W.P.(Crl.) No. 169/2025 – Pila Pahan @ Peela Pahan v. State of Jharkhand में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 10 बाध्यकारी दिशानिर्देश (Binding Guidelines) जारी किए, उनका संक्षिप्त एवं व्यावहारिक हिंदी सार इस प्रकार है:
1. आरक्षित निर्णय 3 माह के भीतर- किसी भी उच्च न्यायालय द्वारा निर्णय सुरक्षित (Reserved) किए जाने के बाद सामान्यतः 3 माह के भीतर निर्णय सुनाना अनिवार्य होगा।
2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों में शीघ्र निर्णय- जमानत, हिरासत, आपराधिक अपील तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में 3 माह की प्रतीक्षा भी नहीं की जानी चाहिए, बल्कि प्राथमिकता से निर्णय दिया जाना चाहिए।
3. जमानत आदेश उसी दिन या अगले दिन- यदि जमानत आवेदन पर आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे उसी दिन अथवा अधिकतम अगले दिन सुनाया जाना चाहिए।
4. जमानत आदेश तुरंत जेल भेजा जाए- जमानत आदेश पारित होते ही उसकी सूचना उसी दिन जेल अधिकारियों को भेजी जाएगी।
5. विचाराधीन बंदी (Undertrial) की तत्काल रिहाई- जमानत मिलने के बाद बंदी को उसी दिन, अथवा विशेष परिस्थितियों में अधिकतम अगले दिन रिहा किया जाना चाहिए।
6. ट्रायल कोर्ट अनुपालन रिपोर्ट भेजे- जमानत आदेश के पालन की सूचना संबंधित ट्रायल कोर्ट द्वारा उच्च न्यायालय को भेजी जाएगी।
7. केवल ऑपरेटिव भाग सुनाना पर्याप्त, पर कारणयुक्त निर्णय 7 दिन में न्यायालय खुली अदालत में केवल अंतिम निष्कर्ष (Operative Part) सुना सकता है, लेकिन विस्तृत कारणयुक्त निर्णय 7 दिनों के भीतर अपलोड करना होगा।
8. 3 माह बाद मुख्य न्यायाधीश की निगरानी, यदि 3 माह के भीतर निर्णय नहीं सुनाया जाता: तो रजिस्ट्रार जनरल मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखेगा। मुख्य न्यायाधीश अधिकतम 2 सप्ताह का अतिरिक्त समय दे सकते हैं। फिर भी निर्णय नहीं आने पर मामला दूसरी पीठ को आवंटित किया जा सकता है।
9. कारणयुक्त निर्णय अपलोड न होने पर पक्षकार का अधिकार- यदि ऑपरेटिव भाग सुनाए जाने के 15 दिन बाद भी कारणयुक्त निर्णय अपलोड नहीं होता, तो पक्षकार आवेदन दे सकता है। यदि 30 दिन बाद भी निर्णय अपलोड नहीं होता, तो पक्षकार मामला वापस लेकर दूसरी पीठ के समक्ष सुनवाई हेतु आवेदन कर सकता है।
10. वेबसाइट पर Reserved Date प्रदर्शित हो- बहस पूरी होने के बाद जिस दिन निर्णय सुरक्षित रखा जाए, वह तिथि उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर प्रदर्शित की जाएगी अधिवक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदु, अब यदि: कोई आपराधिक अपील 3 माह से अधिक समय से आरक्षित है, जमानत आदेश सुनाया नहीं जा रहा, केवल ऑपरेटिव भाग सुनाया गया है लेकिन कारणयुक्त आदेश नहीं दिया जा रहा, या निर्णय वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया,
तो इस निर्णय Pila Pahan @ Peela Pahan v. State of Jharkhand का हवाला देकर उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रभावी राहत मांगी जा सकती है।
यह निर्णय न्यायिक जवाबदेही, समयबद्ध न्याय और विशेष रूप से आपराधिक मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक निर्णय माना जाएगा।
W.P.(Crl.) No. 169/2025
Case Title – Pila Pahan@Peela Pahan and Ors. v. State of Jharkhand and Anr.
