वंदना जैन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
Criminal Appeal No. 1127/2026 (SLP (Crl.) No. 6670/2021)
1️⃣ निर्णय का संक्षिप्त विवरण (Case background)
यह अपील इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दिनांक 30.07.2021 के आदेश के विरुद्ध थी, जिसमें FIR रद्द करने की याचिका खारिज की गई थी।
FIR संख्या 0112/2021, दिनांक 14.03.2021, थाना हजरतगंज, लखनऊ में दर्ज की गई थी।
धाराएँ: 406, 420, 467, 468, 471 IPC.
विवाद 2010 के Joint Venture Agreement (JVA) से उत्पन्न हुआ था, जिसमें भूमि विकास परियोजना हेतु समझौता हुआ था।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यह विवाद मूलतः दीवानी प्रकृति का था, जिसे आपराधिक रंग दिया गया।
अतः:
अपील स्वीकार
हाईकोर्ट का आदेश निरस्त
FIR तथा उससे उत्पन्न सभी कार्यवाहियाँ रद्द।
2️⃣ सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित प्रमुख सिद्धांत (Judicial Principles)
(न्यायिक भाषा में बिंदुवार)
(i) सिविल विवाद को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता
जहां विवाद का मूल स्वरूप संविदात्मक/व्यावसायिक (contractual) हो, वहाँ उसे आपराधिक अपराध का रूप देकर दंडात्मक प्रक्रिया प्रारंभ करना विधि का दुरुपयोग है। �
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(ii) FIR में अपराध के आवश्यक तत्वों का होना अनिवार्य
यदि FIR के आरोपों को पूर्णतः सत्य मान भी लिया जाए और वे IPC की धाराओं के आवश्यक तत्व स्थापित न करें, तो आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रह सकती। �
Juris Hour
(iii) धोखाधड़ी (Cheating) हेतु प्रारंभिक बेईमान मंशा आवश्यक
मात्र अनुबंध का उल्लंघन (breach of contract) धोखाधड़ी नहीं है; इसके लिए प्रारंभ से ही बेईमानी की मंशा (mens rea) सिद्ध होनी चाहिए।
(iv) Forgery के आरोप हेतु ठोस सामग्री आवश्यक
धारा 467/468 IPC तभी लागू होंगी जब दस्तावेज़ को धारा 464 IPC के अर्थ में जाली (forged) सिद्ध किया जाए; केवल आरोप पर्याप्त नहीं।
(v) दीर्घकालिक विलंब FIR की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाता है
यदि कथित अपराध के कई वर्षों बाद FIR दर्ज हो, तो यह संकेत करता है कि विवाद सिविल प्रकृति का हो सकता है।
(vi) आपराधिक प्रक्रिया का उपयोग दबाव बनाने हेतु नहीं
दंड प्रक्रिया का उपयोग किसी पक्ष को अनुबंध पूरा करने या आर्थिक लाभ लेने हेतु दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता।
(vii) हाईकोर्ट की भूमिका – FIR का समुचित परीक्षण
धारा 482 CrPC के अंतर्गत हाईकोर्ट को यह देखना आवश्यक है कि FIR वास्तव में अपराध प्रकट करती है या केवल सिविल विवाद है; इस परीक्षण में असफलता न्यायिक त्रुटि है।
(viii) “Abuse of process of law” का सिद्धांत
जब आपराधिक कार्यवाही का उद्देश्य न्याय न होकर प्रतिशोध या दबाव हो, तो उसे निरस्त करना न्यायालय का कर्तव्य है।
3️⃣ न्यायालय के निष्कर्ष (Findings)
सुप्रीम कोर्ट ने निम्न प्रमुख निष्कर्ष दिए:
JVA से उत्पन्न विवाद मूलतः सिविल था।
FIR में धोखाधड़ी या जालसाजी का प्रथम दृष्टया कोई तत्व नहीं।
आरोप अनुबंध के उल्लंघन से संबंधित हैं, न कि आपराधिक मंशा से।
हाईकोर्ट ने FIR व समझौते का समुचित परीक्षण नहीं किया।
आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
अतः:
“FIR केवल सिविल कारण प्रकट करती है; इसलिए FIR तथा उससे उत्पन्न समस्त कार्यवाही निरस्त की जाती है।”
4️⃣ विधिक महत्व (Legal Significance)
यह निर्णय निम्न सिद्धांतों को पुनः पुष्ट करता है:
Breach of contract ≠ criminal offence
Civil dispute ≠ cheating automatically
FIR quashing jurisprudence (Sec 482 CrPC) को मजबूत किया
Commercial disputes में criminalization पर रोक
5️⃣ प्रासंगिक न्यायिक परीक्षण (Applied Tests)
सुप्रीम कोर्ट ने मूलतः निम्न टेस्ट लागू किए:
Prima facie offence test
Mens rea test
Civil vs criminal distinction test
Abuse of process doctrine
6️⃣ निर्णय का सार (Legal ratio)
“जहाँ विवाद अनुबंध/संपत्ति/व्यावसायिक संबंधों से उत्पन्न हो और आरोप IPC की धाराओं के आवश्यक तत्व स्थापित न करें, वहाँ आपराधिक कार्यवाही विधि का दुरुपयोग मानी जाएगी तथा उसे निरस्त किया जाना चाहिए।”
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विषय: सिविल विवाद को आपराधिक रंग देकर दर्ज FIR की वैधता के संबंध में
मान्यवर,
प्रस्तुत वाद में प्रतिवादी द्वारा दर्ज कराई गई FIR वस्तुतः एक संविदात्मक/व्यावसायिक विवाद से उत्पन्न है, जिसे आपराधिक स्वरूप प्रदान कर दिया गया है। इस संदर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वंदना जैन एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य, क्रिमिनल अपील क्रमांक 1127/2026 (एस.एल.पी. (क्रि.) क्रमांक 6670/2021 से उद्भूत) में प्रतिपादित विधि सिद्धांत पूर्णतः लागू होते हैं।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त प्रकरण में यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है कि—
1. सिविल विवाद का आपराधिकरण विधि का दुरुपयोग है।
जहाँ विवाद का मूल स्वरूप संविदात्मक/व्यावसायिक हो, वहाँ उसे आपराधिक अपराध का रूप देकर दंडात्मक प्रक्रिया प्रारंभ करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
2. FIR में अपराध के आवश्यक तत्वों का होना अनिवार्य है।
यदि आरोपों को पूर्णतः सत्य मान लेने पर भी भारतीय दंड संहिता की धाराओं के आवश्यक तत्व स्थापित नहीं होते, तो आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रह सकती।
3. धोखाधड़ी (Cheating) के लिए प्रारंभिक बेईमान मंशा (Mens rea) आवश्यक है।
मात्र अनुबंध का उल्लंघन या भुगतान न होना धोखाधड़ी का अपराध नहीं है, जब तक कि प्रारंभ से ही बेईमानी की मंशा सिद्ध न हो।
4. Forgery के आरोप हेतु ठोस आधार आवश्यक है।
दस्तावेज़ के जाली होने का प्रथम दृष्टया प्रमाण आवश्यक है; केवल आरोप के आधार पर धारा 467/468/471 IPC लागू नहीं की जा सकती।
5. दीर्घ विलंब से दर्ज FIR की विश्वसनीयता संदिग्ध होती है।
कई वर्षों पश्चात दर्ज FIR इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि विवाद मूलतः दीवानी प्रकृति का है।
6. दंड प्रक्रिया का उपयोग दबाव बनाने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।
अनुबंध के पालन या आर्थिक लाभ हेतु आपराधिक कार्यवाही प्रारंभ करना विधि के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है।
7. धारा 482 दं.प्र.सं. के अंतर्गत न्यायालय का कर्तव्य।
उच्च न्यायालय का दायित्व है कि वह यह परीक्षण करे कि FIR वास्तविक आपराधिक अपराध प्रकट करती है या केवल सिविल विवाद है; अन्यथा न्यायिक त्रुटि मानी जाएगी।
8. Abuse of Process Doctrine
जब आपराधिक कार्यवाही का उद्देश्य न्याय प्राप्त करना न होकर प्रतिशोध या दबाव बनाना हो, तो उसे निरस्त करना न्यायालय का दायित्व है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने उपर्युक्त सिद्धांतों के आधार पर यह निष्कर्ष दिया कि संबंधित FIR सिविल विवाद से उत्पन्न थी, जिसमें धोखाधड़ी अथवा जालसाजी के आवश्यक तत्व अनुपस्थित थे, अतः FIR तथा उससे उत्पन्न समस्त आपराधिक कार्यवाही निरस्त किए जाने योग्य है।
अतः प्रस्तुत वाद में भी—
- आरोप संविदात्मक दायित्वों से संबंधित हैं,
- प्रारंभिक बेईमानी की मंशा का अभाव है,
- कोई स्वतंत्र आपराधिक कृत्य प्रथम दृष्टया स्थापित नहीं होता,
इसलिए उक्त सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के आलोक में यह निवेदन है कि दर्ज FIR एवं उससे उत्पन्न समस्त आपराधिक कार्यवाही को निरस्त किया जाना न्यायोचित एवं विधिसम्मत होगा।
दिनांक: …………
अधिवक्ता
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