Tuesday, 23 June 2026

पार्टनरशिप एक्ट के तहत वकीलों की पार्टनरशिप फर्म रजिस्टर करने के लिए ट्रेड लाइसेंस की ज़रूरत नहीं: कलकत्ता हाईकोर्ट 23 June 2026

पार्टनरशिप एक्ट के तहत वकीलों की पार्टनरशिप फर्म रजिस्टर करने के लिए ट्रेड लाइसेंस की ज़रूरत नहीं: कलकत्ता हाईकोर्ट  23 June 2026

कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ वकालत का काम करने के लिए बनी पार्टनरशिप फर्म को इंडियन पार्टनरशिप एक्ट, 1932 के तहत रजिस्ट्रेशन के लिए ट्रेड लाइसेंस दिखाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने माना कि पार्टनरशिप फर्मों के रजिस्ट्रेशन से जुड़े कानूनी नियमों में ऐसी कोई शर्त नहीं है। जलपाईगुड़ी में सर्किट बेंच में बैठे जस्टिस बिवास पट्टनायक ने वकील डॉ. अर्जुन चौधरी की रिट याचिका मंज़ूरी की। उन्होंने वेस्ट बंगाल के रजिस्ट्रार ऑफ़ फर्म्स, सोसाइटीज़ एंड नॉन-ट्रेडिंग कॉरपोरेशन्स के उस फ़ैसले को चुनौती दी थी, जिसमें ट्रेड लाइसेंस न होने की वजह से पार्टनरशिप फर्म M/s पिनावा लीगल को रजिस्टर करने से मना कर दिया गया। 

EVM-VVPAT और CCTV फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश कोर्ट ने कहा कि इंडियन पार्टनरशिप एक्ट, 1932 की धारा 58 और 59 पार्टनरशिप फर्म के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को पूरी तरह से तय करती हैं और रजिस्ट्रेशन से पहले ट्रेड लाइसेंस दिखाने की शर्त नहीं रखतीं। याचिकाकर्ता का तर्क था कि एक्ट की धारा 58 के तहत ज़रूरी सभी जानकारी देने के बावजूद, रजिस्ट्रार ने बार-बार एप्लीकेशन पर कार्रवाई करने से मना कर दिया, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि ट्रेड लाइसेंस जमा नहीं किया गया। यह तर्क दिया गया कि एक बार कानूनी ज़रूरतें पूरी हो जाने के बाद धारा 59 रजिस्ट्रार पर यह ज़रूरी ज़िम्मेदारी डालती है कि वह फर्मों के रजिस्टर में बयान की एंट्री करे और रजिस्ट्रेशन का सर्टिफ़िकेट जारी करे। 

 CPIM(L) ने हाईकोर्ट में दी चुनौती याचिका का विरोध करते हुए राज्य ने ट्रेड लाइसेंस की मांग को सही ठहराने के लिए विभागीय गाइडलाइंस और बंगाल पार्टनरशिप रूल्स, 1933 का हवाला दिया। इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने पाया कि न तो पार्टनरशिप एक्ट और न ही बंगाल पार्टनरशिप रूल्स वकालत करने वाली पार्टनरशिप फर्म के रजिस्ट्रेशन के लिए ट्रेड लाइसेंस दिखाने को ज़रूरी बनाते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि एग्जीक्यूटिव निर्देश या विभागीय गाइडलाइंस मुख्य कानून में बताई गई शर्तों के अलावा कोई और शर्त नहीं लगा सकतीं। रजिस्ट्रार की ट्रेड लाइसेंस की मांग को कानूनी रूप से गलत मानते हुए कोर्ट ने अथॉरिटी को निर्देश दिया कि वह ट्रेड लाइसेंस दिखाने की ज़िद किए बिना दो हफ़्ते के अंदर याचिकाकर्ता की एप्लीकेशन (नंबर APP-022334) पर कार्रवाई करे और उसे रजिस्टर करे। 

Case Title: Dr. Arjun Chowdhury v. State of West Bengal & Ors.



