Saturday, 18 July 2026

वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन... क्या वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के 3 साल के अंदर न करने पर समय-सीमा खत्म हो जाती है? सुप्रीम कोर्ट

वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन... क्या वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के 3 साल के अंदर न करने पर समय-सीमा खत्म हो जाती है? सुप्रीम कोर्ट ने दिया जवाब 17 July 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल के अंदर ही करना ज़रूरी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि प्रोबेट के लिए आवेदन करने का अधिकार तब मिलता है जब ऐसा करना ज़रूरी हो जाता है, यानी जब वसीयत से बनी स्थिति के खिलाफ कोई कदम उठाया जाता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा, "इसलिए आवेदन करने का अधिकार उस तारीख से मिलता है, जब आवेदन करना ज़रूरी हो जाता है। ज़ाहिर है, यह वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल के अंदर होना ज़रूरी नहीं है।" 

 बेंच ने ट्रायल कोर्ट और झारखंड हाईकोर्ट के उन फैसलों को रद्द किया, जिन्होंने प्रोबेट आवेदन को सिर्फ़ इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि इसे वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल बाद दायर किया गया। यह मामला 15 अप्रैल 1995 की वसीयत के प्रोबेट के आवेदन से जुड़ा है, जिसे श्रीलाल सिंघानिया ने बनाया और जिनका 7 जून 1995 को निधन हो गया। यह आवेदन वसीयत में बताए गए एग्जीक्यूटर भूदेव प्रसाद सिंह ने 31 अगस्त 2005 को दायर किया था, जो वसीयतकर्ता की मौत के एक दशक से भी ज़्यादा समय बाद था। 

 आपत्ति करने वाले प्रतिवादियों ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत आवेदन दायर किया और तर्क दिया कि प्रोबेट आवेदन समय-सीमा (लिमिटेशन) के कारण खारिज होने योग्य है। ट्रायल कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया और इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 की धारा 222 और 276 के तहत प्रोबेट आवेदन खारिज किया। झारखंड हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट का फैसला सही ठहराते हुए अपील खारिज की, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में यह अपील दायर की गई। Also Read - जब आरोपी जेल में हो तो कोर्ट और प्रॉसिक्यूशन की ज़िम्मेदारी है कि वे ट्रायल में तेज़ी लाएं: सुप्रीम कोर्ट अपील मंज़ूरी करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में उस तर्क को खारिज कर दिया गया कि वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल के अंदर ही दायर किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि चूंकि इंडियन सक्सेशन एक्ट में वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन दायर करने की कोई समय-सीमा तय नहीं है, इसलिए लिमिटेशन एक्ट, 1963 के आर्टिकल 163 के तहत तय तीन साल की समय-सीमा लागू होगी। हालांकि, इसकी गिनती उस तारीख से की जाएगी जब दूसरी पार्टी ने वसीयत (Will) से तय स्थिति के खिलाफ कोई कदम उठाया हो। Also Read - सिर्फ़ गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल अश्लीलता नहीं है: सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 294(b) का दायरा समझाया कानून को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा: “आवेदन करने की ज़रूरत उस तारीख से शुरू होगी, जब प्रतिवादियों ने वसीयत से तय स्थिति के खिलाफ कदम उठाए, यानी 8 अगस्त 2005 को वसीयत करने वाले की पत्नी लक्ष्मी देवी द्वारा 'जनरल पावर ऑफ़ अटॉर्नी' (General Power of Attorney) निष्पादित करना। इस नज़रिए से, अपीलकर्ता संजय शर्मा उर्फ संजय भारद्वाज के पक्ष में एग्जीक्यूटर मिस्टर भूदेव प्रसाद सिंह द्वारा वसीयत के प्रोबेट (probate) के लिए दिया गया आवेदन समय-सीमा के भीतर माना जाता है क्योंकि इसे 31 अगस्त 2005 को दायर किया गया।” इसमें P. Kumarakurubaran v. P. Narayanan, 2025 LiveLaw (SC) 509 मामले का हवाला दिया गया, जिसमें यह तय किया गया कि जब समय-सीमा (limitation) का सवाल विवादित तथ्यों से जुड़ा हो तो ऐसे मुद्दों का फैसला Order VII Rule 11 CPC के चरण में नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने समय-सीमा की अवधि को लेकर विवाद होने के बावजूद मुकदमे को सरसरी तौर पर खारिज करके गलती की, क्योंकि यह तथ्य और कानून का मिला-जुला सवाल है। कोर्ट ने यह फैसला सुनाया, “Order VII Rule 11 और समय-सीमा के सवाल, दोनों ही मामलों में निचली अदालतों के फैसलों और आदेशों को रद्द करना होगा। देवघर जिला अदालत द्वारा 31 जुलाई 2012 को पारित आदेश और झारखंड हाईकोर्ट द्वारा 28 अप्रैल 2022 को पारित फैसले को रद्द किया जाता है। कानून के मामले में स्पष्ट गलती होने के कारण अपील स्वीकार की जाती है। मामले को संबंधित सिविल कोर्ट में कानून के अनुसार आगे बढ़ने के लिए बहाल किया जाता है।” 

