Tuesday, 9 June 2026

सिर्फ़ इसलिए जालसाज़ी नहीं मानी जाएगी कि किसी व्यक्ति ने प्रॉपर्टी पर अपना मालिकाना हक़ बताते हुए कोई डॉक्यूमेंट बनाया हो: सुप्रीम कोर्ट 9 June 2026

सिर्फ़ इसलिए जालसाज़ी नहीं मानी जाएगी कि किसी व्यक्ति ने प्रॉपर्टी पर अपना मालिकाना हक़ बताते हुए कोई डॉक्यूमेंट बनाया हो: सुप्रीम कोर्ट 9 June 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति सिर्फ़ इसलिए जालसाज़ी (Forgery) का दोषी नहीं माना जाएगा कि उसने किसी प्रॉपर्टी पर अपना मालिकाना हक़ बताते हुए कोई डॉक्यूमेंट बनाया है, भले ही बाद में वह दावा कानूनी रूप से गलत साबित हो जाए। कोर्ट ने मोहम्मद इब्राहिम बनाम बिहार राज्य (2009) 8 SCC 751 मामले का हवाला देते हुए कहा, "...जब कोई व्यक्ति किसी प्रॉपर्टी को अपनी बताते हुए कोई डॉक्यूमेंट बनाता है तो सिर्फ़ इसलिए वह 'गलत डॉक्यूमेंट' (False Document) नहीं बन जाता कि उसका दावा बाद में गलत साबित हो जाता है।" मोहम्मद इब्राहिम मामले में यह कहा गया: "जब कोई व्यक्ति ऐसी प्रॉपर्टी के लिए डॉक्यूमेंट बनाता है, जो उसकी नहीं है तो वह यह दावा नहीं कर रहा होता कि वह कोई और है, और न ही वह यह दावा कर रहा होता है कि उसे किसी और ने अधिकृत किया। इसलिए ऐसे डॉक्यूमेंट को बनाना (जिसमें वह ऐसी प्रॉपर्टी का अधिकार देने की बात करता है, जिसका वह मालिक नहीं है) कोड की धारा 464 के तहत 'गलत डॉक्यूमेंट' बनाना नहीं माना जाएगा। अगर बनाया गया डॉक्यूमेंट 'गलत डॉक्यूमेंट' नहीं है तो जालसाज़ी भी नहीं है। अगर जालसाज़ी नहीं है तो कोड की धारा 467 या धारा 471 लागू नहीं होतीं।" जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने एक मामले की सुनवाई की, जिसमें अपीलकर्ताओं ने विवादित प्रॉपर्टी पर अपने मालिकाना हक़ का दावा करते हुए 'पावर ऑफ़ अटॉर्नी' बनाई। जब उनका मालिकाना हक़ का दावा कानूनी रूप से गलत साबित हो गया तो उनके खिलाफ़ जालसाज़ी की आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई। यह कार्यवाही इस आधार पर शुरू की गई कि चूंकि प्रॉपर्टी में उनका कोई वैध मालिकाना हक़ नहीं था, इसलिए जिस डॉक्यूमेंट के ज़रिए उन्होंने ऐसे अधिकारों का दावा किया, वह खुद ही जाली है। अपीलकर्ताओं के खिलाफ़ FIR रद्द करने से इनकार करने वाले गुजरात हाईकोर्ट का फ़ैसला पलटते हुए जस्टिस पंचोली ने अपने फ़ैसले में कहा कि हाईकोर्ट ने गलत आधार पर कार्यवाही की। हाईकोर्ट ने माना था कि अपीलकर्ताओं का दावा गलत साबित होने पर मालिकाना हक़ जताने के लिए उनके द्वारा बनाए गए डॉक्यूमेंट धोखाधड़ी का काम थे। कोर्ट ने कहा कि मालिकाना हक़ का दावा करने के लिए इस्तेमाल किए गए डॉक्यूमेंट को सिर्फ़ इसलिए 'गलत डॉक्यूमेंट' नहीं माना जाएगा कि दावा सफल नहीं हो सका। कोर्ट ने कहा, “हाईकोर्ट ने इस आधार पर कार्रवाई की कि चूंकि आरोपी नंबर 1 से 5 के पास प्रॉपर्टी का मालिकाना हक नहीं था, इसलिए पावर ऑफ अटॉर्नी बनाना और सिविल कार्यवाही शुरू करना जालसाजी (Forgery) माना जाएगा। हमारी राय में, हाईकोर्ट का यह नज़रिया कानूनी रूप से सही नहीं है। IPC की धारा 463 के तहत जालसाजी का मुख्य तत्व IPC की धारा 464 के अर्थ में 'झूठा दस्तावेज़' बनाना है। प्रतिवादी नंबर 2 का यह कहना नहीं है कि पावर ऑफ अटॉर्नी पर मौजूद हस्ताक्षर नकली या बनावटी थे, और न ही यह आरोप लगाया गया कि दस्तावेज़ बनाने वालों की जगह किसी और ने हस्ताक्षर किए या किसी और व्यक्ति का रूप धरकर दस्तावेज़ बनाया गया।” इसके आधार पर अपील मंज़ूर कर ली गई और जालसाजी का मामला रद्द किया गया।