Thursday, 11 June 2026

मोटर दुर्घटना प्रकरण| 'होममेकर देश निर्माता हैं': सुप्रीम कोर्ट ने होममेकर के योगदान को ₹30,000 प्रति माह आंका* 11 June 2026

*मोटर दुर्घटना प्रकरण| 'होममेकर देश निर्माता हैं': सुप्रीम कोर्ट ने होममेकर के योगदान को ₹30,000 प्रति माह आंका* 11 June 2026 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना के दावों में होममेकर (घर संभालने वाली महिला) द्वारा दी जाने वाली घरेलू देखभाल का नुकसान हर्जाने का एक अलग और मुआवजा-योग्य आधार है। कोर्ट ने ऐसी घरेलू सेवाओं का मूल्य कम-से-कम ₹30,000 प्रति माह तय किया। मोटर दुर्घटना के दावों से जुड़ी अपील पर फैसला सुनाते हुए *जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह* की बेंच ने कहा कि होममेकर का योगदान घर से कहीं आगे तक जाता है और देश-निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवज़ा तय करते समय होममेकर की मौत या अक्षमता के कारण परिवार को होने वाले घरेलू देखभाल के नुकसान को अलग से मान्यता दी जानी चाहिए। 

 फैसला सुनाते समय जस्टिस करोल ने कहा, *"हमारा यह भी मानना है कि गृहिणी इंसान और देश के विकास में योगदान देती है। होममेकर देश बनाती है। इसलिए हमने सिद्धांत तय किए हैं और देश निर्माता के तौर पर गृहिणी को देखते हुए हमने घरेलू देखभाल के नुकसान की मासिक आय कम से कम ₹30,000 प्रति माह तय की।"* जस्टिस करोल ने कहा कि मोटर दुर्घटना के दावों में मुआवज़ा देने के लिए *'प्रणय सेठी'* फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्यता प्राप्त हर्जाने के आधारों के अलावा *'घरेलू देखभाल का नुकसान'* भी एक आधार होगा। 

 सुप्रीम कोर्ट ने मामला बड़ी बेंच को... जस्टिस करोल ने कहा, "हमें उम्मीद और भरोसा है कि 'होममेकर' शब्द अब 'देश निर्माता' की पहचान भी हासिल कर लेगा।" 2024 में दिए गए एक पिछले अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सोच गलत है कि होममेकर काम नहीं करतीं, और माना कि उनकी मानी गई आय (deemed income) दिहाड़ी मज़दूर के लिए तय न्यूनतम मज़दूरी से कम नहीं होनी चाहिए। मोटर दुर्घटना के दावों में तेज़ी लाने के निर्देश कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवज़ा दावों का तेज़ी से निपटारा सुनिश्चित करने के लिए भी निर्देश जारी किए। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 169 का ज़िक्र करते हुए, जिसमें मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरणों (Tribunals) के समक्ष एक संक्षिप्त प्रक्रिया की परिकल्पना की गई, बेंच ने उम्मीद जताई कि इस प्रावधान को "अक्षरशः और भावना के अनुरूप" लागू किया जाएगा। इसके अलावा, कोर्ट ने उम्मीद जताई कि सभी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मोटर दुर्घटना दावा कार्यवाही की निगरानी करेंगे ताकि समय पर फैसला हो सके और फैसले में तय सिद्धांतों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। 


Case : SHISHUPAL @ SHISH RAM AND ORS. SURJEET AND ORS. v. SURJEET AND ORS | SLP(C) No. 33915/2025

Tuesday, 9 June 2026

सिर्फ़ इसलिए जालसाज़ी नहीं मानी जाएगी कि किसी व्यक्ति ने प्रॉपर्टी पर अपना मालिकाना हक़ बताते हुए कोई डॉक्यूमेंट बनाया हो: सुप्रीम कोर्ट 9 June 2026

