भले ही चेक बिना तारीख (Undated Cheque) के हों, फिर भी वे ऋण/देयता (Debt or Liability) के अस्तित्व का सशक्त साक्ष्य हो सकते हैं — यह सिद्धांत मुख्यतः निम्न प्रकरणों में प्रतिपादित किया गया है:
1️⃣ Bir Singh v. Mukesh Kumar
(2019) 4 SCC 197, सुप्रीम कोर्ट
🔹 प्रतिपादित सिद्धांत (Point-wise):
यदि आरोपी द्वारा हस्ताक्षरित चेक वादी के पास पाया जाता है, तो धारा 118 व 139, Negotiable Instruments Act, 1881 के तहत विधिक अनुमान (Statutory Presumption) उत्पन्न होता है कि चेक वैध ऋण/देयता के निर्वहन हेतु दिया गया है।
यह आवश्यक नहीं कि चेक पूरी तरह से आरोपी द्वारा भरा गया हो; यदि हस्ताक्षर स्वीकार हैं तो अनुमान लागू होगा।
भले ही चेक “ब्लैंक” या “अंडेटेड” हो, यदि हस्ताक्षरित है और स्वेच्छा से दिया गया है, तो वह देयता के समर्थन में सशक्त साक्ष्य है।
बाद में तिथि या राशि भर देना मात्र से चेक अवैध नहीं हो जाता।
आरोपी पर यह दायित्व है कि वह इस वैधानिक अनुमान को “preponderance of probabilities” के आधार पर खंडित करे।
केवल यह कहना कि चेक सुरक्षा (security) के रूप में दिया गया था, पर्याप्त नहीं; ठोस साक्ष्य आवश्यक है।
2️⃣ ICDS Ltd. v. Beena Shabeer
(2002) 6 SCC 426
🔹 सिद्धांत:
“Security cheque” भी यदि देयता के निर्वहन हेतु प्रस्तुत किया जाता है और अनादृत (dishonour) होता है, तो धारा 138 लागू हो सकती है।
देयता का अस्तित्व मूल प्रश्न है, न कि चेक का स्वरूप (dated/undated/security)।
3️⃣ Sampelly Satyanarayana Rao v. Indian Renewable Energy Development Agency Ltd.
(2016) 10 SCC 458
🔹 सिद्धांत:
यदि चेक उस समय किसी “existing liability” के संदर्भ में दिया गया हो, तो वह धारा 138 के अंतर्गत दायित्व उत्पन्न करेगा।
सुरक्षा के नाम पर दिया गया चेक भी, यदि देयता विद्यमान हो, तो दंडनीय हो सकता है।
🔎 निष्कर्ष (संक्षेप में)
✔️ Undated या Blank cheque भी वैध साक्ष्य है।
✔️ हस्ताक्षर स्वीकार होने पर विधिक अनुमान स्वतः लागू होगा।
✔️ देयता न होने का भार (burden) आरोपी पर है।
✔️ केवल “security” या “blank” कह देना पर्याप्त बचाव नहीं है।
लिखित तर्क
विषय: बिना तारीख (Undated) / रिक्त (Blank) चेक की विधिक वैधता एवं देयता के संबंध में
माननीय न्यायालय के समक्ष विनम्र निवेदन है कि इस प्रकरण में अभियुक्त द्वारा हस्ताक्षरित चेक प्रस्तुत है। यद्यपि अभियुक्त का यह कथन है कि चेक बिना तारीख (Undated) अथवा सुरक्षा (Security) के रूप में दिया गया था, तथापि यह तर्क विधि सम्मत नहीं है और विधि द्वारा स्थापित अनुमान के विपरीत है।
1. वैधानिक अनुमान (Statutory Presumption)
धारा 118 तथा 139 के अंतर्गत यह विधिक अनुमान स्थापित है कि—
चेक विधिसम्मत प्रतिफल (consideration) के लिए निर्गत किया गया है।
चेक किसी विधिक देयता (legally enforceable debt or liability) के निर्वहन हेतु दिया गया है।
अतः एक बार हस्ताक्षर स्वीकार हो जाने पर, देयता के अस्तित्व का अनुमान अभियुक्त के विरुद्ध स्वतः उत्पन्न हो जाता है।
2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत
(क) Bir Singh v. Mukesh Kumar, (2019) 4 SCC 197
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि—
यदि चेक पर अभियुक्त के हस्ताक्षर स्वीकार हैं, तो यह आवश्यक नहीं कि शेष विवरण भी उसी द्वारा भरा गया हो।
भले ही चेक ब्लैंक या अंडेटेड हो, यदि वह स्वेच्छा से हस्ताक्षरित कर सौंपा गया है, तो वह वैध एवं विधिसम्मत है।
अभियुक्त पर यह दायित्व है कि वह संभावनाओं के संतुलन (preponderance of probabilities) के आधार पर वैधानिक अनुमान का खंडन करे।
(ख) ICDS Ltd. v. Beena Shabeer, (2002) 6 SCC 426
माननीय न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया कि—
तथाकथित “Security Cheque” भी, यदि देयता के निर्वहन हेतु प्रस्तुत किया गया हो और अनादृत हो जाए, तो धारा 138 के प्रावधान लागू होंगे।
चेक का स्वरूप नहीं, बल्कि देयता का अस्तित्व निर्णायक तत्व है।
(ग) Sampelly Satyanarayana Rao v. Indian Renewable Energy Development Agency Ltd., (2016) 10 SCC 458
इस निर्णय में यह स्थापित किया गया कि—
यदि चेक निर्गमन के समय विधिक देयता विद्यमान थी, तो भले ही उसे सुरक्षा के नाम पर दिया गया हो, धारा 138 के अंतर्गत उत्तरदायित्व उत्पन्न होगा।
3. वर्तमान प्रकरण पर विधि का अनुप्रयोग
अभियुक्त ने चेक पर अपने हस्ताक्षर से इंकार नहीं किया है।
चेक विधिवत प्रस्तुत किया गया और अनादृत हुआ।
विधि द्वारा स्थापित अनुमान अभियुक्त के विरुद्ध लागू है।
मात्र यह कहना कि चेक “सुरक्षा” या “बिना तारीख” का था, अनुमान को खंडित करने हेतु पर्याप्त नहीं है।
अभियुक्त कोई ठोस, विश्वसनीय एवं संभावनाओं के संतुलन पर आधारित प्रतिरक्षा प्रस्तुत करने में असफल रहा है।
4. निष्कर्ष
अतः यह विनम्र निवेदन है कि—
हस्ताक्षरित चेक, चाहे वह अंडेटेड या रिक्त क्यों न हो, विधिक देयता के समर्थन में सशक्त साक्ष्य है।
अभियुक्त वैधानिक अनुमान का खंडन करने में असफल रहा है।
फलतः धारा 138 के अंतर्गत अपराध सिद्ध किया जाना न्यायोचित होगा।
दिनांक: _______
स्थान: _______
(अधिवक्ता/परिवादी)
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