Thursday, 5 November 2026

विधिवत पंजीकृत दस्तावेज अपने साथ शुद्धता (Presumption of Correctness) की उपधारणा लेकर आता है।

 Kaushik Premkumar Mishra & Anr. v. Kanji Ravaria @ Kanji & Anr.

* न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय

* निर्णय दिनांक: 19 जुलाई 2024

* Citation: 2024 INSC 540

* Civil Appeal No.: 1573 of 2023

* पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह


इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य रूप से पूर्व में निष्पादित विक्रय विलेख, उसके विलंब से पंजीयन, नाबालिग क्रेताओं के अधिकार, नामांतरण (Mutation) तथा बाद के क्रेता के सद्भाविक क्रेता (Bona Fide Purchaser) होने के संबंध में महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं। webapi.sci.gov.in +2

1\. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित प्रमुख विधिक सिद्धांत

इस निर्णय के महत्वपूर्ण सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

 (1) पंजीकृत विक्रय विलेख के पक्ष में शुद्धता की उपधारणा

न्यायालय ने कहा कि विधिवत पंजीकृत दस्तावेज अपने साथ शुद्धता (Presumption of Correctness) की उपधारणा लेकर आता है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 114 के अंतर्गत ऐसी उपधारणा की जा सकती है। इसे केवल संदेह अथवा अनुमान के आधार पर निरस्त नहीं किया जा सकता।

व्यावहारिक महत्व: यदि विक्रय विलेख पंजीकृत है तो उसके निष्पादन एवं प्रतिफल के संबंध में केवल मौखिक संदेह पर्याप्त नहीं होगा। उसके विरुद्ध ठोस साक्ष्य आवश्यक होगा।

(निर्णय का पैरा 30)

 (2) विक्रय विलेख के पंजीयन में 26 वर्ष का विलंब अपने आप में उसे अवैध नहीं बनाता

न्यायालय ने माना कि यदि विक्रय विलेख निष्पादित करके विधिवत पंजीयन हेतु प्रस्तुत कर दिया गया था, लेकिन स्टाम्प शुल्क की कमी के कारण पंजीयन लंबित रहा, तो बाद में कमी पूरी करके उसका पंजीयन कराया जा सकता है।

केवल 26 वर्ष के विलंब के आधार पर विक्रय विलेख को अवैध नहीं कहा जा सकता।

महत्वपूर्ण बात: इस मामले में विलेख 2 दिसंबर 1985 को निष्पादित हुआ, 5 दिसंबर 1985 को पंजीयन हेतु प्रस्तुत हुआ और 14 जून 2011 को पंजीकृत हुआ।

(पैरा 28 एवं 33.8)

 (3) पंजीयन के बाद विक्रय विलेख का प्रभाव निष्पादन की तारीख से माना जाएगा

न्यायालय ने इस मामले में माना कि पूर्व में निष्पादित और पंजीयन हेतु प्रस्तुत विक्रय विलेख के बाद में पंजीकृत होने पर उसका प्रभाव निष्पादन की तारीख से संबंधित होगा।

अर्थात बाद में पंजीयन होने के कारण विक्रेता को बीच की अवधि में संपत्ति पर पुनः स्वामित्व प्राप्त नहीं हो जाता।

(पैरा 33.8 एवं 33.13)

 (4) नामांतरण (Mutation) स्वामित्व का निर्णायक आधार नहीं है

यह निर्णय राजस्व नामांतरण के संबंध में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

केवल इस आधार पर कि खरीदार का नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज नहीं हुआ है, उसका संपत्ति में अर्जित अधिकार समाप्त नहीं हो जाता।

राजस्व अभिलेख में नामांतरण न होना और वैध विक्रय विलेख के माध्यम से स्वामित्व अर्जित करना दो अलग-अलग बातें हैं।

व्यावहारिक महत्व: नामांतरण राजस्व अभिलेख का विषय है। स्वामित्व का निर्धारण सक्षम न्यायालय द्वारा संबंधित दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।

(पैरा 26 एवं 33.13)

 (5) विक्रय विलेख पर प्रतिफल प्राप्त न होने की आपत्ति कौन उठा सकता है?

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि पंजीकृत विक्रय विलेख होने के बावजूद विक्रेता यह कहता है कि उसे विक्रय प्रतिफल प्राप्त नहीं हुआ, तो ऐसी स्थिति में विक्रेता को स्वयं उचित कानूनी कार्यवाही करके उस विक्रय विलेख को चुनौती देनी होगी।

केवल खरीदार के पास भुगतान की रसीद या बैंक दस्तावेज नहीं होने से पंजीकृत विक्रय विलेख स्वतः अवैध नहीं हो जाता।

(पैरा 33.5 एवं 33.6)

 (6) विक्रेता द्वारा न्यायालय में साक्ष्य न देना उसके विरुद्ध महत्वपूर्ण परिस्थिति हो सकती है

इस मामले में मूल विक्रेता ने:

* अपने लिखित कथन में विक्रय विलेख का स्पष्ट खंडन नहीं किया।

* वादी के साक्ष्य का प्रतिपरीक्षण नहीं किया।

* स्वयं साक्ष्य देने के लिए न्यायालय में उपस्थित नहीं हुआ।

* अपने कथनों के समर्थन में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि केवल अस्पष्ट कथन कि उसे विक्रय विलेख निष्पादित करना याद नहीं है, निष्पादन का स्पष्ट खंडन नहीं माना जा सकता।

(पैरा 29 एवं 31)

 (7) पहले विक्रय के बाद उसी संपत्ति का दोबारा विक्रय करना

यह इस निर्णय का अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है।

यदि विक्रेता पहले ही संपत्ति का वैध विक्रय करके अपने अधिकार हस्तांतरित कर चुका है, तो वह बाद में उसी संपत्ति को किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में पुनः विक्रय नहीं कर सकता।

बाद का खरीदार केवल इस आधार पर संरक्षण प्राप्त नहीं कर सकता कि उसने सद्भावपूर्वक संपत्ति खरीदी है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि Bona Fide Purchaser for Value का सिद्धांत उस व्यक्ति को संरक्षण नहीं देता जिसका विक्रेता पहले ही अपने समस्त अधिकार हस्तांतरित कर चुका हो।

(पैरा 34 एवं 35)

 (8) नाबालिग खरीदार के पक्ष में विक्रय विलेख

न्यायालय ने इस मामले के विशिष्ट तथ्यों में माना कि नाबालिग खरीदार के पक्ष में विक्रय विलेख होने मात्र से वह स्वतः शून्य नहीं हो जाता।

इस मामले में नाबालिग भाई की माता प्राकृतिक संरक्षक के रूप में विक्रय विलेख में उसका प्रतिनिधित्व कर रही थीं। न्यायालय ने यह भी माना कि माता बड़े पुत्र की भी प्राकृतिक संरक्षक थीं।

इसलिए प्रस्तुत मामले में नाबालिग होने का तर्क विक्रय विलेख को निरस्त करने के लिए पर्याप्त नहीं था। (पैरा 33.10 से 33.12)

ध्यान रहे, इस निर्णय को यह सामान्य सिद्धांत नहीं माना जाना चाहिए कि प्रत्येक नाबालिग के पक्ष में किया गया संपत्ति का लेन-देन बिना किसी अतिरिक्त कानूनी परीक्षण के वैध होगा।

 2\. निर्णय का अंतिम आदेश

सर्वोच्च न्यायालय ने:

* बॉम्बे हाईकोर्ट का 9 जून 2022 का निर्णय निरस्त कर दिया।

* प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा पारित निर्णय एवं डिक्री बहाल कर दी।

* वर्ष 2010 में किए गए बाद के विक्रय विलेख को निरस्त करने का आदेश बरकरार रखा।

* दोनों प्रतिवादियों पर कुल ₹10 लाख का अनुकरणीय हर्जाना (Exemplary Costs) लगाया, जिसे दोनों को बराबर-बराबर देना था।

 3\. अधिवक्ताओं के लिए इस निर्णय का व्यावहारिक महत्व

मेरे विचार से यह निर्णय विशेष रूप से निम्नलिखित प्रकार के दीवानी मुकदमों में उपयोगी है:

| विवाद का विषय | निर्णय की उपयोगिता |

| दोहरा विक्रय (Double Sale) | पहले वैध विक्रय के बाद दूसरा विक्रय चुनौती योग्य |

| पंजीयन में विलंब | केवल विलंब से विलेख स्वतः अवैध नहीं |

| नामांतरण विवाद | Mutation नहीं होना स्वामित्व समाप्त नहीं करता |

| विक्रय प्रतिफल | भुगतान न होने की स्पष्ट आपत्ति एवं साक्ष्य आवश्यक |

| पंजीकृत दस्तावेज | शुद्धता की खंडनीय उपधारणा |

| सद्भाविक क्रेता | विक्रेता के पास अधिकार ही नहीं था तो संरक्षण नहीं |

| साक्ष्य का भार | अस्पष्ट खंडन और साक्ष्य न देने का प्रभाव |

 4\. निर्णय का आधिकारिक स्रोत

Supreme Court Original Judgment

2024 INSC 540 · 56 पृष्ठ · निर्णय दिनांक 19.07.2024

[Indian Kanoon पर संपूर्ण निर्णय](https://indiankanoon.org/doc/107394647/?utm_source=chatgpt.com)


कानूनी राय: इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण अनुपात (Ratio Decidendi) यह है कि वैध रूप से निष्पादित एवं पंजीकृत प्रथम विक्रय विलेख के माध्यम से विक्रेता के अधिकार हस्तांतरित हो जाने के बाद, उसी संपत्ति का बाद में किया गया दूसरा विक्रय किसी बाद के खरीदार को केवल Bona Fide Purchaser होने के आधार पर वैध अधिकार प्रदान नहीं कर सकता।


यह निर्णय भूमि के दोहरे विक्रय, पंजीयन विवाद और स्वामित्व संबंधी दीवानी मुकदमों में महत्वपूर्ण नजीर के रूप में उद्धृत किया जा सकता है।


No comments:

Post a Comment