Friday, 29 May 2026

सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेश निर्णय टाइमलाइन में करें 10 बाध्यकारी दिशानिर्देश (Binding Guidelines) जारी किए

W.P.(Crl.) No. 169/2025 – Pila Pahan @ Peela Pahan v. State of Jharkhand में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 10 बाध्यकारी दिशानिर्देश (Binding Guidelines) जारी किए, उनका संक्षिप्त एवं व्यावहारिक हिंदी सार इस प्रकार है:

1. आरक्षित निर्णय 3 माह के भीतर- किसी भी उच्च न्यायालय द्वारा निर्णय सुरक्षित (Reserved) किए जाने के बाद सामान्यतः 3 माह के भीतर निर्णय सुनाना अनिवार्य होगा।

2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों में शीघ्र निर्णय- जमानत, हिरासत, आपराधिक अपील तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में 3 माह की प्रतीक्षा भी नहीं की जानी चाहिए, बल्कि प्राथमिकता से निर्णय दिया जाना चाहिए।

3. जमानत आदेश उसी दिन या अगले दिन- यदि जमानत आवेदन पर आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे उसी दिन अथवा अधिकतम अगले दिन सुनाया जाना चाहिए।

4. जमानत आदेश तुरंत जेल भेजा जाए- जमानत आदेश पारित होते ही उसकी सूचना उसी दिन जेल अधिकारियों को भेजी जाएगी।

5. विचाराधीन बंदी (Undertrial) की तत्काल रिहाई- जमानत मिलने के बाद बंदी को उसी दिन, अथवा विशेष परिस्थितियों में अधिकतम अगले दिन रिहा किया जाना चाहिए।

6. ट्रायल कोर्ट अनुपालन रिपोर्ट भेजे- जमानत आदेश के पालन की सूचना संबंधित ट्रायल कोर्ट द्वारा उच्च न्यायालय को भेजी जाएगी।

7. केवल ऑपरेटिव भाग सुनाना पर्याप्त, पर कारणयुक्त निर्णय 7 दिन में न्यायालय खुली अदालत में केवल अंतिम निष्कर्ष (Operative Part) सुना सकता है, लेकिन विस्तृत कारणयुक्त निर्णय 7 दिनों के भीतर अपलोड करना होगा।

8. 3 माह बाद मुख्य न्यायाधीश की निगरानी, यदि 3 माह के भीतर निर्णय नहीं सुनाया जाता: तो रजिस्ट्रार जनरल मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखेगा। मुख्य न्यायाधीश अधिकतम 2 सप्ताह का अतिरिक्त समय दे सकते हैं। फिर भी निर्णय नहीं आने पर मामला दूसरी पीठ को आवंटित किया जा सकता है।

9. कारणयुक्त निर्णय अपलोड न होने पर पक्षकार का अधिकार- यदि ऑपरेटिव भाग सुनाए जाने के 15 दिन बाद भी कारणयुक्त निर्णय अपलोड नहीं होता, तो पक्षकार आवेदन दे सकता है। यदि 30 दिन बाद भी निर्णय अपलोड नहीं होता, तो पक्षकार मामला वापस लेकर दूसरी पीठ के समक्ष सुनवाई हेतु आवेदन कर सकता है।

10. वेबसाइट पर Reserved Date प्रदर्शित हो- बहस पूरी होने के बाद जिस दिन निर्णय सुरक्षित रखा जाए, वह तिथि उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर प्रदर्शित की जाएगी अधिवक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदु, अब यदि: कोई आपराधिक अपील 3 माह से अधिक समय से आरक्षित है, जमानत आदेश सुनाया नहीं जा रहा, केवल ऑपरेटिव भाग सुनाया गया है लेकिन कारणयुक्त आदेश नहीं दिया जा रहा, या निर्णय वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया,

तो इस निर्णय Pila Pahan @ Peela Pahan v. State of Jharkhand का हवाला देकर उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रभावी राहत मांगी जा सकती है।

यह निर्णय न्यायिक जवाबदेही, समयबद्ध न्याय और विशेष रूप से आपराधिक मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक निर्णय माना जाएगा।

 W.P.(Crl.) No. 169/2025

Case Title – Pila Pahan@Peela Pahan and Ors. v. State of Jharkhand and Anr.