Cause title: SANJAY SHARMA @ SANJAY BHARDWAJ VERSUS KRISHNADHAN KHAWARE AND ORS.



भूमि अधिग्रहण कानून के निरस्त होने के बाद जारी हुई अधिसूचना पर कार्रवाई अवैध

भूमि अधिग्रहण कानून के निरस्त होने के बाद जारी हुई अधिसूचना पर कार्रवाई अवैध 2026-07-17 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत जारी अधिसूचना पर भले ही 1 जनवरी 2014 से पहले की तारीख अंकित हो, लेकिन उसका प्रकाशन 1 जनवरी 2014 के बाद हुआ है, तो ऐसी पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू से ही अवैध मानी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुराने कानून के निरस्त होने के बाद उसके तहत नई अधिग्रहण कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।

जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि अधिसूचना पर लिखी तारीख का कोई कानूनी महत्व नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि उसका राजपत्र, समाचार पत्रों और स्थानीय स्तर पर कब प्रकाशन हुआ। इन सभी में सबसे अंतिम प्रकाशन की तारीख ही अधिसूचना के प्रकाशन की प्रभावी तारीख मानी जाएगी।

अदालत ने कहा, "अधिसूचना पर अंकित तारीख अप्रासंगिक है। महत्वपूर्ण उसकी वास्तविक प्रकाशन तिथि है और वही यह तय करेगी कि अधिग्रहण की कार्यवाही कब शुरू हुई।"

मामला लखनऊ के सरोजिनी नगर क्षेत्र स्थित गांव अहमामऊ की भूमि से जुड़ा है। याचिकाकर्ता कंपनी ने वर्ष 2007 में इस भूमि का एक हिस्सा पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से खरीदा था।

भूमि अधिग्रहण के लिए अधिसूचना पर 27 दिसंबर 2013 की तारीख दर्ज थी लेकिन उसका प्रकाशन 2 और 3 जनवरी 2014 को समाचार पत्रों में 4 जनवरी 2014 को राजपत्र में तथा 6 फरवरी 2014 को स्थानीय स्तर पर सार्वजनिक सूचना के रूप में किया गया। इसके बाद जनवरी 2015 में अधिग्रहण की घोषणा जारी की गई और जुलाई 2016 में अवार्ड पारित हुआ जिसे बाद में वर्ष 2022 में संशोधित किया गया।

याचिकाकर्ता का कहना था कि न तो उसकी भूमि का कब्जा लिया गया और न ही उसे मुआवजा दिया गया। साथ ही पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया ऐसे कानून के तहत चलाई गई, जो 1 जनवरी 2014 से निरस्त हो चुका था इसलिए पूरी कार्रवाई शुरू से ही शून्य है।

वहीं विकास प्राधिकरण ने दलील दी कि अधिसूचना पर 27 दिसंबर 2013 की तारीख होने के कारण अधिग्रहण की प्रक्रिया 1 जनवरी 2014 से पहले ही शुरू हो गई। हालांकि वह यह स्वीकार करने से इनकार नहीं कर सका कि अधिसूचना का वास्तविक प्रकाशन नए कानून के लागू होने के बाद हुआ।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया तभी शुरू मानी जाती है, जब अधिसूचना का विधि के अनुसार प्रकाशन किया जाए। केवल सरकारी स्तर पर लिया गया निर्णय या अधिसूचना पर अंकित तारीख पर्याप्त नहीं होती। जब तक उसका निर्धारित तरीके से प्रकाशन नहीं होता तब तक वह केवल कागजों पर लिया गया निर्णय भर है।

