भूमि अधिग्रहण कानून के निरस्त होने के बाद जारी हुई अधिसूचना पर कार्रवाई अवैध 2026-07-17
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत जारी अधिसूचना पर भले ही 1 जनवरी 2014 से पहले की तारीख अंकित हो, लेकिन उसका प्रकाशन 1 जनवरी 2014 के बाद हुआ है, तो ऐसी पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू से ही अवैध मानी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुराने कानून के निरस्त होने के बाद उसके तहत नई अधिग्रहण कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।
जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि अधिसूचना पर लिखी तारीख का कोई कानूनी महत्व नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि उसका राजपत्र, समाचार पत्रों और स्थानीय स्तर पर कब प्रकाशन हुआ। इन सभी में सबसे अंतिम प्रकाशन की तारीख ही अधिसूचना के प्रकाशन की प्रभावी तारीख मानी जाएगी।
अदालत ने कहा, "अधिसूचना पर अंकित तारीख अप्रासंगिक है। महत्वपूर्ण उसकी वास्तविक प्रकाशन तिथि है और वही यह तय करेगी कि अधिग्रहण की कार्यवाही कब शुरू हुई।"
मामला लखनऊ के सरोजिनी नगर क्षेत्र स्थित गांव अहमामऊ की भूमि से जुड़ा है। याचिकाकर्ता कंपनी ने वर्ष 2007 में इस भूमि का एक हिस्सा पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से खरीदा था।
भूमि अधिग्रहण के लिए अधिसूचना पर 27 दिसंबर 2013 की तारीख दर्ज थी लेकिन उसका प्रकाशन 2 और 3 जनवरी 2014 को समाचार पत्रों में 4 जनवरी 2014 को राजपत्र में तथा 6 फरवरी 2014 को स्थानीय स्तर पर सार्वजनिक सूचना के रूप में किया गया। इसके बाद जनवरी 2015 में अधिग्रहण की घोषणा जारी की गई और जुलाई 2016 में अवार्ड पारित हुआ जिसे बाद में वर्ष 2022 में संशोधित किया गया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि न तो उसकी भूमि का कब्जा लिया गया और न ही उसे मुआवजा दिया गया। साथ ही पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया ऐसे कानून के तहत चलाई गई, जो 1 जनवरी 2014 से निरस्त हो चुका था इसलिए पूरी कार्रवाई शुरू से ही शून्य है।
वहीं विकास प्राधिकरण ने दलील दी कि अधिसूचना पर 27 दिसंबर 2013 की तारीख होने के कारण अधिग्रहण की प्रक्रिया 1 जनवरी 2014 से पहले ही शुरू हो गई। हालांकि वह यह स्वीकार करने से इनकार नहीं कर सका कि अधिसूचना का वास्तविक प्रकाशन नए कानून के लागू होने के बाद हुआ।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया तभी शुरू मानी जाती है, जब अधिसूचना का विधि के अनुसार प्रकाशन किया जाए। केवल सरकारी स्तर पर लिया गया निर्णय या अधिसूचना पर अंकित तारीख पर्याप्त नहीं होती। जब तक उसका निर्धारित तरीके से प्रकाशन नहीं होता तब तक वह केवल कागजों पर लिया गया निर्णय भर है।
पीठ ने कहा कि 1 जनवरी 2014 से उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 लागू हो गया था, जिसके साथ ही वर्ष 1894 का भूमि अधिग्रहण कानून निरस्त हो गया। चूंकि इस मामले में अधिसूचना का पूरा प्रकाशन 1 जनवरी 2014 के बाद हुआ इसलिए पुराने कानून के तहत अधिग्रहण की कार्रवाई वैध रूप से शुरू ही नहीं हुई।
अदालत ने कहा, "यह वस्तुतः 1 जनवरी 2014 के बाद निरस्त हो चुके अधिनियम 1894 के तहत अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने का मामला है। इसलिए संबंधित अधिसूचनाएं और पूरी प्रक्रिया कानून की नजर में शुरू से ही शून्य और अवैध हैं।"
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वर्ष 2013 का कानून भूमि मालिकों को अधिक न्यायसंगत और उचित मुआवजा देने के उद्देश्य से बनाया गया। इसके बावजूद पुराने कानून के तहत कार्रवाई जारी रखकर अधिकारियों ने याचिकाकर्ता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया।