 Cause Title: BHIKHUBHAI GOVINDBHAI PATEL & ANR. VERSUS THE STATE OF GUJARAT & ANR.



Friday, 5 June 2026

पति की दूसरी शादी की केवल जानकारी होना ही अपराध नहीं है। सास, ससुर या अन्य रिश्तेदारों को केवल इस आधार पर आरोपी नहीं बनाया जा सकता कि उन्हें दूसरी शादी की जानकारी थी।

 Sivaraman Nair & Others v. State of Kerala & Another (निर्णय दिनांक 24.04.2026) में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निम्न महत्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए: 

निर्णय का सार (10 बिंदुओं में)

1. पति की दूसरी शादी की केवल जानकारी होना ही अपराध नहीं है। सास, ससुर या अन्य रिश्तेदारों को केवल इस आधार पर आरोपी नहीं बनाया जा सकता कि उन्हें दूसरी शादी की जानकारी थी। 

2. धारा 494 IPC (अब BNS में समकक्ष प्रावधान) के तहत रिश्तेदारों की जिम्मेदारी तभी बनेगी, जब उनके द्वारा दूसरी शादी कराने, उसमें भाग लेने या उसे प्रोत्साहित करने का ठोस साक्ष्य हो। 

3. Mere Knowledge is not Common Intention — केवल जानकारी होना "सामान्य आशय" (Common Intention) सिद्ध नहीं करता। 

4. पति के माता-पिता और बहन के विरुद्ध विशिष्ट (specific) आरोप नहीं थे, केवल सामान्य और व्यापक आरोप लगाए गए थे। 

5. वैवाहिक विवादों में पूरे परिवार को आरोपी बनाने की प्रवृत्ति पर न्यायालय ने चिंता व्यक्त की। 

6. धारा 498A IPC के मामलों में भी केवल "उत्साहवर्धन किया" या "साथ दिया" जैसे सामान्य आरोप पर्याप्त नहीं हैं; प्रत्येक आरोपी की स्पष्ट भूमिका बताना आवश्यक है। 

7. यदि आरोपों से किसी रिश्तेदार की सक्रिय भागीदारी (active involvement) नहीं दिखती, तो उसके विरुद्ध आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है। 

8. न्यायालय ने कहा कि दूसरी शादी के अपराध में मुख्य उत्तरदायित्व उस पति/पत्नी का है जिसने दूसरी शादी की है। 

9. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सास, ससुर और ननद के विरुद्ध कार्यवाही रद्द (quash) कर दी। 

10. किंतु पति के विरुद्ध मामला जारी रहेगा, क्योंकि उसके विरुद्ध विशिष्ट आरोप थे। 

न्यायालय की सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति

> "केवल यह जानकारी होना कि दूसरी शादी हुई है, अपने आप में धारा 494 IPC के तहत दायित्व स्थापित नहीं करता; सक्रिय सहभागिता, सुविधा प्रदान करना या प्रोत्साहन साबित होना चाहिए।" 

यह निर्णय विशेष रूप से उन मामलों में उपयोगी है जहाँ **पति के साथ-साथ सास, ससुर, देवर, ननद आदि को बिना किसी विशिष्ट भूमिका के धारा 494/498A में आरोपी बना दिया जाता है।**

समय पर मुआवज़ा दिए बिना संपत्ति से वंचित करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: एनएच प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट 2026-06-03