पीठ ने कहा कि 1 जनवरी 2014 से उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 लागू हो गया था, जिसके साथ ही वर्ष 1894 का भूमि अधिग्रहण कानून निरस्त हो गया। चूंकि इस मामले में अधिसूचना का पूरा प्रकाशन 1 जनवरी 2014 के बाद हुआ इसलिए पुराने कानून के तहत अधिग्रहण की कार्रवाई वैध रूप से शुरू ही नहीं हुई।

अदालत ने कहा, "यह वस्तुतः 1 जनवरी 2014 के बाद निरस्त हो चुके अधिनियम 1894 के तहत अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने का मामला है। इसलिए संबंधित अधिसूचनाएं और पूरी प्रक्रिया कानून की नजर में शुरू से ही शून्य और अवैध हैं।"

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वर्ष 2013 का कानून भूमि मालिकों को अधिक न्यायसंगत और उचित मुआवजा देने के उद्देश्य से बनाया गया। इसके बावजूद पुराने कानून के तहत कार्रवाई जारी रखकर अधिकारियों ने याचिकाकर्ता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया।

हालांकि अदालत ने सार्वजनिक हित को देखते हुए पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया रद्द नहीं की। अदालत ने कहा कि भूमि का अधिग्रहण सार्वजनिक सड़क निर्माण के लिए प्रस्तावित है और भूमि का हिस्सा भी छोटा है। इसलिए अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वर्ष 2013 के कानून के अनुसार, फैसले की तारीख पर प्रचलित बाजार दर के आधार पर नया मुआवजा निर्धारित किया जाए- हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक संशोधित मुआवजे का निर्धारण कर उसका भुगतान नहीं किया जाता तब तक संबंधित भूमि का कब्जा नहीं लिया जाएगा। साथ ही पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया।

ज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञज्ञ

प्रकरण का विवरण

प्रकरण: Lohia Developers (India) Pvt. Ltd. v. State of Uttar Pradesh & Others

न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ

रिट याचिका क्रमांक: Writ–C No. 2466 of 2023

निर्णय सुरक्षित: 27.05.2026

निर्णय दिनांक: 03.07.2026 (इस निर्णय की प्रमुख कानूनी रिपोर्ट 17 जुलाई 2026 को प्रकाशित हुई)। 

पीठ: न्यायमूर्ति राजन राय एवं न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला। 

वाद के तथ्य

भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 4 की अधिसूचना पर दिनांक 27.12.2013 अंकित थी।

किन्तु उसका राजपत्र (Official Gazette) में प्रकाशन 04.01.2014 को हुआ।

इस बीच 01.01.2014 से Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013 लागू हो चुका था तथा 1894 का अधिनियम निरस्त हो चुका था।

इसके बाद धारा 6 की घोषणा 23.01.2015 तथा पुरस्कार (Award) 13.07.2016 को पारित किया गया। 

विचारणीय प्रश्न

क्या 1894 के निरस्त अधिनियम के अंतर्गत ऐसी अधिसूचना, जिसका प्रकाशन 01.01.2014 के बाद हुआ, वैध मानी जा सकती है?

न्यायालय का निर्णय

उच्च न्यायालय ने कहा कि—

1. भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही धारा 4 की विधिवत प्रकाशित अधिसूचना से प्रारम्भ होती है।

2. केवल अधिसूचना पर पुरानी तिथि अंकित होने से कार्यवाही वैध नहीं हो जाती।

3. प्रकाशन (Publication) की तिथि ही निर्णायक है।

4. यदि अधिसूचना का प्रकाशन 01.01.2014 के बाद हुआ है, तो वह निरस्त अधिनियम के अंतर्गत जारी मानी जाएगी।

5. ऐसी सम्पूर्ण अधिग्रहण कार्यवाही Void ab initio (प्रारम्भ से ही शून्य) होगी। 

न्यायालय द्वारा अपनाए गए प्रमुख सिद्धांत

भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही धारा 4 की अधिसूचना से प्रारम्भ होती है।

प्रकाशन के बिना अधिसूचना प्रभावी नहीं होती।

निरस्त कानून के अंतर्गत बाद में प्रकाशित अधिसूचना कोई वैधानिक अधिकार उत्पन्न नहीं कर सकती।

सामान्य धाराएँ अधिनियम, 1897 की धारा 6 केवल उन्हीं कार्यवाहियों को बचाती है जो निरसन से पहले विधिसम्मत रूप से प्रारम्भ हो चुकी हों। 

