Tuesday, 10 February 2026

जमानत को रकम जमा करने से नहीं जोड़ा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

जमानत को रकम जमा करने से नहीं जोड़ा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया सिद्धांत, झारखंड हाइकोर्ट का सशर्त आदेश रद्द 10 Feb 2026 

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि नियमित या अग्रिम जमानत को किसी भी प्रकार की धनराशि जमा करने की शर्त से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को दोहराते हुए झारखंड हाइकोर्ट द्वारा पारित सशर्त जमानत आदेशों को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में आरोपियों को जमानत पर रिहा किया जाए। यह मामला एक पिता-पुत्र से जुड़ा है, जिन पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया। शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने क्राफ्ट पेपर खरीदने के बाद 9 लाख का भुगतान नहीं किया। इस संबंध में FIR दर्ज हुई। गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए दोनों आरोपियों ने पहले सेशन कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी दी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद वे झारखंड हाइकोर्ट पहुंचे। 

 हाइकोर्ट ने 13 जनवरी, 2025 और 14 नवंबर, 2025 को पारित अपने आदेशों में आरोपियों को निर्देश दिया कि वे एक पूरक हलफनामा दाखिल करें, जिसमें यह दर्शाया जाए कि शिकायतकर्ता को 9,12,926.84 का भुगतान कर दिया गया। हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि भुगतान दर्शाने वाला हलफनामा दाखिल नहीं किया गया तो अग्रिम जमानत याचिका स्वतः खारिज मानी जाएगी। बाद में आरोपियों द्वारा समय मांगे जाने पर भी इसी शर्त के साथ उन्हें मोहलत दी गई। 

इन आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जहां जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रारंभिक टिप्पणी में ही कहा कि हाइकोर्ट ने असामान्य आदेश पारित किए और वह सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों की अनदेखी करते नजर आते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से अपने हालिया फैसले गजानन दत्तात्रेय गोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य का उल्लेख किया, जिसमें यह साफ कहा गया कि जमानत याचिकाओं का निपटारा मामले के गुण-दोष के आधार पर होना चाहिए न कि आरोपी द्वारा किसी रकम के भुगतान या आश्वासन पर। 

 अदालत ने निराशा जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद हाइकोर्ट इस प्रकार के आदेश पारित करते जा रहे हैं। कोर्ट ने कहा, “यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस न्यायालय द्वारा बार-बार यह कहे जाने के बावजूद कि नियमित या अग्रिम जमानत को किसी भी राशि के जमा करने की शर्त से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। हाइकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से 9,12,926.84 जमा करने को कहा। हमने अपने निर्णय में बिल्कुल स्पष्ट किया कि यदि जमानत का मामला बनता है तो जमानत दी जानी चाहिए और यदि नहीं बनता तो याचिका खारिज की जा सकती है लेकिन कोर्ट को धनराशि जमा करने जैसी शर्त लगाकर विवेकाधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए।” 

 इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाइकोर्ट के दोनों सशर्त आदेशों को रद्द किया और निर्देश दिया कि यदि आरोपियों को गिरफ्तार किया जाता है तो उन्हें जांच अधिकारी द्वारा लगाई जाने वाली सामान्य शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा किया जाए। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस आदेश की एक प्रति झारखंड हाइकोर्ट के मुख्य जस्टिस के समक्ष रखी जाए ताकि इस प्रकार के आदेशों पर भविष्य में रोक लगाई जा सके।


केस-लॉ नोट

Prantik Kumar & Anr. v. State of Jharkhand & Anr.

SLP (Crl.) Diary No. 4297/2026

निर्णय दिनांक: फरवरी, 2026 (Supreme Court of India)

✦ प्रतिपादित विधिक सिद्धांत:

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया कि जमानत (Bail) को किसी धनराशि के जमा करने की शर्त से नहीं जोड़ा जा सकता। न्यायालय ने कहा कि जमानत का उद्देश्य अभियुक्त की न्यायालय में उपस्थिति सुनिश्चित करना है, न कि किसी प्रकार की वसूली (recovery) या क्षतिपूर्ति (compensation) करवाना।

झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा जमानत आदेश में लगभग ₹9,00,000/- जमा करने की शर्त लगाई गई थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने विधि-विरुद्ध और न्यायसंगत सिद्धांतों के विपरीत माना। न्यायालय ने दोहराया कि जमानत आदेश में ऐसी मौद्रिक शर्तें आपराधिक न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांतों को विकृत (distort) कर सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि जमानत प्रदान करते समय न्यायालय को केवल अपराध की प्रकृति, आरोप की गंभीरता, साक्ष्य की स्थिति, अभियुक्त के फरार होने या साक्ष्य से छेड़छाड़ की संभावना जैसे वैधानिक मानकों पर विचार करना चाहिए। जमानत को दंडात्मक या वसूली के साधन में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।

अतः उक्त प्रकरण में उच्च न्यायालय का सशर्त आदेश निरस्त कर दिया गया और बिना धनराशि जमा करने की शर्त के जमानत प्रदान की गई।

Friday, 6 February 2026

धारा 127 CrPC: एकमुश्त राशि स्वीकार करने के बाद भी पत्नी भरण-पोषण बढ़ाने की हकदार

धारा 127 CrPC: एकमुश्त राशि स्वीकार करने के बाद भी पत्नी भरण-पोषण बढ़ाने की हकदार; बॉम्बे हाईकोर्ट ने 5 साल की समय सीमा को स्पष्ट किया 

बॉम्बे हाईकोर्ट (औरंगाबाद बेंच) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि पत्नी द्वारा पूर्व के आदेश के तहत एकमुश्त भरण-पोषण (Lump Sum Maintenance) स्वीकार कर लेने मात्र से वह भविष्य में भरण-पोषण राशि में बढ़ोत्तरी (Enhancement) की मांग करने से वंचित नहीं हो जाती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दी गई एकमुश्त राशि की वैधता एक बार में पांच वर्ष से अधिक नहीं होती है, जिसके बाद पत्नी पुनः राशि बढ़ाने का दावा कर सकती है।


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Sunday, 1 February 2026

अग्रिम जमानत हेतु सेशन कोर्ट जाना अनिवार्य नहीं — सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

*अग्रिम जमानत हेतु सेशन कोर्ट जाना अनिवार्य नहीं — सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय*


सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने Manjeet Singh vs. State of Uttar Pradesh (Criminal Appeal No. ___/2025, @SLP (Crl.) No. 11667/2025) में यह स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत (धारा 482, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023) के लिए पहले सेशन कोर्ट में आवेदन करना कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में लचीलापन और न्याय तक त्वरित पहुँच को सुनिश्चित करता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट और सेशन कोर्ट — दोनों के पास समान अधिकार क्षेत्र है, और "विशेष परिस्थितियों" में आवेदक सीधे हाईकोर्ट में जा सकता है।


अग्रिम जमानत भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है, जिसका उद्देश्य अभियुक्त को गिरफ्तारी से पूर्व ही संरक्षण देना है। परंपरागत रूप से, कई हाईकोर्टों में यह धारणा रही कि पहले सेशन कोर्ट में आवेदन करना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने इस अनिवार्यता को अस्वीकार कर दिया है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक सुगम हो गई है।


2. केस विवरण (Case Details)


न्यायालय: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया


क्षेत्राधिकार: Criminal Appellate Jurisdiction


क्रिमिनल अपील संख्या: Criminal Appeal No. ___ / 2025 (@SLP (Crl.) No. 11667/2025)


मामला: Manjeet Singh vs. State of Uttar Pradesh


संबद्ध अपील: Criminal Appeal No. ___ / 2025 (@SLP (Crl.) No. 11679/2025)


पीठ: न्यायमूर्ति संजय कुमार एवं न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया


निर्णय की तिथि: 8 अगस्त 2025


3. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (Supreme Court’s Ruling)


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:


> "हाईकोर्ट और सेशन कोर्ट, दोनों के पास अग्रिम जमानत देने का समान अधिकार है। आवेदक सीधे हाईकोर्ट जा सकता है, यदि परिस्थितियाँ ऐसा करने को उचित ठहराती हैं।"


4. उद्धृत पूर्व निर्णय (Cited Precedents)


1. Kanumuri Raghurama Krishnam Raju vs. State of A.P., (2021) 13 SCC 822


2. Arvind Kejriwal vs. Directorate of Enforcement, 2024 INSC 512


5. विधिक महत्व (Legal Significance)


प्रक्रियात्मक लचीलापन: अब अभियुक्त को सेशन कोर्ट में पहले जाने का बंधन नहीं है।


न्याय तक त्वरित पहुँच: समय-संवेदनशील मामलों में सीधे हाईकोर्ट से राहत मिल सकती है।


