 2015 को उसी विभागीय कार्रवाई के आधार पर एक नया आदेश पारित कर कर्मचारी की पेंशन का दो-तिहाई हिस्सा स्थायी रूप से रोक दिया गया। साथ ही 36,98,603 रुपये की वसूली का भी आदेश दिया गया।

हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से पेश वकील यह नहीं बता सके कि कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के बाद गवर्नर की कोई मंजूरी ली गई थी। न तो विवादित आदेश में ऐसी मंजूरी का उल्लेख था और न ही राज्य के जवाबी हलफनामे में इसका कोई प्रमाण पेश किया गया।

कोर्ट ने कहा कि निदेशक इस तथ्य से पूरी तरह अवगत थे कि गवर्नर की मंजूरी नहीं ली गई। इसके बावजूद उन्होंने उसी कार्रवाई के आधार पर आदेश पारित किया। कोर्ट ने इसे कर्मचारी को परेशान करने और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले उसके वैध लाभों को रोकने की जानबूझकर की गई कोशिश माना।

हाईकोर्ट ने 15 जनवरी 2015 के विवादित आदेश रद्द करते हुए याचिका मंजूर की। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि कर्मचारी को उसके सभी देय रिटायरमेंट लाभ 8 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ आठ सप्ताह के भीतर जारी किए जाएं।

कोर्ट ने कहा कि आदेश की प्रमाणित प्रति संबंधित अधिकारी संख्या तीन के समक्ष पेश किए जाने के आठ सप्ताह के भीतर भुगतान नहीं किया गया तो देय राशि पर 12 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होगा।

साबित करने के लिए पर्याप्त... जाति साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज न होने भर से SC-ST को संवैधानिक लाभ से वंचित नहीं कर सकते: केरल हाईकोर्ट

साबित करने के लिए पर्याप्त... जाति साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज न होने भर से SC-ST को संवैधानिक लाभ से वंचित नहीं कर सकते: केरल हाईकोर्ट 7 Sept 2026 

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC/ST) का सदस्य अपनी जातीय पहचान साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर पाया केवल इस आधार पर उसे संविधान के तहत मिलने वाले लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। इसके लिए राज्य को उसके दावे के विपरीत ठोस और स्वतंत्र साक्ष्य पेश करना होगा। डॉ. जस्टिस ए.के. जयशंकरन नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के. की डिवीजन बेंच ने कहा कि केरल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति सामुदायिक प्रमाणपत्र जारी करने के विनियमन अधिनियम 1996 के तहत जाति दावों की जांच करते समय अधिकारियों को SC-ST सदस्यों से वही प्रमाण का बोझ पूरा करने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, जो सामान्य परिस्थितियों में किसी नागरिक से उसकी सामुदायिक पहचान साबित करने के लिए की जाती है। 

  अदालत रिटायर्ड पोस्टल असिस्टेंट की अपील पर सुनवाई कर रही थी। सिंगल बेंच ने उस कार्रवाई को बरकरार रखा, जिसमें उन्हें मलई पंडारम अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं माना गया। अपीलकर्ता को 1980 में पोस्टमैन के पद पर और 1989 में पोस्टल असिस्टेंट के पद पर अनुसूचित जनजाति आरक्षण के तहत नियुक्ति और पदोन्नति मिली थी। यह लाभ तहसीलदार द्वारा जारी सामुदायिक प्रमाणपत्र के आधार पर मिला था, जिसमें उन्हें मलई पंडारम समुदाय का सदस्य बताया गया। 

बाद में सतर्कता जांच में दावा किया गया कि वह मलई पंडारम नहीं, बल्कि पंडारम (वीर शैव) समुदाय से संबंधित हैं, जिसे अन्य पिछड़ा वर्ग में रखा गया। जांच के आधार पर स्क्रूटिनी कमेटी ने उनका सामुदायिक प्रमाणपत्र रद्द करने सहित कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद सरकार ने उनकी सेवा समाप्त करने और कथित झूठा जाति दावा करने के आरोप में अभियोजन चलाने का आदेश दिया। अपीलकर्ता ने अधिकारियों द्वारा भरोसा किए गए दस्तावेजों और सामग्री में विसंगतियां होने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि सतर्कता रिपोर्ट में मुख्य रूप से उनके मामा के कथित बयान पर भरोसा किया गया, जबकि मामा खुद अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित बताए गए। उन्होंने यह भी बताया कि उनके परिवार के अन्य सदस्यों को अनुसूचित जनजाति की पहचान के आधार पर लाभ मिल चुके हैं। अपीलकर्ता ने अपने खिलाफ इस्तेमाल किए गए मूल दस्तावेज देखने की मांग की थी लेकिन प्रतिकूल आदेश पारित करने से पहले उन्हें ये दस्तावेज नहीं दिखाए गए। 

डिवीजन बेंच ने पाया कि अपीलकर्ता की आपत्ति और उसके जवाब पर आदेश पारित करते समय विचार ही नहीं किया गया। अदालत ने राज्य की यह दलील भी खारिज की कि उपलब्ध सामग्री पर्याप्त होने के कारण आपत्ति पर विचार न करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं है। अदालत ने कहा कि 1996 के कानून के नजरिए से भी स्क्रूटिनी कमेटी का दृष्टिकोण सही नहीं था। जाति की गलत जानकारी देकर आरक्षण या अन्य संवैधानिक लाभ हासिल करने के आरोपों की जांच करते समय अधिकारियों को उन सामाजिक कठिनाइयों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए, जिनका सामना SC/ST समुदायों के सदस्यों को अपनी पहचान से जुड़े दस्तावेज हासिल करने में करना पड़ता है। 

 हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जिनमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को पहचान संबंधी दस्तावेजों के अभाव में ही लाभों से वंचित कर दिया जाता है। अदालत ने कहा कि पहचान और जाति प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज हासिल करने में इन समुदायों के लोगों को होने वाली कठिनाइयों को वह अपने समक्ष आने वाले मामलों की संख्या के आधार पर न्यायिक संज्ञान में ले सकती है। अदालत ने कहा कि जाति दावों की जांच करते समय अधिकारियों को समग्र परिस्थितियों पर विचार करते हुए उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इसमें परिवार के अन्य सदस्यों, यहां तक कि विस्तारित परिवार के सदस्यों को सामाजिक सुरक्षा या आरक्षण संबंधी लाभ दिए जाने जैसे पहलुओं को भी देखा जाना चाहिए। डिवीजन बेंच ने कहा कि एक ओर राज्य यह स्वीकार करता है कि SC/ST समुदायों को अन्य नागरिकों के बराबर लाने के लिए सकारात्मक कार्रवाई जरूरी है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं समुदायों के सदस्यों से अपनी पहचान साबित करने के लिए सामान्य नागरिकों के समान कठोर प्रमाण की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि एससी-एसटी सदस्यों को संविधान से मिले लाभों से वंचित करना केवल असाधारण मामलों में उचित होगा, जहां स्पष्ट धोखाधड़ी स्वतंत्र रूप से उपलब्ध सरकारी सामग्री से साबित हो। जहां आवश्यक हो, इसमें उस अधिकारी द्वारा की गई कथित धोखाधड़ी का प्रमाण भी शामिल होना चाहिए, जिसने संबंधित जाति प्रमाणपत्र जारी किया था और जिसके आधार पर व्यक्ति को सेवा संबंधी लाभ मिले। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी दावेदार का अपनी सामुदायिक पहचान साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर पाना, अपने आप में संवैधानिक लाभ छीनने का आधार नहीं हो सकता, जब तक राज्य उसके दावे के विपरीत सकारात्मक और ठोस साक्ष्य पेश न करे। अदालत ने स्क्रूटिनी कमेटी की कार्यवाही और उसके आधार पर सरकार द्वारा पारित आदेश दोनों रद्द कर दिए। कमेटी को मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया गया है। उसे अपीलकर्ता की पहले दी गई आपत्ति और उसके द्वारा पेश की जाने वाली अतिरिक्त सामग्री पर विचार करना होगा तथा उसके खिलाफ इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों के मूल रिकॉर्ड का निरीक्षण करने का अवसर भी देना होगा। नई कार्यवाही हाईकोर्ट के फैसले की प्रति प्राप्त होने से छह महीने के भीतर पूरी करनी होगी। अदालत ने कमेटी को यह भी निर्देश दिया कि वह अपीलकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों पर लागू प्रमाण के बोझ को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणियों को ध्यान में रखे। नई कार्यवाही पूरी होने तक अपीलकर्ता को अस्थायी पेंशन लेते रहने की भी अनुमति दी गई है। डिवीजन बेंच ने इस निर्देश के साथ रिट अपील मंजूर की।


https://hindi.livelaw.in/kerala-high-court/kerala-high-court-dr-justice-ak-jayasankaran-nambiar-justice-preeta-ak-scst-548905

Saturday, 5 September 2026

25 साल की सर्विस के बाद फर्जी पाया गया ST सर्टिफिकेट, सुप्रीम कोर्ट ने दी रिटायरमेंट के फायदे देने को मंज़ूरी 5 Sept 2026

25 साल की सर्विस के बाद फर्जी पाया गया ST सर्टिफिकेट, सुप्रीम कोर्ट ने दी रिटायरमेंट के फायदे देने को मंज़ूरी  5 Sept 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (3 सितंबर) को संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए रिटायर्ड कर्मचारी के रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े फायदों को सुरक्षित रखा। इस कर्मचारी का कम्युनिटी सर्टिफिकेट 25 साल से ज़्यादा की सर्विस के बाद अमान्य पाया गया। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने जूनियर इंजीनियर (सिविल) की अपील पर सुनवाई की। उन्हें 1994 में 'टोकरे कोली' अनुसूचित जनजाति (ST) के कम्युनिटी सर्टिफिकेट के आधार पर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ़ ग्रेटर मुंबई में नियुक्त किया गया। बाद में 2020 में स्क्रूटनी कमेटी ने उनके जाति प्रमाण पत्र को अमान्य घोषित कर दिया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस फैसले को सही ठहराया, जिसके बाद रिटायर्ड कर्मचारी ने सुप्रीम कोर्ट में SLP (स्पेशल लीव पिटिशन) दायर की। Also Read - यूनिवर्सिटी शिक्षकों के वेतनमान से खिलवाड़ नहीं कर सकते, UGC नियमों से हटना संभव नहीं: सुप्रीम कोर्ट अपील पर सुनवाई के दौरान, अपीलकर्ता कोर्ट के अंतरिम आदेश के तहत सर्विस में बना रहा और आखिरकार 2025 में रिटायरमेंट की उम्र पूरी होने पर रिटायर हो गया। चूंकि अपीलकर्ता अब रिटायर हो चुका है, इसलिए उसने 'सुरेखा बलजोरसिंह ठाकुर बनाम जाति स्क्रूटनी कमेटी और अन्य (2024)' मामले में कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अपने रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े फायदों को सुरक्षित रखने की मांग की। हालांकि, कोर्ट ने अपीलकर्ता के जाति प्रमाण पत्र को अमान्य घोषित करने वाले स्क्रूटनी कमेटी और हाईकोर्ट के आदेश को सही माना, लेकिन साथ ही यह भी उचित समझा कि अपीलकर्ता को तीन दशकों से अधिक समय तक लगातार सर्विस देने के बदले रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े फायदे मिलने चाहिए। 

 कोर्ट ने कहा, "...मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने और यह ध्यान में रखते हुए कि अपीलकर्ता ने 1994 में रेस्पॉन्डेंट नंबर 3 के साथ सर्विस शुरू की और 30.06.2025 को अपनी रिटायरमेंट की तारीख तक सर्विस में बना रहा - जो कि तीन दशकों से अधिक का समय है - हम यह सुनिश्चित करना उचित समझते हैं कि अपीलकर्ता को उसके रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े फायदों से वंचित न किया जाए।" सुरेखा बलजोरसिंह ठाकुर मामले के अलावा, 'चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, फूड कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया और अन्य' मामले का भी हवाला दिया गया। जगदीश बलराम बहिरा और अन्य (2017) के मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने माना कि, हालांकि आम तौर पर गलत जाति या जनजाति प्रमाण पत्र के आधार पर मिली नौकरी बरकरार नहीं रहती, लेकिन कोर्ट किसी उचित मामले में पूरा न्याय करने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है। 

कोर्ट ने कहा, "इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करने का फैसला करते हैं। इसके अनुसार, अपीलकर्ता द्वारा प्रतिवादी नंबर 3 के साथ 21.10.1994 से 30.06.2025 को उनकी रिटायरमेंट की तारीख तक की गई सेवा को, लागू सेवा नियमों के अनुसार उनके रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े लाभों की गणना और भुगतान के सीमित उद्देश्य के लिए सुरक्षित माना जाएगा।" 

कोर्ट ने स्पष्ट किया, "यह साफ किया जाता है कि यहां दी गई सुरक्षा का मतलब अपीलकर्ता के 'टोकरे कोली' अनुसूचित जनजाति से संबंधित होने के दावे को सही ठहराना या मान्यता देना नहीं होगा। न तो अपीलकर्ता और न ही उनके परिवार का कोई सदस्य अमान्य किए गए जाति प्रमाण पत्र के आधार पर भविष्य में किसी लाभ का दावा करने का हकदार होगा।" नतीजतन, अपील आंशिक रूप से स्वीकार की गई।

 Cause Title: SHIRISH PANDHARINATH PATIL VERSUS THE STATE OF MAHARASHTRA & ORS.


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सुप्रीम कोर्ट में शुरू होगी कानून, न्याय और कानूनी शिक्षा पर मंथली लेक्चर सीरीज़, CJI ने टीचर्स डे पर बताई योजना 5 Sept 2026

सुप्रीम कोर्ट में शुरू होगी कानून, न्याय और कानूनी शिक्षा पर मंथली लेक्चर सीरीज़, CJI ने टीचर्स डे पर बताई योजना 5 Sept 2026 

 सुप्रीम कोर्ट कानून, न्याय और कानूनी शिक्षा पर एक मंथली लेक्चर सीरीज़ शुरू करने जा रहा है। यह कानूनी सिस्टम और समाज से जुड़े मौजूदा मुद्दों पर चर्चा के लिए एक रेगुलर मंच बनाएगा। इस पहल की घोषणा चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ने शनिवार को टीचर्स डे के मौके पर की। यह सीरीज़ "एक ज़रूरी विचार। हर महीने।" (One important idea. Every month.) थीम पर आधारित होगी। हर सेशन में किसी जाने-माने कानून विशेषज्ञ, स्कॉलर, कानूनी शिक्षाविद या अपने क्षेत्र के एक्सपर्ट का खास लेक्चर होगा। लेक्चर के बाद 'आइडियाज़ डायलॉग' होगा, जिसमें चुने हुए युवा वकील, लॉ स्टूडेंट्स और रिसर्चर चर्चा में हिस्सा ले सकेंगे और सवाल पूछ सकेंगे। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस फ़ॉर्मेट का मकसद पारंपरिक लेक्चर से आगे बढ़कर स्थापित कानूनी संस्थानों और कानूनी समुदाय की युवा पीढ़ी के बीच सार्थक बातचीत को बढ़ावा देना है। यह पहल मौजूदा कानूनी विचारों का स्थायी आर्काइव भी बनाएगी। लेक्चर को प्रोफेशनल तरीके से रिकॉर्ड करने और उनके साथ एडिट किए गए ट्रांसक्रिप्ट और संक्षिप्त 'आइडियाज़ पेपर्स' उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है। कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग भी की जाएगी और देश भर के कानूनी और एकेडमिक समुदाय तक पहुंच बढ़ाने के लिए भारतीय भाषाओं में सारांश उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है। 