सर्वोच्च न्यायालय के जिन निर्णयों पर भरोसा किया गया

Indrapuri Griha Nirman Sahkari Samiti Ltd. v. State of Rajasthan, (1975) 4 SCC 296

Laxman Lal v. State of Rajasthan, (2013) 3 SCC 764

V.K.M. Kattha Industries (P) Ltd. v. State of Haryana, (2013) 9 SCC 338

Khub Chand v. State of Rajasthan, AIR 1967 SC 1704 

वाद में उद्धृत करने योग्य निष्कर्ष

> "भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के निरस्त हो जाने के पश्चात यदि धारा 4 की अधिसूचना का प्रकाशन किया जाता है, तो केवल उस पर पूर्व की तिथि अंकित होने से अधिग्रहण कार्यवाही वैध नहीं हो जाती। ऐसी कार्यवाही प्रारम्भ से ही शून्य (Void ab initio) है।" 



Thursday, 9 July 2026

पुराने मालिक के नाम बिजली बिल और हाउस टैक्स जमा करने वाला प्रतिकूल कब्जे से मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता

पुराने मालिक के नाम बिजली बिल और हाउस टैक्स जमा करने वाला प्रतिकूल कब्जे से मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-07-09 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति पर प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) के आधार पर मालिकाना हक का दावा करता है, लेकिन उसी संपत्ति के बिजली बिल और हाउस टैक्स पुराने मालिक के नाम से जमा करता रहता है, तो यह उसके द्वारा पुराने मालिक के स्वामित्व को स्वीकार करना माना जाएगा। ऐसे में प्रतिकूल कब्जे के आधार पर स्वामित्व का दावा टिक नहीं सकता।

जस्टिस संदीप जैन ने यह टिप्पणी गाजियाबाद स्थित एक मकान पर प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) मांगने वाली अपील खारिज करते हुए की।

याचिकाकर्ता का दावा था कि वह वर्ष 1996 से मकान पर खुले, निरंतर और विरोधात्मक (Hostile) कब्जे में है। अपने दावे के समर्थन में उसने शस्त्र लाइसेंस, वाहन पंजीकरण, गैस कनेक्शन, टेलीफोन, बीमा पॉलिसी, मतदाता पहचान पत्र, आयकर रिकॉर्ड और कंपनी रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज प्रस्तुत किए, जिनमें विवादित मकान का पता दर्ज था।

हालांकि, अदालत ने पाया कि बिजली बिल और संपत्ति कर लगातार पूर्व मालिक कैप्टन विनोद कुमार के नाम पर ही जमा किए जा रहे थे। कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार भुगतान करना स्वयं पूर्व मालिक के स्वामित्व को स्वीकार करने के बराबर है, जिससे प्रतिकूल कब्जे का दावा स्वतः कमजोर हो जाता है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी सरकारी दस्तावेज में किसी संपत्ति का पता दर्ज होना उस व्यक्ति के स्वामित्व का प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि किरायेदार, लाइसेंसी या किसी रिश्तेदार के साथ रहने वाला व्यक्ति भी उसी पते का उपयोग कर ऐसे दस्तावेज प्राप्त कर सकता है।

अदालत ने आगे कहा कि प्रतिकूल कब्जे का दावा करने वाले व्यक्ति को यह साबित करना होता है कि वह संपत्ति पर कब, कैसे, किस आधार पर, खुले, निरंतर और वास्तविक मालिक के विरोध में 12 वर्ष से अधिक समय तक कब्जे में रहा, तथा इसकी जानकारी वास्तविक मालिक को भी थी। वर्तमान मामले में वादी इन आवश्यक तत्वों को साबित करने में असफल रहा।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी और कहा कि वादी का प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक का दावा कानूनन स्वीकार नहीं किया जा सकता।

Sunday, 5 July 2026

'बिना एविडेंस एक्ट की धारा 65B के सर्टिफिकेट और वॉइस सैंपल ऑथेंटिकेशन के रिश्वत मांगने की वॉइस रिकॉर्डिंग मान्य नहीं': छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट 2026-06-29 14

'बिना एविडेंस एक्ट की धारा 65B के सर्टिफिकेट और वॉइस सैंपल ऑथेंटिकेशन के रिश्वत मांगने की वॉइस रिकॉर्डिंग मान्य नहीं': छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट 2026-06-29 14

