Wednesday, 2 September 2026

स्वतंत्र प्रैक्टिस करने वाली वकील को सिर्फ पेशे के आधार पर भरणपोषण से वंचित नहीं किया जा सकता

स्वतंत्र प्रैक्टिस करने वाली वकील को सिर्फ पेशे के आधार पर भरणपोषण से वंचित नहीं किया जा सकता: तेलंगाना हाईकोर्ट  24 Aug 2026

तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा है कि सिर्फ अधिवक्ता के रूप में नामांकित होने और स्वतंत्र रूप से वकालत करने से यह साबित नहीं होता कि पत्नी की पर्याप्त स्वतंत्र आय है और उसे हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत भरणपोषण नहीं दिया जाना चाहिए। जस्टिस वाकिति रामकृष्ण रेड्डी ने पत्नी की रिव्यू याचिका मंजूर करते हुए हाईकोर्ट के अक्टूबर 2024 के उस आदेश को वापस ले लिया, जिसमें फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए ₹20,000 प्रतिमाह अंतरिम भरणपोषण को रद्द कर दिया गया था। 

 मामला हैदराबाद की I Additional Family Court में वर्ष 2010 से लंबित वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। वर्ष 2013 में फैमिली कोर्ट ने पत्नी को ₹20,000 और दोनों बेटियों को ₹15,000-₹15,000 प्रतिमाह अंतरिम भरणपोषण देने का आदेश दिया था। पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अक्टूबर 2024 में हाईकोर्ट ने पत्नी का भरणपोषण रद्द कर दिया, जबकि बेटियों के लिए भरणपोषण को उनकी बालिग होने तक बरकरार रखा। इसके बाद पत्नी ने रिव्यू याचिका दाखिल की। 

 पत्नी ने बताया कि वह किसी नौकरी में नहीं थी बल्कि स्वतंत्र रूप से वकालत करती थी, जिससे होने वाली आय नियमित या निश्चित नहीं थी। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि नौकरी से मिलने वाली निश्चित आय और स्वतंत्र प्रैक्टिस से होने वाली अनियमित आय में महत्वपूर्ण अंतर है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 24 के तहत मुख्य सवाल यह है कि वास्तव में उपलब्ध आय पत्नी के भरणपोषण और मुकदमे के खर्च के लिए पर्याप्त है या नहीं। केवल शैक्षणिक योग्यता, पेशेवर स्थिति या कमाने की क्षमता के आधार पर भरणपोषण से इनकार नहीं किया जा सकता। 

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Chaturbhuj v. Sita Bai, Shailja v. Khobbanna और Manish Jain v. Akanksha Jain के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कमाने की क्षमता या कुछ आय होना अपने आप में भरणपोषण से वंचित करने का आधार नहीं है। कोर्ट ने पाया कि उसके पिछले आदेश में पत्नी की वास्तविक आय, उसकी पर्याप्तता और पति की आय एवं आर्थिक क्षमता पर कोई ठोस निष्कर्ष नहीं था। इसके अलावा, Rajnesh v. Neha में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित भरणपोषण संबंधी दिशानिर्देशों पर भी उचित विचार नहीं किया गया था। 

 कोर्ट ने यह भी कहा कि रिवीजनल क्षेत्राधिकार में हाईकोर्ट फैमिली कोर्ट के तथ्यों का नए सिरे से मूल्यांकन नहीं कर सकता, जब तक उसके निष्कर्षों में कोई विकृति या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि न हो। हाईकोर्ट ने रिव्यू याचिका मंजूर करते हुए अक्टूबर 2024 का आदेश वापस ले लिया और पति की सिविल रिवीजन याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही 2013 के फैमिली कोर्ट के अंतरिम भरणपोषण आदेश को उसके मूल रूप में बहाल कर दिया गया। पति को बकाया भरणपोषण की गणना, पहले किए गए भुगतानों और शेष राशि का विवरण तथा Rajnesh v. Neha के अनुसार संपत्ति और देनदारियों का हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया। निर्धारित बकाया राशि का भुगतान 8 सप्ताह के भीतर करने का आदेश दिया गया।



जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्य छिपाना न्याय प्रशासन में दखल, वकील की जिम्मेदारी केवल मुवक्किल तक सीमित नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-09-01

जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्य छिपाना न्याय प्रशासन में दखल, वकील की जिम्मेदारी केवल मुवक्किल तक सीमित नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-09-01 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई वकील अपनी जानकारी में मौजूद महत्वपूर्ण तथ्यों को जानबूझकर छिपाकर अदालत के समक्ष उसके विपरीत स्थिति रखता है तो यह सक्रिय रूप से तथ्य छिपाना है और ऐसा आचरण न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करता है। हालांकि, वास्तविक स्थिति की जानकारी न होने के कारण गलत तथ्य सामने रखना या तथ्यों की गलत व्याख्या करना अलग स्थिति है।

जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने यह टिप्पणी एक कॉलेज की प्रबंध समिति के चुनाव से जुड़े मामले में दो वकीलों के आचरण की जांच करते हुए की। कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाता है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह मामले से जुड़े सभी प्रासंगिक तथ्यों और दस्तावेजों का खुलासा करे।

अदालत ने कहा,

"सक्रिय रूप से तथ्य छिपाने और केवल अनजाने में गलत तथ्य रखने के बीच अंतर है। सक्रिय रूप से तथ्य छिपाने का अर्थ है अदालत को गुमराह करने के लिए सच्चाई को जानबूझकर छिपाना, जबकि जानकारी के अभाव में गलत जानकारी देना अलग स्थिति है।"

मामला नेहरू विद्यापीठ इंटरमीडिएट कॉलेज, रेवतीपुर, गाजीपुर की प्रबंध समिति के चुनाव से जुड़ा है। 5 मई 2026 को हाईकोर्ट ने एक रिट याचिका का निपटारा करते हुए जिला विद्यालय निरीक्षक को दो महीने के भीतर चुनाव कराने का निर्देश दिया। उस समय दोनों पक्षों के वकीलों ने अदालत को बताया कि 2009 में हुए चुनाव में इस्तेमाल मतदाता सूची निर्विवाद है। इसी आधार पर कोर्ट ने उसी सूची को चुनाव के लिए इस्तेमाल करने का निर्देश दिया।

इसके बाद याचिका में प्रतिवादी नंबर छह के रूप में शामिल शिव शंकर सिंह ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की। उन्होंने खुद को निर्वाचित प्रबंधक बताते हुए कहा कि मूल याचिका गलत उद्देश्य से दाखिल की गई। उन्होंने शपथपत्र देकर यह भी कहा कि उन्होंने किसी अधिवक्ता को अपनी ओर से पेश होने के लिए वकालतनामा नहीं दिया और न ही अपनी ओर से कैविएट दाखिल करने का निर्देश दिया।

कैविएट वकील आरसी द्विवेदी ने दाखिल की थी। उनका कहना था कि वकालतनामे पर मौजूद हस्ताक्षर की पुष्टि उन्होंने स्वयं नहीं, बल्कि उनके क्लर्क ने की थी। उनके अनुसार, आवेदक और उसका भतीजा भोला यादव उनके कार्यालय आए, हस्ताक्षर किया हुआ वकालतनामा सौंपा और 2,500 रुपये फीस दी। भोला यादव ने भी शपथपत्र के जरिए इस दावे का समर्थन किया, जबकि आवेदक ने ऐसा नहीं किया।

चूंकि आवेदक वर्ष 2015 से आरसी द्विवेदी को अपना अधिवक्ता नियुक्त करता रहा था इसलिए हाईकोर्ट ने विवादित हस्ताक्षरों को विशेषज्ञ जांच के लिए भेज दिया। 27 जुलाई 2026 की फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी की रिपोर्ट में पाया गया कि कैविएट के साथ दाखिल वकालतनामे पर मौजूद हस्ताक्षर न तो नमूना हस्ताक्षरों से मेल खाते हैं और न ही दो अन्य मामलों में मौजूद वकालतनामों या आवेदक के बैंक रिकॉर्ड में मौजूद हस्ताक्षरों से। रिपोर्ट पर कोई आपत्ति दाखिल नहीं की गई और वह अंतिम हो गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि आवेदक यह साबित करने में असफल रहा कि उसके हस्ताक्षर जाली थे। कोर्ट ने माना कि पुनर्विचार याचिका ऐसे आदेश को वापस लेने के लिए दाखिल की गई, जो आवेदक के अनुकूल नहीं था। इस प्रक्रिया में एक ऐसे वकील को भी कठघरे में खड़ा कर दिया गया, जो एक दशक से अधिक समय से उसका प्रतिनिधित्व कर रहा था।