लेक्चर सीरीज़ के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने सालाना "सुप्रीम कोर्ट न्याय शिक्षा सम्मान" का प्रस्ताव रखा है। यह कानूनी शिक्षा में बेहतरीन योगदान के लिए दिया जाने वाला गैर-मौद्रिक सम्मान होगा। यह अवॉर्ड हर साल टीचर्स डे के आसपास एक या दो जाने-माने कानूनी शिक्षाविदों को देने का प्रस्ताव है। पहला अवॉर्ड उद्घाटन लेक्चर के बाद दिया जाएगा। लेक्चर सीरीज़ का पहला सेशन सितंबर 2026 में होगा और उसके बाद हर महीने एक सेशन आयोजित किया जाएगा। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस पहल का मकसद कानून और न्याय पर एक स्थायी संस्थागत परंपरा और लंबे समय तक चलने वाला सार्वजनिक संसाधन बनाते हुए, गहरी कानूनी सोच, सार्थक बातचीत और व्यापक भागीदारी को बढ़ावा देना है।


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हत्या की सजा रद्द करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जज की कार्यक्षमता पर उठाए सवाल, मामला एक्टिंग चीफ जस्टिस के समक्ष भेजा

 हत्या की सजा रद्द करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जज की कार्यक्षमता पर उठाए सवाल, मामला एक्टिंग चीफ जस्टिस के समक्ष भेजा 5 Sept 2026 

 मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में दोषसिद्धि रद्द करते हुए विशेष जज के फैसले में गंभीर त्रुटियां पाईं। अदालत ने साक्ष्यों के मूल्यांकन के तरीके पर चिंता जताते हुए विशेष जज, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) दमोह की संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए उपयुक्तता पर गंभीर सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने मामले को उचित निर्णय के लिए कार्यवाहक चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया। 

 जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने FSL रिपोर्ट से जुड़े तथ्यों को गलत तरीके से दर्ज किया और दोषसिद्धि का आदेश ऐसे आधारों पर पारित किया, जो स्पष्ट और अस्तित्व में ही नहीं थे। पीठ ने कहा, “ट्रायल कोर्ट अपने दायित्वों का उचित सावधानी और तत्परता से निर्वहन करने में विफल रही है। साक्ष्य और अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री के मूल्यांकन का तरीका गंभीर चिंता पैदा करता है और विशेष जज की इस तरह के संवेदनशील मामलों से निपटने की उपयुक्तता पर प्रथम दृष्टया सवाल खड़े करता है।” 

एमपी हाईकोर्ट ने CISF कॉन्स्टेबल की सज़ा रद्द की अदालत ने निर्देश दिया कि मामले को कार्यवाहक चीफ जस्टिस के समक्ष रखा जाए ताकि इस संबंध में उचित निर्णय लिया जा सके। मामला हत्या के दोषी ठहराए गए व्यक्ति की अपील से जुड़ा था। अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था और हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। यह भी कहा गया कि विशेष जज ने जिन तीन परिस्थितियों को दोषसिद्धि का आधार बनाया वे एक-दूसरे से जुड़ी नहीं थीं और उनसे अपराध साबित नहीं होता। 

 जांच एजेंसी पहले करे वीडियो की सत्यता और संदर्भ की पड़ताल हाईकोर्ट ने अभियोजन के गवाह छोटेलाल अहिरवार जो मृतक लोटन लोधी का रिश्तेदार है, उनके बयान की जांच की। उसने बताया कि 22 मार्च 2024 को मृतक अपने घर के चबूतरे पर अपीलकर्ता के साथ बैठा था। मृतक ने उसे शराब खरीदने के लिए पैसे दिए। शराब लेकर लौटने के बाद मृतक और अपीलकर्ता हल्ले के घर की ओर चले गए। अगले दिन मृतक लाखन सिंह के दरवाजे पर मृत पाया गया। पीठ ने गवाह के बयान में कई विसंगतियां पाईं। उसका बयान मृतक के कथित मृत्यु-पूर्व कथन से मेल नहीं खाता था। इसके अलावा घटना 22-23 मार्च 2024 की होने के बावजूद गवाह का बयान 4 मई 2024 को दर्ज किया गया, यानी काफी देरी से। दोषसिद्धि के लिए दूसरी परिस्थिति के तौर पर अपीलकर्ता के घर से तीन नोट और एक मोबाइल बरामद किए जाने पर भरोसा किया गया। हाईकोर्ट ने पाया कि बरामद मोबाइल के संबंध में न तो सिम कार्ड के न होने का उल्लेख था और न ही उसका IMEI नंबर दर्ज किया गया। अदालत ने यह भी पाया कि दस्तावेज पी-24 न तो स्पष्ट था और न ही पढ़ने योग्य। कॉल विवरण में अपीलकर्ता और मृतक के बीच बातचीत का उल्लेख था लेकिन ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं था, जिससे यह साबित हो कि जिस सिम से बातचीत हुई वही बरामद मोबाइल में इस्तेमाल हो रही थी। पीठ ने कहा कि मोबाइल खरीदने का बिल भी साक्ष्य में मौजूद नहीं था। इसलिए सिम कार्ड को अपीलकर्ता या उसके परिवार के किसी सदस्य के मोबाइल से जोड़ने वाला कोई ठोस आधार नहीं था। इसके अलावा, बरामद मोबाइल मृतक का था यह साबित करने के लिए भी कोई साक्ष्य नहीं था। FSL रिपोर्ट को लेकर हाईकोर्ट ने विशेष जज के निष्कर्ष को विशेष रूप से गंभीर माना। विशेष जज ने यह दर्ज किया कि मृतक के कपड़ों पर मानव रक्त मिला, जबकि FSL रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया कि मृतक के कपड़ों पर मानव रक्त के कोई निशान नहीं थे। इसके विपरीत अभियोजन गवाह सात के कपड़ों पर रक्त पाया गया। हाईकोर्ट ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामलों में घटनाओं की पूरी कड़ी स्थापित किए जाने के सिद्धांत को दोहराया। पीठ ने शरद बिरधिचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि परिस्थितियों को ठोस रूप से साबित करना जरूरी है और सभी परिस्थितियां मिलकर ऐसी पूरी कड़ी बनानी चाहिए, जिससे अपराध के अलावा किसी अन्य निष्कर्ष की संभावना न रहे। पीठ ने गवाह सात और गवाह 13 के बयानों की जांच के बाद पाया कि घटनाओं की कड़ी अधूरी थी। बरामद मोबाइल को मृतक से जोड़ने वाला भी कोई ठोस साक्ष्य नहीं था। अदालत ने कहा, “बरामद मोबाइल और बातचीत में इस्तेमाल सिम के बीच कोई ठोस संबंध स्थापित नहीं होने के कारण यह बरामदगी परिस्थितियों की कड़ी में आवश्यक कड़ी स्थापित नहीं करती। जब परिस्थितियों की कड़ी अधूरी है, तब उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन किए बिना दर्ज की गई दोषसिद्धि कानून की नजर में कायम नहीं रह सकती।” हाईकोर्ट ने माना कि विशेष जज ने साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया। इसके चलते हत्या में दोषसिद्धि बरकरार रखना संभव नहीं है। खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि का आदेश रद्द किया और आरोपी को राहत प्रदान की। साथ ही, विशेष जज की कार्यप्रणाली और संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए उनकी उपयुक्तता से जुड़े मुद्दे पर उचित निर्णय के लिए मामला एक्टिंग चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया।


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Wednesday, 2 September 2026

स्वतंत्र प्रैक्टिस करने वाली वकील को सिर्फ पेशे के आधार पर भरणपोषण से वंचित नहीं किया जा सकता

स्वतंत्र प्रैक्टिस करने वाली वकील को सिर्फ पेशे के आधार पर भरणपोषण से वंचित नहीं किया जा सकता: तेलंगाना हाईकोर्ट  24 Aug 2026

तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा है कि सिर्फ अधिवक्ता के रूप में नामांकित होने और स्वतंत्र रूप से वकालत करने से यह साबित नहीं होता कि पत्नी की पर्याप्त स्वतंत्र आय है और उसे हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत भरणपोषण नहीं दिया जाना चाहिए। जस्टिस वाकिति रामकृष्ण रेड्डी ने पत्नी की रिव्यू याचिका मंजूर करते हुए हाईकोर्ट के अक्टूबर 2024 के उस आदेश को वापस ले लिया, जिसमें फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए ₹20,000 प्रतिमाह अंतरिम भरणपोषण को रद्द कर दिया गया था। 

 मामला हैदराबाद की I Additional Family Court में वर्ष 2010 से लंबित वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। वर्ष 2013 में फैमिली कोर्ट ने पत्नी को ₹20,000 और दोनों बेटियों को ₹15,000-₹15,000 प्रतिमाह अंतरिम भरणपोषण देने का आदेश दिया था। पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अक्टूबर 2024 में हाईकोर्ट ने पत्नी का भरणपोषण रद्द कर दिया, जबकि बेटियों के लिए भरणपोषण को उनकी बालिग होने तक बरकरार रखा। इसके बाद पत्नी ने रिव्यू याचिका दाखिल की। 

 पत्नी ने बताया कि वह किसी नौकरी में नहीं थी बल्कि स्वतंत्र रूप से वकालत करती थी, जिससे होने वाली आय नियमित या निश्चित नहीं थी। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि नौकरी से मिलने वाली निश्चित आय और स्वतंत्र प्रैक्टिस से होने वाली अनियमित आय में महत्वपूर्ण अंतर है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 24 के तहत मुख्य सवाल यह है कि वास्तव में उपलब्ध आय पत्नी के भरणपोषण और मुकदमे के खर्च के लिए पर्याप्त है या नहीं। केवल शैक्षणिक योग्यता, पेशेवर स्थिति या कमाने की क्षमता के आधार पर भरणपोषण से इनकार नहीं किया जा सकता। 

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Chaturbhuj v. Sita Bai, Shailja v. Khobbanna और Manish Jain v. Akanksha Jain के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कमाने की क्षमता या कुछ आय होना अपने आप में भरणपोषण से वंचित करने का आधार नहीं है। कोर्ट ने पाया कि उसके पिछले आदेश में पत्नी की वास्तविक आय, उसकी पर्याप्तता और पति की आय एवं आर्थिक क्षमता पर कोई ठोस निष्कर्ष नहीं था। इसके अलावा, Rajnesh v. Neha में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित भरणपोषण संबंधी दिशानिर्देशों पर भी उचित विचार नहीं किया गया था। 

 कोर्ट ने यह भी कहा कि रिवीजनल क्षेत्राधिकार में हाईकोर्ट फैमिली कोर्ट के तथ्यों का नए सिरे से मूल्यांकन नहीं कर सकता, जब तक उसके निष्कर्षों में कोई विकृति या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि न हो। हाईकोर्ट ने रिव्यू याचिका मंजूर करते हुए अक्टूबर 2024 का आदेश वापस ले लिया और पति की सिविल रिवीजन याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही 2013 के फैमिली कोर्ट के अंतरिम भरणपोषण आदेश को उसके मूल रूप में बहाल कर दिया गया। पति को बकाया भरणपोषण की गणना, पहले किए गए भुगतानों और शेष राशि का विवरण तथा Rajnesh v. Neha के अनुसार संपत्ति और देनदारियों का हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया। निर्धारित बकाया राशि का भुगतान 8 सप्ताह के भीतर करने का आदेश दिया गया।



जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्य छिपाना न्याय प्रशासन में दखल, वकील की जिम्मेदारी केवल मुवक्किल तक सीमित नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-09-01

जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्य छिपाना न्याय प्रशासन में दखल, वकील की जिम्मेदारी केवल मुवक्किल तक सीमित नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-09-01 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई वकील अपनी जानकारी में मौजूद महत्वपूर्ण तथ्यों को जानबूझकर छिपाकर अदालत के समक्ष उसके विपरीत स्थिति रखता है तो यह सक्रिय रूप से तथ्य छिपाना है और ऐसा आचरण न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करता है। हालांकि, वास्तविक स्थिति की जानकारी न होने के कारण गलत तथ्य सामने रखना या तथ्यों की गलत व्याख्या करना अलग स्थिति है।

जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने यह टिप्पणी एक कॉलेज की प्रबंध समिति के चुनाव से जुड़े मामले में दो वकीलों के आचरण की जांच करते हुए की। कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाता है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह मामले से जुड़े सभी प्रासंगिक तथ्यों और दस्तावेजों का खुलासा करे।

अदालत ने कहा,

"सक्रिय रूप से तथ्य छिपाने और केवल अनजाने में गलत तथ्य रखने के बीच अंतर है। सक्रिय रूप से तथ्य छिपाने का अर्थ है अदालत को गुमराह करने के लिए सच्चाई को जानबूझकर छिपाना, जबकि जानकारी के अभाव में गलत जानकारी देना अलग स्थिति है।"

मामला नेहरू विद्यापीठ इंटरमीडिएट कॉलेज, रेवतीपुर, गाजीपुर की प्रबंध समिति के चुनाव से जुड़ा है। 5 मई 2026 को हाईकोर्ट ने एक रिट याचिका का निपटारा करते हुए जिला विद्यालय निरीक्षक को दो महीने के भीतर चुनाव कराने का निर्देश दिया। उस समय दोनों पक्षों के वकीलों ने अदालत को बताया कि 2009 में हुए चुनाव में इस्तेमाल मतदाता सूची निर्विवाद है। इसी आधार पर कोर्ट ने उसी सूची को चुनाव के लिए इस्तेमाल करने का निर्देश दिया।

इसके बाद याचिका में प्रतिवादी नंबर छह के रूप में शामिल शिव शंकर सिंह ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की। उन्होंने खुद को निर्वाचित प्रबंधक बताते हुए कहा कि मूल याचिका गलत उद्देश्य से दाखिल की गई। उन्होंने शपथपत्र देकर यह भी कहा कि उन्होंने किसी अधिवक्ता को अपनी ओर से पेश होने के लिए वकालतनामा नहीं दिया और न ही अपनी ओर से कैविएट दाखिल करने का निर्देश दिया।

कैविएट वकील आरसी द्विवेदी ने दाखिल की थी। उनका कहना था कि वकालतनामे पर मौजूद हस्ताक्षर की पुष्टि उन्होंने स्वयं नहीं, बल्कि उनके क्लर्क ने की थी। उनके अनुसार, आवेदक और उसका भतीजा भोला यादव उनके कार्यालय आए, हस्ताक्षर किया हुआ वकालतनामा सौंपा और 2,500 रुपये फीस दी। भोला यादव ने भी शपथपत्र के जरिए इस दावे का समर्थन किया, जबकि आवेदक ने ऐसा नहीं किया।

चूंकि आवेदक वर्ष 2015 से आरसी द्विवेदी को अपना अधिवक्ता नियुक्त करता रहा था इसलिए हाईकोर्ट ने विवादित हस्ताक्षरों को विशेषज्ञ जांच के लिए भेज दिया। 27 जुलाई 2026 की फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी की रिपोर्ट में पाया गया कि कैविएट के साथ दाखिल वकालतनामे पर मौजूद हस्ताक्षर न तो नमूना हस्ताक्षरों से मेल खाते हैं और न ही दो अन्य मामलों में मौजूद वकालतनामों या आवेदक के बैंक रिकॉर्ड में मौजूद हस्ताक्षरों से। रिपोर्ट पर कोई आपत्ति दाखिल नहीं की गई और वह अंतिम हो गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि आवेदक यह साबित करने में असफल रहा कि उसके हस्ताक्षर जाली थे। कोर्ट ने माना कि पुनर्विचार याचिका ऐसे आदेश को वापस लेने के लिए दाखिल की गई, जो आवेदक के अनुकूल नहीं था। इस प्रक्रिया में एक ऐसे वकील को भी कठघरे में खड़ा कर दिया गया, जो एक दशक से अधिक समय से उसका प्रतिनिधित्व कर रहा था।

2009 के चुनाव को निर्विवाद बताने के दावे की भी अदालत ने जांच की। रिकॉर्ड से सामने आया कि संयुक्त शिक्षा निदेशक ने 16 अप्रैल 2016 के आदेश में 2009 के चुनाव को संदिग्ध माना था और नए चुनाव कराने का निर्देश दिया था। उस आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका बाद में सहमति से निष्प्रभावी मानकर खारिज कर दी गई।