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत दोषी ठहराए गए दो सरकारी कर्मचारियों को बरी किया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष गैर-कानूनी तरीके से रिश्वत मांगने की बात को बिना किसी शक के साबित करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने पाया कि इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 65-B के तहत सर्टिफिकेट न होने और वॉइस सैंपल या FSL रिपोर्ट न होने की वजह से अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई रिकॉर्ड की गई बातचीत पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

जस्टिस रजनी दुबे स्पेशल जज (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) के फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई कर रही थीं। इस फैसले में अपीलकर्ताओं को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 13(1)(d) के साथ धारा 13(2) के तहत दोषी ठहराया गया। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि शिकायतकर्ता, जिसकी पत्नी की सैलरी छह महीने से रुकी हुई, उससे अपीलकर्ता नंबर 2 ने अपीलकर्ता नंबर 1 की ओर से सैलरी जारी करने के लिए 5,000 रुपये रिश्वत के तौर पर देने को कहा था। एंटी-करप्शन ब्यूरो के कहने पर शिकायतकर्ता ने आरोपियों के साथ बातचीत रिकॉर्ड की और 12.10.2010 को किए गए ट्रैप के दौरान, अपीलकर्ता नंबर 1 की जेब से रिश्वत के नोट बरामद किए गए।

जांच अधिकारी ने माना कि न तो आरोपियों और न ही शिकायतकर्ता के वॉइस सैंपल लिए गए, जबकि अभियोजन पक्ष के गवाहों ने भी माना कि रिकॉर्ड की गई बातचीत साफ नहीं है, क्योंकि उसमें कई लोगों की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। कोर्ट ने यह भी पाया कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के संबंध में इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 65-B के तहत कोई सर्टिफिकेट पेश नहीं किया गया।

कोर्ट ने कहा,

"इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 65-B के तहत सर्टिफिकेट न होने और किसी भी वॉइस सैंपल या FSL रिपोर्ट के न होने की स्थिति में, वॉइस रिकॉर्डिंग पर भरोसा नहीं किया जा सकता।"

कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराने के लिए रिश्वत मांगने का सबूत होना सबसे ज़रूरी है और सिर्फ रिश्वत के पैसे की बरामदगी काफी नहीं है।

कोर्ट ने 'रमेश शर्मा बनाम स्टेट' [CrL. Rev.P. 646/2004] मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें टेप-रिकॉर्ड की गई बातचीत को सबूत के तौर पर स्वीकार करने की शर्तों पर चर्चा की गई। इन शर्तों में बोलने वाले की आवाज़ की सही पहचान, रिकॉर्डिंग के सही होने का सबूत, उसमें कोई छेड़छाड़ न होने की पुष्टि और सबूत से जुड़ी ज़रूरतों का पालन शामिल था।

कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग को साबित करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने पाया कि आवाज़ की रिकॉर्डिंग की पहचान सिर्फ़ शिकायत करने वाले के बयान के आधार पर की गई, आवाज़ के कोई सैंपल नहीं लिए गए, बातचीत में शामिल बताए जा रहे किसी दूसरे व्यक्ति को न तो गवाह के तौर पर बुलाया गया और न ही उससे पूछताछ की गई, और वॉयस रिकॉर्डर के साथ छेड़छाड़ की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ज़ब्त किए जाने से पहले वह कई दिनों तक शिकायत करने वाले के पास ही रहा था।

इसके बाद कोर्ट ने अपील मंज़ूर की, 08.09.2017 के दोषी ठहराने और सज़ा सुनाने वाला फ़ैसला रद्द कर दिया। साथ ही दोनों अपीलकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

Case Title: Anil Markende & Anr. v. State of Chhattisgarh [CRA No. 1423 of 2017].

व्यक्तिगत आयकर से अचल संपत्ति के हस्तांतरण को कब छूट मिलती है

व्यक्तिगत आयकर से अचल संपत्ति के हस्तांतरण को कब छूट मिलती है?