 समय पर मुआवज़ा दिए बिना संपत्ति से वंचित करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: एनएच प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट 2026-06-03 

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उस याचिका को मंज़ूरी दी, जिसमें नेशनल हाईवे के निर्माण के लिए ज़मीन अधिग्रहित की गई, लेकिन मुआवज़े की रकम जारी नहीं की गई। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि ज़मीन मालिकों को समय पर मुआवज़ा दिए बिना उनकी संपत्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीज़न बेंच ने यह टिप्पणी की:

"अधिग्रहित ज़मीन के लिए मुआवज़ा पाने का अधिकार सिर्फ़ एक कानूनी हक नहीं है, बल्कि अनुच्छेद 300-A से मिलने वाली एक संवैधानिक गारंटी है। समय पर मुआवज़ा दिए बिना संपत्ति से वंचित करना सत्ता का मनमाना इस्तेमाल माना जाएगा और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। आपसी सहमति से छूटी हुई ज़मीनों के अधिग्रहण से जुड़ी नीति में ही यह प्रावधान है कि देरी और विवादों से बचने के लिए अधिग्रहण तेज़ी से किया जाए और तुरंत भुगतान किया जाए। अगर ज़मीन मालिक, अधिग्रहण के लिए सहमति देने के बाद मुआवज़े के लिए अनिश्चित काल तक इंतज़ार करने पर मजबूर होते हैं तो ऐसी नीति का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।"

एक रिट याचिका दायर की गई, जिसमें 'रिट ऑफ़ मैंडमस' जारी करने की मांग की गई। इस रिट के ज़रिए राज्य सरकार को यह निर्देश देने की मांग की गई कि वह नेशनल हाईवे के निर्माण के लिए ज़मीन अधिग्रहण के बदले याचिकाकर्ताओं के पक्ष में तय की गई मुआवज़े की रकम को जारी करे और वितरित करे।

याचिकाकर्ताओं की ज़मीनें शहडोल ज़िले में हैं। शुरुआत में, उमरिया को शहडोल से जोड़ने वाले हाईवे के निर्माण के लिए किए गए बड़े पैमाने पर ज़मीन अधिग्रहण में इन ज़मीनों को शामिल नहीं किया गया था। बाद में अधिकारियों को पता चला कि प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए याचिकाकर्ताओं की ज़मीनों की ज़रूरत है। इसलिए सड़क परिवहन मंत्रालय ने 15 मार्च, 2016 को एक सर्कुलर जारी किया। इस सर्कुलर में विशेष रूप से यह प्रावधान किया गया कि देरी से बचने के लिए छूटी हुई ज़मीनों का अधिग्रहण आपसी सहमति से किया जाए।

तदनुसार, ज़मीन अधिग्रहण के लिए याचिकाकर्ताओं को ₹3.35 करोड़ की राशि मंज़ूर की गई। रिकॉर्ड से यह भी पता चला कि प्रस्ताव और उसके साथ मंज़ूर की गई राशि, 2 जनवरी, 2026 को भुगतान जारी करने के लिए सक्षम प्राधिकारी को भेज दी गई।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने संबंधित प्राधिकारी को बार-बार अभ्यावेदन (Representations) दिए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। याचिकाकर्ताओं के वकील ने यह तर्क दिया कि मुआवज़े की रकम को रोककर रखने का प्रतिवादियों का पूरा कृत्य संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन था। यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ताओं को अधिग्रहित ज़मीनों के लिए मुआवज़ा पाने का अधिकार है, क्योंकि यह संपत्ति के अधिकार का एक अहम पहलू है, जो संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत आता है।

प्रतिवादियों की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि मुआवज़े की राशि जारी करने में देरी, भुगतान प्रक्रिया से जुड़ी प्रक्रियात्मक और प्रशासनिक ज़रूरतों के कारण हुई।

दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं की ज़मीन एक सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहित की गई और यह अधिग्रहण 15 मार्च, 2016 के सर्कुलर के अनुसार, आपसी सहमति की नीति के तहत किया गया था। खंडपीठ ने आगे कहा कि प्राधिकरण ने मुआवज़े की राशि ₹3.35 करोड़ तय की थी। इसलिए विचार के लिए केवल एक ही मुद्दा बचा था: प्रतिवादियों द्वारा उक्त राशि का भुगतान न करना।