इसके अलावा, तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक मालती राय, जिनके बारे में कहा गया कि उन्होंने 2009 में चुनाव कराया, ने 23 जुलाई 2016 को संयुक्त शिक्षा निदेशक को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि उन्होंने ऐसा कोई चुनाव नहीं कराया।

अदालत ने कहा कि लंबे समय से याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील एससी द्विवेदी इन दस्तावेजों और तथ्यों से अनजान होने का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने वकील और उनके मुवक्किल को 25 अक्टूबर 2009 को हुए चुनाव को अंतिम निर्विवाद चुनाव बताने के लिए समान रूप से जिम्मेदार माना।

अदालत ने कहा,

"इस अदालत को यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि मिस्टर एससी द्विवेदी, वकील और उनके मुवक्किल की ओर से तथ्य को सक्रिय रूप से छिपाया गया, जिसके कारण न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप हुआ।"

हाईकोर्ट ने कानूनी पेशे में वकील की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अधिवक्ताओं को केवल मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि मुख्य रूप से अदालत का अधिकारी माना जाता है। उन पर पेशेवर जिम्मेदारी के साथ-साथ अदालत के प्रति भी बड़ी जिम्मेदारी होती है। इस जिम्मेदारी का उल्लंघन न्याय प्रशासन की बुनियाद को प्रभावित करता है और कानूनी व्यवस्था में जनता के भरोसे को नुकसान पहुंचा सकता है।

वहीं, आरसी द्विवेदी के आचरण को अदालत ने अलग माना। कोर्ट के अनुसार, उन्होंने केवल याचिकाकर्ता की ओर से रखे गए दावे को स्वीकार किया और 2009 के चुनाव को संदिग्ध बताने वाले दस्तावेज उनके सामने रिकॉर्ड पर पेश नहीं किए गए। इसलिए अदालत ने उनके आचरण को न तो सक्रिय रूप से तथ्य छिपाना माना और न ही जानबूझकर झूठ बोलना। कार्यालय में हुई प्रक्रियात्मक कमियों के लिए उनकी बिना शर्त माफी को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

वकालतनामे के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत में किसी अधिवक्ता की पेशी की मान्यता पूरी तरह वैध और प्रभावी वकालतनामे के अस्तित्व पर आधारित होती है। जिस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करने का दावा किया जा रहा है उसकी जानकारी या सहमति के बिना वकालतनामा दाखिल करना अदालत के समक्ष गलत प्रस्तुति है।

हाईकोर्ट ने मामले को बार काउंसिल के पास भेजने या अवमानना अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से इनकार किया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता और प्रतिवादी नंबर छह पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। दोनों को यह राशि एक महीने के भीतर हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति में जमा करनी होगी। राशि जमा नहीं करने पर रजिस्ट्रार जनरल को अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया गया।

अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट नियम, 1952 के अध्याय 22 नियम 5 का भी संज्ञान लिया, जिसके तहत केवल आवेदन देकर बिना सहायक शपथपत्र के कैविएट दाखिल की जा सकती है। कोर्ट ने माना कि इस प्रक्रिया का दुरुपयोग संभव है। इसलिए आदेश की प्रति प्रशासनिक स्तर पर चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया, ताकि कैविएट आवेदन के साथ आवेदक का शपथपत्र अनिवार्य करने के लिए नियम में संशोधन पर विचार किया जा सके।

अंततः हाईकोर्ट ने माना कि 2009 का चुनाव निर्विवाद नहीं था। इस आधार पर कोर्ट ने अपने 5 मई 2026 के आदेश की समीक्षा करते हुए उसे वापस ले लिया और मामले को आगे की सुनवाई के लिए सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत के समक्ष रखने का निर्देश दिया।

Monday, 10 August 2026

20 साल तक बाकी रकम जमा न करने के बाद प्रॉपर्टी खरीदने वाला सेल डीड लागू करने की मांग नहीं कर सकता

20 साल तक बाकी रकम जमा न करने के बाद प्रॉपर्टी खरीदने वाला सेल डीड लागू करने की मांग नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-08-10

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि प्रॉपर्टी खरीदने वाला व्यक्ति 20 साल तक बिक्री की बाकी रकम जमा न करने के बाद सेल डीड को लागू करने की मांग नहीं कर सकता।

ऐसा करते हुए कोर्ट ने उस खरीदार को बाकी रकम जमा करने के लिए समय देने वाला आदेश रद्द किया, जिसके पक्ष में 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध का पालन) का मुकदमा तय हुआ था। कोर्ट ने देखा कि उसने बकाया रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने की अर्जी देने में 20 साल का इंतज़ार किया।

राम लाल बनाम जरनैल सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने कहा,

“राम लाल (ऊपर बताया गया) मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला साफ तौर पर वादी-प्रतिवादी के मामले को खारिज करता है, क्योंकि वादी ने तय समय के भीतर बिक्री की बाकी रकम जमा करने में जानबूझकर लापरवाही बरती और बाकी रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने की दूसरी अर्जी देने में लगभग 20 साल से ज़्यादा का इंतज़ार किया।

देरी की अवधि और इस बीच बने हालात 'जजमेंट डेटर' (जिसके खिलाफ फैसला आया है) के पक्ष में हैं। 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' के मुकदमे में कोर्ट को दोनों पक्षों के बीच निष्पक्षता बनाए रखनी होती है। ऊपर बताए गए फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुकदमे का फैसला एक शुरुआती डिक्री (प्रारंभिक आदेश) होती है। जिस कोर्ट ने डिक्री पास की है, उसके पास यह अधिकार है कि वह तय समय के भीतर भुगतान/जमा न करने पर कॉन्ट्रैक्ट/डिक्री को रद्द कर दे या भुगतान/जमा करने की समय-सीमा बढ़ा दे। इस मामले में वादी-प्रतिवादी की ओर से बिक्री की बाकी रकम जमा करने की अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने में बिना किसी ठोस कारण के देरी हुई है।"

प्रतिवादी दुलीराम मौर्य ने 1991 में कुल 25,000 रुपये में ज़मीन बेचने का समझौता किया था, जिसमें से 13,000 रुपये उसी दिन वादी नंदराम ने चुका दिए थे, जिसने प्रॉपर्टी खरीदी थी।

बाकी 12,000 रुपये सेल डीड (बिक्री विलेख) के निष्पादन के समय चुकाए जाने थे। इसके बाद नंदराम ने बिक्री समझौते के 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध का पालन) के लिए मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने 1998 में केस खारिज किया। कोर्ट ने माना कि सेल-डीड (बिक्री विलेख) को पूरा करने के लिए कोई लेन-देन नहीं हुआ और यह एग्रीमेंट असल में डिफेंडेंट द्वारा लिए गए लोन को छिपाने का एक तरीका था।

2003 में वादी की सिविल अपील मंजूर कर ली गई और केस में वादी के पक्ष में फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने डिफेंडेंट को दो महीने के भीतर सेल एग्रीमेंट पूरा करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने वादी-खरीदार को बाकी रकम जमा करने का भी निर्देश दिया।

डिफेंडेंट-विक्रेता ने दूसरी अपील दायर की, जो बिना किसी अंतरिम आदेश के हाईकोर्ट में लंबित रही। इसे सितंबर 2019 में खारिज कर दिया गया। इस बीच वादी-खरीदार ने 6 अगस्त 2012 को फैसले को लागू करवाने की कार्यवाही (एग्जीक्यूशन प्रोसीडिंग्स) शुरू की।

दूसरी अपील खारिज होने के बाद डिफेंडेंट ने स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 28 के तहत एक अर्जी दी ताकि वादी द्वारा शुरू की गई एग्जीक्यूशन प्रोसीडिंग्स को रोका जा सके। वादी ने इसका विरोध किया और 17.11.2025 को बाकी रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने और देरी को माफ करने की अर्जी दी।

संदर्भ के लिए, धारा 28 विक्रेता को उसी केस में, जिसमें स्पेसिफिक परफॉर्मेंस (अनुबंध का पालन) का फैसला सुनाया गया, कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने की अर्जी देने की अनुमति देती है। ऐसा तब किया जा सकता है, जब खरीदार फैसले में तय समय या कोर्ट द्वारा दी गई अतिरिक्त समय-सीमा के भीतर खरीद की रकम का भुगतान न करे।

23 दिसंबर 2025 के आदेश से एग्जीक्यूशन कोर्ट ने डिफेंडेंट की अर्जी खारिज की और 1000 रुपये के खर्च (कॉस्ट) पर बाकी रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने की वादी की अर्जी मंजूर कर ली। इसके खिलाफ डिफेंडेंट-विक्रेता ने रिवीजन याचिका दायर की जिसे खारिज कर दिया गया; इस खारिज आदेश के खिलाफ डिफेंडेंट हाईकोर्ट गया।

डिफेंडेंट-विक्रेता के वकील ने तर्क दिया कि वादी-खरीदार ने फैसले के बाद लगभग नौ साल तक न तो पैसे जमा किए और न ही एग्जीक्यूशन के लिए कोई कदम उठाया, और उसके बाद दायर समय बढ़ाने की अर्जी भी लंबित पड़ी रही। यह कहा गया कि 20 साल से भी अधिक समय बाद जमा करने की अनुमति देना न्याय का मजाक उड़ाने जैसा होगा; चूंकि स्पेसिफिक परफॉर्मेंस एक इक्विटेबल रिलीफ (न्यायसंगत राहत) है, इसलिए कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने या समय बढ़ाने का फैसला करते समय कोर्ट को इक्विटी (निष्पक्षता/न्याय) के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।

वादी के वकील ने कहा कि धारा 28 के तहत डिक्री-होल्डर समय बढ़ाने की मांग भी कर सकता है। यह बताया गया कि 2012 में जब एग्जीक्यूशन (डिक्री लागू करने की प्रक्रिया) शुरू हुई, तब दी गई अर्ज़ी पेंडिंग रही और दूसरी अपील पर फ़ैसले का इंतज़ार करते हुए एग्जीक्यूशन पर ज़ोर नहीं दिया गया। यह तर्क दिया गया कि 2003 की डिक्री 2019 के दूसरे अपीलीय फ़ैसले में मिल गई, इसलिए समय की गिनती 2003 से नहीं की जा सकती।

वादी के इस तर्क को खारिज करते हुए कि एग्जीक्यूशन लिमिटेशन एक्ट के तहत तय बारह साल की अवधि के भीतर है, कोर्ट ने कहा:

“यह तर्क पूरी तरह से गलतफहमी पर आधारित है, क्योंकि यह 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध के पालन) का मामला है, जिसमें पहली अपीलीय अदालत ने 22.11.2003 को वादी-प्रतिवादी के पक्ष में डिक्री पारित की थी और उसे बिक्री की बाकी रकम जमा करने के लिए एक महीने का समय दिया था।”

दूसरी अपील के रिकॉर्ड को देखते हुए कोर्ट ने पाया कि इसे कभी स्वीकार नहीं किया गया, कानून का कोई अहम सवाल तय नहीं किया गया और कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया गया।

“वादी-प्रतिवादी न तो दूसरी अपीलीय अदालत के सामने पेश हुआ और न ही दूसरी अपील का विरोध किया। वह बस बाहर से कार्यवाही देखता रहा।”

कोर्ट ने यह भी देखा कि 2012 की एग्जीक्यूशन कार्यवाही में समय बढ़ाने की जो अर्ज़ी दी गई, उसे न तो मंज़ूरी मिली और न ही उस पर ज़ोर दिया गया और दूसरी अर्ज़ी 2025 में आई, यानी दूसरी अपील खारिज होने के छह साल बाद। कोर्ट ने माना कि इससे पता चलता है कि वादी न तो डिक्री को लागू करवाने में दिलचस्पी रखता था और न ही सौदे के अपने हिस्से को पूरा करने के लिए तैयार था।

मर्जर (डिक्री के विलय) के मुद्दे पर हालांकि कोर्ट ने माना कि 2003 की डिक्री 23 सितंबर 2019 के दूसरे अपीलीय फ़ैसले में मिल गई, लेकिन यह भी कहा कि इससे वादी को कोई मदद नहीं मिली, क्योंकि उस तारीख से भी गिनती करने पर समय बढ़ाने की दूसरी अर्ज़ी 17 नवंबर 2025 को आई, जबकि पहली अर्ज़ी पर कभी ज़ोर नहीं दिया गया।

कोर्ट ने आगे कहा,

“निचली दोनों अदालतें इस मामले में निष्पक्षता बनाए रखने में नाकाम रहीं और उन्होंने गलत तरीके से यह दर्ज किया कि दूसरी अपील पेंडिंग होने के कारण डिक्री को लागू करवाने में वादी-प्रतिवादी की कोई गलती नहीं थी।”

कोर्ट ने विक्रेता की अर्ज़ी मंज़ूर करते हुए उसे निर्देश दिया कि वह 3.7.1991 के बिक्री समझौते के तहत खरीदार से मिली अग्रिम राशि को उसे प्राप्त होने की तारीख से 6% ब्याज के साथ एक महीने के भीतर जमा करे।

Case Title: Duliram Maurya v. Nandram

Tuesday, 21 July 2026

संयुक्त हिंदू परिवार का सदस्य अपने पैसे से अलग संपत्ति खरीद सकता है; दूसरे सह-उत्तराधिकारी उस पर अपना हक नहीं जता सकते

संयुक्त हिंदू परिवार का सदस्य अपने पैसे से अलग संपत्ति खरीद सकता है; दूसरे सह-उत्तराधिकारी उस पर अपना हक नहीं जता सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट  2026-07-20


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ संयुक्त हिंदू परिवार होने से यह नहीं माना जा सकता कि कोई खास ज़मीन संयुक्त परिवार की संपत्ति है।

कोर्ट ने कहा कि संयुक्त हिंदू परिवार का कोई सदस्य अपने नाम पर अलग से संपत्ति खरीद और रख सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे सदस्य को ज़मीन पर सह-स्वामित्व का अधिकार तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक वे यह साबित न कर दें कि वह ज़मीन संयुक्त परिवार के फंड से खरीदी गई।

यह विवाद बस्ती ज़िले के बारो गाँव में खाता नंबर 277 के तीन प्लॉट से जुड़ा था। चकबंदी प्रक्रिया के शुरुआती साल में ये प्लॉट सिर्फ़ याचिकाकर्ताओं (चेताई के बेटे) के नाम पर 'सिरदार' के तौर पर दर्ज थे।

चेताई के भाई प्रतिवादी नंबर 2 और 3 (जगलल और फौजदार) ने यू.पी. चकबंदी अधिनियम, 1953 की धारा 9-A(2) के तहत आपत्ति दर्ज कराई और खुद को सह-काश्तकार के तौर पर दर्ज करने की मांग की। उनका दावा था कि यह ज़मीन मूल रूप से घिरऊ ने खरीदी थी। उनकी मौत के बाद यह उनकी विधवा श्रीमती झिनका उर्फ़ छोटका के नाम पर दर्ज हुई और उनकी मौत के बाद चेताई, जगलल और फौजदार को संयुक्त रूप से मिली, लेकिन इसे गलत तरीके से सिर्फ़ चेताई के नाम पर दर्ज कर दिया गया।

याचिकाकर्ताओं (जो चेताई के वारिस हैं) ने कहा कि यह ज़मीन नई थी और चेताई ने इसे अपने भाइयों से अलग होने के बाद अकेले खरीदा था। उन्होंने कहा कि श्रीमती झिनका की किसी ज़मीन से इसका कोई संबंध या निरंतरता नहीं थी और संयुक्त परिवार के फंड से इसे खरीदने का कोई दावा भी नहीं किया गया।