Thursday, 21 May 2026

समान आरोपों में सह-आरोपी डिस्चार्ज हो चुके हों तो एक आरोपी पर अकेले मुकदमा नहीं चल सकता : सुप्रीम कोर्ट 20 May 2026

समान आरोपों में सह-आरोपी डिस्चार्ज हो चुके हों तो एक आरोपी पर अकेले मुकदमा नहीं चल सकता : सुप्रीम कोर्ट 20 May 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि समान परिस्थितियों वाले सह-आरोपियों (Co-Accused) को पहले ही डिस्चार्ज किया जा चुका है, तो केवल एक आरोपी के खिलाफ मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्य अन्य आरोपियों की तुलना में अधिक मजबूत न हों। अदालत ने कहा कि समान आरोपों वाले व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाना आपराधिक न्यायशास्त्र (Criminal Jurisprudence) का मूल सिद्धांत है। 

सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा सही ठहराई जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ओडिशा के एक Forest Range Officer से जुड़े भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश मामले की सुनवाई कर रही थी। आरोप था कि अधिकारी ने अन्य अधिकारियों के साथ मिलकर कालिमेला और चित्रकोंडा क्षेत्रों में अवैध पेड़ कटाई की अनुमति दी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के आरोप केवल सामान्य और अस्पष्ट (Vague & Omnibus) थे और उनमें आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका स्पष्ट रूप से नहीं बताई गई थी। 

अदालत ने कहा कि मामले में दो वरिष्ठ भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारियों को पहले ही डिस्चार्ज किया जा चुका है, जबकि निर्णय प्रक्रिया में उनकी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण थी। ऐसे में केवल एक अधिकारी के खिलाफ मुकदमा जारी रखना मनमाना होगा और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक मुकदमे को उत्पीड़न (Oppression) का माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि उपलब्ध सामग्री किसी अपराध की स्पष्ट ओर गंभीर आशंका तक नहीं दिखाती, तो व्यक्ति को अनावश्यक रूप से आपराधिक मुकदमे की कठिन प्रक्रिया से नहीं गुजरना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि कानून निर्दोष व्यक्ति की रक्षा के लिए ढाल (Shield) होना चाहिए, प्रताड़ना का हथियार नहीं। इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने Forest Range Officer के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए कहा कि केवल सामान्य आरोपों के आधार पर मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।


https://hindi.livelaw.in/supreme-court/supreme-court-co-accused-parity-principle-criminal-jurisprudence-article-14-534984

Monday, 11 May 2026

Order VII Rule 11 CPC | यह देखने के लिए कि क्या कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग से छिपाया गया, वाद-पत्र को ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट 2026-05-10

Order VII Rule 11 CPC | यह देखने के लिए कि क्या कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग से छिपाया गया, वाद-पत्र को ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट 2026-05-10 

CPC के आदेश VII नियम 11 के दायरे पर महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को वाद-पत्र की "ध्यान से और पूरी तरह" जांच करनी चाहिए ताकि यह देखा जा सके कि क्या किसी कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए छिपाया गया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर तथ्यों को जान-बूझकर छिपाया गया हो तो वाद-पत्र को खारिज किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा,

"ट्रायल कोर्ट को ऐसे बेतुके मुकदमों को रोकना चाहिए, जो कानून द्वारा वर्जित हैं। साथ ही ऐसे मामलों को भी, जहां कार्रवाई का कारण (Cause of Action) केवल एक भ्रम हो। इसके लिए उन्हें चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के पीछे छिपे सच को उजागर करना होगा और वाद-पत्र तथा उसके साथ लगे दस्तावेजों को ध्यान से और पूरी तरह पढ़ना होगा - बेहतर होगा कि यह काम मुकदमे के शुरुआती चरण में ही कर लिया जाए।"

