Sunday, 1 February 2026

अग्रिम जमानत हेतु सेशन कोर्ट जाना अनिवार्य नहीं — सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

*अग्रिम जमानत हेतु सेशन कोर्ट जाना अनिवार्य नहीं — सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय*


सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने Manjeet Singh vs. State of Uttar Pradesh (Criminal Appeal No. ___/2025, @SLP (Crl.) No. 11667/2025) में यह स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत (धारा 482, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023) के लिए पहले सेशन कोर्ट में आवेदन करना कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में लचीलापन और न्याय तक त्वरित पहुँच को सुनिश्चित करता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट और सेशन कोर्ट — दोनों के पास समान अधिकार क्षेत्र है, और "विशेष परिस्थितियों" में आवेदक सीधे हाईकोर्ट में जा सकता है।


अग्रिम जमानत भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है, जिसका उद्देश्य अभियुक्त को गिरफ्तारी से पूर्व ही संरक्षण देना है। परंपरागत रूप से, कई हाईकोर्टों में यह धारणा रही कि पहले सेशन कोर्ट में आवेदन करना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने इस अनिवार्यता को अस्वीकार कर दिया है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक सुगम हो गई है।


2. केस विवरण (Case Details)


न्यायालय: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया


क्षेत्राधिकार: Criminal Appellate Jurisdiction


क्रिमिनल अपील संख्या: Criminal Appeal No. ___ / 2025 (@SLP (Crl.) No. 11667/2025)


मामला: Manjeet Singh vs. State of Uttar Pradesh


संबद्ध अपील: Criminal Appeal No. ___ / 2025 (@SLP (Crl.) No. 11679/2025)


पीठ: न्यायमूर्ति संजय कुमार एवं न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया


निर्णय की तिथि: 8 अगस्त 2025


3. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (Supreme Court’s Ruling)


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:


> "हाईकोर्ट और सेशन कोर्ट, दोनों के पास अग्रिम जमानत देने का समान अधिकार है। आवेदक सीधे हाईकोर्ट जा सकता है, यदि परिस्थितियाँ ऐसा करने को उचित ठहराती हैं।"


4. उद्धृत पूर्व निर्णय (Cited Precedents)


1. Kanumuri Raghurama Krishnam Raju vs. State of A.P., (2021) 13 SCC 822


2. Arvind Kejriwal vs. Directorate of Enforcement, 2024 INSC 512


5. विधिक महत्व (Legal Significance)


प्रक्रियात्मक लचीलापन: अब अभियुक्त को सेशन कोर्ट में पहले जाने का बंधन नहीं है।


न्याय तक त्वरित पहुँच: समय-संवेदनशील मामलों में सीधे हाईकोर्ट से राहत मिल सकती है।


न्यायिक विवेकाधिकार: प्रत्येक मामले में “विशेष परिस्थितियों” का आकलन न्यायालय करेगा


6. निष्कर्ष (Conclusion)


यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण सुधार है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है और न्यायिक पहुँच को आसान बनाता है। यह अधिवक्ताओं और अभियुक्तों दोनों के लिए एक रणनीतिक विकल्प उपलब्ध कराता है।

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संदर्भ सूची (References)


1. Supreme Court of India, Manjeet Singh vs. State of Uttar Pradesh, Criminal Appeal No. ___/2025, @SLP (Crl.) No. 11667/2025, निर्णय दिनांक 08.08.2025.