चकबंदी अधिकारी ने 30.5.1978 को आपत्ति स्वीकार की और प्रतिवादी नंबर 2 और 3 को एक-तिहाई हिस्से के साथ सह-काश्तकार के तौर पर दर्ज किया। अधिकारी का मानना था कि चेताई का नाम 'कर्ता खानदान' (परिवार के मुखिया) के तौर पर दर्ज किया गया। एक्ट की धारा 11(1) के तहत अपील पर कंसोलिडेशन के असिस्टेंट सेटलमेंट ऑफिसर ने उस आदेश रद्द किया और निर्देश दिया कि खाता केवल याचिकाकर्ताओं के नाम पर दर्ज किया जाए। उन्होंने पाया कि रेवेन्यू एंट्री में कोई निरंतरता या एकरूपता नहीं थी और परिवार के अलग होने के बाद सेटलमेंट चेताई के पक्ष में किया गया।

कंसोलिडेशन के डिप्टी डायरेक्टर ने एक्ट की धारा 48 के तहत प्रतिवादी नंबर 2 और 3 द्वारा दायर रिवीजन याचिका स्वीकार की, अपीलीय आदेश रद्द किया और कंसोलिडेशन ऑफिसर के आदेश को बहाल किया। याचिकाकर्ताओं ने रिवीजन आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

जस्टिस चंद्र कुमार राय ने कहा,

“अपीलीय अदालत ने भी यह तथ्य दर्ज किया कि परिवार के अलग होने के बाद, सेटलमेंट याचिकाकर्ताओं के पिता चेताई के पक्ष में किया गया था, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि चेताई का नाम 'कर्ता खानदान' (परिवार के मुखिया) के रूप में दर्ज किया गया था।”

अदालत ने माना कि रेवेन्यू एंट्री, खतौनी में दर्ज अवधि और एंट्री में निरंतरता व एकरूपता के अभाव के आधार पर अपीलीय अथॉरिटी द्वारा दर्ज तथ्यों को कंसोलिडेशन के डिप्टी डायरेक्टर ने सही तरीके से नहीं पलटा था। अदालत ने गौर किया कि रिवीजन आदेश में 1348 फसली की एंट्री की अवधि एक साल बताई गई थी, जबकि रिट याचिका के साथ संलग्न 1348 फसली की खतौनी में अवधि नौ साल दिखाई गई थी। अदालत ने माना कि इस आधार पर रिवीजन आदेश को बरकरार नहीं रखा जा सकता है।

अदालत ने आगे कहा कि 1979 में कंसोलिडेशन के डिप्टी डायरेक्टर के पास मौजूद रिवीजन की शक्ति सीमित थी। “साल 1979 में, U.P.C.H. एक्ट की धारा 48 के तहत कंसोलिडेशन के डिप्टी डायरेक्टर का अधिकार क्षेत्र सीमित था, क्योंकि U.P.C.H. एक्ट की धारा 48 में संशोधन करके 10.11.1980 से उन्हें ज़्यादा अधिकार दिए गए थे।”

कोर्ट ने 'राम चंद्र दुबे और अन्य बनाम डिप्टी डायरेक्टर ऑफ़ कंसोलिडेशन, देवरिया और अन्य' के मामले का हवाला दिया, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि संयुक्त हिंदू परिवार का कोई सदस्य, भले ही वह संयुक्त परिवार का हिस्सा हो, अलग संपत्ति रख सकता है जो पूरी तरह से उसकी अपनी हो और जिसमें कोपार्सनरी (संयुक्त उत्तराधिकार वाले परिवार) का कोई अन्य सदस्य कोई अधिकार हासिल न कर सके।

कोर्ट ने 'बाला चरण और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य' मामले का भी हवाला दिया, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि भले ही संयुक्त परिवार होने का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन संयुक्त परिवार की संपत्ति होने का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

इन फैसलों को लागू करते हुए, कोर्ट ने कहा कि यह साबित करने की ज़िम्मेदारी प्रतिवादी नंबर 2 और 3 की थी कि विवादित ज़मीन संयुक्त परिवार की संपत्ति से हासिल की गई थी, जिसे वे साबित नहीं कर पाए; इसलिए उन्हें सह-काश्तकारी (co-tenancy) का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

रिट याचिका को मंज़ूरी देते हुए, कोर्ट ने 17.8.1979 के रिविज़नल आदेश को रद्द कर दिया और 29.12.1978 के अपीलीय आदेश को बरकरार रखा। खर्च के बारे में कोई आदेश नहीं दिया गया।

Case Title: Pardeshi v. D.D.C and others

Saturday, 18 July 2026

वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन... क्या वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के 3 साल के अंदर न करने पर समय-सीमा खत्म हो जाती है? सुप्रीम कोर्ट

वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन... क्या वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के 3 साल के अंदर न करने पर समय-सीमा खत्म हो जाती है? सुप्रीम कोर्ट ने दिया जवाब 17 July 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल के अंदर ही करना ज़रूरी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि प्रोबेट के लिए आवेदन करने का अधिकार तब मिलता है जब ऐसा करना ज़रूरी हो जाता है, यानी जब वसीयत से बनी स्थिति के खिलाफ कोई कदम उठाया जाता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा, "इसलिए आवेदन करने का अधिकार उस तारीख से मिलता है, जब आवेदन करना ज़रूरी हो जाता है। ज़ाहिर है, यह वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल के अंदर होना ज़रूरी नहीं है।" 

 बेंच ने ट्रायल कोर्ट और झारखंड हाईकोर्ट के उन फैसलों को रद्द किया, जिन्होंने प्रोबेट आवेदन को सिर्फ़ इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि इसे वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल बाद दायर किया गया। यह मामला 15 अप्रैल 1995 की वसीयत के प्रोबेट के आवेदन से जुड़ा है, जिसे श्रीलाल सिंघानिया ने बनाया और जिनका 7 जून 1995 को निधन हो गया। यह आवेदन वसीयत में बताए गए एग्जीक्यूटर भूदेव प्रसाद सिंह ने 31 अगस्त 2005 को दायर किया था, जो वसीयतकर्ता की मौत के एक दशक से भी ज़्यादा समय बाद था। 

 आपत्ति करने वाले प्रतिवादियों ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत आवेदन दायर किया और तर्क दिया कि प्रोबेट आवेदन समय-सीमा (लिमिटेशन) के कारण खारिज होने योग्य है। ट्रायल कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया और इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 की धारा 222 और 276 के तहत प्रोबेट आवेदन खारिज किया। झारखंड हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट का फैसला सही ठहराते हुए अपील खारिज की, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में यह अपील दायर की गई। Also Read - जब आरोपी जेल में हो तो कोर्ट और प्रॉसिक्यूशन की ज़िम्मेदारी है कि वे ट्रायल में तेज़ी लाएं: सुप्रीम कोर्ट अपील मंज़ूरी करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में उस तर्क को खारिज कर दिया गया कि वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल के अंदर ही दायर किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि चूंकि इंडियन सक्सेशन एक्ट में वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन दायर करने की कोई समय-सीमा तय नहीं है, इसलिए लिमिटेशन एक्ट, 1963 के आर्टिकल 163 के तहत तय तीन साल की समय-सीमा लागू होगी। हालांकि, इसकी गिनती उस तारीख से की जाएगी जब दूसरी पार्टी ने वसीयत (Will) से तय स्थिति के खिलाफ कोई कदम उठाया हो। Also Read - सिर्फ़ गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल अश्लीलता नहीं है: सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 294(b) का दायरा समझाया कानून को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा: “आवेदन करने की ज़रूरत उस तारीख से शुरू होगी, जब प्रतिवादियों ने वसीयत से तय स्थिति के खिलाफ कदम उठाए, यानी 8 अगस्त 2005 को वसीयत करने वाले की पत्नी लक्ष्मी देवी द्वारा 'जनरल पावर ऑफ़ अटॉर्नी' (General Power of Attorney) निष्पादित करना। इस नज़रिए से, अपीलकर्ता संजय शर्मा उर्फ संजय भारद्वाज के पक्ष में एग्जीक्यूटर मिस्टर भूदेव प्रसाद सिंह द्वारा वसीयत के प्रोबेट (probate) के लिए दिया गया आवेदन समय-सीमा के भीतर माना जाता है क्योंकि इसे 31 अगस्त 2005 को दायर किया गया।” इसमें P. Kumarakurubaran v. P. Narayanan, 2025 LiveLaw (SC) 509 मामले का हवाला दिया गया, जिसमें यह तय किया गया कि जब समय-सीमा (limitation) का सवाल विवादित तथ्यों से जुड़ा हो तो ऐसे मुद्दों का फैसला Order VII Rule 11 CPC के चरण में नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने समय-सीमा की अवधि को लेकर विवाद होने के बावजूद मुकदमे को सरसरी तौर पर खारिज करके गलती की, क्योंकि यह तथ्य और कानून का मिला-जुला सवाल है। कोर्ट ने यह फैसला सुनाया, “Order VII Rule 11 और समय-सीमा के सवाल, दोनों ही मामलों में निचली अदालतों के फैसलों और आदेशों को रद्द करना होगा। देवघर जिला अदालत द्वारा 31 जुलाई 2012 को पारित आदेश और झारखंड हाईकोर्ट द्वारा 28 अप्रैल 2022 को पारित फैसले को रद्द किया जाता है। कानून के मामले में स्पष्ट गलती होने के कारण अपील स्वीकार की जाती है। मामले को संबंधित सिविल कोर्ट में कानून के अनुसार आगे बढ़ने के लिए बहाल किया जाता है।” 

Cause title: SANJAY SHARMA @ SANJAY BHARDWAJ VERSUS KRISHNADHAN KHAWARE AND ORS.



भूमि अधिग्रहण कानून के निरस्त होने के बाद जारी हुई अधिसूचना पर कार्रवाई अवैध

भूमि अधिग्रहण कानून के निरस्त होने के बाद जारी हुई अधिसूचना पर कार्रवाई अवैध 2026-07-17 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत जारी अधिसूचना पर भले ही 1 जनवरी 2014 से पहले की तारीख अंकित हो, लेकिन उसका प्रकाशन 1 जनवरी 2014 के बाद हुआ है, तो ऐसी पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू से ही अवैध मानी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुराने कानून के निरस्त होने के बाद उसके तहत नई अधिग्रहण कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।

जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि अधिसूचना पर लिखी तारीख का कोई कानूनी महत्व नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि उसका राजपत्र, समाचार पत्रों और स्थानीय स्तर पर कब प्रकाशन हुआ। इन सभी में सबसे अंतिम प्रकाशन की तारीख ही अधिसूचना के प्रकाशन की प्रभावी तारीख मानी जाएगी।

अदालत ने कहा, "अधिसूचना पर अंकित तारीख अप्रासंगिक है। महत्वपूर्ण उसकी वास्तविक प्रकाशन तिथि है और वही यह तय करेगी कि अधिग्रहण की कार्यवाही कब शुरू हुई।"

मामला लखनऊ के सरोजिनी नगर क्षेत्र स्थित गांव अहमामऊ की भूमि से जुड़ा है। याचिकाकर्ता कंपनी ने वर्ष 2007 में इस भूमि का एक हिस्सा पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से खरीदा था।

भूमि अधिग्रहण के लिए अधिसूचना पर 27 दिसंबर 2013 की तारीख दर्ज थी लेकिन उसका प्रकाशन 2 और 3 जनवरी 2014 को समाचार पत्रों में 4 जनवरी 2014 को राजपत्र में तथा 6 फरवरी 2014 को स्थानीय स्तर पर सार्वजनिक सूचना के रूप में किया गया। इसके बाद जनवरी 2015 में अधिग्रहण की घोषणा जारी की गई और जुलाई 2016 में अवार्ड पारित हुआ जिसे बाद में वर्ष 2022 में संशोधित किया गया।

याचिकाकर्ता का कहना था कि न तो उसकी भूमि का कब्जा लिया गया और न ही उसे मुआवजा दिया गया। साथ ही पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया ऐसे कानून के तहत चलाई गई, जो 1 जनवरी 2014 से निरस्त हो चुका था इसलिए पूरी कार्रवाई शुरू से ही शून्य है।

वहीं विकास प्राधिकरण ने दलील दी कि अधिसूचना पर 27 दिसंबर 2013 की तारीख होने के कारण अधिग्रहण की प्रक्रिया 1 जनवरी 2014 से पहले ही शुरू हो गई। हालांकि वह यह स्वीकार करने से इनकार नहीं कर सका कि अधिसूचना का वास्तविक प्रकाशन नए कानून के लागू होने के बाद हुआ।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया तभी शुरू मानी जाती है, जब अधिसूचना का विधि के अनुसार प्रकाशन किया जाए। केवल सरकारी स्तर पर लिया गया निर्णय या अधिसूचना पर अंकित तारीख पर्याप्त नहीं होती। जब तक उसका निर्धारित तरीके से प्रकाशन नहीं होता तब तक वह केवल कागजों पर लिया गया निर्णय भर है।

पीठ ने कहा कि 1 जनवरी 2014 से उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 लागू हो गया था, जिसके साथ ही वर्ष 1894 का भूमि अधिग्रहण कानून निरस्त हो गया। चूंकि इस मामले में अधिसूचना का पूरा प्रकाशन 1 जनवरी 2014 के बाद हुआ इसलिए पुराने कानून के तहत अधिग्रहण की कार्रवाई वैध रूप से शुरू ही नहीं हुई।

अदालत ने कहा, "यह वस्तुतः 1 जनवरी 2014 के बाद निरस्त हो चुके अधिनियम 1894 के तहत अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने का मामला है। इसलिए संबंधित अधिसूचनाएं और पूरी प्रक्रिया कानून की नजर में शुरू से ही शून्य और अवैध हैं।"

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वर्ष 2013 का कानून भूमि मालिकों को अधिक न्यायसंगत और उचित मुआवजा देने के उद्देश्य से बनाया गया। इसके बावजूद पुराने कानून के तहत कार्रवाई जारी रखकर अधिकारियों ने याचिकाकर्ता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया।

हालांकि अदालत ने सार्वजनिक हित को देखते हुए पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया रद्द नहीं की। अदालत ने कहा कि भूमि का अधिग्रहण सार्वजनिक सड़क निर्माण के लिए प्रस्तावित है और भूमि का हिस्सा भी छोटा है। इसलिए अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वर्ष 2013 के कानून के अनुसार, फैसले की तारीख पर प्रचलित बाजार दर के आधार पर नया मुआवजा निर्धारित किया जाए- हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक संशोधित मुआवजे का निर्धारण कर उसका भुगतान नहीं किया जाता तब तक संबंधित भूमि का कब्जा नहीं लिया जाएगा। साथ ही पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया।

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प्रकरण का विवरण

प्रकरण: Lohia Developers (India) Pvt. Ltd. v. State of Uttar Pradesh & Others

न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ

रिट याचिका क्रमांक: Writ–C No. 2466 of 2023

निर्णय सुरक्षित: 27.05.2026

निर्णय दिनांक: 03.07.2026 (इस निर्णय की प्रमुख कानूनी रिपोर्ट 17 जुलाई 2026 को प्रकाशित हुई)। 

पीठ: न्यायमूर्ति राजन राय एवं न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला। 

वाद के तथ्य

भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 4 की अधिसूचना पर दिनांक 27.12.2013 अंकित थी।

किन्तु उसका राजपत्र (Official Gazette) में प्रकाशन 04.01.2014 को हुआ।

इस बीच 01.01.2014 से Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013 लागू हो चुका था तथा 1894 का अधिनियम निरस्त हो चुका था।

इसके बाद धारा 6 की घोषणा 23.01.2015 तथा पुरस्कार (Award) 13.07.2016 को पारित किया गया। 

विचारणीय प्रश्न

क्या 1894 के निरस्त अधिनियम के अंतर्गत ऐसी अधिसूचना, जिसका प्रकाशन 01.01.2014 के बाद हुआ, वैध मानी जा सकती है?