न्यायिक विवेकाधिकार: प्रत्येक मामले में “विशेष परिस्थितियों” का आकलन न्यायालय करेगा


6. निष्कर्ष (Conclusion)


यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण सुधार है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है और न्यायिक पहुँच को आसान बनाता है। यह अधिवक्ताओं और अभियुक्तों दोनों के लिए एक रणनीतिक विकल्प उपलब्ध कराता है।

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संदर्भ सूची (References)


1. Supreme Court of India, Manjeet Singh vs. State of Uttar Pradesh, Criminal Appeal No. ___/2025, @SLP (Crl.) No. 11667/2025, निर्णय दिनांक 08.08.2025.


2. Kanumuri Raghurama Krishnam Raju vs. State of A.P., (2021) 13 SCC 822.


3. Arvind Kejriwal vs. Directorate of Enforcement, 2024 INSC 512.

Friday, 16 January 2026

मुफ्त पीने का पानी न देने पर रेस्टोरेंट दोषी: फरीदाबाद जिला उपभोक्ता आयोग 16 Jan 2026

मुफ्त पीने का पानी न देने पर रेस्टोरेंट दोषी: फरीदाबाद जिला उपभोक्ता आयोग  16 Jan 2026 

फरीदाबाद जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, जिसकी पीठ में अमित अरोड़ा (अध्यक्ष) और इंदिरा भड़ाना (सदस्य) शामिल थीं, ने एक रेस्टोरेंट के खिलाफ उपभोक्ता शिकायत स्वीकार करते हुए कहा है कि ग्राहक को मुफ्त पीने का पानी न देकर बोतलबंद पानी खरीदने के लिए मजबूर करना सेवा में कमी है। यह फैसला आकाश शर्मा बनाम एम/एस गार्डन ग्रिल्स 2.0 मामले में दिया गया। पुरा मामला शिकायतकर्ता आकाश शर्मा 18 जून 2025 को अपने दोस्तों के साथ फरीदाबाद स्थित एम/एस गार्डन ग्रिल्स 2.0 रेस्टोरेंट में डिनर के लिए गया। भोजन के दौरान जब उसने पीने का पानी मांगा, तो रेस्टोरेंट स्टाफ ने मुफ्त पीने का पानी देने से इनकार कर दिया और कहा कि ग्राहकों के लिए केवल बोतलबंद पानी ही उपलब्ध है, जिसे खरीदना होगा। 

 शिकायतकर्ता ने इसका विरोध करते हुए स्टाफ और मैनेजर को बताया कि ग्राहकों को बोतलबंद पानी खरीदने के लिए मजबूर करना अवैध है और नियमों के खिलाफ है, लेकिन रेस्टोरेंट प्रबंधन अपने रुख पर अड़ा रहा। मजबूरी में शिकायतकर्ता को “डसानी” ब्रांड की दो बोतलें ₹40 में खरीदनी पड़ीं। इसके बाद शिकायतकर्ता ने सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप लगाते हुए जिला उपभोक्ता आयोग का रुख किया और राशि की वापसी, मानसिक उत्पीड़न के लिए मुआवजा तथा इस प्रथा को बंद करने के निर्देश देने की मांग की। 

रेस्टोरेंट की अनुपस्थिति नोटिस की विधिवत सेवा के बावजूद रेस्टोरेंट आयोग के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ, जिसके चलते उसे एकतरफा (ex parte) कार्यवाही में शामिल किया गया। आयोग की टिप्पणियां और फैसला आयोग ने कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत शपथपत्र, बोतलबंद पानी का बिल और नोटिस की सेवा के प्रमाण बिना किसी प्रतिवाद के रिकॉर्ड पर हैं। चूंकि विपक्षी पक्ष ने न तो उपस्थित होकर आरोपों का खंडन किया और न ही कोई साक्ष्य प्रस्तुत किया, इसलिए शिकायतकर्ता के आरोप अप्रतिवादित रहे। 

 आयोग ने यह स्पष्ट रूप से माना कि: ग्राहकों को मुफ्त पीने का पानी देने के बजाय बोतलबंद पानी खरीदने के लिए मजबूर करना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत सेवा में कमी है। आदेश शिकायत स्वीकार करते हुए, जिला उपभोक्ता आयोग ने रेस्टोरेंट को निर्देश दिया कि वह: शिकायतकर्ता से वसूले गए ₹40 की राशि वापस करे, और मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न के लिए ₹3,000 का मुआवजा अदा करे। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि वाद व्यय (litigation cost) नहीं दिया गया, क्योंकि शिकायतकर्ता ने स्वयं मामले की पैरवी की थी।


https://hindi.livelaw.in/consumer-cases/district-consumer-commission-faridabad-drinking-water-in-restaurant-519303