2009 के चुनाव को निर्विवाद बताने के दावे की भी अदालत ने जांच की। रिकॉर्ड से सामने आया कि संयुक्त शिक्षा निदेशक ने 16 अप्रैल 2016 के आदेश में 2009 के चुनाव को संदिग्ध माना था और नए चुनाव कराने का निर्देश दिया था। उस आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका बाद में सहमति से निष्प्रभावी मानकर खारिज कर दी गई।

इसके अलावा, तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक मालती राय, जिनके बारे में कहा गया कि उन्होंने 2009 में चुनाव कराया, ने 23 जुलाई 2016 को संयुक्त शिक्षा निदेशक को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि उन्होंने ऐसा कोई चुनाव नहीं कराया।

अदालत ने कहा कि लंबे समय से याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील एससी द्विवेदी इन दस्तावेजों और तथ्यों से अनजान होने का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने वकील और उनके मुवक्किल को 25 अक्टूबर 2009 को हुए चुनाव को अंतिम निर्विवाद चुनाव बताने के लिए समान रूप से जिम्मेदार माना।

अदालत ने कहा,

"इस अदालत को यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि मिस्टर एससी द्विवेदी, वकील और उनके मुवक्किल की ओर से तथ्य को सक्रिय रूप से छिपाया गया, जिसके कारण न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप हुआ।"

हाईकोर्ट ने कानूनी पेशे में वकील की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अधिवक्ताओं को केवल मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि मुख्य रूप से अदालत का अधिकारी माना जाता है। उन पर पेशेवर जिम्मेदारी के साथ-साथ अदालत के प्रति भी बड़ी जिम्मेदारी होती है। इस जिम्मेदारी का उल्लंघन न्याय प्रशासन की बुनियाद को प्रभावित करता है और कानूनी व्यवस्था में जनता के भरोसे को नुकसान पहुंचा सकता है।

वहीं, आरसी द्विवेदी के आचरण को अदालत ने अलग माना। कोर्ट के अनुसार, उन्होंने केवल याचिकाकर्ता की ओर से रखे गए दावे को स्वीकार किया और 2009 के चुनाव को संदिग्ध बताने वाले दस्तावेज उनके सामने रिकॉर्ड पर पेश नहीं किए गए। इसलिए अदालत ने उनके आचरण को न तो सक्रिय रूप से तथ्य छिपाना माना और न ही जानबूझकर झूठ बोलना। कार्यालय में हुई प्रक्रियात्मक कमियों के लिए उनकी बिना शर्त माफी को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

वकालतनामे के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत में किसी अधिवक्ता की पेशी की मान्यता पूरी तरह वैध और प्रभावी वकालतनामे के अस्तित्व पर आधारित होती है। जिस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करने का दावा किया जा रहा है उसकी जानकारी या सहमति के बिना वकालतनामा दाखिल करना अदालत के समक्ष गलत प्रस्तुति है।

हाईकोर्ट ने मामले को बार काउंसिल के पास भेजने या अवमानना अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से इनकार किया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता और प्रतिवादी नंबर छह पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। दोनों को यह राशि एक महीने के भीतर हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति में जमा करनी होगी। राशि जमा नहीं करने पर रजिस्ट्रार जनरल को अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया गया।

अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट नियम, 1952 के अध्याय 22 नियम 5 का भी संज्ञान लिया, जिसके तहत केवल आवेदन देकर बिना सहायक शपथपत्र के कैविएट दाखिल की जा सकती है। कोर्ट ने माना कि इस प्रक्रिया का दुरुपयोग संभव है। इसलिए आदेश की प्रति प्रशासनिक स्तर पर चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया, ताकि कैविएट आवेदन के साथ आवेदक का शपथपत्र अनिवार्य करने के लिए नियम में संशोधन पर विचार किया जा सके।