2. Kanumuri Raghurama Krishnam Raju vs. State of A.P., (2021) 13 SCC 822.


3. Arvind Kejriwal vs. Directorate of Enforcement, 2024 INSC 512.

Friday, 16 January 2026

मुफ्त पीने का पानी न देने पर रेस्टोरेंट दोषी: फरीदाबाद जिला उपभोक्ता आयोग 16 Jan 2026

मुफ्त पीने का पानी न देने पर रेस्टोरेंट दोषी: फरीदाबाद जिला उपभोक्ता आयोग  16 Jan 2026 

फरीदाबाद जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, जिसकी पीठ में अमित अरोड़ा (अध्यक्ष) और इंदिरा भड़ाना (सदस्य) शामिल थीं, ने एक रेस्टोरेंट के खिलाफ उपभोक्ता शिकायत स्वीकार करते हुए कहा है कि ग्राहक को मुफ्त पीने का पानी न देकर बोतलबंद पानी खरीदने के लिए मजबूर करना सेवा में कमी है। यह फैसला आकाश शर्मा बनाम एम/एस गार्डन ग्रिल्स 2.0 मामले में दिया गया। पुरा मामला शिकायतकर्ता आकाश शर्मा 18 जून 2025 को अपने दोस्तों के साथ फरीदाबाद स्थित एम/एस गार्डन ग्रिल्स 2.0 रेस्टोरेंट में डिनर के लिए गया। भोजन के दौरान जब उसने पीने का पानी मांगा, तो रेस्टोरेंट स्टाफ ने मुफ्त पीने का पानी देने से इनकार कर दिया और कहा कि ग्राहकों के लिए केवल बोतलबंद पानी ही उपलब्ध है, जिसे खरीदना होगा। 

 शिकायतकर्ता ने इसका विरोध करते हुए स्टाफ और मैनेजर को बताया कि ग्राहकों को बोतलबंद पानी खरीदने के लिए मजबूर करना अवैध है और नियमों के खिलाफ है, लेकिन रेस्टोरेंट प्रबंधन अपने रुख पर अड़ा रहा। मजबूरी में शिकायतकर्ता को “डसानी” ब्रांड की दो बोतलें ₹40 में खरीदनी पड़ीं। इसके बाद शिकायतकर्ता ने सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप लगाते हुए जिला उपभोक्ता आयोग का रुख किया और राशि की वापसी, मानसिक उत्पीड़न के लिए मुआवजा तथा इस प्रथा को बंद करने के निर्देश देने की मांग की। 

रेस्टोरेंट की अनुपस्थिति नोटिस की विधिवत सेवा के बावजूद रेस्टोरेंट आयोग के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ, जिसके चलते उसे एकतरफा (ex parte) कार्यवाही में शामिल किया गया। आयोग की टिप्पणियां और फैसला आयोग ने कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत शपथपत्र, बोतलबंद पानी का बिल और नोटिस की सेवा के प्रमाण बिना किसी प्रतिवाद के रिकॉर्ड पर हैं। चूंकि विपक्षी पक्ष ने न तो उपस्थित होकर आरोपों का खंडन किया और न ही कोई साक्ष्य प्रस्तुत किया, इसलिए शिकायतकर्ता के आरोप अप्रतिवादित रहे। 

 आयोग ने यह स्पष्ट रूप से माना कि: ग्राहकों को मुफ्त पीने का पानी देने के बजाय बोतलबंद पानी खरीदने के लिए मजबूर करना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत सेवा में कमी है। आदेश शिकायत स्वीकार करते हुए, जिला उपभोक्ता आयोग ने रेस्टोरेंट को निर्देश दिया कि वह: शिकायतकर्ता से वसूले गए ₹40 की राशि वापस करे, और मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न के लिए ₹3,000 का मुआवजा अदा करे। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि वाद व्यय (litigation cost) नहीं दिया गया, क्योंकि शिकायतकर्ता ने स्वयं मामले की पैरवी की थी।


https://hindi.livelaw.in/consumer-cases/district-consumer-commission-faridabad-drinking-water-in-restaurant-519303

Thursday, 15 January 2026

टाइटल सूट में ट्रायल कोर्ट, कब्ज़ा वापस दिलाने की राहत दिए बिना स्थायी रोक का आदेश नहीं दे सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट 2026-01-15

टाइटल सूट में ट्रायल कोर्ट, कब्ज़ा वापस दिलाने की राहत दिए बिना स्थायी रोक का आदेश नहीं दे सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट 2026-01-15 