Thursday, 15 January 2026

टाइटल सूट में ट्रायल कोर्ट, कब्ज़ा वापस दिलाने की राहत दिए बिना स्थायी रोक का आदेश नहीं दे सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट 2026-01-15

टाइटल सूट में ट्रायल कोर्ट, कब्ज़ा वापस दिलाने की राहत दिए बिना स्थायी रोक का आदेश नहीं दे सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट 2026-01-15 

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बुधवार (14 जनवरी) को एक टाइटल सूट में ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने वादी को कब्ज़ा वापस दिलाने की राहत दिए बिना ही स्थायी रोक का आदेश देकर गलती की, जबकि कोर्ट ने यह माना था कि प्रतिवादी ने ज़मीन पर कब्ज़ा किया।

जस्टिस विवेक जैन की बेंच ने कहा,

"कोर्ट पहले ही इस नतीजे पर पहुंच चुका था कि प्रतिवादी ने ज़मीन पर कब्ज़ा किया और फैसले में यह भी लिखा कि प्रतिवादी को ज़मीन का खाली कब्ज़ा वादी को सौंपना होगा, लेकिन हैरानी की बात है कि आदेश में कब्ज़ा वापस दिलाने की राहत का ज़िक्र किए बिना ट्रायल कोर्ट ने सिर्फ़ स्थायी रोक का आदेश दिया, जबकि स्थायी रोक का आदेश कब्ज़ा वापस दिलाने के बाद दिया जाना चाहिए। आदेश में साफ़ तौर पर गलती है, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने आदेश में कब्ज़ा वापस दिलाने का ज़िक्र नहीं किया, जबकि फैसले में ट्रायल कोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा कि प्रतिवादी ने ज़मीन पर कब्ज़ा किया और वादी कब्ज़ा वापस दिलाने के आदेश का हकदार है।"

याचिकाकर्ता-वादी ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए एक रिव्यू याचिका दायर की, जिसमें कोर्ट ने आदेश को अंतिम रूप दिया और बाद में उस पर हस्ताक्षर किए, जबकि वादी की धारा 152 CPC के तहत आदेश में संशोधन की अर्ज़ी खारिज कर दी थी।

वादी के अनुसार, उसने टाइटल की घोषणा और कब्ज़ा वापस दिलाने के लिए मुकदमा दायर किया, जिसमें स्थायी रोक की मांग की गई। ट्रायल कोर्ट ने छह मुद्दे तय किए, जिसमें मुद्दा 2 प्रतिवादी द्वारा ज़मीन पर कब्ज़े से संबंधित था। इसके बाद का मुद्दा यह था कि क्या याचिकाकर्ता कब्ज़ा वापस दिलाने की राहत का हकदार था।

बेंच ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले के मुख्य हिस्से में कहा गया कि प्रतिवादी-प्रतिवादियों ने ज़मीन पर कब्ज़ा किया था और याचिकाकर्ता उसे वापस पाने का हकदार था।

हालांकि, जब आदेश का मसौदा पेश किया गया तो ट्रायल कोर्ट ने कब्ज़ा वापस दिलाने के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया। ट्रायल कोर्ट ने विवादित ज़मीन के संबंध में स्थायी रोक का आदेश दिया, जबकि यह निष्कर्ष निकाला था कि प्रतिवादी ने ज़मीन पर कब्ज़ा किया।

बेंच ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को फैसले में यह दर्ज करना चाहिए कि प्रतिवादी को ज़मीन का खाली कब्ज़ा वादी को सौंपना होगा। हालांकि, "हैरानी की बात है", ट्रायल कोर्ट ने कब्ज़ा वापस दिलाने की राहत के लिए आदेश का ज़िक्र किए बिना सिर्फ़ स्थायी रोक का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी देखा कि ट्रायल कोर्ट ने CPC की धारा 152 के तहत उक्त डिक्री के संबंध में वादी की आपत्तियों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वे सुनवाई योग्य नहीं हैं।

बेंच ने कहा:

"इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि एक बार जब डिक्री पर अंतिम रूप से हस्ताक्षर नहीं किए गए तो क्या धारा 152 के तहत आपत्तियां सुनवाई योग्य थीं या नहीं, लेकिन एक बार जब ट्रायल कोर्ट को यह बताया गया कि फैसले में यह लिखे होने के बावजूद कि याचिकाकर्ता कब्जे की रिकवरी का हकदार है तो डिक्री में कब्जे की रिकवरी का जिक्र नहीं किया गया तो ट्रायल कोर्ट को इस विसंगति पर ध्यान देना चाहिए और ट्रायल कोर्ट के लिए यह ज़रूरी नहीं था कि वह यह कहते हुए कि CPC की धारा 152 लागू नहीं होती, यांत्रिक रूप से डिक्री पर हस्ताक्षर कर दे।"

चूंकि डिक्री पर हस्ताक्षर हो गए, इसलिए बेंच ने कहा कि CPC की धारा 152 के तहत आपत्तियां सुनवाई योग्य थीं। इसलिए ट्रायल कोर्ट को 30 दिनों के भीतर CPC की धारा 152 के तहत एक विशेष आदेश पारित करने का निर्देश दिया गया। ट्रायल कोर्ट को यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया कि डिक्री फैसले के अनुसार हो।


Case Title: Mahendra Prasad Tiwari v Smt Chinti Yadav [CR-1364-2025]

Wednesday, 14 January 2026

ससुर की मृत्यु के बाद विधवा बहू भी उसकी संपत्ति से भरण-पोषण की हकदार : सुप्रीम कोर्ट 14 Jan 2026

ससुर की मृत्यु के बाद विधवा बहू भी उसकी संपत्ति से भरण-पोषण की हकदार : सुप्रीम कोर्ट  14 Jan 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि जो बहू अपने ससुर की मृत्यु के बाद विधवा होती है, वह भी अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण पाने की अधिकारी है। यह अधिकार हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत मिलता है। जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस. वी. एन. भट्टी की खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 21(vii) में प्रयुक्त शब्द “पुत्र की कोई भी विधवा” (any widow of his son) बिल्कुल स्पष्ट है और इसमें यह शर्त नहीं है कि पुत्र की मृत्यु ससुर से पहले हुई हो। इसलिए यह तय करना कि पुत्र कब मरा — ससुर से पहले या बाद में — भरण-पोषण के अधिकार के लिए अप्रासंगिक है। 

 मामले की पृष्ठभूमि डॉ. महेन्द्र प्रसाद का निधन दिसंबर 2021 में हुआ। उनकी बहू गीता शर्मा के पति (डॉ. प्रसाद के पुत्र) की मृत्यु मार्च 2023 में हुई। पति की मृत्यु के बाद गीता शर्मा ने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की मांग की। फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी थी कि जब ससुर की मृत्यु हुई थी तब वह विधवा नहीं थीं। हालांकि, हाई कोर्ट ने यह फैसला पलटते हुए कहा कि गीता शर्मा कानून के तहत “निर्भर” (dependent) हैं और उन्हें भरण-पोषण का अधिकार है। 

राज्यों को नियम बनाने का निर्देश दिया अन्य पारिवारिक सदस्यों ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणी अदालत ने यह कानूनी प्रश्न तय किया: “क्या वह बहू, जो अपने ससुर की मृत्यु के बाद विधवा बनी, ससुर की संपत्ति पर निर्भर मानी जाएगी और उससे भरण-पोषण मांग सकती है?” कोर्ट ने कहा कि धारा 21(vii) में “पुत्र की कोई भी विधवा” कहा गया है, न कि “पूर्व-मृत पुत्र की विधवा”। इसलिए अदालत इसमें अतिरिक्त शब्द जोड़ नहीं सकती। 

 “विधायिका ने जानबूझकर 'पूर्व-मृत' शब्द का प्रयोग नहीं किया है ताकि पुत्र की कोई भी विधवा इस दायरे में आ सके। पुत्र की मृत्यु का समय अप्रासंगिक है।” अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि बहुओं को इस आधार पर अलग-अलग वर्गों में बांटा जाए कि उनके पति ससुर से पहले मरे या बाद में, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन होगा। साथ ही, ऐसी व्याख्या अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीवन का अधिकार) का भी हनन करेगी, क्योंकि इससे विधवा महिला को दरिद्रता और सामाजिक असुरक्षा में धकेला जा सकता है। 