न्यायालय का निर्णय

उच्च न्यायालय ने कहा कि—

1. भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही धारा 4 की विधिवत प्रकाशित अधिसूचना से प्रारम्भ होती है।

2. केवल अधिसूचना पर पुरानी तिथि अंकित होने से कार्यवाही वैध नहीं हो जाती।

3. प्रकाशन (Publication) की तिथि ही निर्णायक है।

4. यदि अधिसूचना का प्रकाशन 01.01.2014 के बाद हुआ है, तो वह निरस्त अधिनियम के अंतर्गत जारी मानी जाएगी।

5. ऐसी सम्पूर्ण अधिग्रहण कार्यवाही Void ab initio (प्रारम्भ से ही शून्य) होगी। 

न्यायालय द्वारा अपनाए गए प्रमुख सिद्धांत

भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही धारा 4 की अधिसूचना से प्रारम्भ होती है।

प्रकाशन के बिना अधिसूचना प्रभावी नहीं होती।

निरस्त कानून के अंतर्गत बाद में प्रकाशित अधिसूचना कोई वैधानिक अधिकार उत्पन्न नहीं कर सकती।

सामान्य धाराएँ अधिनियम, 1897 की धारा 6 केवल उन्हीं कार्यवाहियों को बचाती है जो निरसन से पहले विधिसम्मत रूप से प्रारम्भ हो चुकी हों। 

सर्वोच्च न्यायालय के जिन निर्णयों पर भरोसा किया गया

Indrapuri Griha Nirman Sahkari Samiti Ltd. v. State of Rajasthan, (1975) 4 SCC 296

Laxman Lal v. State of Rajasthan, (2013) 3 SCC 764

V.K.M. Kattha Industries (P) Ltd. v. State of Haryana, (2013) 9 SCC 338

Khub Chand v. State of Rajasthan, AIR 1967 SC 1704 

वाद में उद्धृत करने योग्य निष्कर्ष

> "भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के निरस्त हो जाने के पश्चात यदि धारा 4 की अधिसूचना का प्रकाशन किया जाता है, तो केवल उस पर पूर्व की तिथि अंकित होने से अधिग्रहण कार्यवाही वैध नहीं हो जाती। ऐसी कार्यवाही प्रारम्भ से ही शून्य (Void ab initio) है।" 



Thursday, 9 July 2026

पुराने मालिक के नाम बिजली बिल और हाउस टैक्स जमा करने वाला प्रतिकूल कब्जे से मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता

पुराने मालिक के नाम बिजली बिल और हाउस टैक्स जमा करने वाला प्रतिकूल कब्जे से मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-07-09 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति पर प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) के आधार पर मालिकाना हक का दावा करता है, लेकिन उसी संपत्ति के बिजली बिल और हाउस टैक्स पुराने मालिक के नाम से जमा करता रहता है, तो यह उसके द्वारा पुराने मालिक के स्वामित्व को स्वीकार करना माना जाएगा। ऐसे में प्रतिकूल कब्जे के आधार पर स्वामित्व का दावा टिक नहीं सकता।

जस्टिस संदीप जैन ने यह टिप्पणी गाजियाबाद स्थित एक मकान पर प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) मांगने वाली अपील खारिज करते हुए की।

याचिकाकर्ता का दावा था कि वह वर्ष 1996 से मकान पर खुले, निरंतर और विरोधात्मक (Hostile) कब्जे में है। अपने दावे के समर्थन में उसने शस्त्र लाइसेंस, वाहन पंजीकरण, गैस कनेक्शन, टेलीफोन, बीमा पॉलिसी, मतदाता पहचान पत्र, आयकर रिकॉर्ड और कंपनी रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज प्रस्तुत किए, जिनमें विवादित मकान का पता दर्ज था।

हालांकि, अदालत ने पाया कि बिजली बिल और संपत्ति कर लगातार पूर्व मालिक कैप्टन विनोद कुमार के नाम पर ही जमा किए जा रहे थे। कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार भुगतान करना स्वयं पूर्व मालिक के स्वामित्व को स्वीकार करने के बराबर है, जिससे प्रतिकूल कब्जे का दावा स्वतः कमजोर हो जाता है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी सरकारी दस्तावेज में किसी संपत्ति का पता दर्ज होना उस व्यक्ति के स्वामित्व का प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि किरायेदार, लाइसेंसी या किसी रिश्तेदार के साथ रहने वाला व्यक्ति भी उसी पते का उपयोग कर ऐसे दस्तावेज प्राप्त कर सकता है।

अदालत ने आगे कहा कि प्रतिकूल कब्जे का दावा करने वाले व्यक्ति को यह साबित करना होता है कि वह संपत्ति पर कब, कैसे, किस आधार पर, खुले, निरंतर और वास्तविक मालिक के विरोध में 12 वर्ष से अधिक समय तक कब्जे में रहा, तथा इसकी जानकारी वास्तविक मालिक को भी थी। वर्तमान मामले में वादी इन आवश्यक तत्वों को साबित करने में असफल रहा।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी और कहा कि वादी का प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक का दावा कानूनन स्वीकार नहीं किया जा सकता।

Sunday, 5 July 2026

'बिना एविडेंस एक्ट की धारा 65B के सर्टिफिकेट और वॉइस सैंपल ऑथेंटिकेशन के रिश्वत मांगने की वॉइस रिकॉर्डिंग मान्य नहीं': छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट 2026-06-29 14

'बिना एविडेंस एक्ट की धारा 65B के सर्टिफिकेट और वॉइस सैंपल ऑथेंटिकेशन के रिश्वत मांगने की वॉइस रिकॉर्डिंग मान्य नहीं': छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट 2026-06-29 14

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत दोषी ठहराए गए दो सरकारी कर्मचारियों को बरी किया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष गैर-कानूनी तरीके से रिश्वत मांगने की बात को बिना किसी शक के साबित करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने पाया कि इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 65-B के तहत सर्टिफिकेट न होने और वॉइस सैंपल या FSL रिपोर्ट न होने की वजह से अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई रिकॉर्ड की गई बातचीत पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

जस्टिस रजनी दुबे स्पेशल जज (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) के फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई कर रही थीं। इस फैसले में अपीलकर्ताओं को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 13(1)(d) के साथ धारा 13(2) के तहत दोषी ठहराया गया। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि शिकायतकर्ता, जिसकी पत्नी की सैलरी छह महीने से रुकी हुई, उससे अपीलकर्ता नंबर 2 ने अपीलकर्ता नंबर 1 की ओर से सैलरी जारी करने के लिए 5,000 रुपये रिश्वत के तौर पर देने को कहा था। एंटी-करप्शन ब्यूरो के कहने पर शिकायतकर्ता ने आरोपियों के साथ बातचीत रिकॉर्ड की और 12.10.2010 को किए गए ट्रैप के दौरान, अपीलकर्ता नंबर 1 की जेब से रिश्वत के नोट बरामद किए गए।

जांच अधिकारी ने माना कि न तो आरोपियों और न ही शिकायतकर्ता के वॉइस सैंपल लिए गए, जबकि अभियोजन पक्ष के गवाहों ने भी माना कि रिकॉर्ड की गई बातचीत साफ नहीं है, क्योंकि उसमें कई लोगों की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। कोर्ट ने यह भी पाया कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के संबंध में इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 65-B के तहत कोई सर्टिफिकेट पेश नहीं किया गया।

कोर्ट ने कहा,

"इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 65-B के तहत सर्टिफिकेट न होने और किसी भी वॉइस सैंपल या FSL रिपोर्ट के न होने की स्थिति में, वॉइस रिकॉर्डिंग पर भरोसा नहीं किया जा सकता।"

कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराने के लिए रिश्वत मांगने का सबूत होना सबसे ज़रूरी है और सिर्फ रिश्वत के पैसे की बरामदगी काफी नहीं है।

कोर्ट ने 'रमेश शर्मा बनाम स्टेट' [CrL. Rev.P. 646/2004] मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें टेप-रिकॉर्ड की गई बातचीत को सबूत के तौर पर स्वीकार करने की शर्तों पर चर्चा की गई। इन शर्तों में बोलने वाले की आवाज़ की सही पहचान, रिकॉर्डिंग के सही होने का सबूत, उसमें कोई छेड़छाड़ न होने की पुष्टि और सबूत से जुड़ी ज़रूरतों का पालन शामिल था।

कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग को साबित करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने पाया कि आवाज़ की रिकॉर्डिंग की पहचान सिर्फ़ शिकायत करने वाले के बयान के आधार पर की गई, आवाज़ के कोई सैंपल नहीं लिए गए, बातचीत में शामिल बताए जा रहे किसी दूसरे व्यक्ति को न तो गवाह के तौर पर बुलाया गया और न ही उससे पूछताछ की गई, और वॉयस रिकॉर्डर के साथ छेड़छाड़ की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ज़ब्त किए जाने से पहले वह कई दिनों तक शिकायत करने वाले के पास ही रहा था।

इसके बाद कोर्ट ने अपील मंज़ूर की, 08.09.2017 के दोषी ठहराने और सज़ा सुनाने वाला फ़ैसला रद्द कर दिया। साथ ही दोनों अपीलकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

Case Title: Anil Markende & Anr. v. State of Chhattisgarh [CRA No. 1423 of 2017].

व्यक्तिगत आयकर से अचल संपत्ति के हस्तांतरण को कब छूट मिलती है

व्यक्तिगत आयकर से अचल संपत्ति के हस्तांतरण को कब छूट मिलती है?

व्यक्तिगत आयकर कानून के कार्यान्वयन संबंधी दिशानिर्देश जारी करते हुए, सरकार ने अध्यादेश 253 जारी किया है, जिसमें अचल संपत्ति के हस्तांतरण, विरासत और उपहार से प्राप्त आय पर कर छूट का प्रावधान है। यह अध्यादेश 1 जुलाई, 2026 से प्रभावी होगा। 03/07/2026


अध्यादेश 253 में यह प्रावधान है कि परिवार के सदस्यों के बीच अचल संपत्ति (जिसमें अचल संपत्ति व्यवसाय संबंधी कानून द्वारा विनियमित मकान और निर्माणाधीन निर्माण परियोजनाएं शामिल हैं) के हस्तांतरण, विरासत या उपहार से होने वाली आय पर व्यक्तिगत आयकर से छूट दी गई है।


अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर व्यक्तिगत आयकर से छूट कब मिलती है? - चित्र 1.

एक सरकारी अध्यादेश में कई ऐसे मामलों का उल्लेख किया गया है जिनमें अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर व्यक्तिगत आयकर से छूट दी जाएगी, जो 1 जुलाई, 2026 से प्रभावी होगा।


विशेष रूप से, इसमें पति-पत्नी के बीच संबंध; जैविक माता-पिता और उनके बच्चे; दत्तक माता-पिता और उनके दत्तक बच्चे; ससुर और सास और बहू (पति की मृत्यु के बाद भी); ससुर और सास और दामाद (पत्नी की मृत्यु के बाद भी); दादा-दादी और नाना-नानी और नाती-पोते; नाना-नानी और नाती-पोते; और भाई-बहन शामिल हैं।


यदि तलाक के बाद आपसी सहमति या अदालत के फैसले से अचल संपत्ति (जिसमें अचल संपत्ति व्यापार कानूनों द्वारा परिभाषित मकान और भावी निर्माण परियोजनाएं शामिल हैं) का बंटवारा होता है, तो इस बंटवारे से होने वाली आय कर मुक्त होती है। कर छूट की प्रक्रिया और दस्तावेजीकरण कर प्रशासन कानूनों के अनुसार किए जाएंगे।


स्वामित्व हस्तांतरित करने वाले व्यक्ति के पास केवल एक घर और एक भूमि उपयोग का अधिकार होता है।

इस अध्यादेश में यह भी प्रावधान है कि व्यक्तियों द्वारा घरों, भूमि उपयोग अधिकारों और भूमि से जुड़ी संपत्तियों के हस्तांतरण से होने वाली आय पर व्यक्तिगत आयकर से छूट दी गई है, बशर्ते हस्तांतरणकर्ता के पास वियतनाम में केवल एक घर या भूमि उपयोग अधिकार हो।


यह कर छूट उन मकानों या निर्माण परियोजनाओं के हस्तांतरण पर लागू नहीं होती जो अभी भी निर्माणाधीन हैं।


कर छूट के पात्र व्यक्तियों को निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना होगा:


हस्तांतरण के समय व्यक्ति के पास केवल एक ही मकान होना चाहिए या एक ही भूखंड पर उपयोग का अधिकार होना चाहिए (जिसमें मकान या निर्माण शामिल हैं)। यदि हस्तांतरण के समय व्यक्ति भविष्य में अतिरिक्त मकान या निर्माण प्राप्त कर लेता है, तो यह हस्तांतरण व्यक्ति के एकमात्र मकान या भूमि उपयोग अधिकार के रूप में नहीं माना जाएगा।


संयुक्त स्वामित्व वाले आवास या संयुक्त रूप से उपयोग की जाने वाली भूमि (जिसमें पति-पत्नी का संयुक्त स्वामित्व वाला आवास या भूमि शामिल है) के हस्तांतरण के मामलों में, केवल वे व्यक्ति कर से मुक्त होते हैं जिनके पास कहीं और आवास या भूमि का स्वामित्व नहीं होता है; वे व्यक्ति जो संयुक्त रूप से आवास या भूमि के मालिक हैं और अन्य आवास या भूमि के भी मालिक हैं, कर से मुक्त नहीं होते हैं।


संपत्ति के हस्तांतरण के समय मकान का स्वामित्व और भूमि के उपयोग का अधिकार कम से कम 183 दिनों से धारित होना चाहिए।


आवास और भूमि उपयोग अधिकारों के स्वामित्व का निर्धारण करने की तिथि, भूमि उपयोग अधिकार, आवास और भूमि से जुड़ी अन्य संपत्तियों के स्वामित्व का प्रमाण पत्र जारी होने की तिथि होती है। हालांकि, भूमि कानून विनियमों के अनुसार पुनः जारी करने या प्रतिस्थापन के मामलों में, आवास और भूमि उपयोग अधिकारों के स्वामित्व का निर्धारण करने की तिथि, पुनः जारी करने या प्रतिस्थापन से पहले जारी किए गए भूमि उपयोग अधिकार, आवास और भूमि से जुड़ी अन्य संपत्तियों के स्वामित्व का प्रमाण पत्र की तिथि से गिनी जाती है।

संपूर्ण मकान और भूमि उपयोग अधिकारों का हस्तांतरण। यदि किसी व्यक्ति के पास मकान और भूमि उपयोग अधिकारों का एकमात्र या संयुक्त स्वामित्व है, लेकिन वह केवल एक हिस्सा हस्तांतरित करता है, तो हस्तांतरित हिस्से पर कर छूट लागू नहीं होती है।


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जुलाई 2026 से विरासत और उपहारों पर व्यक्तिगत आयकर लगेगा।

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व्यक्तिगत आयकर की गणना करते समय चिकित्सा और शैक्षिक खर्चों के लिए आधिकारिक तौर पर कटौतियों को शामिल करना।

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ऐसे आठ मामले जिनमें व्यक्तिगत खाते में धन प्राप्त करना कर के दायरे में आता है।

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व्यक्ति द्वारा स्वयं घोषित जानकारी और अचल संपत्ति के हस्तांतरण की जिम्मेदारी के आधार पर आवास और एकमात्र भूमि उपयोग अधिकार कर से मुक्त हैं। यदि गलत घोषणाएँ पाई जाती हैं, तो कर प्रबंधन कानूनों और अन्य संबंधित कानूनों के अनुसार व्यक्ति से कर वसूली और जुर्माना वसूला जाएगा।

Friday, 3 July 2026

Motor Accident Claims | सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित की आय का आकलन करने के लिए ITR के इस्तेमाल पर नियम तय किए : 2026-07-02

Motor Accident Claims | सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित की आय का आकलन करने के लिए ITR के इस्तेमाल पर नियम तय किए : 2026-07-02 