सिर्फ़ इसलिए जालसाज़ी नहीं मानी जाएगी कि किसी व्यक्ति ने प्रॉपर्टी पर अपना मालिकाना हक़ बताते हुए कोई डॉक्यूमेंट बनाया हो: सुप्रीम कोर्ट 9 June 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति सिर्फ़ इसलिए जालसाज़ी (Forgery) का दोषी नहीं माना जाएगा कि उसने किसी प्रॉपर्टी पर अपना मालिकाना हक़ बताते हुए कोई डॉक्यूमेंट बनाया है, भले ही बाद में वह दावा कानूनी रूप से गलत साबित हो जाए। कोर्ट ने मोहम्मद इब्राहिम बनाम बिहार राज्य (2009) 8 SCC 751 मामले का हवाला देते हुए कहा, "...जब कोई व्यक्ति किसी प्रॉपर्टी को अपनी बताते हुए कोई डॉक्यूमेंट बनाता है तो सिर्फ़ इसलिए वह 'गलत डॉक्यूमेंट' (False Document) नहीं बन जाता कि उसका दावा बाद में गलत साबित हो जाता है।" मोहम्मद इब्राहिम मामले में यह कहा गया: "जब कोई व्यक्ति ऐसी प्रॉपर्टी के लिए डॉक्यूमेंट बनाता है, जो उसकी नहीं है तो वह यह दावा नहीं कर रहा होता कि वह कोई और है, और न ही वह यह दावा कर रहा होता है कि उसे किसी और ने अधिकृत किया। इसलिए ऐसे डॉक्यूमेंट को बनाना (जिसमें वह ऐसी प्रॉपर्टी का अधिकार देने की बात करता है, जिसका वह मालिक नहीं है) कोड की धारा 464 के तहत 'गलत डॉक्यूमेंट' बनाना नहीं माना जाएगा। अगर बनाया गया डॉक्यूमेंट 'गलत डॉक्यूमेंट' नहीं है तो जालसाज़ी भी नहीं है। अगर जालसाज़ी नहीं है तो कोड की धारा 467 या धारा 471 लागू नहीं होतीं।" जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने एक मामले की सुनवाई की, जिसमें अपीलकर्ताओं ने विवादित प्रॉपर्टी पर अपने मालिकाना हक़ का दावा करते हुए 'पावर ऑफ़ अटॉर्नी' बनाई। जब उनका मालिकाना हक़ का दावा कानूनी रूप से गलत साबित हो गया तो उनके खिलाफ़ जालसाज़ी की आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई। यह कार्यवाही इस आधार पर शुरू की गई कि चूंकि प्रॉपर्टी में उनका कोई वैध मालिकाना हक़ नहीं था, इसलिए जिस डॉक्यूमेंट के ज़रिए उन्होंने ऐसे अधिकारों का दावा किया, वह खुद ही जाली है। अपीलकर्ताओं के खिलाफ़ FIR रद्द करने से इनकार करने वाले गुजरात हाईकोर्ट का फ़ैसला पलटते हुए जस्टिस पंचोली ने अपने फ़ैसले में कहा कि हाईकोर्ट ने गलत आधार पर कार्यवाही की। हाईकोर्ट ने माना था कि अपीलकर्ताओं का दावा गलत साबित होने पर मालिकाना हक़ जताने के लिए उनके द्वारा बनाए गए डॉक्यूमेंट धोखाधड़ी का काम थे। कोर्ट ने कहा कि मालिकाना हक़ का दावा करने के लिए इस्तेमाल किए गए डॉक्यूमेंट को सिर्फ़ इसलिए 'गलत डॉक्यूमेंट' नहीं माना जाएगा कि दावा सफल नहीं हो सका। कोर्ट ने कहा, “हाईकोर्ट ने इस आधार पर कार्रवाई की कि चूंकि आरोपी नंबर 1 से 5 के पास प्रॉपर्टी का मालिकाना हक नहीं था, इसलिए पावर ऑफ अटॉर्नी बनाना और सिविल कार्यवाही शुरू करना जालसाजी (Forgery) माना जाएगा। हमारी राय में, हाईकोर्ट का यह नज़रिया कानूनी रूप से सही नहीं है। IPC की धारा 463 के तहत जालसाजी का मुख्य तत्व IPC की धारा 464 के अर्थ में 'झूठा दस्तावेज़' बनाना है। प्रतिवादी नंबर 2 का यह कहना नहीं है कि पावर ऑफ अटॉर्नी पर मौजूद हस्ताक्षर नकली या बनावटी थे, और न ही यह आरोप लगाया गया कि दस्तावेज़ बनाने वालों की जगह किसी और ने हस्ताक्षर किए या किसी और व्यक्ति का रूप धरकर दस्तावेज़ बनाया गया।” इसके आधार पर अपील मंज़ूर कर ली गई और जालसाजी का मामला रद्द किया गया।

 Cause Title: BHIKHUBHAI GOVINDBHAI PATEL & ANR. VERSUS THE STATE OF GUJARAT & ANR.