हालांकि अदालत ने सार्वजनिक हित को देखते हुए पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया रद्द नहीं की। अदालत ने कहा कि भूमि का अधिग्रहण सार्वजनिक सड़क निर्माण के लिए प्रस्तावित है और भूमि का हिस्सा भी छोटा है। इसलिए अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वर्ष 2013 के कानून के अनुसार, फैसले की तारीख पर प्रचलित बाजार दर के आधार पर नया मुआवजा निर्धारित किया जाए- हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक संशोधित मुआवजे का निर्धारण कर उसका भुगतान नहीं किया जाता तब तक संबंधित भूमि का कब्जा नहीं लिया जाएगा। साथ ही पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया।
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प्रकरण का विवरण
प्रकरण: Lohia Developers (India) Pvt. Ltd. v. State of Uttar Pradesh & Others
न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ
रिट याचिका क्रमांक: Writ–C No. 2466 of 2023
निर्णय सुरक्षित: 27.05.2026
निर्णय दिनांक: 03.07.2026 (इस निर्णय की प्रमुख कानूनी रिपोर्ट 17 जुलाई 2026 को प्रकाशित हुई)।
पीठ: न्यायमूर्ति राजन राय एवं न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला।
वाद के तथ्य
भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 4 की अधिसूचना पर दिनांक 27.12.2013 अंकित थी।
किन्तु उसका राजपत्र (Official Gazette) में प्रकाशन 04.01.2014 को हुआ।
इस बीच 01.01.2014 से Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013 लागू हो चुका था तथा 1894 का अधिनियम निरस्त हो चुका था।
इसके बाद धारा 6 की घोषणा 23.01.2015 तथा पुरस्कार (Award) 13.07.2016 को पारित किया गया।
विचारणीय प्रश्न
क्या 1894 के निरस्त अधिनियम के अंतर्गत ऐसी अधिसूचना, जिसका प्रकाशन 01.01.2014 के बाद हुआ, वैध मानी जा सकती है?
न्यायालय का निर्णय
उच्च न्यायालय ने कहा कि—
1. भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही धारा 4 की विधिवत प्रकाशित अधिसूचना से प्रारम्भ होती है।
2. केवल अधिसूचना पर पुरानी तिथि अंकित होने से कार्यवाही वैध नहीं हो जाती।
3. प्रकाशन (Publication) की तिथि ही निर्णायक है।
4. यदि अधिसूचना का प्रकाशन 01.01.2014 के बाद हुआ है, तो वह निरस्त अधिनियम के अंतर्गत जारी मानी जाएगी।
5. ऐसी सम्पूर्ण अधिग्रहण कार्यवाही Void ab initio (प्रारम्भ से ही शून्य) होगी।
न्यायालय द्वारा अपनाए गए प्रमुख सिद्धांत
भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही धारा 4 की अधिसूचना से प्रारम्भ होती है।
प्रकाशन के बिना अधिसूचना प्रभावी नहीं होती।
निरस्त कानून के अंतर्गत बाद में प्रकाशित अधिसूचना कोई वैधानिक अधिकार उत्पन्न नहीं कर सकती।
सामान्य धाराएँ अधिनियम, 1897 की धारा 6 केवल उन्हीं कार्यवाहियों को बचाती है जो निरसन से पहले विधिसम्मत रूप से प्रारम्भ हो चुकी हों।
सर्वोच्च न्यायालय के जिन निर्णयों पर भरोसा किया गया
Indrapuri Griha Nirman Sahkari Samiti Ltd. v. State of Rajasthan, (1975) 4 SCC 296
Laxman Lal v. State of Rajasthan, (2013) 3 SCC 764
V.K.M. Kattha Industries (P) Ltd. v. State of Haryana, (2013) 9 SCC 338
Khub Chand v. State of Rajasthan, AIR 1967 SC 1704
वाद में उद्धृत करने योग्य निष्कर्ष
> "भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के निरस्त हो जाने के पश्चात यदि धारा 4 की अधिसूचना का प्रकाशन किया जाता है, तो केवल उस पर पूर्व की तिथि अंकित होने से अधिग्रहण कार्यवाही वैध नहीं हो जाती। ऐसी कार्यवाही प्रारम्भ से ही शून्य (Void ab initio) है।"
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