मोटर दुर्घटना मुआवज़े के दावों के लिए मृतक की सालाना आय की गणना के तरीके में एकरूपता लाने के मकसद से सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवज़े के मामलों में पीड़ितों की सालाना आय का आकलन करने के लिए विस्तृत गाइडलाइंस तय कीं। इसमें सैलरी पाने वाले कर्मचारियों और खुद का काम करने वाले (सेल्फ-एम्प्लॉयड) लोगों के बीच स्पष्ट अंतर किया गया।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि सैलरी पाने वाले व्यक्तियों के मामले में आम तौर पर ठीक पिछले असेसमेंट ईयर के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) पर विचार किया जाना चाहिए। वहीं, खुद का काम करने वाले लोगों या कारोबारियों के मामले में, ट्रिब्यूनल को आम तौर पर पिछले तीन सालों के ITR में दिखाई गई औसत आय को आधार बनाना चाहिए, हालांकि हर मामले की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाएगा।

कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि जिन मामलों में इनकम टैक्स रिटर्न उपलब्ध हैं, उनमें मृतक व्यक्ति की सालाना आय तय करने का तरीका क्या हो।

चूंकि सैलरी पाने वाले और खुद का काम करने वाले व्यक्तियों के लिए एक ही तरीका नहीं अपनाया जा सकता, इसलिए कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट जे.आर. मिधा और एडवोकेट सलिल पॉल के सुझाव को माना। इन दोनों को इस मामले में 'एमिकस क्यूरी' (न्यायालय मित्र) नियुक्त किया गया था और उन्होंने सैलरी पाने वाले कर्मचारियों और खुद का काम करने वाले लोगों के लिए अलग-अलग तरीके अपनाने का सुझाव दिया।

सैलरी पाने वाले कर्मचारियों के बारे में कोर्ट ने कहा कि लेटेस्ट ITR में आम तौर पर प्रमोशन, इंक्रीमेंट और दुर्घटना से ठीक पहले मिल रही सैलरी की जानकारी होती है। इसलिए ठीक पिछले असेसमेंट ईयर का ITR आम तौर पर कमाई की क्षमता की सबसे सही तस्वीर पेश करेगा।

कोर्ट ने कहा,

"सालाना आय का आकलन करते समय सैलरी पाने वाले व्यक्तियों और खुद का काम करने वाले व्यक्तियों के बीच अंतर किया जाना चाहिए। हमारी राय में सैलरी पाने वाले व्यक्तियों के लिए, सैलरी से होने वाली सालाना आय को दिखाने के लिए केवल पिछले साल का ITR ही काफी होगा। केवल पिछले साल पर विचार करने का कारण यह है कि प्रमोशन का आर्थिक असर काफी होता है और यह केवल उसी साल के ITR में दिख सकता है। ऐसी स्थिति भी हो सकती है कि मृतक/दावेदार ने दुर्घटना से पहले प्रमोशन वाली पोस्ट पर एक साल पूरा न किया हो या उस अवधि के लिए ITR फाइल न किया हो। ऐसे मामलों में संबंधित कोर्ट प्रमोशन लेटर और दूसरे सहायक फाइनेंशियल स्टेटमेंट का सहारा ले सकता है।" हालांकि, कोर्ट ने कहा कि ऐसा तरीका उन लोगों के लिए सही नहीं हो सकता जो अपना काम (सेल्फ-एम्प्लॉयड) करते हैं, क्योंकि उनकी आय अक्सर मार्केट की स्थितियों, बिज़नेस साइकल और इन्वेस्टमेंट के तरीकों की वजह से घटती-बढ़ती रहती है।

कोर्ट ने कहा,

"जब बात सेल्फ-एम्प्लॉयड लोगों या अपना बिज़नेस करने वाले व्यक्तियों की आती है तो हमारी राय में उनके बिज़नेस से होने वाली सालाना आय का आकलन करने के लिए पिछले तीन सालों तक के ITR में बताई गई आय का औसत आधार (रेफरेंस पॉइंट) माना जाना चाहिए।"

इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी बताया कि आय की गणना करते समय आस-पास की अन्य परिस्थितियों पर भी विचार किया जा सकता है।

"ऐसी स्थिति भी हो सकती है जब केवल एक या दो ITR ही फाइल किए गए हों। ऐसी स्थितियों और इन पेशों में आय में उतार-चढ़ाव को देखते हुए, आस-पास की परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

इनमें ये शामिल होंगे:

a) बिज़नेस का स्वरूप (भौगोलिक स्थिति, श्रेणी आदि सहित)।

b) बिज़नेस के बढ़ने का तरीका और बिज़नेस पर मौत का असर।

c) बिज़नेस के बढ़ने की संभावना (उदाहरण के लिए, कुछ बिज़नेस शुरुआत में ज़्यादा पूंजी वाले होते हैं और बड़े पैमाने पर/भविष्य में फायदेमंद होते हैं)।

d) नेगेटिव आय (कुछ बिज़नेस में शुरुआती सालों में नुकसान हो सकता है, जो सही आर्थिक स्थिति को नहीं दिखाता है)।

e) बिज़नेस से जुड़ा कोई अन्य संबंधित कारक।"

Cause Title: RASHMIREKHA TRIPATHY AND ANR. VERSUS THE BRANCH MANAGER (LEGAL CLAIMS), SRIRAM GENERAL INSURANCE COMPANY LIMITED AND ORS.

Sunday, 28 June 2026

मामूली गवाही विरोधाभास से पंजीकृत बिक्री विलेख की वैधता पर संदेह नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

मामूली गवाही विरोधाभास से पंजीकृत बिक्री विलेख की वैधता पर संदेह नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट 25 June 2026 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पंजीकृत बिक्री विलेख (Sale Deed) को कानूनन वैधता और प्रामाणिकता का मजबूत अनुमान प्राप्त होता है। ऐसे में सत्यापनकर्ता (Attesting Witness) के बयान में मामूली विरोधाभास मात्र से विलेख के निष्पादन पर संदेह नहीं किया जा सकता। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने हरिद्वार की कृषि भूमि से जुड़े एक विवाद में यह टिप्पणी की। समेकन अधिकारियों और हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं के स्वामित्व दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि बिक्री विलेख के एक गवाह के विवरण में विसंगति है। 

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिक्री विलेख की वैधता सत्यापन पर निर्भर नहीं करती। वसीयत या उपहार विलेख के विपरीत, बिक्री विलेख के लिए सत्यापन वैधानिक आवश्यकता नहीं है। इसलिए गवाह के विवरण में मामूली अंतर के आधार पर पंजीकृत दस्तावेज को संदिग्ध नहीं माना जा सकता। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि 1957 में निष्पादित बिक्री विलेख पर बाद के संशोधनों को लागू नहीं किया जा सकता। साथ ही, जब तक किसी सक्षम सिविल अदालत द्वारा दस्तावेज निरस्त न किया जाए, समेकन अधिकारी केवल इस आधार पर उसे नजरअंदाज नहीं कर सकते कि वह कथित रूप से अवैध है। मामले में जालसाजी, धोखाधड़ी या दबाव का कोई आरोप नहीं था। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के आदेश रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली और अपीलकर्ताओं के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने का निर्देश दिया।



Saturday, 27 June 2026

सरकार नागरिकों की जमीन पर अवैध कब्जा कर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकती

सरकार नागरिकों की जमीन पर अवैध कब्जा कर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकती: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट, मुआवजा देने का आदेश 26 June 2026 

 पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि कल्याणकारी राज्य होने के नाते सरकार नागरिकों की निजी जमीन पर प्रतिकूल कब्जे का सिद्धांत लागू कर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकती। अदालत ने हरियाणा सरकार को बिना भूमि अधिग्रहण के सिंचाई नहर के लिए इस्तेमाल की गई निजी जमीन का उचित मुआवजा तीन महीने के भीतर देने का निर्देश दिया। जस्टिस रमेश कुमारी ने कहा कि राज्य का दायित्व अपने नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की रक्षा करना है। सरकार को नागरिकों की जमीन पर अवैध कब्जा कर उसे अपनी संपत्ति में बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती। 

 अदालत ने कहा, “राज्य एक कल्याणकारी राज्य है। वह अपने ही नागरिकों की संपत्ति पर कब्जा करने वाला अतिक्रमणकारी नहीं बन सकता। प्रतिकूल कब्जे के आधार पर राज्य नागरिकों की भूमि पर मालिकाना हक हासिल नहीं कर सकता।” मामला फतेहाबाद जिले के बनमंदोरी गांव की 119 कनाल भूमि से जुड़ा था। भूमि मालिकों का कहना था कि उनकी सात कनाल जमीन पर सरकार ने सिंचाई के लिए बनाई गई नहर को पक्का किया, जबकि न तो जमीन का विधिवत अधिग्रहण किया गया और न ही कोई मुआवजा दिया गया। 

 वहीं, राज्य सरकार ने दलील दी कि यह नहर वर्ष 1960 से मौजूद है और भूमि मालिकों ने कभी इसका विरोध नहीं किया। सरकार ने यह भी दावा किया कि लंबे समय से खुले और निरंतर कब्जे के कारण उसे प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक प्राप्त हो गया। ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत ने सरकार की इस दलील को स्वीकार करते हुए भूमि मालिकों का दावा खारिज किया था। दोनों अदालतों ने माना कि सरकार प्रतिकूल कब्जे के आधार पर जमीन की मालिक बन चुकी है और 12 वर्ष की समयसीमा बीत जाने के कारण मुकदमा भी सुनवाई योग्य नहीं है। 

फाइनल आंसर की को सही ठहराया हालांकि, हाईकोर्ट ने इन निष्कर्षों को गलत ठहराया। अदालत ने कहा कि संपत्ति का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 300-ए के तहत संरक्षित संवैधानिक और मानव अधिकार है। किसी व्यक्ति की भूमि कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया अपनाए बिना नहीं ली जा सकती। हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही नहर सार्वजनिक उद्देश्य के लिए दशकों से उपयोग में हो, लेकिन सरकार भूमि का अधिग्रहण किए बिना और मुआवजा दिए बिना उस पर कब्जा नहीं कर सकती। अदालत ने कहा, 

“राज्य भूमि अधिग्रहण की वैधानिक प्रक्रिया अपनाए बिना और मुआवजा दिए बिना नहर बनाने या उसे ईंट और सीमेंट से पक्का करने के लिए निजी जमीन का उपयोग नहीं कर सकता। सरकार का दायित्व है कि वह भूमि के वैध मालिकों को उचित मुआवजा दे।” हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य बिना किसी नोटिस और मुआवजा दिए नागरिकों की जमीन पर कब्जा नहीं कर सकता, भले ही उसका उपयोग सिंचाई जैसी सार्वजनिक परियोजना के लिए किया जा रहा हो। अदालत ने माना कि सरकार ने सात कनाल भूमि का उपयोग तो किया, लेकिन उसका अधिग्रहण नहीं किया और न ही भूमि मालिकों को कोई भुगतान किया। इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने निचली अदालतों का फैसला रद्द करते हुए हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि वह संबंधित सात कनाल भूमि को “माना हुआ अधिग्रहण” मानते हुए वर्तमान बाजार मूल्य के आधार पर मुआवजा दे। साथ ही कानून के अनुसार मिलने वाले सभी वैधानिक लाभ, जैसे सांत्वना राशि, ब्याज और अन्य देय लाभ भी तीन महीने के भीतर भूमि मालिकों को अदा किए जाएं।


Wednesday, 24 June 2026

138 NI Act | चेक बाउंस मामले में मिली सज़ा पक्षकारों के बीच समझौते के आधार पर रद्द की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट 2 June 2026

 138 NI Act | चेक बाउंस मामले में मिली सज़ा पक्षकारों के बीच समझौते के आधार पर रद्द की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट  2 June 2026

 सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 147 (अपराधों का समझौता योग्य होना) के तहत अपराधों के कंपाउंडिंग (समझौते) की अनुमति दी, जब पार्टियों के बीच एक समझौता हो गया। इसके परिणामस्वरूप, कोर्ट ने NI Act की धारा 138 के तहत चेक बाउंस होने (खाते में पर्याप्त पैसे न होने के कारण) के अपराध के लिए दी गई सज़ा और दोषसिद्धि रद्द की। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच ने यह आदेश दिया। उन्होंने अपने पहले के फैसले 'ज्ञान चंद गर्ग बनाम हरपाल सिंह (2025)' पर भरोसा किया, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि एक बार शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच समझौता हो जाने के बाद NI Act की धारा 138 के तहत दी गई सज़ा बरकरार नहीं रखी जा सकती। 

 इस मामले में अपीलकर्ता (एक कंपनी का डायरेक्टर) को 2014 के एक फैसले में दोषी ठहराया गया। उसे एक साल की साधारण कैद की सज़ा सुनाई गई और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 357(3) के तहत मुआवजे के तौर पर 28,00,000 रुपये (चेक की राशि) का भुगतान करने का निर्देश दिया गया। इस फैसले को सेशंस कोर्ट ने और उसके बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया था। इसके बाद डायरेक्टर को सज़ा काटने के लिए हिरासत में ले लिया गया। लेकिन दो दिन के भीतर ही अपीलकर्ता द्वारा 30,00,000 रुपये का भुगतान करने पर दोनों पार्टियों के बीच समझौता हो गया। हालांकि, जब अपराध के कंपाउंडिंग (समझौते) के लिए एक अर्जी दायर की गई तो प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उसे खारिज कर दिया। बाद में हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि पहले दिए गए फैसले की समीक्षा नहीं की जा सकती। 

इस फैसले को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा: "पार्टियों की ओर से पेश हुए वकीलों की दलीलें सुनने के बाद, और इस कोर्ट द्वारा 'ज्ञान चंद गर्ग बनाम हरपाल सिंह और अन्य' (2025 SCC OnLine SC 2317) मामले में तय किए गए कानून को ध्यान में रखते हुए हमें पार्टियों के बीच हुए समझौते को स्वीकार करने और अपराध का कंपाउंडिंग (समझौता) करने में कोई हिचकिचाहट नहीं है।" कोर्ट ने सेंट्रल जेल, रायपुर के जेल अधीक्षक को निर्देश दिया कि वे अपीलकर्ता को तुरंत रिहा करें और इस आदेश के पालन की सूचना सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को ईमेल के माध्यम से भेजें। 

Case : PARSHARVANATH WELD WIRES PVT LTD & ANR v. STATE OF CHHATTISGARH & ANR.