Friday, 5 June 2026

पति की दूसरी शादी की केवल जानकारी होना ही अपराध नहीं है। सास, ससुर या अन्य रिश्तेदारों को केवल इस आधार पर आरोपी नहीं बनाया जा सकता कि उन्हें दूसरी शादी की जानकारी थी।

 Sivaraman Nair & Others v. State of Kerala & Another (निर्णय दिनांक 24.04.2026) में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निम्न महत्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए: 

निर्णय का सार (10 बिंदुओं में)

1. पति की दूसरी शादी की केवल जानकारी होना ही अपराध नहीं है। सास, ससुर या अन्य रिश्तेदारों को केवल इस आधार पर आरोपी नहीं बनाया जा सकता कि उन्हें दूसरी शादी की जानकारी थी। 

2. धारा 494 IPC (अब BNS में समकक्ष प्रावधान) के तहत रिश्तेदारों की जिम्मेदारी तभी बनेगी, जब उनके द्वारा दूसरी शादी कराने, उसमें भाग लेने या उसे प्रोत्साहित करने का ठोस साक्ष्य हो। 

3. Mere Knowledge is not Common Intention — केवल जानकारी होना "सामान्य आशय" (Common Intention) सिद्ध नहीं करता। 

4. पति के माता-पिता और बहन के विरुद्ध विशिष्ट (specific) आरोप नहीं थे, केवल सामान्य और व्यापक आरोप लगाए गए थे। 

5. वैवाहिक विवादों में पूरे परिवार को आरोपी बनाने की प्रवृत्ति पर न्यायालय ने चिंता व्यक्त की। 

6. धारा 498A IPC के मामलों में भी केवल "उत्साहवर्धन किया" या "साथ दिया" जैसे सामान्य आरोप पर्याप्त नहीं हैं; प्रत्येक आरोपी की स्पष्ट भूमिका बताना आवश्यक है। 

7. यदि आरोपों से किसी रिश्तेदार की सक्रिय भागीदारी (active involvement) नहीं दिखती, तो उसके विरुद्ध आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है। 

8. न्यायालय ने कहा कि दूसरी शादी के अपराध में मुख्य उत्तरदायित्व उस पति/पत्नी का है जिसने दूसरी शादी की है। 

9. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सास, ससुर और ननद के विरुद्ध कार्यवाही रद्द (quash) कर दी। 

10. किंतु पति के विरुद्ध मामला जारी रहेगा, क्योंकि उसके विरुद्ध विशिष्ट आरोप थे। 

न्यायालय की सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति

> "केवल यह जानकारी होना कि दूसरी शादी हुई है, अपने आप में धारा 494 IPC के तहत दायित्व स्थापित नहीं करता; सक्रिय सहभागिता, सुविधा प्रदान करना या प्रोत्साहन साबित होना चाहिए।" 

यह निर्णय विशेष रूप से उन मामलों में उपयोगी है जहाँ **पति के साथ-साथ सास, ससुर, देवर, ननद आदि को बिना किसी विशिष्ट भूमिका के धारा 494/498A में आरोपी बना दिया जाता है।**

समय पर मुआवज़ा दिए बिना संपत्ति से वंचित करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: एनएच प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट 2026-06-03

 समय पर मुआवज़ा दिए बिना संपत्ति से वंचित करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: एनएच प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट 2026-06-03 

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उस याचिका को मंज़ूरी दी, जिसमें नेशनल हाईवे के निर्माण के लिए ज़मीन अधिग्रहित की गई, लेकिन मुआवज़े की रकम जारी नहीं की गई। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि ज़मीन मालिकों को समय पर मुआवज़ा दिए बिना उनकी संपत्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीज़न बेंच ने यह टिप्पणी की:

"अधिग्रहित ज़मीन के लिए मुआवज़ा पाने का अधिकार सिर्फ़ एक कानूनी हक नहीं है, बल्कि अनुच्छेद 300-A से मिलने वाली एक संवैधानिक गारंटी है। समय पर मुआवज़ा दिए बिना संपत्ति से वंचित करना सत्ता का मनमाना इस्तेमाल माना जाएगा और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। आपसी सहमति से छूटी हुई ज़मीनों के अधिग्रहण से जुड़ी नीति में ही यह प्रावधान है कि देरी और विवादों से बचने के लिए अधिग्रहण तेज़ी से किया जाए और तुरंत भुगतान किया जाए। अगर ज़मीन मालिक, अधिग्रहण के लिए सहमति देने के बाद मुआवज़े के लिए अनिश्चित काल तक इंतज़ार करने पर मजबूर होते हैं तो ऐसी नीति का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।"