व्यक्तिगत आयकर कानून के कार्यान्वयन संबंधी दिशानिर्देश जारी करते हुए, सरकार ने अध्यादेश 253 जारी किया है, जिसमें अचल संपत्ति के हस्तांतरण, विरासत और उपहार से प्राप्त आय पर कर छूट का प्रावधान है। यह अध्यादेश 1 जुलाई, 2026 से प्रभावी होगा। 03/07/2026


अध्यादेश 253 में यह प्रावधान है कि परिवार के सदस्यों के बीच अचल संपत्ति (जिसमें अचल संपत्ति व्यवसाय संबंधी कानून द्वारा विनियमित मकान और निर्माणाधीन निर्माण परियोजनाएं शामिल हैं) के हस्तांतरण, विरासत या उपहार से होने वाली आय पर व्यक्तिगत आयकर से छूट दी गई है।


अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर व्यक्तिगत आयकर से छूट कब मिलती है? - चित्र 1.

एक सरकारी अध्यादेश में कई ऐसे मामलों का उल्लेख किया गया है जिनमें अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर व्यक्तिगत आयकर से छूट दी जाएगी, जो 1 जुलाई, 2026 से प्रभावी होगा।


विशेष रूप से, इसमें पति-पत्नी के बीच संबंध; जैविक माता-पिता और उनके बच्चे; दत्तक माता-पिता और उनके दत्तक बच्चे; ससुर और सास और बहू (पति की मृत्यु के बाद भी); ससुर और सास और दामाद (पत्नी की मृत्यु के बाद भी); दादा-दादी और नाना-नानी और नाती-पोते; नाना-नानी और नाती-पोते; और भाई-बहन शामिल हैं।


यदि तलाक के बाद आपसी सहमति या अदालत के फैसले से अचल संपत्ति (जिसमें अचल संपत्ति व्यापार कानूनों द्वारा परिभाषित मकान और भावी निर्माण परियोजनाएं शामिल हैं) का बंटवारा होता है, तो इस बंटवारे से होने वाली आय कर मुक्त होती है। कर छूट की प्रक्रिया और दस्तावेजीकरण कर प्रशासन कानूनों के अनुसार किए जाएंगे।


स्वामित्व हस्तांतरित करने वाले व्यक्ति के पास केवल एक घर और एक भूमि उपयोग का अधिकार होता है।

इस अध्यादेश में यह भी प्रावधान है कि व्यक्तियों द्वारा घरों, भूमि उपयोग अधिकारों और भूमि से जुड़ी संपत्तियों के हस्तांतरण से होने वाली आय पर व्यक्तिगत आयकर से छूट दी गई है, बशर्ते हस्तांतरणकर्ता के पास वियतनाम में केवल एक घर या भूमि उपयोग अधिकार हो।


यह कर छूट उन मकानों या निर्माण परियोजनाओं के हस्तांतरण पर लागू नहीं होती जो अभी भी निर्माणाधीन हैं।


कर छूट के पात्र व्यक्तियों को निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना होगा:


हस्तांतरण के समय व्यक्ति के पास केवल एक ही मकान होना चाहिए या एक ही भूखंड पर उपयोग का अधिकार होना चाहिए (जिसमें मकान या निर्माण शामिल हैं)। यदि हस्तांतरण के समय व्यक्ति भविष्य में अतिरिक्त मकान या निर्माण प्राप्त कर लेता है, तो यह हस्तांतरण व्यक्ति के एकमात्र मकान या भूमि उपयोग अधिकार के रूप में नहीं माना जाएगा।


संयुक्त स्वामित्व वाले आवास या संयुक्त रूप से उपयोग की जाने वाली भूमि (जिसमें पति-पत्नी का संयुक्त स्वामित्व वाला आवास या भूमि शामिल है) के हस्तांतरण के मामलों में, केवल वे व्यक्ति कर से मुक्त होते हैं जिनके पास कहीं और आवास या भूमि का स्वामित्व नहीं होता है; वे व्यक्ति जो संयुक्त रूप से आवास या भूमि के मालिक हैं और अन्य आवास या भूमि के भी मालिक हैं, कर से मुक्त नहीं होते हैं।


संपत्ति के हस्तांतरण के समय मकान का स्वामित्व और भूमि के उपयोग का अधिकार कम से कम 183 दिनों से धारित होना चाहिए।