इस मामले में कोर्ट ने दो आधारों पर वाद-पत्र खारिज किया - पहला, 'बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम' के तहत लगी रोक को छिपाने की कोशिश की गई, जिसके लिए मुकदमे को इस तरह से पेश किया गया जैसे वह किसी वसीयत पर आधारित हो। दूसरा, वादी ने यह तथ्य छिपाया था कि वह वसीयतकर्ता की हत्या का आरोपी है।

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अदालतों को कार्रवाई के असली कारण और चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए गढ़े गए झूठे कारण के बीच फर्क करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि CPC के आदेश VII नियम 11 के तहत जांच करते समय वाद-पत्र के केवल रूप या भाषा पर नहीं, बल्कि उसके मूल तत्व (Substance) पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"अगर चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए कोई मनगढ़ंत कारण खड़ा करके कानून के तहत लगी रोक को छिपाने की कोशिश की जाती है तो कोर्ट के लिए उस वाद-पत्र को खारिज करना अनिवार्य हो जाता है।"

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों का फैसला आमतौर पर मुकदमे के शुरुआती चरण में नहीं किया जा सकता, फिर भी अदालतों को यह जांचने का अधिकार है कि क्या वादी द्वारा किए गए दावे का मूल आधार कानूनी रूप से सही और मान्य है।

न्यायालय ने टिप्पणी की,

“एक बार जब वाद-पत्र (Plaint) संस्थापन के लिए प्रस्तुत किया जाता है तो इसे स्वीकार किए जाने से पहले यह ट्रायल कोर्ट का कर्तव्य है कि वह वाद-पत्र की सामग्री को सत्यापित करे और यह सुनिश्चित करे कि वाद-पत्र को स्वीकार करने से पहले सभी कानूनी आवश्यकताओं को पूरा किया गया। एक ट्रायल कोर्ट यांत्रिक रूप से वाद-पत्र को स्वीकार नहीं कर सकता और वाद को पंजीकृत नहीं कर सकता। वाद-पत्र की स्वीकृति एक यांत्रिक प्रक्रिया नहीं हो सकती, जिसके द्वारा रजिस्ट्री के नोट को न्यायालय द्वारा केवल अनुमोदित कर दिया जाए। यदि, वाद-पत्र की स्वीकृति के चरण पर ट्रायल कोर्ट वाद-पत्र को ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि वाद-पत्र अस्वीकृत किए जाने योग्य है तो वह वाद-पत्र को अस्वीकृत कर देगा। ट्रायल कोर्ट के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह प्रतिवादी के उपस्थित होने और वाद-पत्र की अस्वीकृति की मांग करने की प्रतीक्षा करे। एक बार जब न्यायालय यह पाता है कि वाद तुच्छ है, अधिकार-क्षेत्र से बाहर है, पूर्व-शर्तों का पालन किए बिना दायर किया गया, कार्रवाई का कोई वास्तविक कारण (Cause of Action) प्रकट करने में विफल रहता है, महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाता है, या कानून द्वारा वर्जित है लेकिन कार्रवाई का कारण होने का भ्रम पैदा करने के लिए चालाकी से तैयार किया गया है तो उसे वाद-पत्र को लागत (Costs) सहित अस्वीकृत कर देना चाहिए।”

Cause Title: MANJULA AND OTHERS VERSUS D.A. SRINIVAS

Friday, 1 May 2026

तलाक वाद में मुद्दे तय किए बिना निर्णय देना केवल अनुमान आधारित आकलन: पटना हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया

 तलाक वाद में मुद्दे तय किए बिना निर्णय देना केवल अनुमान आधारित आकलन: पटना हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक संबंधी वाद में यदि ट्रायल कोर्ट स्पष्ट मुद्दे तय किए बिना निर्णय देता है तो ऐसा निर्णय विधिसम्मत नहीं माना जा सकता और वह केवल “अनुमान आधारित आकलन” बनकर रह जाता है।


जस्टिस नानी टैगिया और जस्टिस आलोक कुमार पांडे की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए मुजफ्फरपुर फैमिली कोर्ट द्वारा पति की तलाक याचिका खारिज करने का आदेश रद्द किया। निर्णय जस्टिस आलोक कुमार पांडे ने लिखा।