अंततः हाईकोर्ट ने माना कि 2009 का चुनाव निर्विवाद नहीं था। इस आधार पर कोर्ट ने अपने 5 मई 2026 के आदेश की समीक्षा करते हुए उसे वापस ले लिया और मामले को आगे की सुनवाई के लिए सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत के समक्ष रखने का निर्देश दिया।

Monday, 10 August 2026

20 साल तक बाकी रकम जमा न करने के बाद प्रॉपर्टी खरीदने वाला सेल डीड लागू करने की मांग नहीं कर सकता

20 साल तक बाकी रकम जमा न करने के बाद प्रॉपर्टी खरीदने वाला सेल डीड लागू करने की मांग नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-08-10

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि प्रॉपर्टी खरीदने वाला व्यक्ति 20 साल तक बिक्री की बाकी रकम जमा न करने के बाद सेल डीड को लागू करने की मांग नहीं कर सकता।

ऐसा करते हुए कोर्ट ने उस खरीदार को बाकी रकम जमा करने के लिए समय देने वाला आदेश रद्द किया, जिसके पक्ष में 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध का पालन) का मुकदमा तय हुआ था। कोर्ट ने देखा कि उसने बकाया रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने की अर्जी देने में 20 साल का इंतज़ार किया।

राम लाल बनाम जरनैल सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने कहा,

“राम लाल (ऊपर बताया गया) मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला साफ तौर पर वादी-प्रतिवादी के मामले को खारिज करता है, क्योंकि वादी ने तय समय के भीतर बिक्री की बाकी रकम जमा करने में जानबूझकर लापरवाही बरती और बाकी रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने की दूसरी अर्जी देने में लगभग 20 साल से ज़्यादा का इंतज़ार किया।

देरी की अवधि और इस बीच बने हालात 'जजमेंट डेटर' (जिसके खिलाफ फैसला आया है) के पक्ष में हैं। 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' के मुकदमे में कोर्ट को दोनों पक्षों के बीच निष्पक्षता बनाए रखनी होती है। ऊपर बताए गए फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुकदमे का फैसला एक शुरुआती डिक्री (प्रारंभिक आदेश) होती है। जिस कोर्ट ने डिक्री पास की है, उसके पास यह अधिकार है कि वह तय समय के भीतर भुगतान/जमा न करने पर कॉन्ट्रैक्ट/डिक्री को रद्द कर दे या भुगतान/जमा करने की समय-सीमा बढ़ा दे। इस मामले में वादी-प्रतिवादी की ओर से बिक्री की बाकी रकम जमा करने की अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने में बिना किसी ठोस कारण के देरी हुई है।"

प्रतिवादी दुलीराम मौर्य ने 1991 में कुल 25,000 रुपये में ज़मीन बेचने का समझौता किया था, जिसमें से 13,000 रुपये उसी दिन वादी नंदराम ने चुका दिए थे, जिसने प्रॉपर्टी खरीदी थी।

बाकी 12,000 रुपये सेल डीड (बिक्री विलेख) के निष्पादन के समय चुकाए जाने थे। इसके बाद नंदराम ने बिक्री समझौते के 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध का पालन) के लिए मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने 1998 में केस खारिज किया। कोर्ट ने माना कि सेल-डीड (बिक्री विलेख) को पूरा करने के लिए कोई लेन-देन नहीं हुआ और यह एग्रीमेंट असल में डिफेंडेंट द्वारा लिए गए लोन को छिपाने का एक तरीका था।

2003 में वादी की सिविल अपील मंजूर कर ली गई और केस में वादी के पक्ष में फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने डिफेंडेंट को दो महीने के भीतर सेल एग्रीमेंट पूरा करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने वादी-खरीदार को बाकी रकम जमा करने का भी निर्देश दिया।

डिफेंडेंट-विक्रेता ने दूसरी अपील दायर की, जो बिना किसी अंतरिम आदेश के हाईकोर्ट में लंबित रही। इसे सितंबर 2019 में खारिज कर दिया गया। इस बीच वादी-खरीदार ने 6 अगस्त 2012 को फैसले को लागू करवाने की कार्यवाही (एग्जीक्यूशन प्रोसीडिंग्स) शुरू की।

