Thursday, 21 May 2026

समान आरोपों में सह-आरोपी डिस्चार्ज हो चुके हों तो एक आरोपी पर अकेले मुकदमा नहीं चल सकता : सुप्रीम कोर्ट 20 May 2026

समान आरोपों में सह-आरोपी डिस्चार्ज हो चुके हों तो एक आरोपी पर अकेले मुकदमा नहीं चल सकता : सुप्रीम कोर्ट 20 May 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि समान परिस्थितियों वाले सह-आरोपियों (Co-Accused) को पहले ही डिस्चार्ज किया जा चुका है, तो केवल एक आरोपी के खिलाफ मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्य अन्य आरोपियों की तुलना में अधिक मजबूत न हों। अदालत ने कहा कि समान आरोपों वाले व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाना आपराधिक न्यायशास्त्र (Criminal Jurisprudence) का मूल सिद्धांत है। 

सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा सही ठहराई जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ओडिशा के एक Forest Range Officer से जुड़े भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश मामले की सुनवाई कर रही थी। आरोप था कि अधिकारी ने अन्य अधिकारियों के साथ मिलकर कालिमेला और चित्रकोंडा क्षेत्रों में अवैध पेड़ कटाई की अनुमति दी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के आरोप केवल सामान्य और अस्पष्ट (Vague & Omnibus) थे और उनमें आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका स्पष्ट रूप से नहीं बताई गई थी। 

अदालत ने कहा कि मामले में दो वरिष्ठ भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारियों को पहले ही डिस्चार्ज किया जा चुका है, जबकि निर्णय प्रक्रिया में उनकी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण थी। ऐसे में केवल एक अधिकारी के खिलाफ मुकदमा जारी रखना मनमाना होगा और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक मुकदमे को उत्पीड़न (Oppression) का माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि उपलब्ध सामग्री किसी अपराध की स्पष्ट ओर गंभीर आशंका तक नहीं दिखाती, तो व्यक्ति को अनावश्यक रूप से आपराधिक मुकदमे की कठिन प्रक्रिया से नहीं गुजरना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि कानून निर्दोष व्यक्ति की रक्षा के लिए ढाल (Shield) होना चाहिए, प्रताड़ना का हथियार नहीं। इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने Forest Range Officer के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए कहा कि केवल सामान्य आरोपों के आधार पर मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।


https://hindi.livelaw.in/supreme-court/supreme-court-co-accused-parity-principle-criminal-jurisprudence-article-14-534984

Monday, 11 May 2026

Order VII Rule 11 CPC | यह देखने के लिए कि क्या कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग से छिपाया गया, वाद-पत्र को ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट 2026-05-10

Order VII Rule 11 CPC | यह देखने के लिए कि क्या कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग से छिपाया गया, वाद-पत्र को ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट 2026-05-10 

CPC के आदेश VII नियम 11 के दायरे पर महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को वाद-पत्र की "ध्यान से और पूरी तरह" जांच करनी चाहिए ताकि यह देखा जा सके कि क्या किसी कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए छिपाया गया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर तथ्यों को जान-बूझकर छिपाया गया हो तो वाद-पत्र को खारिज किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा,

"ट्रायल कोर्ट को ऐसे बेतुके मुकदमों को रोकना चाहिए, जो कानून द्वारा वर्जित हैं। साथ ही ऐसे मामलों को भी, जहां कार्रवाई का कारण (Cause of Action) केवल एक भ्रम हो। इसके लिए उन्हें चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के पीछे छिपे सच को उजागर करना होगा और वाद-पत्र तथा उसके साथ लगे दस्तावेजों को ध्यान से और पूरी तरह पढ़ना होगा - बेहतर होगा कि यह काम मुकदमे के शुरुआती चरण में ही कर लिया जाए।"

इस मामले में कोर्ट ने दो आधारों पर वाद-पत्र खारिज किया - पहला, 'बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम' के तहत लगी रोक को छिपाने की कोशिश की गई, जिसके लिए मुकदमे को इस तरह से पेश किया गया जैसे वह किसी वसीयत पर आधारित हो। दूसरा, वादी ने यह तथ्य छिपाया था कि वह वसीयतकर्ता की हत्या का आरोपी है।

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अदालतों को कार्रवाई के असली कारण और चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए गढ़े गए झूठे कारण के बीच फर्क करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि CPC के आदेश VII नियम 11 के तहत जांच करते समय वाद-पत्र के केवल रूप या भाषा पर नहीं, बल्कि उसके मूल तत्व (Substance) पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"अगर चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए कोई मनगढ़ंत कारण खड़ा करके कानून के तहत लगी रोक को छिपाने की कोशिश की जाती है तो कोर्ट के लिए उस वाद-पत्र को खारिज करना अनिवार्य हो जाता है।"

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों का फैसला आमतौर पर मुकदमे के शुरुआती चरण में नहीं किया जा सकता, फिर भी अदालतों को यह जांचने का अधिकार है कि क्या वादी द्वारा किए गए दावे का मूल आधार कानूनी रूप से सही और मान्य है।

