“किशोर संबंधों में अक्सर लड़कों को भुगतने पड़ते हैं परिणाम”: POCSO के दुरुपयोग को रोकने के लिए जागरूकता जरूरी — मद्रास हाईकोर्ट 7 Mar 2026
मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में एक युवक की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया, जिसे निचली अदालत ने आईपीसी की धारा 366 तथा Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 की धारा 5(l) सहपठित धारा 6 के तहत एक नाबालिग लड़की के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप में दोषी ठहराया था। जस्टिस एन माला ने कहा कि यह मामला दो किशोरों के बीच सहमति से बने संबंध का प्रतीत होता है, जो अंततः माता-पिता के विरोध के कारण विवाद में बदल गया। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में अक्सर परिणामों का सामना केवल लड़कों को करना पड़ता है।
मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी अदालत ने कहा, “यह एक सामान्य मामला है जिसमें किशोरों के बीच सहमति से बने संबंध का अंत माता-पिता के मतभेद के कारण हुआ। ऐसे मामलों में अक्सर लड़की पर परिवार का दबाव होता है और बाद में उसकी शादी कहीं और करा दी जाती है, जिसके बाद लड़के के खिलाफ POCSO के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज करा दिया जाता है, जिससे उसे लंबी अवधि तक जेल में रहना पड़ता है।” अदालत ने यह भी कहा कि यदि POCSO अधिनियम की धारा 43 के तहत कानून के प्रावधानों और उसकी कठोरता के बारे में व्यापक जागरूकता फैलाई जाए तो ऐसे मामलों में कमी लाई जा सकती है। न्यायालय ने कहा कि इस कानून के कठोर प्रावधानों की जानकारी के अभाव में इसका दुरुपयोग होने की संभावना बढ़ जाती है।
इसी संदर्भ में अदालत ने Chief Secretary of Tamil Nadu को निर्देश दिया कि वे POCSO अधिनियम की धारा 43 का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कदम उठाएं और आम जनता, बच्चों तथा अभिभावकों में कानून के प्रति जागरूकता बढ़ाएं। अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि सरकारी और निजी स्कूलों तथा कॉलेजों में जागरूकता शिविर आयोजित किए जाएं, ताकि कानून और उसके परिणामों के बारे में जानकारी दी जा सके। यह मामला उस अपील से संबंधित था जिसमें आरोपी ने Special Court for POCSO Cases, Nagercoil के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे दोषी ठहराया गया था।
अभियोजन के अनुसार, घटना के समय लड़की की उम्र 16 वर्ष थी। आरोपी, जो लड़की के भाई का मित्र था, उससे परिचित हुआ और बाद में उससे प्रेम का इज़हार करते हुए विवाह की इच्छा जताई। लड़की ने बताया कि उसके माता-पिता उसकी इच्छा के विरुद्ध शादी कराना चाहते हैं, जिसके बाद आरोपी उसे घर से ले गया और अपने रिश्तेदार के घर में उससे विवाह कर लिया। बाद में जिला बाल संरक्षण अधिकारी को एक गुमनाम कॉल मिलने पर दोनों को हिरासत में लिया गया।
हालांकि अपील में आरोपी ने तर्क दिया कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था और लड़की ने स्वेच्छा से उसके साथ जाने का निर्णय लिया था। उसने यह भी कहा कि लड़की के शुरुआती बयानों में उसके खिलाफ कोई आरोप नहीं था और निचली अदालत ने उसके विरोधाभासी बयान पर भरोसा करके गलती की। अदालत ने पाया कि लड़की की उम्र साबित करने के लिए अभियोजन ने जन्म प्रमाणपत्र और ट्रांसफर सर्टिफिकेट की केवल फोटोकॉपी पेश की थी, जबकि उनके मूल दस्तावेज उपलब्ध थे। अदालत ने कहा कि जब मूल दस्तावेज मौजूद हों तो बिना उचित कारण के द्वितीयक साक्ष्य (फोटोकॉपी) स्वीकार नहीं किए जा सकते। न्यायालय ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा इन फोटोकॉपी दस्तावेजों को स्वीकार कर पीड़िता की उम्र तय करना एक गंभीर त्रुटि थी। चूंकि पीड़िता की उम्र साबित नहीं हो सकी, जो इस मामले का मूल तथ्य था, इसलिए अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपी की दोषसिद्धि रद्द कर दी।
https://hindi.livelaw.in/madras-high-court/madras-high-court-pocso-act-misuse-525512