दूसरी अपील खारिज होने के बाद डिफेंडेंट ने स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 28 के तहत एक अर्जी दी ताकि वादी द्वारा शुरू की गई एग्जीक्यूशन प्रोसीडिंग्स को रोका जा सके। वादी ने इसका विरोध किया और 17.11.2025 को बाकी रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने और देरी को माफ करने की अर्जी दी।

संदर्भ के लिए, धारा 28 विक्रेता को उसी केस में, जिसमें स्पेसिफिक परफॉर्मेंस (अनुबंध का पालन) का फैसला सुनाया गया, कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने की अर्जी देने की अनुमति देती है। ऐसा तब किया जा सकता है, जब खरीदार फैसले में तय समय या कोर्ट द्वारा दी गई अतिरिक्त समय-सीमा के भीतर खरीद की रकम का भुगतान न करे।

23 दिसंबर 2025 के आदेश से एग्जीक्यूशन कोर्ट ने डिफेंडेंट की अर्जी खारिज की और 1000 रुपये के खर्च (कॉस्ट) पर बाकी रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने की वादी की अर्जी मंजूर कर ली। इसके खिलाफ डिफेंडेंट-विक्रेता ने रिवीजन याचिका दायर की जिसे खारिज कर दिया गया; इस खारिज आदेश के खिलाफ डिफेंडेंट हाईकोर्ट गया।

डिफेंडेंट-विक्रेता के वकील ने तर्क दिया कि वादी-खरीदार ने फैसले के बाद लगभग नौ साल तक न तो पैसे जमा किए और न ही एग्जीक्यूशन के लिए कोई कदम उठाया, और उसके बाद दायर समय बढ़ाने की अर्जी भी लंबित पड़ी रही। यह कहा गया कि 20 साल से भी अधिक समय बाद जमा करने की अनुमति देना न्याय का मजाक उड़ाने जैसा होगा; चूंकि स्पेसिफिक परफॉर्मेंस एक इक्विटेबल रिलीफ (न्यायसंगत राहत) है, इसलिए कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने या समय बढ़ाने का फैसला करते समय कोर्ट को इक्विटी (निष्पक्षता/न्याय) के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।

वादी के वकील ने कहा कि धारा 28 के तहत डिक्री-होल्डर समय बढ़ाने की मांग भी कर सकता है। यह बताया गया कि 2012 में जब एग्जीक्यूशन (डिक्री लागू करने की प्रक्रिया) शुरू हुई, तब दी गई अर्ज़ी पेंडिंग रही और दूसरी अपील पर फ़ैसले का इंतज़ार करते हुए एग्जीक्यूशन पर ज़ोर नहीं दिया गया। यह तर्क दिया गया कि 2003 की डिक्री 2019 के दूसरे अपीलीय फ़ैसले में मिल गई, इसलिए समय की गिनती 2003 से नहीं की जा सकती।

वादी के इस तर्क को खारिज करते हुए कि एग्जीक्यूशन लिमिटेशन एक्ट के तहत तय बारह साल की अवधि के भीतर है, कोर्ट ने कहा:

“यह तर्क पूरी तरह से गलतफहमी पर आधारित है, क्योंकि यह 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध के पालन) का मामला है, जिसमें पहली अपीलीय अदालत ने 22.11.2003 को वादी-प्रतिवादी के पक्ष में डिक्री पारित की थी और उसे बिक्री की बाकी रकम जमा करने के लिए एक महीने का समय दिया था।”

दूसरी अपील के रिकॉर्ड को देखते हुए कोर्ट ने पाया कि इसे कभी स्वीकार नहीं किया गया, कानून का कोई अहम सवाल तय नहीं किया गया और कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया गया।

“वादी-प्रतिवादी न तो दूसरी अपीलीय अदालत के सामने पेश हुआ और न ही दूसरी अपील का विरोध किया। वह बस बाहर से कार्यवाही देखता रहा।”