लाइव ला
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देशों का एक सेट जारी किया, जिसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विचाराधीन कैदी और दोषी, अदालतों द्वारा उन्हें ज़मानत दिए जाने, उनकी सज़ा निलंबित किए जाने या उन्हें बरी किए जाने के बाद बिना किसी देरी के जेल से रिहा हो जाएं।
यह मानते हुए कि अनुकूल न्यायिक आदेश मिलने के बावजूद कैदी अक्सर कई दिनों तक जेल में ही बंद रहते हैं, कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट्स को ऐसे आदेशों को सुनाने, उनकी जानकारी देने और उन्हें लागू करने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा कि एक बार ज़मानत याचिका पर सुनवाई हो जाने के बाद आदेश को उसी दिन सुनाया जाना और वेबसाइट पर अपलोड किया जाना बेहतर होगा। यदि मामले में आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो कोर्ट ने कहा कि उम्मीद है कि आदेश अगले दिन सुनाया जाएगा और उसके तुरंत बाद कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाएगा।
प्रशासनिक देरी के कारण ज़मानत का मकसद विफल न हो, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि नियमित ज़मानत देने, सज़ा निलंबित करने, या हिरासत में मौजूद किसी दोषी को बरी करने वाले आदेशों की जानकारी, जिस दिन वे सुनाए जाते हैं, उसी दिन जेल अधिकारियों और निचली अदालत को दी जानी चाहिए।
कोर्ट ने आगे निर्देश दिया कि ऐसी जानकारी मिलने के बाद विचाराधीन कैदी या दोषी को उसी दिन, या ज़्यादा से ज़्यादा अगले दिन रिहा कर दिया जाना चाहिए। इसके एकमात्र अपवाद वे स्थितियाँ होंगी जहाँ कैदी को किसी अन्य मामले में हिरासत में लिया जाना आवश्यक हो, या जहां ज़मानत की शर्तें और अन्य प्रक्रियात्मक आवश्यकताएँ पूरी करने में देरी हो रही हो।
रिहाई के आदेशों को लागू करने में जवाबदेही पर ज़ोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट ट्रायल कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट की उस पीठ को दी जानी चाहिए, जिसने ज़मानत, सज़ा निलंबन या बरी करने का आदेश पारित किया था।
ये निर्देश चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ द्वारा सुरक्षित रखे गए मामलों में फ़ैसले सुनाने में होने वाली देरी से बचने के लिए हाईकोर्ट को दिए गए दिशानिर्देशों के हिस्से के रूप में जारी किए गए। खंडपीठ ने हाईकोर्ट के लिए सुरक्षित रखे गए मामलों में फ़ैसले सुनाने के लिए 3 महीने की समय सीमा तय की।
कैदियों की रिहाई से संबंधित प्रासंगिक निर्देश इस प्रकार हैं:
1. जैसे ही ज़मानत याचिका पर सुनवाई पूरी हो, आदेश को उसी दिन सुनाया जाना और वेबसाइट पर अपलोड किया जाना बेहतर होगा। यदि आदेश सुरक्षित रखा जाता है तो उम्मीद है कि इसे अगले दिन सुनाया जाएगा और वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा।
2. रेगुलर ज़मानत देने, सज़ा निलंबित करने, या हिरासत में बंद किसी दोषी को बरी करने वाले आदेशों की जानकारी जेल अधिकारियों और ट्रायल कोर्ट को उसी दिन दी जानी चाहिए, जिस दिन वे सुनाए जाते हैं।
3. ऊपर दिए गए निर्देश के नतीजे के तौर पर, विचाराधीन कैदी/दोषी को उसी दिन, या ज़्यादा से ज़्यादा अगले दिन रिहा कर दिया जाना चाहिए; सिवाय इसके कि उन्हें किसी दूसरे मामले में हिरासत में लिए जाने की ज़रूरत हो, या ज़मानत की शर्तों का पालन करने में कोई देरी हो, वगैरह।
इस आदेश के पालन की रिपोर्ट ट्रायल कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट की उस बेंच को दी जानी चाहिए, जिसने यह आदेश पारित किया था।
Case Title – Pila Pahan@Peela Pahan and Ors. v. State of Jharkhand and Anr.