POCSO / सहमति वाले किशोर प्रेम-संबंध (consensual relationship) से जुड़े 10 महत्वपूर्ण निर्णय (5 सुप्रीम कोर्ट + 5 हाईकोर्ट) दिए जा रहे हैं। हर केस के साथ टाइटल और 4–5 लाइन का कोर्ट-उपयोगी पैराग्राफ भी दिया गया है ताकि इन्हें लिखित बहस / जमानत / अपील में सीधे उपयोग कर सकें।
1️⃣ सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय
1. Mahadeo s/o Kerba Maske v. State of Maharashtra
सिद्धांत :
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिपादित किया कि POCSO अथवा यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता की आयु का निर्धारण अत्यंत महत्वपूर्ण है और आयु सिद्ध करने हेतु ठोस व विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक है। केवल अनुमान अथवा अपूर्ण दस्तावेजों के आधार पर दोषसिद्धि उचित नहीं मानी जा सकती।
2. Independent Thought v. Union of India
सिद्धांत :
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा कानून का मूल उद्देश्य है, किन्तु न्यायालयों को सामाजिक परिस्थितियों और वास्तविकताओं को भी ध्यान में रखना चाहिए ताकि कानून का प्रयोग न्यायपूर्ण ढंग से हो।
3. Satish v. State of Maharashtra
सिद्धांत :
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि POCSO के अपराधों में यौन आशय (sexual intent) का परीक्षण महत्वपूर्ण है और प्रत्येक मामले के तथ्यों व परिस्थितियों का समुचित मूल्यांकन आवश्यक है।
4. S. Varadarajan v. State of Madras
सिद्धांत :
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिपादित किया कि यदि लड़की स्वयं आरोपी के साथ जाती है और आरोपी द्वारा कोई बल अथवा प्रलोभन नहीं दिया गया है, तो ऐसी स्थिति को स्वतः अपहरण नहीं माना जा सकता।
5. Alamelu v. State
सिद्धांत :
न्यायालय ने कहा कि आयु सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों की विश्वसनीयता का परीक्षण आवश्यक है और यदि आयु के संबंध में संदेह हो तो आरोपी को उसका लाभ दिया जाना चाहिए।
2️⃣ हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय
6. Sabari v. Inspector of Police
सिद्धांत :
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि किशोरावस्था में प्रेम संबंध होना सामाजिक वास्तविकता है और ऐसे मामलों में न्यायालयों को परिस्थितियों का संवेदनशीलता के साथ मूल्यांकन करना चाहिए।
7. Mahesh v. State
सिद्धांत :
कोर्ट ने टिप्पणी की कि सहमति वाले किशोर प्रेम संबंधों को अपराध बनाने का खामियाजा अक्सर लड़कों को भुगतना पड़ता है। POCSO का उद्देश्य बच्चों के शोषण को रोकना है, न कि स्वेच्छा से बने प्रेम संबंधों को दंडित करना।
8. Raja v. State of Karnataka
सिद्धांत :
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि यदि लड़की स्वयं आरोपी के साथ गई हो और संबंध सहमति से स्थापित हुआ हो, तो न्यायालय को समग्र परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निर्णय करना चाहिए।
9. Anversinh v. State of Gujarat
सिद्धांत :
गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि प्रेम संबंध और यौन शोषण में स्पष्ट अंतर है और प्रत्येक मामले को कठोर आपराधिक दृष्टिकोण से देखने के बजाय उसके तथ्यों का सूक्ष्म परीक्षण आवश्यक है।
10. Court on its Own Motion v. State
सिद्धांत :
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO के अंतर्गत बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आते हैं जो वास्तव में सहमति वाले किशोर प्रेम संबंध होते हैं, इसलिए न्यायालयों को प्रत्येक मामले में परिस्थितियों का सावधानीपूर्वक परीक्षण करना चाहिए।
⚖️ कोर्ट में उपयोग करने योग्य निष्कर्ष (बहस के लिए)
उपरोक्त न्यायिक दृष्टांतों से यह सिद्ध होता है कि न्यायालयों ने समय-समय पर यह प्रतिपादित किया है कि POCSO कानून का उद्देश्य बालकों को यौन शोषण से संरक्षण देना है, न कि सहमति से स्थापित किशोर प्रेम संबंधों को कठोर आपराधिक अपराध के रूप में दंडित करना। अतः जहाँ परिस्थितियों से यह स्पष्ट हो कि संबंध स्वेच्छा से स्थापित हुआ था और उसमें बल, प्रलोभन अथवा शोषण का तत्व नहीं है, वहाँ न्यायालय को तथ्यों का समग्र मूल्यांकन करते हुए आरोपी को दोषमुक्त करने पर विचार करना चाहिए।
जय मीनेष 🌹
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