अदालत ने प्रशासनिक देरी के संबंध में प्रतिवादी की दलील खारिज की।

खंडपीठ ने ज़ोर देकर कहा,

"एक बार अधिग्रहण पूरा हो जाने और मुआवज़ा तय हो जाने के बाद प्रतिवादियों का यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वे तत्काल भुगतान सुनिश्चित करें। भुगतान में किसी भी तरह की देरी, वैधानिक योजना के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देती है और ज़मीन मालिकों को गंभीर नुकसान पहुंचाती है।"

खंडपीठ ने इस बात पर प्रकाश डाला कि मुआवज़ा पाने का अधिकार एक संवैधानिक गारंटी है, जो संविधान के अनुच्छेद 300A से प्राप्त होती है। खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि समय पर मुआवज़ा दिए बिना याचिकाकर्ता को उसकी संपत्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है; क्योंकि यह नीति स्वयं ही देरी और विवादों से बचने के लिए त्वरित अधिग्रहण और तत्काल भुगतान की परिकल्पना करती है।

इस प्रकार, अदालत ने कहा,

"एक बार जब प्रतिवादियों ने स्वयं ही मुआवज़े की राशि तय कर ली है और भुगतान का प्रस्ताव आगे बढ़ा दिया है तो उस राशि को रोकने का कोई भी औचित्य नहीं बचता। प्रशासनिक अक्षमताओं या प्रक्रियात्मक देरी को याचिकाकर्ताओं के कानूनी और संवैधानिक अधिकारों पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"

इसलिए खंडपीठ ने याचिका स्वीकार की और प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे 8 सप्ताह की अवधि के भीतर मुआवज़े की राशि जारी करने और वितरित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएं।

Case Title: Shanti Singh v State of Madhya Pradesh, WP-15538-2026

Wednesday, 3 June 2026

Hindu Succession Act | बिना वसीयत उत्तराधिकार के बाद कोई भी सह-उत्तराधिकारी 'कर्ता' के तौर पर काम करते हुए दूसरों के हिस्से नहीं बेच सकता: सुप्रीम कोर्ट

Hindu Succession Act | बिना वसीयत उत्तराधिकार के बाद कोई भी सह-उत्तराधिकारी 'कर्ता' के तौर पर काम करते हुए दूसरों के हिस्से नहीं बेच सकता: सुप्रीम कोर्ट 2026-06-02 

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (1 जून) को यह फैसला सुनाया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act) के तहत बिना वसीयत वाली संपत्ति का उत्तराधिकार पाने वाले लोग उस संपत्ति को 'टेनेंट्स-इन-कॉमन' (साझा हिस्सेदार) के तौर पर रखते हैं, जिसमें उनके हिस्से तय होते हैं, न कि 'संयुक्त पारिवारिक संपत्ति' के तौर पर। नतीजतन, कोई भी सह-उत्तराधिकारी दूसरों की ओर से संपत्ति का निपटारा (बेच या हस्तांतरित) नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसे मामलों में 'कर्ता' की अवधारणा लागू नहीं होती।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। इस मामले में जब एक हिंदू पुरुष की बिना वसीयत मृत्यु हो गई तो उसकी दूसरी पत्नी के साथ-साथ पहली पत्नी से हुई चार बेटियां भी उसकी संपत्ति में बराबर हिस्से की हकदार थीं - यानी, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार संपत्ति में 1/5वां हिस्सा।

यह विवाद 1972 में स्वर्गीय दाजीबा की चार बेटियों द्वारा अपनी सौतेली मां (दारूबाई, दाजीबा की दूसरी पत्नी और सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता) के खिलाफ दायर बंटवारे के मुकदमे से शुरू हुआ था। बेटियों ने मुकदमे वाली संपत्तियों - जिसमें महाराष्ट्र में कृषि भूमि और घर शामिल थे - में 4/5वें हिस्से का दावा किया। उन्होंने तर्क दिया कि वे और विधवा दाजीबा के 'प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी' (Class I heirs) हैं। ट्रायल कोर्ट ने बेटियों के पक्ष में फैसला सुनाया। हालांकि, पहली अपीलीय अदालत ने 'कानूनी आवश्यकता' के आधार पर किसी तीसरे पक्ष को की गई बिक्री के संबंध में विधवा के बचाव को आंशिक रूप से स्वीकार किया था, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बहाल कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि क्या विधवा 'कर्ता' के तौर पर 'कानूनी आवश्यकता के सिद्धांत' का हवाला दे सकती है, और क्या उत्तराधिकारियों को संपत्ति 'संयुक्त किरायेदार' (Joint Tenants) के तौर पर मिली है या 'साझा हिस्सेदार' (Tenants-in-Common) के तौर पर।

विवादित फैसला रद्द करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि मुकदमे के पक्षकार संपत्ति को 'संयुक्त किरायेदार' के तौर पर नहीं रखते हैं - जो कि स्वामित्व का एक ऐसा रूप है, जिसमें अलग-अलग व्यक्तिगत हिस्सों के बिना एक ही एकीकृत हित होता है - बल्कि वे इसे 'साझा हिस्सेदार' (Tenants-in-Common) के तौर पर रखते हैं। इसमें प्रत्येक उत्तराधिकारी का अपना अलग और विशिष्ट हिस्सा होता है, जो आगे चलकर उनके अपने उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित होने के योग्य होता है। इसका मतलब है कि किसी एक सह-मालिक की मृत्यु होने पर उसका हिस्सा उत्तराधिकार कानून के अनुसार उसके अपने उत्तराधिकारियों को मिल जाता है।

Friday, 29 May 2026

सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेश निर्णय टाइमलाइन में करें 10 बाध्यकारी दिशानिर्देश (Binding Guidelines) जारी किए

W.P.(Crl.) No. 169/2025 – Pila Pahan @ Peela Pahan v. State of Jharkhand में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 10 बाध्यकारी दिशानिर्देश (Binding Guidelines) जारी किए, उनका संक्षिप्त एवं व्यावहारिक हिंदी सार इस प्रकार है:

1. आरक्षित निर्णय 3 माह के भीतर- किसी भी उच्च न्यायालय द्वारा निर्णय सुरक्षित (Reserved) किए जाने के बाद सामान्यतः 3 माह के भीतर निर्णय सुनाना अनिवार्य होगा।

2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों में शीघ्र निर्णय- जमानत, हिरासत, आपराधिक अपील तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में 3 माह की प्रतीक्षा भी नहीं की जानी चाहिए, बल्कि प्राथमिकता से निर्णय दिया जाना चाहिए।

3. जमानत आदेश उसी दिन या अगले दिन- यदि जमानत आवेदन पर आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे उसी दिन अथवा अधिकतम अगले दिन सुनाया जाना चाहिए।

4. जमानत आदेश तुरंत जेल भेजा जाए- जमानत आदेश पारित होते ही उसकी सूचना उसी दिन जेल अधिकारियों को भेजी जाएगी।

5. विचाराधीन बंदी (Undertrial) की तत्काल रिहाई- जमानत मिलने के बाद बंदी को उसी दिन, अथवा विशेष परिस्थितियों में अधिकतम अगले दिन रिहा किया जाना चाहिए।

6. ट्रायल कोर्ट अनुपालन रिपोर्ट भेजे- जमानत आदेश के पालन की सूचना संबंधित ट्रायल कोर्ट द्वारा उच्च न्यायालय को भेजी जाएगी।

7. केवल ऑपरेटिव भाग सुनाना पर्याप्त, पर कारणयुक्त निर्णय 7 दिन में न्यायालय खुली अदालत में केवल अंतिम निष्कर्ष (Operative Part) सुना सकता है, लेकिन विस्तृत कारणयुक्त निर्णय 7 दिनों के भीतर अपलोड करना होगा।

8. 3 माह बाद मुख्य न्यायाधीश की निगरानी, यदि 3 माह के भीतर निर्णय नहीं सुनाया जाता: तो रजिस्ट्रार जनरल मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखेगा। मुख्य न्यायाधीश अधिकतम 2 सप्ताह का अतिरिक्त समय दे सकते हैं। फिर भी निर्णय नहीं आने पर मामला दूसरी पीठ को आवंटित किया जा सकता है।

9. कारणयुक्त निर्णय अपलोड न होने पर पक्षकार का अधिकार- यदि ऑपरेटिव भाग सुनाए जाने के 15 दिन बाद भी कारणयुक्त निर्णय अपलोड नहीं होता, तो पक्षकार आवेदन दे सकता है। यदि 30 दिन बाद भी निर्णय अपलोड नहीं होता, तो पक्षकार मामला वापस लेकर दूसरी पीठ के समक्ष सुनवाई हेतु आवेदन कर सकता है।

10. वेबसाइट पर Reserved Date प्रदर्शित हो- बहस पूरी होने के बाद जिस दिन निर्णय सुरक्षित रखा जाए, वह तिथि उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर प्रदर्शित की जाएगी अधिवक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदु, अब यदि: कोई आपराधिक अपील 3 माह से अधिक समय से आरक्षित है, जमानत आदेश सुनाया नहीं जा रहा, केवल ऑपरेटिव भाग सुनाया गया है लेकिन कारणयुक्त आदेश नहीं दिया जा रहा, या निर्णय वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया,

तो इस निर्णय Pila Pahan @ Peela Pahan v. State of Jharkhand का हवाला देकर उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रभावी राहत मांगी जा सकती है।

यह निर्णय न्यायिक जवाबदेही, समयबद्ध न्याय और विशेष रूप से आपराधिक मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक निर्णय माना जाएगा।

 W.P.(Crl.) No. 169/2025

Case Title – Pila Pahan@Peela Pahan and Ors. v. State of Jharkhand and Anr.



लाइव ला 


सुप्रीम कोर्ट ने निर्देशों का एक सेट जारी किया, जिसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विचाराधीन कैदी और दोषी, अदालतों द्वारा उन्हें ज़मानत दिए जाने, उनकी सज़ा निलंबित किए जाने या उन्हें बरी किए जाने के बाद बिना किसी देरी के जेल से रिहा हो जाएं।

यह मानते हुए कि अनुकूल न्यायिक आदेश मिलने के बावजूद कैदी अक्सर कई दिनों तक जेल में ही बंद रहते हैं, कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट्स को ऐसे आदेशों को सुनाने, उनकी जानकारी देने और उन्हें लागू करने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा कि एक बार ज़मानत याचिका पर सुनवाई हो जाने के बाद आदेश को उसी दिन सुनाया जाना और वेबसाइट पर अपलोड किया जाना बेहतर होगा। यदि मामले में आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो कोर्ट ने कहा कि उम्मीद है कि आदेश अगले दिन सुनाया जाएगा और उसके तुरंत बाद कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाएगा।

प्रशासनिक देरी के कारण ज़मानत का मकसद विफल न हो, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि नियमित ज़मानत देने, सज़ा निलंबित करने, या हिरासत में मौजूद किसी दोषी को बरी करने वाले आदेशों की जानकारी, जिस दिन वे सुनाए जाते हैं, उसी दिन जेल अधिकारियों और निचली अदालत को दी जानी चाहिए।

कोर्ट ने आगे निर्देश दिया कि ऐसी जानकारी मिलने के बाद विचाराधीन कैदी या दोषी को उसी दिन, या ज़्यादा से ज़्यादा अगले दिन रिहा कर दिया जाना चाहिए। इसके एकमात्र अपवाद वे स्थितियाँ होंगी जहाँ कैदी को किसी अन्य मामले में हिरासत में लिया जाना आवश्यक हो, या जहां ज़मानत की शर्तें और अन्य प्रक्रियात्मक आवश्यकताएँ पूरी करने में देरी हो रही हो।

रिहाई के आदेशों को लागू करने में जवाबदेही पर ज़ोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट ट्रायल कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट की उस पीठ को दी जानी चाहिए, जिसने ज़मानत, सज़ा निलंबन या बरी करने का आदेश पारित किया था।

ये निर्देश चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ द्वारा सुरक्षित रखे गए मामलों में फ़ैसले सुनाने में होने वाली देरी से बचने के लिए हाईकोर्ट को दिए गए दिशानिर्देशों के हिस्से के रूप में जारी किए गए। खंडपीठ ने हाईकोर्ट के लिए सुरक्षित रखे गए मामलों में फ़ैसले सुनाने के लिए 3 महीने की समय सीमा तय की।

कैदियों की रिहाई से संबंधित प्रासंगिक निर्देश इस प्रकार हैं:

1. जैसे ही ज़मानत याचिका पर सुनवाई पूरी हो, आदेश को उसी दिन सुनाया जाना और वेबसाइट पर अपलोड किया जाना बेहतर होगा। यदि आदेश सुरक्षित रखा जाता है तो उम्मीद है कि इसे अगले दिन सुनाया जाएगा और वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा।

2. रेगुलर ज़मानत देने, सज़ा निलंबित करने, या हिरासत में बंद किसी दोषी को बरी करने वाले आदेशों की जानकारी जेल अधिकारियों और ट्रायल कोर्ट को उसी दिन दी जानी चाहिए, जिस दिन वे सुनाए जाते हैं।

3. ऊपर दिए गए निर्देश के नतीजे के तौर पर, विचाराधीन कैदी/दोषी को उसी दिन, या ज़्यादा से ज़्यादा अगले दिन रिहा कर दिया जाना चाहिए; सिवाय इसके कि उन्हें किसी दूसरे मामले में हिरासत में लिए जाने की ज़रूरत हो, या ज़मानत की शर्तों का पालन करने में कोई देरी हो, वगैरह।

इस आदेश के पालन की रिपोर्ट ट्रायल कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट की उस बेंच को दी जानी चाहिए, जिसने यह आदेश पारित किया था।

Case Title – Pila Pahan@Peela Pahan and Ors. v. State of Jharkhand and Anr.

Thursday, 21 May 2026

समान आरोपों में सह-आरोपी डिस्चार्ज हो चुके हों तो एक आरोपी पर अकेले मुकदमा नहीं चल सकता : सुप्रीम कोर्ट 20 May 2026

समान आरोपों में सह-आरोपी डिस्चार्ज हो चुके हों तो एक आरोपी पर अकेले मुकदमा नहीं चल सकता : सुप्रीम कोर्ट 20 May 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि समान परिस्थितियों वाले सह-आरोपियों (Co-Accused) को पहले ही डिस्चार्ज किया जा चुका है, तो केवल एक आरोपी के खिलाफ मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्य अन्य आरोपियों की तुलना में अधिक मजबूत न हों। अदालत ने कहा कि समान आरोपों वाले व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाना आपराधिक न्यायशास्त्र (Criminal Jurisprudence) का मूल सिद्धांत है। 

सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा सही ठहराई जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ओडिशा के एक Forest Range Officer से जुड़े भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश मामले की सुनवाई कर रही थी। आरोप था कि अधिकारी ने अन्य अधिकारियों के साथ मिलकर कालिमेला और चित्रकोंडा क्षेत्रों में अवैध पेड़ कटाई की अनुमति दी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के आरोप केवल सामान्य और अस्पष्ट (Vague & Omnibus) थे और उनमें आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका स्पष्ट रूप से नहीं बताई गई थी। 

अदालत ने कहा कि मामले में दो वरिष्ठ भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारियों को पहले ही डिस्चार्ज किया जा चुका है, जबकि निर्णय प्रक्रिया में उनकी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण थी। ऐसे में केवल एक अधिकारी के खिलाफ मुकदमा जारी रखना मनमाना होगा और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक मुकदमे को उत्पीड़न (Oppression) का माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि उपलब्ध सामग्री किसी अपराध की स्पष्ट ओर गंभीर आशंका तक नहीं दिखाती, तो व्यक्ति को अनावश्यक रूप से आपराधिक मुकदमे की कठिन प्रक्रिया से नहीं गुजरना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि कानून निर्दोष व्यक्ति की रक्षा के लिए ढाल (Shield) होना चाहिए, प्रताड़ना का हथियार नहीं। इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने Forest Range Officer के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए कहा कि केवल सामान्य आरोपों के आधार पर मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।


https://hindi.livelaw.in/supreme-court/supreme-court-co-accused-parity-principle-criminal-jurisprudence-article-14-534984

Monday, 11 May 2026

Order VII Rule 11 CPC | यह देखने के लिए कि क्या कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग से छिपाया गया, वाद-पत्र को ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट 2026-05-10

Order VII Rule 11 CPC | यह देखने के लिए कि क्या कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग से छिपाया गया, वाद-पत्र को ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट 2026-05-10 

CPC के आदेश VII नियम 11 के दायरे पर महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को वाद-पत्र की "ध्यान से और पूरी तरह" जांच करनी चाहिए ताकि यह देखा जा सके कि क्या किसी कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए छिपाया गया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर तथ्यों को जान-बूझकर छिपाया गया हो तो वाद-पत्र को खारिज किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा,

"ट्रायल कोर्ट को ऐसे बेतुके मुकदमों को रोकना चाहिए, जो कानून द्वारा वर्जित हैं। साथ ही ऐसे मामलों को भी, जहां कार्रवाई का कारण (Cause of Action) केवल एक भ्रम हो। इसके लिए उन्हें चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के पीछे छिपे सच को उजागर करना होगा और वाद-पत्र तथा उसके साथ लगे दस्तावेजों को ध्यान से और पूरी तरह पढ़ना होगा - बेहतर होगा कि यह काम मुकदमे के शुरुआती चरण में ही कर लिया जाए।"

इस मामले में कोर्ट ने दो आधारों पर वाद-पत्र खारिज किया - पहला, 'बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम' के तहत लगी रोक को छिपाने की कोशिश की गई, जिसके लिए मुकदमे को इस तरह से पेश किया गया जैसे वह किसी वसीयत पर आधारित हो। दूसरा, वादी ने यह तथ्य छिपाया था कि वह वसीयतकर्ता की हत्या का आरोपी है।

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अदालतों को कार्रवाई के असली कारण और चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए गढ़े गए झूठे कारण के बीच फर्क करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि CPC के आदेश VII नियम 11 के तहत जांच करते समय वाद-पत्र के केवल रूप या भाषा पर नहीं, बल्कि उसके मूल तत्व (Substance) पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"अगर चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए कोई मनगढ़ंत कारण खड़ा करके कानून के तहत लगी रोक को छिपाने की कोशिश की जाती है तो कोर्ट के लिए उस वाद-पत्र को खारिज करना अनिवार्य हो जाता है।"

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों का फैसला आमतौर पर मुकदमे के शुरुआती चरण में नहीं किया जा सकता, फिर भी अदालतों को यह जांचने का अधिकार है कि क्या वादी द्वारा किए गए दावे का मूल आधार कानूनी रूप से सही और मान्य है।

न्यायालय ने टिप्पणी की,

“एक बार जब वाद-पत्र (Plaint) संस्थापन के लिए प्रस्तुत किया जाता है तो इसे स्वीकार किए जाने से पहले यह ट्रायल कोर्ट का कर्तव्य है कि वह वाद-पत्र की सामग्री को सत्यापित करे और यह सुनिश्चित करे कि वाद-पत्र को स्वीकार करने से पहले सभी कानूनी आवश्यकताओं को पूरा किया गया। एक ट्रायल कोर्ट यांत्रिक रूप से वाद-पत्र को स्वीकार नहीं कर सकता और वाद को पंजीकृत नहीं कर सकता। वाद-पत्र की स्वीकृति एक यांत्रिक प्रक्रिया नहीं हो सकती, जिसके द्वारा रजिस्ट्री के नोट को न्यायालय द्वारा केवल अनुमोदित कर दिया जाए। यदि, वाद-पत्र की स्वीकृति के चरण पर ट्रायल कोर्ट वाद-पत्र को ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि वाद-पत्र अस्वीकृत किए जाने योग्य है तो वह वाद-पत्र को अस्वीकृत कर देगा। ट्रायल कोर्ट के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह प्रतिवादी के उपस्थित होने और वाद-पत्र की अस्वीकृति की मांग करने की प्रतीक्षा करे। एक बार जब न्यायालय यह पाता है कि वाद तुच्छ है, अधिकार-क्षेत्र से बाहर है, पूर्व-शर्तों का पालन किए बिना दायर किया गया, कार्रवाई का कोई वास्तविक कारण (Cause of Action) प्रकट करने में विफल रहता है, महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाता है, या कानून द्वारा वर्जित है लेकिन कार्रवाई का कारण होने का भ्रम पैदा करने के लिए चालाकी से तैयार किया गया है तो उसे वाद-पत्र को लागत (Costs) सहित अस्वीकृत कर देना चाहिए।”

Cause Title: MANJULA AND OTHERS VERSUS D.A. SRINIVAS