कोर्ट ने यह भी देखा कि 2012 की एग्जीक्यूशन कार्यवाही में समय बढ़ाने की जो अर्ज़ी दी गई, उसे न तो मंज़ूरी मिली और न ही उस पर ज़ोर दिया गया और दूसरी अर्ज़ी 2025 में आई, यानी दूसरी अपील खारिज होने के छह साल बाद। कोर्ट ने माना कि इससे पता चलता है कि वादी न तो डिक्री को लागू करवाने में दिलचस्पी रखता था और न ही सौदे के अपने हिस्से को पूरा करने के लिए तैयार था।

मर्जर (डिक्री के विलय) के मुद्दे पर हालांकि कोर्ट ने माना कि 2003 की डिक्री 23 सितंबर 2019 के दूसरे अपीलीय फ़ैसले में मिल गई, लेकिन यह भी कहा कि इससे वादी को कोई मदद नहीं मिली, क्योंकि उस तारीख से भी गिनती करने पर समय बढ़ाने की दूसरी अर्ज़ी 17 नवंबर 2025 को आई, जबकि पहली अर्ज़ी पर कभी ज़ोर नहीं दिया गया।

कोर्ट ने आगे कहा,

“निचली दोनों अदालतें इस मामले में निष्पक्षता बनाए रखने में नाकाम रहीं और उन्होंने गलत तरीके से यह दर्ज किया कि दूसरी अपील पेंडिंग होने के कारण डिक्री को लागू करवाने में वादी-प्रतिवादी की कोई गलती नहीं थी।”

कोर्ट ने विक्रेता की अर्ज़ी मंज़ूर करते हुए उसे निर्देश दिया कि वह 3.7.1991 के बिक्री समझौते के तहत खरीदार से मिली अग्रिम राशि को उसे प्राप्त होने की तारीख से 6% ब्याज के साथ एक महीने के भीतर जमा करे।

Case Title: Duliram Maurya v. Nandram

Tuesday, 21 July 2026

संयुक्त हिंदू परिवार का सदस्य अपने पैसे से अलग संपत्ति खरीद सकता है; दूसरे सह-उत्तराधिकारी उस पर अपना हक नहीं जता सकते

संयुक्त हिंदू परिवार का सदस्य अपने पैसे से अलग संपत्ति खरीद सकता है; दूसरे सह-उत्तराधिकारी उस पर अपना हक नहीं जता सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट  2026-07-20


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ संयुक्त हिंदू परिवार होने से यह नहीं माना जा सकता कि कोई खास ज़मीन संयुक्त परिवार की संपत्ति है।

कोर्ट ने कहा कि संयुक्त हिंदू परिवार का कोई सदस्य अपने नाम पर अलग से संपत्ति खरीद और रख सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे सदस्य को ज़मीन पर सह-स्वामित्व का अधिकार तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक वे यह साबित न कर दें कि वह ज़मीन संयुक्त परिवार के फंड से खरीदी गई।

यह विवाद बस्ती ज़िले के बारो गाँव में खाता नंबर 277 के तीन प्लॉट से जुड़ा था। चकबंदी प्रक्रिया के शुरुआती साल में ये प्लॉट सिर्फ़ याचिकाकर्ताओं (चेताई के बेटे) के नाम पर 'सिरदार' के तौर पर दर्ज थे।

चेताई के भाई प्रतिवादी नंबर 2 और 3 (जगलल और फौजदार) ने यू.पी. चकबंदी अधिनियम, 1953 की धारा 9-A(2) के तहत आपत्ति दर्ज कराई और खुद को सह-काश्तकार के तौर पर दर्ज करने की मांग की। उनका दावा था कि यह ज़मीन मूल रूप से घिरऊ ने खरीदी थी। उनकी मौत के बाद यह उनकी विधवा श्रीमती झिनका उर्फ़ छोटका के नाम पर दर्ज हुई और उनकी मौत के बाद चेताई, जगलल और फौजदार को संयुक्त रूप से मिली, लेकिन इसे गलत तरीके से सिर्फ़ चेताई के नाम पर दर्ज कर दिया गया।