पति ने क्रूरता, परित्याग और व्यभिचार के आधार पर विवाह विच्छेद की मांग की थी। उसका कहना था कि जून 2007 में विवाह के बाद कुछ समय साथ रहने के पश्चात पत्नी वैवाहिक घर छोड़कर मायके चली गई और वापस नहीं लौटी।


पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी का किसी अन्य व्यक्ति से अवैध संबंध है तथा समझौते के प्रयासों के बावजूद उसने वैवाहिक जीवन पुनः शुरू करने से इनकार किया।


वहीं पत्नी ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उसे पति और उसके परिवार द्वारा दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया तथा शारीरिक और मानसिक क्रूरता के कारण उसे मायके में शरण लेनी पड़ी। उसने अवैध संबंध के आरोपों को भी निराधार बताया और वैवाहिक जीवन जारी रखने की इच्छा जताई।


हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच करते हुए पाया कि फैमिली कोर्ट ने पक्षकारों की विस्तृत दलीलों और परस्पर विरोधी तथ्यों के बावजूद धारा 13 के वैधानिक आधारों के अनुरूप कोई विशिष्ट मुद्दे तय नहीं किए।


अदालत ने कहा,


“विशिष्ट मुद्दे तय किए बिना दिया गया निष्कर्ष केवल एक अनुमान आधारित आकलन है, जो रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के अनुरूप नहीं है।”


खंडपीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने तथ्यों और साक्ष्यों का समग्र परीक्षण करने के बजाय चुनिंदा परिस्थितियों के आधार पर निष्कर्ष निकाल लिया, जिससे निर्णय प्रक्रिया मूलतः त्रुटिपूर्ण हो गई।


हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक जैसे मामलों में, विशेषकर जब क्रूरता, परित्याग और व्यभिचार जैसे गंभीर आरोप हों, ट्रायल कोर्ट का दायित्व है कि वह पक्षकारों की दलीलों के आधार पर स्पष्ट मुद्दे तय करे और प्रत्येक आधार पर स्वतंत्र रूप से साक्ष्य का परीक्षण करे।


इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का निर्णय और डिक्री रद्द करते हुए मामला पुनर्विचार हेतु वापस भेज दिया।


फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के अनुरूप विशिष्ट मुद्दे तय कर मामले का नए सिरे से यथाशीघ्र, अधिमानतः छह माह के भीतर निस्तारण करे।


अदालत ने पक्षकारों को यह स्वतंत्रता भी दी कि वे अपने वर्तमान वैवाहिक स्थिति संबंधी अतिरिक्त अभ्यावेदन ट्रायल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं।

Monday, 27 April 2026

7 साल तक की सजा वाले गैर-जमानती अपराधों में धारा 480(3) BNSS की शर्तें लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट 27 Apr 2026

7 साल तक की सजा वाले गैर-जमानती अपराधों में धारा 480(3) BNSS की शर्तें लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट 27 Apr 2026

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे गैर-जमानती अपराध जिनमें अधिकतम सजा सात वर्ष तक है, उनमें जमानत देते समय Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 480(3) के तहत निर्धारित शर्तें लागू नहीं की जा सकतीं। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोपी को Madhya Pradesh Excise Act (मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम) के तहत अवैध शराब रखने के आरोप में जमानत दी गई थी। इस अपराध में अधिकतम सजा तीन वर्ष निर्धारित है। 

 मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, इंदौर पीठ ने आरोपी की जमानत इस आधार पर रद्द कर दी थी कि उसने धारा 480(3) के तहत लगाई गई शर्तों का उल्लंघन किया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब संबंधित अपराध में सजा सात वर्ष से कम है, तो धारा 480(3) की शर्तें प्रारंभ से ही लागू नहीं होतीं। इसलिए इन शर्तों के उल्लंघन के आधार पर जमानत रद्द करना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने कहा कि धारा 480(3) के तहत शर्तें केवल उन्हीं गैर-जमानती अपराधों में लागू होती हैं, जिनमें सजा सात वर्ष या उससे अधिक हो। चूंकि इस मामले में अधिकतम सजा तीन वर्ष है, इसलिए ऐसी शर्तें लगाना ही विधि के अनुरूप नहीं था। 