एक रिट याचिका दायर की गई, जिसमें 'रिट ऑफ़ मैंडमस' जारी करने की मांग की गई। इस रिट के ज़रिए राज्य सरकार को यह निर्देश देने की मांग की गई कि वह नेशनल हाईवे के निर्माण के लिए ज़मीन अधिग्रहण के बदले याचिकाकर्ताओं के पक्ष में तय की गई मुआवज़े की रकम को जारी करे और वितरित करे।

याचिकाकर्ताओं की ज़मीनें शहडोल ज़िले में हैं। शुरुआत में, उमरिया को शहडोल से जोड़ने वाले हाईवे के निर्माण के लिए किए गए बड़े पैमाने पर ज़मीन अधिग्रहण में इन ज़मीनों को शामिल नहीं किया गया था। बाद में अधिकारियों को पता चला कि प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए याचिकाकर्ताओं की ज़मीनों की ज़रूरत है। इसलिए सड़क परिवहन मंत्रालय ने 15 मार्च, 2016 को एक सर्कुलर जारी किया। इस सर्कुलर में विशेष रूप से यह प्रावधान किया गया कि देरी से बचने के लिए छूटी हुई ज़मीनों का अधिग्रहण आपसी सहमति से किया जाए।

तदनुसार, ज़मीन अधिग्रहण के लिए याचिकाकर्ताओं को ₹3.35 करोड़ की राशि मंज़ूर की गई। रिकॉर्ड से यह भी पता चला कि प्रस्ताव और उसके साथ मंज़ूर की गई राशि, 2 जनवरी, 2026 को भुगतान जारी करने के लिए सक्षम प्राधिकारी को भेज दी गई।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने संबंधित प्राधिकारी को बार-बार अभ्यावेदन (Representations) दिए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। याचिकाकर्ताओं के वकील ने यह तर्क दिया कि मुआवज़े की रकम को रोककर रखने का प्रतिवादियों का पूरा कृत्य संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन था। यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ताओं को अधिग्रहित ज़मीनों के लिए मुआवज़ा पाने का अधिकार है, क्योंकि यह संपत्ति के अधिकार का एक अहम पहलू है, जो संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत आता है।

प्रतिवादियों की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि मुआवज़े की राशि जारी करने में देरी, भुगतान प्रक्रिया से जुड़ी प्रक्रियात्मक और प्रशासनिक ज़रूरतों के कारण हुई।

दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं की ज़मीन एक सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहित की गई और यह अधिग्रहण 15 मार्च, 2016 के सर्कुलर के अनुसार, आपसी सहमति की नीति के तहत किया गया था। खंडपीठ ने आगे कहा कि प्राधिकरण ने मुआवज़े की राशि ₹3.35 करोड़ तय की थी। इसलिए विचार के लिए केवल एक ही मुद्दा बचा था: प्रतिवादियों द्वारा उक्त राशि का भुगतान न करना।

अदालत ने प्रशासनिक देरी के संबंध में प्रतिवादी की दलील खारिज की।

खंडपीठ ने ज़ोर देकर कहा,

"एक बार अधिग्रहण पूरा हो जाने और मुआवज़ा तय हो जाने के बाद प्रतिवादियों का यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वे तत्काल भुगतान सुनिश्चित करें। भुगतान में किसी भी तरह की देरी, वैधानिक योजना के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देती है और ज़मीन मालिकों को गंभीर नुकसान पहुंचाती है।"

खंडपीठ ने इस बात पर प्रकाश डाला कि मुआवज़ा पाने का अधिकार एक संवैधानिक गारंटी है, जो संविधान के अनुच्छेद 300A से प्राप्त होती है। खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि समय पर मुआवज़ा दिए बिना याचिकाकर्ता को उसकी संपत्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है; क्योंकि यह नीति स्वयं ही देरी और विवादों से बचने के लिए त्वरित अधिग्रहण और तत्काल भुगतान की परिकल्पना करती है।

इस प्रकार, अदालत ने कहा,

"एक बार जब प्रतिवादियों ने स्वयं ही मुआवज़े की राशि तय कर ली है और भुगतान का प्रस्ताव आगे बढ़ा दिया है तो उस राशि को रोकने का कोई भी औचित्य नहीं बचता। प्रशासनिक अक्षमताओं या प्रक्रियात्मक देरी को याचिकाकर्ताओं के कानूनी और संवैधानिक अधिकारों पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"

इसलिए खंडपीठ ने याचिका स्वीकार की और प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे 8 सप्ताह की अवधि के भीतर मुआवज़े की राशि जारी करने और वितरित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएं।

Case Title: Shanti Singh v State of Madhya Pradesh, WP-15538-2026

Wednesday, 3 June 2026

Hindu Succession Act | बिना वसीयत उत्तराधिकार के बाद कोई भी सह-उत्तराधिकारी 'कर्ता' के तौर पर काम करते हुए दूसरों के हिस्से नहीं बेच सकता: सुप्रीम कोर्ट

Hindu Succession Act | बिना वसीयत उत्तराधिकार के बाद कोई भी सह-उत्तराधिकारी 'कर्ता' के तौर पर काम करते हुए दूसरों के हिस्से नहीं बेच सकता: सुप्रीम कोर्ट 2026-06-02 

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (1 जून) को यह फैसला सुनाया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act) के तहत बिना वसीयत वाली संपत्ति का उत्तराधिकार पाने वाले लोग उस संपत्ति को 'टेनेंट्स-इन-कॉमन' (साझा हिस्सेदार) के तौर पर रखते हैं, जिसमें उनके हिस्से तय होते हैं, न कि 'संयुक्त पारिवारिक संपत्ति' के तौर पर। नतीजतन, कोई भी सह-उत्तराधिकारी दूसरों की ओर से संपत्ति का निपटारा (बेच या हस्तांतरित) नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसे मामलों में 'कर्ता' की अवधारणा लागू नहीं होती।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। इस मामले में जब एक हिंदू पुरुष की बिना वसीयत मृत्यु हो गई तो उसकी दूसरी पत्नी के साथ-साथ पहली पत्नी से हुई चार बेटियां भी उसकी संपत्ति में बराबर हिस्से की हकदार थीं - यानी, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार संपत्ति में 1/5वां हिस्सा।

यह विवाद 1972 में स्वर्गीय दाजीबा की चार बेटियों द्वारा अपनी सौतेली मां (दारूबाई, दाजीबा की दूसरी पत्नी और सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता) के खिलाफ दायर बंटवारे के मुकदमे से शुरू हुआ था। बेटियों ने मुकदमे वाली संपत्तियों - जिसमें महाराष्ट्र में कृषि भूमि और घर शामिल थे - में 4/5वें हिस्से का दावा किया। उन्होंने तर्क दिया कि वे और विधवा दाजीबा के 'प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी' (Class I heirs) हैं। ट्रायल कोर्ट ने बेटियों के पक्ष में फैसला सुनाया। हालांकि, पहली अपीलीय अदालत ने 'कानूनी आवश्यकता' के आधार पर किसी तीसरे पक्ष को की गई बिक्री के संबंध में विधवा के बचाव को आंशिक रूप से स्वीकार किया था, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बहाल कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि क्या विधवा 'कर्ता' के तौर पर 'कानूनी आवश्यकता के सिद्धांत' का हवाला दे सकती है, और क्या उत्तराधिकारियों को संपत्ति 'संयुक्त किरायेदार' (Joint Tenants) के तौर पर मिली है या 'साझा हिस्सेदार' (Tenants-in-Common) के तौर पर।

विवादित फैसला रद्द करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि मुकदमे के पक्षकार संपत्ति को 'संयुक्त किरायेदार' के तौर पर नहीं रखते हैं - जो कि स्वामित्व का एक ऐसा रूप है, जिसमें अलग-अलग व्यक्तिगत हिस्सों के बिना एक ही एकीकृत हित होता है - बल्कि वे इसे 'साझा हिस्सेदार' (Tenants-in-Common) के तौर पर रखते हैं। इसमें प्रत्येक उत्तराधिकारी का अपना अलग और विशिष्ट हिस्सा होता है, जो आगे चलकर उनके अपने उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित होने के योग्य होता है। इसका मतलब है कि किसी एक सह-मालिक की मृत्यु होने पर उसका हिस्सा उत्तराधिकार कानून के अनुसार उसके अपने उत्तराधिकारियों को मिल जाता है।