याचिकाकर्ताओं (जो चेताई के वारिस हैं) ने कहा कि यह ज़मीन नई थी और चेताई ने इसे अपने भाइयों से अलग होने के बाद अकेले खरीदा था। उन्होंने कहा कि श्रीमती झिनका की किसी ज़मीन से इसका कोई संबंध या निरंतरता नहीं थी और संयुक्त परिवार के फंड से इसे खरीदने का कोई दावा भी नहीं किया गया।

चकबंदी अधिकारी ने 30.5.1978 को आपत्ति स्वीकार की और प्रतिवादी नंबर 2 और 3 को एक-तिहाई हिस्से के साथ सह-काश्तकार के तौर पर दर्ज किया। अधिकारी का मानना था कि चेताई का नाम 'कर्ता खानदान' (परिवार के मुखिया) के तौर पर दर्ज किया गया। एक्ट की धारा 11(1) के तहत अपील पर कंसोलिडेशन के असिस्टेंट सेटलमेंट ऑफिसर ने उस आदेश रद्द किया और निर्देश दिया कि खाता केवल याचिकाकर्ताओं के नाम पर दर्ज किया जाए। उन्होंने पाया कि रेवेन्यू एंट्री में कोई निरंतरता या एकरूपता नहीं थी और परिवार के अलग होने के बाद सेटलमेंट चेताई के पक्ष में किया गया।

कंसोलिडेशन के डिप्टी डायरेक्टर ने एक्ट की धारा 48 के तहत प्रतिवादी नंबर 2 और 3 द्वारा दायर रिवीजन याचिका स्वीकार की, अपीलीय आदेश रद्द किया और कंसोलिडेशन ऑफिसर के आदेश को बहाल किया। याचिकाकर्ताओं ने रिवीजन आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

जस्टिस चंद्र कुमार राय ने कहा,

“अपीलीय अदालत ने भी यह तथ्य दर्ज किया कि परिवार के अलग होने के बाद, सेटलमेंट याचिकाकर्ताओं के पिता चेताई के पक्ष में किया गया था, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि चेताई का नाम 'कर्ता खानदान' (परिवार के मुखिया) के रूप में दर्ज किया गया था।”

अदालत ने माना कि रेवेन्यू एंट्री, खतौनी में दर्ज अवधि और एंट्री में निरंतरता व एकरूपता के अभाव के आधार पर अपीलीय अथॉरिटी द्वारा दर्ज तथ्यों को कंसोलिडेशन के डिप्टी डायरेक्टर ने सही तरीके से नहीं पलटा था। अदालत ने गौर किया कि रिवीजन आदेश में 1348 फसली की एंट्री की अवधि एक साल बताई गई थी, जबकि रिट याचिका के साथ संलग्न 1348 फसली की खतौनी में अवधि नौ साल दिखाई गई थी। अदालत ने माना कि इस आधार पर रिवीजन आदेश को बरकरार नहीं रखा जा सकता है।

अदालत ने आगे कहा कि 1979 में कंसोलिडेशन के डिप्टी डायरेक्टर के पास मौजूद रिवीजन की शक्ति सीमित थी। “साल 1979 में, U.P.C.H. एक्ट की धारा 48 के तहत कंसोलिडेशन के डिप्टी डायरेक्टर का अधिकार क्षेत्र सीमित था, क्योंकि U.P.C.H. एक्ट की धारा 48 में संशोधन करके 10.11.1980 से उन्हें ज़्यादा अधिकार दिए गए थे।”

कोर्ट ने 'राम चंद्र दुबे और अन्य बनाम डिप्टी डायरेक्टर ऑफ़ कंसोलिडेशन, देवरिया और अन्य' के मामले का हवाला दिया, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि संयुक्त हिंदू परिवार का कोई सदस्य, भले ही वह संयुक्त परिवार का हिस्सा हो, अलग संपत्ति रख सकता है जो पूरी तरह से उसकी अपनी हो और जिसमें कोपार्सनरी (संयुक्त उत्तराधिकार वाले परिवार) का कोई अन्य सदस्य कोई अधिकार हासिल न कर सके।

कोर्ट ने 'बाला चरण और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य' मामले का भी हवाला दिया, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि भले ही संयुक्त परिवार होने का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन संयुक्त परिवार की संपत्ति होने का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