आवास और भूमि उपयोग अधिकारों के स्वामित्व का निर्धारण करने की तिथि, भूमि उपयोग अधिकार, आवास और भूमि से जुड़ी अन्य संपत्तियों के स्वामित्व का प्रमाण पत्र जारी होने की तिथि होती है। हालांकि, भूमि कानून विनियमों के अनुसार पुनः जारी करने या प्रतिस्थापन के मामलों में, आवास और भूमि उपयोग अधिकारों के स्वामित्व का निर्धारण करने की तिथि, पुनः जारी करने या प्रतिस्थापन से पहले जारी किए गए भूमि उपयोग अधिकार, आवास और भूमि से जुड़ी अन्य संपत्तियों के स्वामित्व का प्रमाण पत्र की तिथि से गिनी जाती है।

संपूर्ण मकान और भूमि उपयोग अधिकारों का हस्तांतरण। यदि किसी व्यक्ति के पास मकान और भूमि उपयोग अधिकारों का एकमात्र या संयुक्त स्वामित्व है, लेकिन वह केवल एक हिस्सा हस्तांतरित करता है, तो हस्तांतरित हिस्से पर कर छूट लागू नहीं होती है।


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व्यक्ति द्वारा स्वयं घोषित जानकारी और अचल संपत्ति के हस्तांतरण की जिम्मेदारी के आधार पर आवास और एकमात्र भूमि उपयोग अधिकार कर से मुक्त हैं। यदि गलत घोषणाएँ पाई जाती हैं, तो कर प्रबंधन कानूनों और अन्य संबंधित कानूनों के अनुसार व्यक्ति से कर वसूली और जुर्माना वसूला जाएगा।

Friday, 3 July 2026

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Motor Accident Claims | सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित की आय का आकलन करने के लिए ITR के इस्तेमाल पर नियम तय किए : 2026-07-02 

मोटर दुर्घटना मुआवज़े के दावों के लिए मृतक की सालाना आय की गणना के तरीके में एकरूपता लाने के मकसद से सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवज़े के मामलों में पीड़ितों की सालाना आय का आकलन करने के लिए विस्तृत गाइडलाइंस तय कीं। इसमें सैलरी पाने वाले कर्मचारियों और खुद का काम करने वाले (सेल्फ-एम्प्लॉयड) लोगों के बीच स्पष्ट अंतर किया गया।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि सैलरी पाने वाले व्यक्तियों के मामले में आम तौर पर ठीक पिछले असेसमेंट ईयर के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) पर विचार किया जाना चाहिए। वहीं, खुद का काम करने वाले लोगों या कारोबारियों के मामले में, ट्रिब्यूनल को आम तौर पर पिछले तीन सालों के ITR में दिखाई गई औसत आय को आधार बनाना चाहिए, हालांकि हर मामले की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाएगा।

कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि जिन मामलों में इनकम टैक्स रिटर्न उपलब्ध हैं, उनमें मृतक व्यक्ति की सालाना आय तय करने का तरीका क्या हो।

चूंकि सैलरी पाने वाले और खुद का काम करने वाले व्यक्तियों के लिए एक ही तरीका नहीं अपनाया जा सकता, इसलिए कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट जे.आर. मिधा और एडवोकेट सलिल पॉल के सुझाव को माना। इन दोनों को इस मामले में 'एमिकस क्यूरी' (न्यायालय मित्र) नियुक्त किया गया था और उन्होंने सैलरी पाने वाले कर्मचारियों और खुद का काम करने वाले लोगों के लिए अलग-अलग तरीके अपनाने का सुझाव दिया।

सैलरी पाने वाले कर्मचारियों के बारे में कोर्ट ने कहा कि लेटेस्ट ITR में आम तौर पर प्रमोशन, इंक्रीमेंट और दुर्घटना से ठीक पहले मिल रही सैलरी की जानकारी होती है। इसलिए ठीक पिछले असेसमेंट ईयर का ITR आम तौर पर कमाई की क्षमता की सबसे सही तस्वीर पेश करेगा।

कोर्ट ने कहा,

"सालाना आय का आकलन करते समय सैलरी पाने वाले व्यक्तियों और खुद का काम करने वाले व्यक्तियों के बीच अंतर किया जाना चाहिए। हमारी राय में सैलरी पाने वाले व्यक्तियों के लिए, सैलरी से होने वाली सालाना आय को दिखाने के लिए केवल पिछले साल का ITR ही काफी होगा। केवल पिछले साल पर विचार करने का कारण यह है कि प्रमोशन का आर्थिक असर काफी होता है और यह केवल उसी साल के ITR में दिख सकता है। ऐसी स्थिति भी हो सकती है कि मृतक/दावेदार ने दुर्घटना से पहले प्रमोशन वाली पोस्ट पर एक साल पूरा न किया हो या उस अवधि के लिए ITR फाइल न किया हो। ऐसे मामलों में संबंधित कोर्ट प्रमोशन लेटर और दूसरे सहायक फाइनेंशियल स्टेटमेंट का सहारा ले सकता है।" हालांकि, कोर्ट ने कहा कि ऐसा तरीका उन लोगों के लिए सही नहीं हो सकता जो अपना काम (सेल्फ-एम्प्लॉयड) करते हैं, क्योंकि उनकी आय अक्सर मार्केट की स्थितियों, बिज़नेस साइकल और इन्वेस्टमेंट के तरीकों की वजह से घटती-बढ़ती रहती है।