 मामले की पृष्ठभूमि में, आरोपी को पहले हाईकोर्ट ने जमानत देते समय उक्त शर्तों के साथ राहत दी थी। बाद में राज्य ने यह आरोप लगाते हुए जमानत रद्द करने का आवेदन किया कि आरोपी ने दोबारा समान अपराध किया है। इस आधार पर हाईकोर्ट ने जमानत रद्द कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि जब शर्तें ही लागू नहीं थीं, तो उनके उल्लंघन का प्रश्न ही नहीं उठता। इसी आधार पर न्यायालय ने उच्च न्यायालय का आदेश निरस्त करते हुए आरोपी की जमानत बहाल कर दी।


https://hindi.livelaw.in/supreme-court/supreme-court-bail-section-4803-bharatiya-nagarik-suraksha-sanhita-non-bailable-offences-531900

Sunday, 26 April 2026

अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय कोर्ट आरोपी को सरेंडर करने का निर्देश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय कोर्ट आरोपी को सरेंडर करने का निर्देश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

2026-04-26 

सुप्रीम कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय किसी आरोपी को ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश देने का अधिकार कोर्ट के पास नहीं है।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"अगर कोर्ट अग्रिम ज़मानत खारिज करना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है, लेकिन कोर्ट के पास यह कहने का अधिकार नहीं है कि याचिकाकर्ता को अब सरेंडर कर देना चाहिए।"

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ऐसे व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिस पर धोखाधड़ी और जालसाज़ी का आरोप है। यह याचिका झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई, जिसमें उसकी अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज की थी और उसे सरेंडर करके नियमित ज़मानत मांगने के लिए कहा गया था।

शिकायतकर्ता ने 2021 में मजिस्ट्रेट के सामने निजी शिकायत दायर की, जिसमें ज़मीन विवाद के सिलसिले में IPC की धारा 323 (जानबूझकर चोट पहुंचाना), 420 (धोखाधड़ी), 467 (कीमती दस्तावेज़ की जालसाज़ी), 468 (धोखाधड़ी के मकसद से जालसाज़ी), 471 (जाली दस्तावेज़ का इस्तेमाल करना), और 120B (धारा 34 के साथ पठित) के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया।

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दूसरी अग्रिम ज़मानत याचिका इस आधार पर खारिज की कि कोई नई परिस्थितियां सामने नहीं आई थीं। कोर्ट ने अपने पिछले आदेश पर भरोसा किया, जिसमें उसने याचिकाकर्ता की पहली अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज की थी और याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करे और 'सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम CBI' मामले में दिए गए फैसले के अनुसार नियमित ज़मानत मांगे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा निर्देश पूरी तरह से अधिकार क्षेत्र से बाहर था। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई कोर्ट अग्रिम ज़मानत खारिज करने का फैसला करता है तो वह ऐसा कर सकता है, लेकिन वह आरोपी को सरेंडर करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।

कोर्ट ने समझाया कि एक बार जब कोई मजिस्ट्रेट संज्ञान लेता है और प्रक्रिया जारी करता है तो सामान्य तरीका समन जारी करना होता है। साथ ही आरोपी को केवल कोर्ट के सामने पेश होने और कार्यवाही में हिस्सा लेने की ज़रूरत होती है।

CrPC, 1973 की धारा 87 का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि समन के बजाय या उसके अतिरिक्त वारंट केवल तभी जारी किया जा सकता है, जब कोर्ट के पास यह मानने के उचित कारण हों कि आरोपी फरार हो गया है या वह समन का पालन नहीं करेगा, या यदि आरोपी को समन तामील होने के बावजूद बिना किसी उचित कारण के कोर्ट में पेश होने में विफल रहता है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस के पास किसी शिकायत वाले मामले में आरोपी को गिरफ़्तार करने का कोई अधिकार नहीं है, जब तक कि कोर्ट से कोई गैर-जमानती वारंट जारी न हो जाए। कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि CrPC की धारा 202 के तहत जांच के दौरान भी, जहां मजिस्ट्रेट कोई प्रक्रिया शुरू करने से पहले पुलिस रिपोर्ट माँग सकते हैं, पुलिस आरोपी को गिरफ़्तार नहीं कर सकती।