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बुधवार (14 जनवरी) को एक टाइटल सूट में ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने वादी को कब्ज़ा वापस दिलाने की राहत दिए बिना ही स्थायी रोक का आदेश देकर गलती की, जबकि कोर्ट ने यह माना था कि प्रतिवादी ने ज़मीन पर कब्ज़ा किया।

जस्टिस विवेक जैन की बेंच ने कहा,

"कोर्ट पहले ही इस नतीजे पर पहुंच चुका था कि प्रतिवादी ने ज़मीन पर कब्ज़ा किया और फैसले में यह भी लिखा कि प्रतिवादी को ज़मीन का खाली कब्ज़ा वादी को सौंपना होगा, लेकिन हैरानी की बात है कि आदेश में कब्ज़ा वापस दिलाने की राहत का ज़िक्र किए बिना ट्रायल कोर्ट ने सिर्फ़ स्थायी रोक का आदेश दिया, जबकि स्थायी रोक का आदेश कब्ज़ा वापस दिलाने के बाद दिया जाना चाहिए। आदेश में साफ़ तौर पर गलती है, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने आदेश में कब्ज़ा वापस दिलाने का ज़िक्र नहीं किया, जबकि फैसले में ट्रायल कोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा कि प्रतिवादी ने ज़मीन पर कब्ज़ा किया और वादी कब्ज़ा वापस दिलाने के आदेश का हकदार है।"

याचिकाकर्ता-वादी ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए एक रिव्यू याचिका दायर की, जिसमें कोर्ट ने आदेश को अंतिम रूप दिया और बाद में उस पर हस्ताक्षर किए, जबकि वादी की धारा 152 CPC के तहत आदेश में संशोधन की अर्ज़ी खारिज कर दी थी।

वादी के अनुसार, उसने टाइटल की घोषणा और कब्ज़ा वापस दिलाने के लिए मुकदमा दायर किया, जिसमें स्थायी रोक की मांग की गई। ट्रायल कोर्ट ने छह मुद्दे तय किए, जिसमें मुद्दा 2 प्रतिवादी द्वारा ज़मीन पर कब्ज़े से संबंधित था। इसके बाद का मुद्दा यह था कि क्या याचिकाकर्ता कब्ज़ा वापस दिलाने की राहत का हकदार था।

बेंच ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले के मुख्य हिस्से में कहा गया कि प्रतिवादी-प्रतिवादियों ने ज़मीन पर कब्ज़ा किया था और याचिकाकर्ता उसे वापस पाने का हकदार था।

हालांकि, जब आदेश का मसौदा पेश किया गया तो ट्रायल कोर्ट ने कब्ज़ा वापस दिलाने के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया। ट्रायल कोर्ट ने विवादित ज़मीन के संबंध में स्थायी रोक का आदेश दिया, जबकि यह निष्कर्ष निकाला था कि प्रतिवादी ने ज़मीन पर कब्ज़ा किया।

बेंच ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को फैसले में यह दर्ज करना चाहिए कि प्रतिवादी को ज़मीन का खाली कब्ज़ा वादी को सौंपना होगा। हालांकि, "हैरानी की बात है", ट्रायल कोर्ट ने कब्ज़ा वापस दिलाने की राहत के लिए आदेश का ज़िक्र किए बिना सिर्फ़ स्थायी रोक का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी देखा कि ट्रायल कोर्ट ने CPC की धारा 152 के तहत उक्त डिक्री के संबंध में वादी की आपत्तियों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वे सुनवाई योग्य नहीं हैं।

बेंच ने कहा:

"इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि एक बार जब डिक्री पर अंतिम रूप से हस्ताक्षर नहीं किए गए तो क्या धारा 152 के तहत आपत्तियां सुनवाई योग्य थीं या नहीं, लेकिन एक बार जब ट्रायल कोर्ट को यह बताया गया कि फैसले में यह लिखे होने के बावजूद कि याचिकाकर्ता कब्जे की रिकवरी का हकदार है तो डिक्री में कब्जे की रिकवरी का जिक्र नहीं किया गया तो ट्रायल कोर्ट को इस विसंगति पर ध्यान देना चाहिए और ट्रायल कोर्ट के लिए यह ज़रूरी नहीं था कि वह यह कहते हुए कि CPC की धारा 152 लागू नहीं होती, यांत्रिक रूप से डिक्री पर हस्ताक्षर कर दे।"

चूंकि डिक्री पर हस्ताक्षर हो गए, इसलिए बेंच ने कहा कि CPC की धारा 152 के तहत आपत्तियां सुनवाई योग्य थीं। इसलिए ट्रायल कोर्ट को 30 दिनों के भीतर CPC की धारा 152 के तहत एक विशेष आदेश पारित करने का निर्देश दिया गया। ट्रायल कोर्ट को यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया कि डिक्री फैसले के अनुसार हो।


Case Title: Mahendra Prasad Tiwari v Smt Chinti Yadav [CR-1364-2025]

Wednesday, 14 January 2026

ससुर की मृत्यु के बाद विधवा बहू भी उसकी संपत्ति से भरण-पोषण की हकदार : सुप्रीम कोर्ट 14 Jan 2026

ससुर की मृत्यु के बाद विधवा बहू भी उसकी संपत्ति से भरण-पोषण की हकदार : सुप्रीम कोर्ट  14 Jan 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि जो बहू अपने ससुर की मृत्यु के बाद विधवा होती है, वह भी अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण पाने की अधिकारी है। यह अधिकार हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत मिलता है। जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस. वी. एन. भट्टी की खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 21(vii) में प्रयुक्त शब्द “पुत्र की कोई भी विधवा” (any widow of his son) बिल्कुल स्पष्ट है और इसमें यह शर्त नहीं है कि पुत्र की मृत्यु ससुर से पहले हुई हो। इसलिए यह तय करना कि पुत्र कब मरा — ससुर से पहले या बाद में — भरण-पोषण के अधिकार के लिए अप्रासंगिक है। 

 मामले की पृष्ठभूमि डॉ. महेन्द्र प्रसाद का निधन दिसंबर 2021 में हुआ। उनकी बहू गीता शर्मा के पति (डॉ. प्रसाद के पुत्र) की मृत्यु मार्च 2023 में हुई। पति की मृत्यु के बाद गीता शर्मा ने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की मांग की। फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी थी कि जब ससुर की मृत्यु हुई थी तब वह विधवा नहीं थीं। हालांकि, हाई कोर्ट ने यह फैसला पलटते हुए कहा कि गीता शर्मा कानून के तहत “निर्भर” (dependent) हैं और उन्हें भरण-पोषण का अधिकार है। 

राज्यों को नियम बनाने का निर्देश दिया अन्य पारिवारिक सदस्यों ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणी अदालत ने यह कानूनी प्रश्न तय किया: “क्या वह बहू, जो अपने ससुर की मृत्यु के बाद विधवा बनी, ससुर की संपत्ति पर निर्भर मानी जाएगी और उससे भरण-पोषण मांग सकती है?” कोर्ट ने कहा कि धारा 21(vii) में “पुत्र की कोई भी विधवा” कहा गया है, न कि “पूर्व-मृत पुत्र की विधवा”। इसलिए अदालत इसमें अतिरिक्त शब्द जोड़ नहीं सकती। 

 “विधायिका ने जानबूझकर 'पूर्व-मृत' शब्द का प्रयोग नहीं किया है ताकि पुत्र की कोई भी विधवा इस दायरे में आ सके। पुत्र की मृत्यु का समय अप्रासंगिक है।” अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि बहुओं को इस आधार पर अलग-अलग वर्गों में बांटा जाए कि उनके पति ससुर से पहले मरे या बाद में, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन होगा। साथ ही, ऐसी व्याख्या अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीवन का अधिकार) का भी हनन करेगी, क्योंकि इससे विधवा महिला को दरिद्रता और सामाजिक असुरक्षा में धकेला जा सकता है। 