कोर्ट ने कहा,

"जब बात सेल्फ-एम्प्लॉयड लोगों या अपना बिज़नेस करने वाले व्यक्तियों की आती है तो हमारी राय में उनके बिज़नेस से होने वाली सालाना आय का आकलन करने के लिए पिछले तीन सालों तक के ITR में बताई गई आय का औसत आधार (रेफरेंस पॉइंट) माना जाना चाहिए।"

इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी बताया कि आय की गणना करते समय आस-पास की अन्य परिस्थितियों पर भी विचार किया जा सकता है।

"ऐसी स्थिति भी हो सकती है जब केवल एक या दो ITR ही फाइल किए गए हों। ऐसी स्थितियों और इन पेशों में आय में उतार-चढ़ाव को देखते हुए, आस-पास की परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

इनमें ये शामिल होंगे:

a) बिज़नेस का स्वरूप (भौगोलिक स्थिति, श्रेणी आदि सहित)।

b) बिज़नेस के बढ़ने का तरीका और बिज़नेस पर मौत का असर।

c) बिज़नेस के बढ़ने की संभावना (उदाहरण के लिए, कुछ बिज़नेस शुरुआत में ज़्यादा पूंजी वाले होते हैं और बड़े पैमाने पर/भविष्य में फायदेमंद होते हैं)।

d) नेगेटिव आय (कुछ बिज़नेस में शुरुआती सालों में नुकसान हो सकता है, जो सही आर्थिक स्थिति को नहीं दिखाता है)।

e) बिज़नेस से जुड़ा कोई अन्य संबंधित कारक।"

Cause Title: RASHMIREKHA TRIPATHY AND ANR. VERSUS THE BRANCH MANAGER (LEGAL CLAIMS), SRIRAM GENERAL INSURANCE COMPANY LIMITED AND ORS.

Sunday, 28 June 2026

मामूली गवाही विरोधाभास से पंजीकृत बिक्री विलेख की वैधता पर संदेह नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

मामूली गवाही विरोधाभास से पंजीकृत बिक्री विलेख की वैधता पर संदेह नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट 25 June 2026 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पंजीकृत बिक्री विलेख (Sale Deed) को कानूनन वैधता और प्रामाणिकता का मजबूत अनुमान प्राप्त होता है। ऐसे में सत्यापनकर्ता (Attesting Witness) के बयान में मामूली विरोधाभास मात्र से विलेख के निष्पादन पर संदेह नहीं किया जा सकता। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने हरिद्वार की कृषि भूमि से जुड़े एक विवाद में यह टिप्पणी की। समेकन अधिकारियों और हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं के स्वामित्व दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि बिक्री विलेख के एक गवाह के विवरण में विसंगति है। 

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिक्री विलेख की वैधता सत्यापन पर निर्भर नहीं करती। वसीयत या उपहार विलेख के विपरीत, बिक्री विलेख के लिए सत्यापन वैधानिक आवश्यकता नहीं है। इसलिए गवाह के विवरण में मामूली अंतर के आधार पर पंजीकृत दस्तावेज को संदिग्ध नहीं माना जा सकता। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि 1957 में निष्पादित बिक्री विलेख पर बाद के संशोधनों को लागू नहीं किया जा सकता। साथ ही, जब तक किसी सक्षम सिविल अदालत द्वारा दस्तावेज निरस्त न किया जाए, समेकन अधिकारी केवल इस आधार पर उसे नजरअंदाज नहीं कर सकते कि वह कथित रूप से अवैध है। मामले में जालसाजी, धोखाधड़ी या दबाव का कोई आरोप नहीं था। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के आदेश रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली और अपीलकर्ताओं के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने का निर्देश दिया।