Tuesday, 23 June 2026

पार्टनरशिप एक्ट के तहत वकीलों की पार्टनरशिप फर्म रजिस्टर करने के लिए ट्रेड लाइसेंस की ज़रूरत नहीं: कलकत्ता हाईकोर्ट 23 June 2026

पार्टनरशिप एक्ट के तहत वकीलों की पार्टनरशिप फर्म रजिस्टर करने के लिए ट्रेड लाइसेंस की ज़रूरत नहीं: कलकत्ता हाईकोर्ट  23 June 2026

कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ वकालत का काम करने के लिए बनी पार्टनरशिप फर्म को इंडियन पार्टनरशिप एक्ट, 1932 के तहत रजिस्ट्रेशन के लिए ट्रेड लाइसेंस दिखाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने माना कि पार्टनरशिप फर्मों के रजिस्ट्रेशन से जुड़े कानूनी नियमों में ऐसी कोई शर्त नहीं है। जलपाईगुड़ी में सर्किट बेंच में बैठे जस्टिस बिवास पट्टनायक ने वकील डॉ. अर्जुन चौधरी की रिट याचिका मंज़ूरी की। उन्होंने वेस्ट बंगाल के रजिस्ट्रार ऑफ़ फर्म्स, सोसाइटीज़ एंड नॉन-ट्रेडिंग कॉरपोरेशन्स के उस फ़ैसले को चुनौती दी थी, जिसमें ट्रेड लाइसेंस न होने की वजह से पार्टनरशिप फर्म M/s पिनावा लीगल को रजिस्टर करने से मना कर दिया गया। 

EVM-VVPAT और CCTV फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश कोर्ट ने कहा कि इंडियन पार्टनरशिप एक्ट, 1932 की धारा 58 और 59 पार्टनरशिप फर्म के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को पूरी तरह से तय करती हैं और रजिस्ट्रेशन से पहले ट्रेड लाइसेंस दिखाने की शर्त नहीं रखतीं। याचिकाकर्ता का तर्क था कि एक्ट की धारा 58 के तहत ज़रूरी सभी जानकारी देने के बावजूद, रजिस्ट्रार ने बार-बार एप्लीकेशन पर कार्रवाई करने से मना कर दिया, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि ट्रेड लाइसेंस जमा नहीं किया गया। यह तर्क दिया गया कि एक बार कानूनी ज़रूरतें पूरी हो जाने के बाद धारा 59 रजिस्ट्रार पर यह ज़रूरी ज़िम्मेदारी डालती है कि वह फर्मों के रजिस्टर में बयान की एंट्री करे और रजिस्ट्रेशन का सर्टिफ़िकेट जारी करे। 

 CPIM(L) ने हाईकोर्ट में दी चुनौती याचिका का विरोध करते हुए राज्य ने ट्रेड लाइसेंस की मांग को सही ठहराने के लिए विभागीय गाइडलाइंस और बंगाल पार्टनरशिप रूल्स, 1933 का हवाला दिया। इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने पाया कि न तो पार्टनरशिप एक्ट और न ही बंगाल पार्टनरशिप रूल्स वकालत करने वाली पार्टनरशिप फर्म के रजिस्ट्रेशन के लिए ट्रेड लाइसेंस दिखाने को ज़रूरी बनाते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि एग्जीक्यूटिव निर्देश या विभागीय गाइडलाइंस मुख्य कानून में बताई गई शर्तों के अलावा कोई और शर्त नहीं लगा सकतीं। रजिस्ट्रार की ट्रेड लाइसेंस की मांग को कानूनी रूप से गलत मानते हुए कोर्ट ने अथॉरिटी को निर्देश दिया कि वह ट्रेड लाइसेंस दिखाने की ज़िद किए बिना दो हफ़्ते के अंदर याचिकाकर्ता की एप्लीकेशन (नंबर APP-022334) पर कार्रवाई करे और उसे रजिस्टर करे। 

Case Title: Dr. Arjun Chowdhury v. State of West Bengal & Ors.



Thursday, 11 June 2026

मोटर दुर्घटना प्रकरण| 'होममेकर देश निर्माता हैं': सुप्रीम कोर्ट ने होममेकर के योगदान को ₹30,000 प्रति माह आंका* 11 June 2026

*मोटर दुर्घटना प्रकरण| 'होममेकर देश निर्माता हैं': सुप्रीम कोर्ट ने होममेकर के योगदान को ₹30,000 प्रति माह आंका* 11 June 2026 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना के दावों में होममेकर (घर संभालने वाली महिला) द्वारा दी जाने वाली घरेलू देखभाल का नुकसान हर्जाने का एक अलग और मुआवजा-योग्य आधार है। कोर्ट ने ऐसी घरेलू सेवाओं का मूल्य कम-से-कम ₹30,000 प्रति माह तय किया। मोटर दुर्घटना के दावों से जुड़ी अपील पर फैसला सुनाते हुए *जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह* की बेंच ने कहा कि होममेकर का योगदान घर से कहीं आगे तक जाता है और देश-निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवज़ा तय करते समय होममेकर की मौत या अक्षमता के कारण परिवार को होने वाले घरेलू देखभाल के नुकसान को अलग से मान्यता दी जानी चाहिए। 

 फैसला सुनाते समय जस्टिस करोल ने कहा, *"हमारा यह भी मानना है कि गृहिणी इंसान और देश के विकास में योगदान देती है। होममेकर देश बनाती है। इसलिए हमने सिद्धांत तय किए हैं और देश निर्माता के तौर पर गृहिणी को देखते हुए हमने घरेलू देखभाल के नुकसान की मासिक आय कम से कम ₹30,000 प्रति माह तय की।"* जस्टिस करोल ने कहा कि मोटर दुर्घटना के दावों में मुआवज़ा देने के लिए *'प्रणय सेठी'* फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्यता प्राप्त हर्जाने के आधारों के अलावा *'घरेलू देखभाल का नुकसान'* भी एक आधार होगा। 

 सुप्रीम कोर्ट ने मामला बड़ी बेंच को... जस्टिस करोल ने कहा, "हमें उम्मीद और भरोसा है कि 'होममेकर' शब्द अब 'देश निर्माता' की पहचान भी हासिल कर लेगा।" 2024 में दिए गए एक पिछले अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सोच गलत है कि होममेकर काम नहीं करतीं, और माना कि उनकी मानी गई आय (deemed income) दिहाड़ी मज़दूर के लिए तय न्यूनतम मज़दूरी से कम नहीं होनी चाहिए। मोटर दुर्घटना के दावों में तेज़ी लाने के निर्देश कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवज़ा दावों का तेज़ी से निपटारा सुनिश्चित करने के लिए भी निर्देश जारी किए। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 169 का ज़िक्र करते हुए, जिसमें मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरणों (Tribunals) के समक्ष एक संक्षिप्त प्रक्रिया की परिकल्पना की गई, बेंच ने उम्मीद जताई कि इस प्रावधान को "अक्षरशः और भावना के अनुरूप" लागू किया जाएगा। इसके अलावा, कोर्ट ने उम्मीद जताई कि सभी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मोटर दुर्घटना दावा कार्यवाही की निगरानी करेंगे ताकि समय पर फैसला हो सके और फैसले में तय सिद्धांतों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। 


Case : SHISHUPAL @ SHISH RAM AND ORS. SURJEET AND ORS. v. SURJEET AND ORS | SLP(C) No. 33915/2025

Tuesday, 9 June 2026

सिर्फ़ इसलिए जालसाज़ी नहीं मानी जाएगी कि किसी व्यक्ति ने प्रॉपर्टी पर अपना मालिकाना हक़ बताते हुए कोई डॉक्यूमेंट बनाया हो: सुप्रीम कोर्ट 9 June 2026

सिर्फ़ इसलिए जालसाज़ी नहीं मानी जाएगी कि किसी व्यक्ति ने प्रॉपर्टी पर अपना मालिकाना हक़ बताते हुए कोई डॉक्यूमेंट बनाया हो: सुप्रीम कोर्ट 9 June 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति सिर्फ़ इसलिए जालसाज़ी (Forgery) का दोषी नहीं माना जाएगा कि उसने किसी प्रॉपर्टी पर अपना मालिकाना हक़ बताते हुए कोई डॉक्यूमेंट बनाया है, भले ही बाद में वह दावा कानूनी रूप से गलत साबित हो जाए। कोर्ट ने मोहम्मद इब्राहिम बनाम बिहार राज्य (2009) 8 SCC 751 मामले का हवाला देते हुए कहा, "...जब कोई व्यक्ति किसी प्रॉपर्टी को अपनी बताते हुए कोई डॉक्यूमेंट बनाता है तो सिर्फ़ इसलिए वह 'गलत डॉक्यूमेंट' (False Document) नहीं बन जाता कि उसका दावा बाद में गलत साबित हो जाता है।" मोहम्मद इब्राहिम मामले में यह कहा गया: "जब कोई व्यक्ति ऐसी प्रॉपर्टी के लिए डॉक्यूमेंट बनाता है, जो उसकी नहीं है तो वह यह दावा नहीं कर रहा होता कि वह कोई और है, और न ही वह यह दावा कर रहा होता है कि उसे किसी और ने अधिकृत किया। इसलिए ऐसे डॉक्यूमेंट को बनाना (जिसमें वह ऐसी प्रॉपर्टी का अधिकार देने की बात करता है, जिसका वह मालिक नहीं है) कोड की धारा 464 के तहत 'गलत डॉक्यूमेंट' बनाना नहीं माना जाएगा। अगर बनाया गया डॉक्यूमेंट 'गलत डॉक्यूमेंट' नहीं है तो जालसाज़ी भी नहीं है। अगर जालसाज़ी नहीं है तो कोड की धारा 467 या धारा 471 लागू नहीं होतीं।" जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने एक मामले की सुनवाई की, जिसमें अपीलकर्ताओं ने विवादित प्रॉपर्टी पर अपने मालिकाना हक़ का दावा करते हुए 'पावर ऑफ़ अटॉर्नी' बनाई। जब उनका मालिकाना हक़ का दावा कानूनी रूप से गलत साबित हो गया तो उनके खिलाफ़ जालसाज़ी की आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई। यह कार्यवाही इस आधार पर शुरू की गई कि चूंकि प्रॉपर्टी में उनका कोई वैध मालिकाना हक़ नहीं था, इसलिए जिस डॉक्यूमेंट के ज़रिए उन्होंने ऐसे अधिकारों का दावा किया, वह खुद ही जाली है। अपीलकर्ताओं के खिलाफ़ FIR रद्द करने से इनकार करने वाले गुजरात हाईकोर्ट का फ़ैसला पलटते हुए जस्टिस पंचोली ने अपने फ़ैसले में कहा कि हाईकोर्ट ने गलत आधार पर कार्यवाही की। हाईकोर्ट ने माना था कि अपीलकर्ताओं का दावा गलत साबित होने पर मालिकाना हक़ जताने के लिए उनके द्वारा बनाए गए डॉक्यूमेंट धोखाधड़ी का काम थे। कोर्ट ने कहा कि मालिकाना हक़ का दावा करने के लिए इस्तेमाल किए गए डॉक्यूमेंट को सिर्फ़ इसलिए 'गलत डॉक्यूमेंट' नहीं माना जाएगा कि दावा सफल नहीं हो सका। कोर्ट ने कहा, “हाईकोर्ट ने इस आधार पर कार्रवाई की कि चूंकि आरोपी नंबर 1 से 5 के पास प्रॉपर्टी का मालिकाना हक नहीं था, इसलिए पावर ऑफ अटॉर्नी बनाना और सिविल कार्यवाही शुरू करना जालसाजी (Forgery) माना जाएगा। हमारी राय में, हाईकोर्ट का यह नज़रिया कानूनी रूप से सही नहीं है। IPC की धारा 463 के तहत जालसाजी का मुख्य तत्व IPC की धारा 464 के अर्थ में 'झूठा दस्तावेज़' बनाना है। प्रतिवादी नंबर 2 का यह कहना नहीं है कि पावर ऑफ अटॉर्नी पर मौजूद हस्ताक्षर नकली या बनावटी थे, और न ही यह आरोप लगाया गया कि दस्तावेज़ बनाने वालों की जगह किसी और ने हस्ताक्षर किए या किसी और व्यक्ति का रूप धरकर दस्तावेज़ बनाया गया।” इसके आधार पर अपील मंज़ूर कर ली गई और जालसाजी का मामला रद्द किया गया।

 Cause Title: BHIKHUBHAI GOVINDBHAI PATEL & ANR. VERSUS THE STATE OF GUJARAT & ANR.



Friday, 5 June 2026

पति की दूसरी शादी की केवल जानकारी होना ही अपराध नहीं है। सास, ससुर या अन्य रिश्तेदारों को केवल इस आधार पर आरोपी नहीं बनाया जा सकता कि उन्हें दूसरी शादी की जानकारी थी।

 Sivaraman Nair & Others v. State of Kerala & Another (निर्णय दिनांक 24.04.2026) में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निम्न महत्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए: 

निर्णय का सार (10 बिंदुओं में)

1. पति की दूसरी शादी की केवल जानकारी होना ही अपराध नहीं है। सास, ससुर या अन्य रिश्तेदारों को केवल इस आधार पर आरोपी नहीं बनाया जा सकता कि उन्हें दूसरी शादी की जानकारी थी। 

2. धारा 494 IPC (अब BNS में समकक्ष प्रावधान) के तहत रिश्तेदारों की जिम्मेदारी तभी बनेगी, जब उनके द्वारा दूसरी शादी कराने, उसमें भाग लेने या उसे प्रोत्साहित करने का ठोस साक्ष्य हो। 

3. Mere Knowledge is not Common Intention — केवल जानकारी होना "सामान्य आशय" (Common Intention) सिद्ध नहीं करता। 

4. पति के माता-पिता और बहन के विरुद्ध विशिष्ट (specific) आरोप नहीं थे, केवल सामान्य और व्यापक आरोप लगाए गए थे। 

5. वैवाहिक विवादों में पूरे परिवार को आरोपी बनाने की प्रवृत्ति पर न्यायालय ने चिंता व्यक्त की। 

6. धारा 498A IPC के मामलों में भी केवल "उत्साहवर्धन किया" या "साथ दिया" जैसे सामान्य आरोप पर्याप्त नहीं हैं; प्रत्येक आरोपी की स्पष्ट भूमिका बताना आवश्यक है। 

7. यदि आरोपों से किसी रिश्तेदार की सक्रिय भागीदारी (active involvement) नहीं दिखती, तो उसके विरुद्ध आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है। 

8. न्यायालय ने कहा कि दूसरी शादी के अपराध में मुख्य उत्तरदायित्व उस पति/पत्नी का है जिसने दूसरी शादी की है। 

9. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सास, ससुर और ननद के विरुद्ध कार्यवाही रद्द (quash) कर दी। 

10. किंतु पति के विरुद्ध मामला जारी रहेगा, क्योंकि उसके विरुद्ध विशिष्ट आरोप थे। 

न्यायालय की सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति

> "केवल यह जानकारी होना कि दूसरी शादी हुई है, अपने आप में धारा 494 IPC के तहत दायित्व स्थापित नहीं करता; सक्रिय सहभागिता, सुविधा प्रदान करना या प्रोत्साहन साबित होना चाहिए।" 

यह निर्णय विशेष रूप से उन मामलों में उपयोगी है जहाँ **पति के साथ-साथ सास, ससुर, देवर, ननद आदि को बिना किसी विशिष्ट भूमिका के धारा 494/498A में आरोपी बना दिया जाता है।**

समय पर मुआवज़ा दिए बिना संपत्ति से वंचित करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: एनएच प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट 2026-06-03

 समय पर मुआवज़ा दिए बिना संपत्ति से वंचित करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: एनएच प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट 2026-06-03 

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उस याचिका को मंज़ूरी दी, जिसमें नेशनल हाईवे के निर्माण के लिए ज़मीन अधिग्रहित की गई, लेकिन मुआवज़े की रकम जारी नहीं की गई। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि ज़मीन मालिकों को समय पर मुआवज़ा दिए बिना उनकी संपत्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीज़न बेंच ने यह टिप्पणी की:

"अधिग्रहित ज़मीन के लिए मुआवज़ा पाने का अधिकार सिर्फ़ एक कानूनी हक नहीं है, बल्कि अनुच्छेद 300-A से मिलने वाली एक संवैधानिक गारंटी है। समय पर मुआवज़ा दिए बिना संपत्ति से वंचित करना सत्ता का मनमाना इस्तेमाल माना जाएगा और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। आपसी सहमति से छूटी हुई ज़मीनों के अधिग्रहण से जुड़ी नीति में ही यह प्रावधान है कि देरी और विवादों से बचने के लिए अधिग्रहण तेज़ी से किया जाए और तुरंत भुगतान किया जाए। अगर ज़मीन मालिक, अधिग्रहण के लिए सहमति देने के बाद मुआवज़े के लिए अनिश्चित काल तक इंतज़ार करने पर मजबूर होते हैं तो ऐसी नीति का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।"

एक रिट याचिका दायर की गई, जिसमें 'रिट ऑफ़ मैंडमस' जारी करने की मांग की गई। इस रिट के ज़रिए राज्य सरकार को यह निर्देश देने की मांग की गई कि वह नेशनल हाईवे के निर्माण के लिए ज़मीन अधिग्रहण के बदले याचिकाकर्ताओं के पक्ष में तय की गई मुआवज़े की रकम को जारी करे और वितरित करे।