“केवल पति की मृत्यु के समय के आधार पर विधवाओं के बीच भेदभाव करना मनमाना है और इसका अधिनियम के उद्देश्य से कोई तर्कसंगत संबंध नहीं है।” अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि गीता शर्मा की भरण-पोषण याचिका पूरी तरह से वैध है और फैमिली कोर्ट को अब इसकी राशि तय करनी होगी। “मृत हिंदू के पुत्र की कोई भी विधवा, धारा 21(vii) के तहत आश्रित है और धारा 22 के अंतर्गत भरण-पोषण की हकदार है।” इस प्रकार सभी अपीलें खारिज कर दी गईं।


https://hindi.livelaw.in/category/news-updates/supreme-court-hindu-adoptions-and-maintenance-act-518781

नामांकित व्यक्ति (Nominee) को जीपीएफ राशि पाने के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट

नामांकित व्यक्ति (Nominee) को जीपीएफ राशि पाने के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट 14 Jan 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी ने अपने General Provident Fund (GPF) खाते में किसी व्यक्ति को वैध रूप से नामांकित (nominee) किया है, तो उस नामांकित व्यक्ति को पूरी राशि पाने के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र (Succession Certificate), प्रोबेट या लेटर ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन की आवश्यकता नहीं होगी — भले ही राशि ₹5,000 से अधिक क्यों न हो। जस्टिस मनोज मिश्र और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला दिया। 

 कोर्ट ने क्या कहा? सुप्रीम कोर्ट ने कहा: “जहाँ वैध नामांकन मौजूद है, वहाँ मृत कर्मचारी के भविष्य निधि खाते की राशि सीधे नामांकित व्यक्ति को दी जानी चाहिए।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि हर मामले में नामांकित व्यक्ति से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र माँगा जाएगा, तो नामांकन की पूरी व्यवस्था ही अर्थहीन हो जाएगी (otiose)। ₹5,000 की सीमा अब अप्रासंगिक Provident Funds Act, 1925 के तहत यदि राशि ₹5,000 से अधिक हो, तो उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की आवश्यकता होती है। लेकिन कोर्ट ने कहा कि:  वर्ष 1925 में ₹5,000 एक बड़ी राशि थी, लेकिन आज महँगाई के कारण इसका कोई महत्व नहीं रह गया है। इसी वजह से सरकार ने स्वयं General Provident Fund (Central Services) Rules, 1960 के Rule 33(ii) में यह प्रावधान किया कि — नामांकित व्यक्ति को राशि किसी भी रकम तक बिना किसी प्रमाणपत्र के दी जाएगी। नामांकित व्यक्ति मालिक नहीं, ट्रस्टी होता है कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि: नामांकित व्यक्ति (Nominee) राशि का अंतिम मालिक नहीं, बल्कि केवल ट्रस्टी (Trustee) होता है। 

 यदि कोई अन्य वैध वारिस अदालत में दावा करता है, तो वह अपने हिस्से के लिए मुकदमा कर सकता है। अर्थात — सरकार पैसा nominee को दे देगी, लेकिन वारिस आपस में अपना हक अदालत में तय कर सकते हैं। मामले की पृष्ठभूमि एक सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके GPF खाते की राशि उसके भाई परेश चंद्र मंडल को देनी थी, क्योंकि वह नामांकित व्यक्ति था। कुछ भतीजों ने इस पर आपत्ति जताई। Central Administrative Tribunal और बाद में Calcutta High Court ने आदेश दिया कि: Also Read - Order XXI Rule 102 CPC | मुकदमे के दौरान संपत्ति खरीदने वाले को डिक्री के एग्जीक्यूशन में रुकावट डालने का कोई अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट चूँकि भाई वैध nominee है, इसलिए राशि उसे ही दी जाए। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह कहते हुए चुनौती दी कि चूँकि रकम ₹5,000 से अधिक है, इसलिए succession certificate जरूरी है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। 