“केवल पति की मृत्यु के समय के आधार पर विधवाओं के बीच भेदभाव करना मनमाना है और इसका अधिनियम के उद्देश्य से कोई तर्कसंगत संबंध नहीं है।” अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि गीता शर्मा की भरण-पोषण याचिका पूरी तरह से वैध है और फैमिली कोर्ट को अब इसकी राशि तय करनी होगी। “मृत हिंदू के पुत्र की कोई भी विधवा, धारा 21(vii) के तहत आश्रित है और धारा 22 के अंतर्गत भरण-पोषण की हकदार है।” इस प्रकार सभी अपीलें खारिज कर दी गईं।


https://hindi.livelaw.in/category/news-updates/supreme-court-hindu-adoptions-and-maintenance-act-518781

नामांकित व्यक्ति (Nominee) को जीपीएफ राशि पाने के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट

नामांकित व्यक्ति (Nominee) को जीपीएफ राशि पाने के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट 14 Jan 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी ने अपने General Provident Fund (GPF) खाते में किसी व्यक्ति को वैध रूप से नामांकित (nominee) किया है, तो उस नामांकित व्यक्ति को पूरी राशि पाने के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र (Succession Certificate), प्रोबेट या लेटर ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन की आवश्यकता नहीं होगी — भले ही राशि ₹5,000 से अधिक क्यों न हो। जस्टिस मनोज मिश्र और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला दिया। 

 कोर्ट ने क्या कहा? सुप्रीम कोर्ट ने कहा: “जहाँ वैध नामांकन मौजूद है, वहाँ मृत कर्मचारी के भविष्य निधि खाते की राशि सीधे नामांकित व्यक्ति को दी जानी चाहिए।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि हर मामले में नामांकित व्यक्ति से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र माँगा जाएगा, तो नामांकन की पूरी व्यवस्था ही अर्थहीन हो जाएगी (otiose)। ₹5,000 की सीमा अब अप्रासंगिक Provident Funds Act, 1925 के तहत यदि राशि ₹5,000 से अधिक हो, तो उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की आवश्यकता होती है। लेकिन कोर्ट ने कहा कि:  वर्ष 1925 में ₹5,000 एक बड़ी राशि थी, लेकिन आज महँगाई के कारण इसका कोई महत्व नहीं रह गया है। इसी वजह से सरकार ने स्वयं General Provident Fund (Central Services) Rules, 1960 के Rule 33(ii) में यह प्रावधान किया कि — नामांकित व्यक्ति को राशि किसी भी रकम तक बिना किसी प्रमाणपत्र के दी जाएगी। नामांकित व्यक्ति मालिक नहीं, ट्रस्टी होता है कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि: नामांकित व्यक्ति (Nominee) राशि का अंतिम मालिक नहीं, बल्कि केवल ट्रस्टी (Trustee) होता है। 

 यदि कोई अन्य वैध वारिस अदालत में दावा करता है, तो वह अपने हिस्से के लिए मुकदमा कर सकता है। अर्थात — सरकार पैसा nominee को दे देगी, लेकिन वारिस आपस में अपना हक अदालत में तय कर सकते हैं। मामले की पृष्ठभूमि एक सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके GPF खाते की राशि उसके भाई परेश चंद्र मंडल को देनी थी, क्योंकि वह नामांकित व्यक्ति था। कुछ भतीजों ने इस पर आपत्ति जताई। Central Administrative Tribunal और बाद में Calcutta High Court ने आदेश दिया कि: Also Read - Order XXI Rule 102 CPC | मुकदमे के दौरान संपत्ति खरीदने वाले को डिक्री के एग्जीक्यूशन में रुकावट डालने का कोई अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट चूँकि भाई वैध nominee है, इसलिए राशि उसे ही दी जाए। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह कहते हुए चुनौती दी कि चूँकि रकम ₹5,000 से अधिक है, इसलिए succession certificate जरूरी है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। 

सरकार को निजी विवादों में नहीं पड़ना चाहिए कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि: सरकार को मृत कर्मचारी की संपत्ति को लेकर चलने वाले पारिवारिक विवादों में नहीं उलझना चाहिए। नामांकन होने पर पैसा nominee को देना चाहिए और बाकी विवाद निजी पक्षों पर छोड़ देना चाहिए।


https://hindi.livelaw.in/category/news-updates/supreme-court-general-provident-fund-gpf-nominee-518783