याचिकाकर्ताओं की ज़मीनें शहडोल ज़िले में हैं। शुरुआत में, उमरिया को शहडोल से जोड़ने वाले हाईवे के निर्माण के लिए किए गए बड़े पैमाने पर ज़मीन अधिग्रहण में इन ज़मीनों को शामिल नहीं किया गया था। बाद में अधिकारियों को पता चला कि प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए याचिकाकर्ताओं की ज़मीनों की ज़रूरत है। इसलिए सड़क परिवहन मंत्रालय ने 15 मार्च, 2016 को एक सर्कुलर जारी किया। इस सर्कुलर में विशेष रूप से यह प्रावधान किया गया कि देरी से बचने के लिए छूटी हुई ज़मीनों का अधिग्रहण आपसी सहमति से किया जाए।

तदनुसार, ज़मीन अधिग्रहण के लिए याचिकाकर्ताओं को ₹3.35 करोड़ की राशि मंज़ूर की गई। रिकॉर्ड से यह भी पता चला कि प्रस्ताव और उसके साथ मंज़ूर की गई राशि, 2 जनवरी, 2026 को भुगतान जारी करने के लिए सक्षम प्राधिकारी को भेज दी गई।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने संबंधित प्राधिकारी को बार-बार अभ्यावेदन (Representations) दिए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। याचिकाकर्ताओं के वकील ने यह तर्क दिया कि मुआवज़े की रकम को रोककर रखने का प्रतिवादियों का पूरा कृत्य संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन था। यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ताओं को अधिग्रहित ज़मीनों के लिए मुआवज़ा पाने का अधिकार है, क्योंकि यह संपत्ति के अधिकार का एक अहम पहलू है, जो संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत आता है।

प्रतिवादियों की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि मुआवज़े की राशि जारी करने में देरी, भुगतान प्रक्रिया से जुड़ी प्रक्रियात्मक और प्रशासनिक ज़रूरतों के कारण हुई।

दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं की ज़मीन एक सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहित की गई और यह अधिग्रहण 15 मार्च, 2016 के सर्कुलर के अनुसार, आपसी सहमति की नीति के तहत किया गया था। खंडपीठ ने आगे कहा कि प्राधिकरण ने मुआवज़े की राशि ₹3.35 करोड़ तय की थी। इसलिए विचार के लिए केवल एक ही मुद्दा बचा था: प्रतिवादियों द्वारा उक्त राशि का भुगतान न करना।

अदालत ने प्रशासनिक देरी के संबंध में प्रतिवादी की दलील खारिज की।

खंडपीठ ने ज़ोर देकर कहा,

"एक बार अधिग्रहण पूरा हो जाने और मुआवज़ा तय हो जाने के बाद प्रतिवादियों का यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वे तत्काल भुगतान सुनिश्चित करें। भुगतान में किसी भी तरह की देरी, वैधानिक योजना के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देती है और ज़मीन मालिकों को गंभीर नुकसान पहुंचाती है।"

खंडपीठ ने इस बात पर प्रकाश डाला कि मुआवज़ा पाने का अधिकार एक संवैधानिक गारंटी है, जो संविधान के अनुच्छेद 300A से प्राप्त होती है। खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि समय पर मुआवज़ा दिए बिना याचिकाकर्ता को उसकी संपत्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है; क्योंकि यह नीति स्वयं ही देरी और विवादों से बचने के लिए त्वरित अधिग्रहण और तत्काल भुगतान की परिकल्पना करती है।

इस प्रकार, अदालत ने कहा,

"एक बार जब प्रतिवादियों ने स्वयं ही मुआवज़े की राशि तय कर ली है और भुगतान का प्रस्ताव आगे बढ़ा दिया है तो उस राशि को रोकने का कोई भी औचित्य नहीं बचता। प्रशासनिक अक्षमताओं या प्रक्रियात्मक देरी को याचिकाकर्ताओं के कानूनी और संवैधानिक अधिकारों पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"

इसलिए खंडपीठ ने याचिका स्वीकार की और प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे 8 सप्ताह की अवधि के भीतर मुआवज़े की राशि जारी करने और वितरित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएं।

Case Title: Shanti Singh v State of Madhya Pradesh, WP-15538-2026

Wednesday, 3 June 2026

Hindu Succession Act | बिना वसीयत उत्तराधिकार के बाद कोई भी सह-उत्तराधिकारी 'कर्ता' के तौर पर काम करते हुए दूसरों के हिस्से नहीं बेच सकता: सुप्रीम कोर्ट

Hindu Succession Act | बिना वसीयत उत्तराधिकार के बाद कोई भी सह-उत्तराधिकारी 'कर्ता' के तौर पर काम करते हुए दूसरों के हिस्से नहीं बेच सकता: सुप्रीम कोर्ट 2026-06-02 

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (1 जून) को यह फैसला सुनाया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act) के तहत बिना वसीयत वाली संपत्ति का उत्तराधिकार पाने वाले लोग उस संपत्ति को 'टेनेंट्स-इन-कॉमन' (साझा हिस्सेदार) के तौर पर रखते हैं, जिसमें उनके हिस्से तय होते हैं, न कि 'संयुक्त पारिवारिक संपत्ति' के तौर पर। नतीजतन, कोई भी सह-उत्तराधिकारी दूसरों की ओर से संपत्ति का निपटारा (बेच या हस्तांतरित) नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसे मामलों में 'कर्ता' की अवधारणा लागू नहीं होती।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। इस मामले में जब एक हिंदू पुरुष की बिना वसीयत मृत्यु हो गई तो उसकी दूसरी पत्नी के साथ-साथ पहली पत्नी से हुई चार बेटियां भी उसकी संपत्ति में बराबर हिस्से की हकदार थीं - यानी, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार संपत्ति में 1/5वां हिस्सा।

यह विवाद 1972 में स्वर्गीय दाजीबा की चार बेटियों द्वारा अपनी सौतेली मां (दारूबाई, दाजीबा की दूसरी पत्नी और सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता) के खिलाफ दायर बंटवारे के मुकदमे से शुरू हुआ था। बेटियों ने मुकदमे वाली संपत्तियों - जिसमें महाराष्ट्र में कृषि भूमि और घर शामिल थे - में 4/5वें हिस्से का दावा किया। उन्होंने तर्क दिया कि वे और विधवा दाजीबा के 'प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी' (Class I heirs) हैं। ट्रायल कोर्ट ने बेटियों के पक्ष में फैसला सुनाया। हालांकि, पहली अपीलीय अदालत ने 'कानूनी आवश्यकता' के आधार पर किसी तीसरे पक्ष को की गई बिक्री के संबंध में विधवा के बचाव को आंशिक रूप से स्वीकार किया था, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बहाल कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि क्या विधवा 'कर्ता' के तौर पर 'कानूनी आवश्यकता के सिद्धांत' का हवाला दे सकती है, और क्या उत्तराधिकारियों को संपत्ति 'संयुक्त किरायेदार' (Joint Tenants) के तौर पर मिली है या 'साझा हिस्सेदार' (Tenants-in-Common) के तौर पर।

विवादित फैसला रद्द करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि मुकदमे के पक्षकार संपत्ति को 'संयुक्त किरायेदार' के तौर पर नहीं रखते हैं - जो कि स्वामित्व का एक ऐसा रूप है, जिसमें अलग-अलग व्यक्तिगत हिस्सों के बिना एक ही एकीकृत हित होता है - बल्कि वे इसे 'साझा हिस्सेदार' (Tenants-in-Common) के तौर पर रखते हैं। इसमें प्रत्येक उत्तराधिकारी का अपना अलग और विशिष्ट हिस्सा होता है, जो आगे चलकर उनके अपने उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित होने के योग्य होता है। इसका मतलब है कि किसी एक सह-मालिक की मृत्यु होने पर उसका हिस्सा उत्तराधिकार कानून के अनुसार उसके अपने उत्तराधिकारियों को मिल जाता है।

Friday, 29 May 2026

सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेश निर्णय टाइमलाइन में करें 10 बाध्यकारी दिशानिर्देश (Binding Guidelines) जारी किए

W.P.(Crl.) No. 169/2025 – Pila Pahan @ Peela Pahan v. State of Jharkhand में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 10 बाध्यकारी दिशानिर्देश (Binding Guidelines) जारी किए, उनका संक्षिप्त एवं व्यावहारिक हिंदी सार इस प्रकार है:

1. आरक्षित निर्णय 3 माह के भीतर- किसी भी उच्च न्यायालय द्वारा निर्णय सुरक्षित (Reserved) किए जाने के बाद सामान्यतः 3 माह के भीतर निर्णय सुनाना अनिवार्य होगा।

2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों में शीघ्र निर्णय- जमानत, हिरासत, आपराधिक अपील तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में 3 माह की प्रतीक्षा भी नहीं की जानी चाहिए, बल्कि प्राथमिकता से निर्णय दिया जाना चाहिए।

3. जमानत आदेश उसी दिन या अगले दिन- यदि जमानत आवेदन पर आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे उसी दिन अथवा अधिकतम अगले दिन सुनाया जाना चाहिए।

4. जमानत आदेश तुरंत जेल भेजा जाए- जमानत आदेश पारित होते ही उसकी सूचना उसी दिन जेल अधिकारियों को भेजी जाएगी।

5. विचाराधीन बंदी (Undertrial) की तत्काल रिहाई- जमानत मिलने के बाद बंदी को उसी दिन, अथवा विशेष परिस्थितियों में अधिकतम अगले दिन रिहा किया जाना चाहिए।

6. ट्रायल कोर्ट अनुपालन रिपोर्ट भेजे- जमानत आदेश के पालन की सूचना संबंधित ट्रायल कोर्ट द्वारा उच्च न्यायालय को भेजी जाएगी।

7. केवल ऑपरेटिव भाग सुनाना पर्याप्त, पर कारणयुक्त निर्णय 7 दिन में न्यायालय खुली अदालत में केवल अंतिम निष्कर्ष (Operative Part) सुना सकता है, लेकिन विस्तृत कारणयुक्त निर्णय 7 दिनों के भीतर अपलोड करना होगा।

8. 3 माह बाद मुख्य न्यायाधीश की निगरानी, यदि 3 माह के भीतर निर्णय नहीं सुनाया जाता: तो रजिस्ट्रार जनरल मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखेगा। मुख्य न्यायाधीश अधिकतम 2 सप्ताह का अतिरिक्त समय दे सकते हैं। फिर भी निर्णय नहीं आने पर मामला दूसरी पीठ को आवंटित किया जा सकता है।

9. कारणयुक्त निर्णय अपलोड न होने पर पक्षकार का अधिकार- यदि ऑपरेटिव भाग सुनाए जाने के 15 दिन बाद भी कारणयुक्त निर्णय अपलोड नहीं होता, तो पक्षकार आवेदन दे सकता है। यदि 30 दिन बाद भी निर्णय अपलोड नहीं होता, तो पक्षकार मामला वापस लेकर दूसरी पीठ के समक्ष सुनवाई हेतु आवेदन कर सकता है।

10. वेबसाइट पर Reserved Date प्रदर्शित हो- बहस पूरी होने के बाद जिस दिन निर्णय सुरक्षित रखा जाए, वह तिथि उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर प्रदर्शित की जाएगी अधिवक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदु, अब यदि: कोई आपराधिक अपील 3 माह से अधिक समय से आरक्षित है, जमानत आदेश सुनाया नहीं जा रहा, केवल ऑपरेटिव भाग सुनाया गया है लेकिन कारणयुक्त आदेश नहीं दिया जा रहा, या निर्णय वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया,

तो इस निर्णय Pila Pahan @ Peela Pahan v. State of Jharkhand का हवाला देकर उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रभावी राहत मांगी जा सकती है।

यह निर्णय न्यायिक जवाबदेही, समयबद्ध न्याय और विशेष रूप से आपराधिक मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक निर्णय माना जाएगा।

 W.P.(Crl.) No. 169/2025

Case Title – Pila Pahan@Peela Pahan and Ors. v. State of Jharkhand and Anr.



लाइव ला 


सुप्रीम कोर्ट ने निर्देशों का एक सेट जारी किया, जिसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विचाराधीन कैदी और दोषी, अदालतों द्वारा उन्हें ज़मानत दिए जाने, उनकी सज़ा निलंबित किए जाने या उन्हें बरी किए जाने के बाद बिना किसी देरी के जेल से रिहा हो जाएं।

यह मानते हुए कि अनुकूल न्यायिक आदेश मिलने के बावजूद कैदी अक्सर कई दिनों तक जेल में ही बंद रहते हैं, कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट्स को ऐसे आदेशों को सुनाने, उनकी जानकारी देने और उन्हें लागू करने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा कि एक बार ज़मानत याचिका पर सुनवाई हो जाने के बाद आदेश को उसी दिन सुनाया जाना और वेबसाइट पर अपलोड किया जाना बेहतर होगा। यदि मामले में आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो कोर्ट ने कहा कि उम्मीद है कि आदेश अगले दिन सुनाया जाएगा और उसके तुरंत बाद कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाएगा।

प्रशासनिक देरी के कारण ज़मानत का मकसद विफल न हो, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि नियमित ज़मानत देने, सज़ा निलंबित करने, या हिरासत में मौजूद किसी दोषी को बरी करने वाले आदेशों की जानकारी, जिस दिन वे सुनाए जाते हैं, उसी दिन जेल अधिकारियों और निचली अदालत को दी जानी चाहिए।

कोर्ट ने आगे निर्देश दिया कि ऐसी जानकारी मिलने के बाद विचाराधीन कैदी या दोषी को उसी दिन, या ज़्यादा से ज़्यादा अगले दिन रिहा कर दिया जाना चाहिए। इसके एकमात्र अपवाद वे स्थितियाँ होंगी जहाँ कैदी को किसी अन्य मामले में हिरासत में लिया जाना आवश्यक हो, या जहां ज़मानत की शर्तें और अन्य प्रक्रियात्मक आवश्यकताएँ पूरी करने में देरी हो रही हो।

रिहाई के आदेशों को लागू करने में जवाबदेही पर ज़ोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट ट्रायल कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट की उस पीठ को दी जानी चाहिए, जिसने ज़मानत, सज़ा निलंबन या बरी करने का आदेश पारित किया था।

ये निर्देश चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ द्वारा सुरक्षित रखे गए मामलों में फ़ैसले सुनाने में होने वाली देरी से बचने के लिए हाईकोर्ट को दिए गए दिशानिर्देशों के हिस्से के रूप में जारी किए गए। खंडपीठ ने हाईकोर्ट के लिए सुरक्षित रखे गए मामलों में फ़ैसले सुनाने के लिए 3 महीने की समय सीमा तय की।

कैदियों की रिहाई से संबंधित प्रासंगिक निर्देश इस प्रकार हैं:

1. जैसे ही ज़मानत याचिका पर सुनवाई पूरी हो, आदेश को उसी दिन सुनाया जाना और वेबसाइट पर अपलोड किया जाना बेहतर होगा। यदि आदेश सुरक्षित रखा जाता है तो उम्मीद है कि इसे अगले दिन सुनाया जाएगा और वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा।

2. रेगुलर ज़मानत देने, सज़ा निलंबित करने, या हिरासत में बंद किसी दोषी को बरी करने वाले आदेशों की जानकारी जेल अधिकारियों और ट्रायल कोर्ट को उसी दिन दी जानी चाहिए, जिस दिन वे सुनाए जाते हैं।

3. ऊपर दिए गए निर्देश के नतीजे के तौर पर, विचाराधीन कैदी/दोषी को उसी दिन, या ज़्यादा से ज़्यादा अगले दिन रिहा कर दिया जाना चाहिए; सिवाय इसके कि उन्हें किसी दूसरे मामले में हिरासत में लिए जाने की ज़रूरत हो, या ज़मानत की शर्तों का पालन करने में कोई देरी हो, वगैरह।

इस आदेश के पालन की रिपोर्ट ट्रायल कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट की उस बेंच को दी जानी चाहिए, जिसने यह आदेश पारित किया था।

Case Title – Pila Pahan@Peela Pahan and Ors. v. State of Jharkhand and Anr.