सरकार को निजी विवादों में नहीं पड़ना चाहिए कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि: सरकार को मृत कर्मचारी की संपत्ति को लेकर चलने वाले पारिवारिक विवादों में नहीं उलझना चाहिए। नामांकन होने पर पैसा nominee को देना चाहिए और बाकी विवाद निजी पक्षों पर छोड़ देना चाहिए।


https://hindi.livelaw.in/category/news-updates/supreme-court-general-provident-fund-gpf-nominee-518783

Tuesday, 13 January 2026

मुकदमे के दौरान संपत्ति खरीदने वाले को डिक्री के एग्जीक्यूशन में रुकावट डालने का कोई अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Order XXI Rule 102 CPC | मुकदमे के दौरान संपत्ति खरीदने वाले को डिक्री के एग्जीक्यूशन में रुकावट डालने का कोई अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फिर से कहा कि जो खरीदार मुकदमे के दौरान संपत्ति खरीदता है, यानी ट्रांसफर पेंडेंटे लाइट के तौर पर उसे डिक्री के एग्जीक्यूशन में रुकावट डालने का कोई अधिकार नहीं है और वह कार्यवाही के नतीजे से बंधा रहता है, और ट्रांसफर को सख्ती से डिक्री के अधीन माना जाएगा।

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा, जिसमें एक ट्रांसफर पेंडेंटे लाइट द्वारा दायर अपील खारिज कर दी गई थी। उसने सिविल प्रोसीजर कोड (CPC) के ऑर्डर XXI नियम 97 के तहत स्पेसिफिक परफॉर्मेंस के लिए एक डिक्री के एग्जीक्यूशन पर अपनी आपत्तियों को खारिज किए जाने को चुनौती दी थी।

कोर्ट ने कहा कि मुकदमे के दौरान किया गया ट्रांसफर ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 52 के तहत आता है और मुकदमे के नतीजे के अधीन रहता है। चूंकि अपीलकर्ता ने स्पेसिफिक परफॉर्मेंस सूट के दौरान संपत्ति खरीदी थी, इसलिए खरीदार के पक्ष में डिक्री प्रभावी रही, जिससे अपीलकर्ता के पास संपत्ति पर कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं रहा और न ही ऑर्डर XXI नियम 102 CPC के तहत विशेष रोक के कारण डिक्री के एग्जीक्यूशन का विरोध करने का अधिकार रहा। (देखें ताहिर वी. इसानी बनाम मदन वामन चोडंकर)

कोर्ट ने कहा,

“मान लीजिए कि इस मामले में मुकदमे वाली संपत्ति का ट्रांसफर पेंडेंटे लाइट है। इसलिए, ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 52 में शामिल लिस पेंडेंस का सिद्धांत पूरी तरह से लागू होता है। सभी अदालतों ने यह स्पष्ट तथ्य पाया है कि अपीलकर्ताओं को मुकदमे के लंबित होने की पूरी जानकारी थी। हालांकि, यह भी जरूरी नहीं है। जैसा कि इस कोर्ट ने सिल्वरलाइन मामले में कहा है, फैसले का दायरा केवल इस सवाल तक सीमित है कि क्या एग्जीक्यूशन का विरोध करने वाला आपत्ति करने वाला ट्रांसफर पेंडेंटे लाइट है या नहीं और यदि फैसला सकारात्मक है, तो ऐसे ट्रांसफर करने वाले को विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है।”

मामला

यह विवाद 1973 के बिक्री समझौते से जुड़ा है। विक्रेता की डिफ़ॉल्ट के बाद 1986 में प्रतिवादी नंबर 1-मूल खरीदार द्वारा स्पेसिफिक परफॉर्मेंस के लिए एक मुकदमा दायर किया गया, जिसका फैसला 1990 में हुआ। मुकदमे के लंबित रहने के दौरान, निर्णय देनदार-विक्रेता ने संपत्ति के कुछ हिस्से तीसरे पक्षों को बेच दिए, जिनसे वर्तमान अपीलकर्ताओं ने बाद में टाइटल प्राप्त किया, जिससे निष्पादन में बार-बार बाधा उत्पन्न हुई।

निष्पादन 1991 में शुरू हुआ और 1993 में अदालत द्वारा कमीशन की गई सेल डीड निष्पादित की गई, लेकिन कब्ज़ा रोक दिया गया। 2019 में अपीलकर्ताओं ने ऑर्डर XXI नियम 97 CPC के तहत एक आवेदन दायर करके कब्ज़े की डिलीवरी में बाधा डाली। उनके आपत्तियों को निष्पादन न्यायालय, प्रथम अपीलीय न्यायालय और बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप सर्वोच्च न्यायालय में अपील की गई।

निर्णय

विवादास्पद निर्णय की पुष्टि करते हुए जस्टिस भुयान द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि चूंकि संपत्ति अपीलकर्ताओं द्वारा मुकदमे के लंबित रहने के दौरान खरीदी गई और मूल खरीदार के पक्ष में फैसला सुनाया गया, इसलिए वे पेंडेंटे लाइट ट्रांसफ़री के रूप में अपनी स्थिति के कारण फैसले के निष्पादन का विरोध करने के हकदार नहीं होंगे और उन्हें संपत्ति का वास्तविक कब्ज़ा मूल खरीदार को सौंपना होगा।

अदालत ने कहा,

"अब जब प्रतिवादी नंबर 1 के पक्ष में फैसला और हस्तांतरण अंतिम हो गया है तो पेंडेंटे लाइट ट्रांसफ़री यानी अपीलकर्ताओं को रास्ता देना होगा और मुकदमे वाली संपत्ति का वास्तविक भौतिक कब्ज़ा प्रतिवादी नंबर 1 को सौंपना होगा।"

अदालत ने अपीलकर्ताओं के लाला दुर्गा प्रसाद बनाम लाला दीप चंद, (1953) 2 SCC 509 पर निर्भरता खारिज की, जो मुकदमे दायर करने से पहले किए गए बाद के हस्तांतरण को मान्य करता है। इस मामले को वर्तमान मामले के तथ्यों से अलग करते हुए अदालत ने पाया कि यह लागू नहीं होता, क्योंकि हस्तांतरण पेंडेंटे लाइट था, यानी मुकदमे के लंबित रहने के दौरान किया गया।

विवादित आदेश को मंज़ूरी देते हुए कोर्ट ने कहा:

“हाईकोर्ट ने माना कि अगर बाद वाला ट्रांसफ़री मुक़दमा दायर होने से पहले प्रॉपर्टी के संबंध में अधिकार, टाइटल और इंटरेस्ट हासिल कर लेता है, तो लाला दुर्गा प्रसाद में बताया गया कानून लागू होगा। विवादित फ़ैसले के पैराग्राफ़ 41 में हाईकोर्ट ने कहा कि क्योंकि इस मामले में ट्रांसफर मुक़दमे के दौरान हुए हैं, इसलिए ऐसे ट्रांज़ैक्शन ट्रांसफर ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 52 के तहत आते हैं। इसलिए लाला दुर्गा प्रसाद में बताया गया कानून लागू नहीं होगा।”

इसके अनुसार, अपील खारिज कर दी गई और अपीलकर्ताओं को 15 फरवरी, 2026 तक कब्ज़ा सौंपने का आदेश देते हुए कोर्ट ने भविष्य के मुकदमों के खिलाफ़ एक सामान्य रोक लगाने का असाधारण कदम उठाया।

Cause Title: ALKA SHRIRANG CHAVAN & ANR. VERSUS HEMCHANDRA RAJARAM BHONSALE & ORS.

Sunday, 11 January 2026

एडवोकेट की अनुपस्थिति में आपराधिक अपील खारिज नहीं की जा सकती, एमिकस क्यूरी नियुक्त करना अनिवार्य

एडवोकेट की अनुपस्थिति में आपराधिक अपील खारिज नहीं की जा सकती, एमिकस क्यूरी नियुक्त करना अनिवार्य: इलाहाबाद हाइकोर्ट 10 Jan 2026 

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक अपील को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि अभियुक्त की ओर से वकील उपस्थित नहीं हुआ। हाइकोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में अपीलीय न्यायालय का कर्तव्य है कि वह अभियुक्त के लिए एमिकस क्यूरी नियुक्त करे और अपील का निर्णय मामले के गुण-दोष के आधार पर करे, न कि अनुपस्थिति के कारण। जस्टिस अब्दुल शाहिद की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि अभियुक्त के वकील की गैर-हाजिरी के कारण आपराधिक अपील को डिफॉल्ट में खारिज करना भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 425 के प्रावधानों के विपरीत है, जो पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 384 के अनुरूप है। 

 सालों तक घरेलू काम के बाद नौकरी पर लौटना मुश्किल: इलाहाबाद हाईकोर्ट यह मामला संजय यादव द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण से जुड़ा था। संजय यादव को मई दो हजार बाईस में गोरखपुर के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act) की धारा एक सौ अड़तीस के अंतर्गत दोषसिद्ध किया गया, जो चेक अनादरण से संबंधित था। इस दोषसिद्धि के विरुद्ध उन्होंने निर्धारित समय सीमा के भीतर सत्र न्यायालय में वैधानिक आपराधिक अपील दाखिल की। इसके बावजूद अक्टूबर दो हजार तेईस में अभियुक्त के वकील की अनुपस्थिति के कारण उक्त अपील डिफॉल्ट में खारिज कर दी गई। 

 इसके पश्चात अभियुक्त ने एक नई आपराधिक अपील दाखिल की और सीमाबद्धता अधिनियम की धारा पाँच के अंतर्गत प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर लगभग आठ माह की देरी को माफ करने तथा अक्टूबर, 2023 के आदेश को निरस्त करने का अनुरोध किया। स्पेशल जज, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम, गोरखपुर ने सितंबर पिछले वर्ष इस आवेदन को भी अस्वीकार कर दिया। इसके बाद अभियुक्त ने हाइकोर्ट में वर्तमान आपराधिक पुनरीक्षण दाखिल किया। हाइकोर्ट ने प्रारंभ में ही भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 425 का उल्लेख करते हुए कहा कि अपीलीय न्यायालय केवल अधिवक्ता की अनुपस्थिति के आधार पर अपील खारिज नहीं कर सकता। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के. मुरुगानंदम तथा अन्य बनाम राज्य, प्रतिनिधि पुलिस अधीक्षक, पर भरोसा जताते हुए कहा कि यदि अभियुक्त अपने द्वारा नियुक्त अधिवक्ता के माध्यम से उपस्थित नहीं होता है तो न्यायालय को एमिकस क्यूरी नियुक्त कर सुनवाई करनी होगी, लेकिन अपील को गैर-प्रतिनिधित्व के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। 

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिकारियों के खिलाफ DOB में 11 साल की 'हेरफेर' के लिए FIR का आदेश दिया हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि अभियुक्त के लिए दूसरी आपराधिक अपील दाखिल करने की कोई विधिक आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि पहली अपील पहले ही समय सीमा के भीतर दाखिल की जा चुकी थी। पहली अपील का निस्तारण केवल मामले के गुण-दोष के आधार पर ही किया जाना चाहिए था। इन तथ्यों के आधार पर हाइकोर्ट ने 26 अक्टूबर, 2023 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके द्वारा मूल आपराधिक अपील को डिफॉल्ट में खारिज किया गया। साथ ही अपीलीय न्यायालय को निर्देश दिया गया कि बहाल की गई अपील का निस्तारण यथाशीघ्र गुण-दोष के आधार पर किया जाए।


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