कोर्ट ने पाया कि इस कानूनी स्थिति के बावजूद, अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ियाँ नियमित रूप से दायर की जा रही हैं और उन पर सुनवाई हो रही है - खासकर बिहार और झारखंड में - जिसके चलते बेवजह के मुक़दमे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच रहे हैं।

कोर्ट ने कहा,

"बेवजह अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ियों पर सुनवाई की जाती है, और जब वे खारिज हो जाती हैं तो मुक़दमा लड़ने वालों को इस देश की सबसे बड़ी अदालत तक का सफ़र तय करना पड़ता है। हम हाईकोर्ट को यह भी याद दिलाते हैं कि याचिकाकर्ता को कोर्ट के सामने सरेंडर करके नियमित ज़मानत माँगने का जो निर्देश दिया गया, वह भी पूरी तरह से अधिकार क्षेत्र से बाहर है।"

चूंकि इस मामले में मुक़दमा पहले से ही चल रहा था, इसलिए कोर्ट ने यह देखते हुए याचिका का निपटारा किया कि अब और किसी आदेश की ज़रूरत नहीं है।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस आदेश की एक प्रति बिहार और झारखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जाए, ताकि वे इसे अपने-अपने चीफ जस्टिस के सामने रख सकें। कोर्ट ने राज्य के वकील से यह भी कहा कि वे इस मुद्दे की जांच करें और उसी के अनुसार राज्य को उचित सलाह दें।

Case Title – Om Prakash Chhawnika @ Om Prakash Chabnika @ Om Prakash Chawnika v. State of Jharkhand & Anr.

Friday, 24 April 2026

बार-बार सर्विस के बावजूद खराब बाइक ठीक न करने पर डीलर पर ₹30,000 का मुआवजा

बार-बार सर्विस के बावजूद खराब बाइक ठीक न करने पर डीलर पर ₹30,000 का मुआवजा: उपभोक्ता आयोग 23 Apr 2026

 जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, त्रिशूर ने एक मामले में डीलर को सेवा में कमी का दोषी ठहराते हुए मुआवजा देने का आदेश दिया, क्योंकि वह कई बार सर्विस के बावजूद मोटरसाइकिल की खामियां दूर करने में असफल रहा। शिकायतकर्ता, जो एक दिहाड़ी मजदूर है, ने 6 जनवरी 2021 को ₹87,000 में Hero Passion Pro 110 मोटरसाइकिल खरीदी थी, लेकिन जल्द ही उसमें मीटर और फ्यूल गेज की खराबी, पेट्रोल भरने में दिक्कत, ओवरहीटिंग और लगभग 60 किमी/घंटा की रफ्तार पर नियंत्रण में समस्या जैसी दिक्कतें आने लगीं। 

 कई बार सर्विस कराने के बावजूद समस्याएं बनी रहीं, जिसके बाद उसने उपभोक्ता आयोग का रुख किया। सुनवाई के दौरान विशेषज्ञ जांच में वाहन में तकनीकी खामियां पाई गईं, जबकि डीलर और निर्माता आयोग के समक्ष पेश नहीं हुए और मामला एकतरफा चला। आयोग ने माना कि डीलर द्वारा खामियां दूर न करना सेवा में कमी है, जबकि निर्माता के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला। 

इसके बाद आयोग ने डीलर को ₹20,000 मुआवजा, ₹10,000 मुकदमे का खर्च और शिकायत की तारीख से 9% ब्याज देने का निर्देश दिया।


https://hindi.livelaw.in/consumer-cases/consumer-commission-thrissur-defective-bike-case-service-deficiency-dealer-531476