न्यायालय ने टिप्पणी की,

“एक बार जब वाद-पत्र (Plaint) संस्थापन के लिए प्रस्तुत किया जाता है तो इसे स्वीकार किए जाने से पहले यह ट्रायल कोर्ट का कर्तव्य है कि वह वाद-पत्र की सामग्री को सत्यापित करे और यह सुनिश्चित करे कि वाद-पत्र को स्वीकार करने से पहले सभी कानूनी आवश्यकताओं को पूरा किया गया। एक ट्रायल कोर्ट यांत्रिक रूप से वाद-पत्र को स्वीकार नहीं कर सकता और वाद को पंजीकृत नहीं कर सकता। वाद-पत्र की स्वीकृति एक यांत्रिक प्रक्रिया नहीं हो सकती, जिसके द्वारा रजिस्ट्री के नोट को न्यायालय द्वारा केवल अनुमोदित कर दिया जाए। यदि, वाद-पत्र की स्वीकृति के चरण पर ट्रायल कोर्ट वाद-पत्र को ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि वाद-पत्र अस्वीकृत किए जाने योग्य है तो वह वाद-पत्र को अस्वीकृत कर देगा। ट्रायल कोर्ट के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह प्रतिवादी के उपस्थित होने और वाद-पत्र की अस्वीकृति की मांग करने की प्रतीक्षा करे। एक बार जब न्यायालय यह पाता है कि वाद तुच्छ है, अधिकार-क्षेत्र से बाहर है, पूर्व-शर्तों का पालन किए बिना दायर किया गया, कार्रवाई का कोई वास्तविक कारण (Cause of Action) प्रकट करने में विफल रहता है, महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाता है, या कानून द्वारा वर्जित है लेकिन कार्रवाई का कारण होने का भ्रम पैदा करने के लिए चालाकी से तैयार किया गया है तो उसे वाद-पत्र को लागत (Costs) सहित अस्वीकृत कर देना चाहिए।”

Cause Title: MANJULA AND OTHERS VERSUS D.A. SRINIVAS

Friday, 1 May 2026

तलाक वाद में मुद्दे तय किए बिना निर्णय देना केवल अनुमान आधारित आकलन: पटना हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया

 तलाक वाद में मुद्दे तय किए बिना निर्णय देना केवल अनुमान आधारित आकलन: पटना हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक संबंधी वाद में यदि ट्रायल कोर्ट स्पष्ट मुद्दे तय किए बिना निर्णय देता है तो ऐसा निर्णय विधिसम्मत नहीं माना जा सकता और वह केवल “अनुमान आधारित आकलन” बनकर रह जाता है।


जस्टिस नानी टैगिया और जस्टिस आलोक कुमार पांडे की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए मुजफ्फरपुर फैमिली कोर्ट द्वारा पति की तलाक याचिका खारिज करने का आदेश रद्द किया। निर्णय जस्टिस आलोक कुमार पांडे ने लिखा।


पति ने क्रूरता, परित्याग और व्यभिचार के आधार पर विवाह विच्छेद की मांग की थी। उसका कहना था कि जून 2007 में विवाह के बाद कुछ समय साथ रहने के पश्चात पत्नी वैवाहिक घर छोड़कर मायके चली गई और वापस नहीं लौटी।


पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी का किसी अन्य व्यक्ति से अवैध संबंध है तथा समझौते के प्रयासों के बावजूद उसने वैवाहिक जीवन पुनः शुरू करने से इनकार किया।


वहीं पत्नी ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उसे पति और उसके परिवार द्वारा दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया तथा शारीरिक और मानसिक क्रूरता के कारण उसे मायके में शरण लेनी पड़ी। उसने अवैध संबंध के आरोपों को भी निराधार बताया और वैवाहिक जीवन जारी रखने की इच्छा जताई।


हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच करते हुए पाया कि फैमिली कोर्ट ने पक्षकारों की विस्तृत दलीलों और परस्पर विरोधी तथ्यों के बावजूद धारा 13 के वैधानिक आधारों के अनुरूप कोई विशिष्ट मुद्दे तय नहीं किए।


अदालत ने कहा,


“विशिष्ट मुद्दे तय किए बिना दिया गया निष्कर्ष केवल एक अनुमान आधारित आकलन है, जो रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के अनुरूप नहीं है।”


खंडपीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने तथ्यों और साक्ष्यों का समग्र परीक्षण करने के बजाय चुनिंदा परिस्थितियों के आधार पर निष्कर्ष निकाल लिया, जिससे निर्णय प्रक्रिया मूलतः त्रुटिपूर्ण हो गई।


हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक जैसे मामलों में, विशेषकर जब क्रूरता, परित्याग और व्यभिचार जैसे गंभीर आरोप हों, ट्रायल कोर्ट का दायित्व है कि वह पक्षकारों की दलीलों के आधार पर स्पष्ट मुद्दे तय करे और प्रत्येक आधार पर स्वतंत्र रूप से साक्ष्य का परीक्षण करे।


इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का निर्णय और डिक्री रद्द करते हुए मामला पुनर्विचार हेतु वापस भेज दिया।


फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के अनुरूप विशिष्ट मुद्दे तय कर मामले का नए सिरे से यथाशीघ्र, अधिमानतः छह माह के भीतर निस्तारण करे।


अदालत ने पक्षकारों को यह स्वतंत्रता भी दी कि वे अपने वर्तमान वैवाहिक स्थिति संबंधी अतिरिक्त अभ्यावेदन ट्रायल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं।