जमानत को रकम जमा करने से नहीं जोड़ा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया सिद्धांत, झारखंड हाइकोर्ट का सशर्त आदेश रद्द 10 Feb 2026
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि नियमित या अग्रिम जमानत को किसी भी प्रकार की धनराशि जमा करने की शर्त से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को दोहराते हुए झारखंड हाइकोर्ट द्वारा पारित सशर्त जमानत आदेशों को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में आरोपियों को जमानत पर रिहा किया जाए। यह मामला एक पिता-पुत्र से जुड़ा है, जिन पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया। शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने क्राफ्ट पेपर खरीदने के बाद 9 लाख का भुगतान नहीं किया। इस संबंध में FIR दर्ज हुई। गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए दोनों आरोपियों ने पहले सेशन कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी दी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद वे झारखंड हाइकोर्ट पहुंचे।
हाइकोर्ट ने 13 जनवरी, 2025 और 14 नवंबर, 2025 को पारित अपने आदेशों में आरोपियों को निर्देश दिया कि वे एक पूरक हलफनामा दाखिल करें, जिसमें यह दर्शाया जाए कि शिकायतकर्ता को 9,12,926.84 का भुगतान कर दिया गया। हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि भुगतान दर्शाने वाला हलफनामा दाखिल नहीं किया गया तो अग्रिम जमानत याचिका स्वतः खारिज मानी जाएगी। बाद में आरोपियों द्वारा समय मांगे जाने पर भी इसी शर्त के साथ उन्हें मोहलत दी गई।
इन आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जहां जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रारंभिक टिप्पणी में ही कहा कि हाइकोर्ट ने असामान्य आदेश पारित किए और वह सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों की अनदेखी करते नजर आते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से अपने हालिया फैसले गजानन दत्तात्रेय गोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य का उल्लेख किया, जिसमें यह साफ कहा गया कि जमानत याचिकाओं का निपटारा मामले के गुण-दोष के आधार पर होना चाहिए न कि आरोपी द्वारा किसी रकम के भुगतान या आश्वासन पर।
अदालत ने निराशा जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद हाइकोर्ट इस प्रकार के आदेश पारित करते जा रहे हैं। कोर्ट ने कहा, “यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस न्यायालय द्वारा बार-बार यह कहे जाने के बावजूद कि नियमित या अग्रिम जमानत को किसी भी राशि के जमा करने की शर्त से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। हाइकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से 9,12,926.84 जमा करने को कहा। हमने अपने निर्णय में बिल्कुल स्पष्ट किया कि यदि जमानत का मामला बनता है तो जमानत दी जानी चाहिए और यदि नहीं बनता तो याचिका खारिज की जा सकती है लेकिन कोर्ट को धनराशि जमा करने जैसी शर्त लगाकर विवेकाधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए।”
इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाइकोर्ट के दोनों सशर्त आदेशों को रद्द किया और निर्देश दिया कि यदि आरोपियों को गिरफ्तार किया जाता है तो उन्हें जांच अधिकारी द्वारा लगाई जाने वाली सामान्य शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा किया जाए। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस आदेश की एक प्रति झारखंड हाइकोर्ट के मुख्य जस्टिस के समक्ष रखी जाए ताकि इस प्रकार के आदेशों पर भविष्य में रोक लगाई जा सके।
केस-लॉ नोट
Prantik Kumar & Anr. v. State of Jharkhand & Anr.
SLP (Crl.) Diary No. 4297/2026
निर्णय दिनांक: फरवरी, 2026 (Supreme Court of India)
✦ प्रतिपादित विधिक सिद्धांत:
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया कि जमानत (Bail) को किसी धनराशि के जमा करने की शर्त से नहीं जोड़ा जा सकता। न्यायालय ने कहा कि जमानत का उद्देश्य अभियुक्त की न्यायालय में उपस्थिति सुनिश्चित करना है, न कि किसी प्रकार की वसूली (recovery) या क्षतिपूर्ति (compensation) करवाना।
झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा जमानत आदेश में लगभग ₹9,00,000/- जमा करने की शर्त लगाई गई थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने विधि-विरुद्ध और न्यायसंगत सिद्धांतों के विपरीत माना। न्यायालय ने दोहराया कि जमानत आदेश में ऐसी मौद्रिक शर्तें आपराधिक न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांतों को विकृत (distort) कर सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि जमानत प्रदान करते समय न्यायालय को केवल अपराध की प्रकृति, आरोप की गंभीरता, साक्ष्य की स्थिति, अभियुक्त के फरार होने या साक्ष्य से छेड़छाड़ की संभावना जैसे वैधानिक मानकों पर विचार करना चाहिए। जमानत को दंडात्मक या वसूली के साधन में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।
अतः उक्त प्रकरण में उच्च न्यायालय का सशर्त आदेश निरस्त कर दिया गया और बिना धनराशि जमा करने की शर्त के जमानत प्रदान की गई।