इन फैसलों को लागू करते हुए, कोर्ट ने कहा कि यह साबित करने की ज़िम्मेदारी प्रतिवादी नंबर 2 और 3 की थी कि विवादित ज़मीन संयुक्त परिवार की संपत्ति से हासिल की गई थी, जिसे वे साबित नहीं कर पाए; इसलिए उन्हें सह-काश्तकारी (co-tenancy) का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

रिट याचिका को मंज़ूरी देते हुए, कोर्ट ने 17.8.1979 के रिविज़नल आदेश को रद्द कर दिया और 29.12.1978 के अपीलीय आदेश को बरकरार रखा। खर्च के बारे में कोई आदेश नहीं दिया गया।

Case Title: Pardeshi v. D.D.C and others

Saturday, 18 July 2026

वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन... क्या वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के 3 साल के अंदर न करने पर समय-सीमा खत्म हो जाती है? सुप्रीम कोर्ट

वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन... क्या वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के 3 साल के अंदर न करने पर समय-सीमा खत्म हो जाती है? सुप्रीम कोर्ट ने दिया जवाब 17 July 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल के अंदर ही करना ज़रूरी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि प्रोबेट के लिए आवेदन करने का अधिकार तब मिलता है जब ऐसा करना ज़रूरी हो जाता है, यानी जब वसीयत से बनी स्थिति के खिलाफ कोई कदम उठाया जाता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा, "इसलिए आवेदन करने का अधिकार उस तारीख से मिलता है, जब आवेदन करना ज़रूरी हो जाता है। ज़ाहिर है, यह वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल के अंदर होना ज़रूरी नहीं है।" 

 बेंच ने ट्रायल कोर्ट और झारखंड हाईकोर्ट के उन फैसलों को रद्द किया, जिन्होंने प्रोबेट आवेदन को सिर्फ़ इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि इसे वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल बाद दायर किया गया। यह मामला 15 अप्रैल 1995 की वसीयत के प्रोबेट के आवेदन से जुड़ा है, जिसे श्रीलाल सिंघानिया ने बनाया और जिनका 7 जून 1995 को निधन हो गया। यह आवेदन वसीयत में बताए गए एग्जीक्यूटर भूदेव प्रसाद सिंह ने 31 अगस्त 2005 को दायर किया था, जो वसीयतकर्ता की मौत के एक दशक से भी ज़्यादा समय बाद था। 

 आपत्ति करने वाले प्रतिवादियों ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत आवेदन दायर किया और तर्क दिया कि प्रोबेट आवेदन समय-सीमा (लिमिटेशन) के कारण खारिज होने योग्य है। ट्रायल कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया और इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 की धारा 222 और 276 के तहत प्रोबेट आवेदन खारिज किया। झारखंड हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट का फैसला सही ठहराते हुए अपील खारिज की, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में यह अपील दायर की गई। Also Read - जब आरोपी जेल में हो तो कोर्ट और प्रॉसिक्यूशन की ज़िम्मेदारी है कि वे ट्रायल में तेज़ी लाएं: सुप्रीम कोर्ट अपील मंज़ूरी करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में उस तर्क को खारिज कर दिया गया कि वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल के अंदर ही दायर किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि चूंकि इंडियन सक्सेशन एक्ट में वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन दायर करने की कोई समय-सीमा तय नहीं है, इसलिए लिमिटेशन एक्ट, 1963 के आर्टिकल 163 के तहत तय तीन साल की समय-सीमा लागू होगी। हालांकि, इसकी गिनती उस तारीख से की जाएगी जब दूसरी पार्टी ने वसीयत (Will) से तय स्थिति के खिलाफ कोई कदम उठाया हो। Also Read - सिर्फ़ गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल अश्लीलता नहीं है: सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 294(b) का दायरा समझाया कानून को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा: “आवेदन करने की ज़रूरत उस तारीख से शुरू होगी, जब प्रतिवादियों ने वसीयत से तय स्थिति के खिलाफ कदम उठाए, यानी 8 अगस्त 2005 को वसीयत करने वाले की पत्नी लक्ष्मी देवी द्वारा 'जनरल पावर ऑफ़ अटॉर्नी' (General Power of Attorney) निष्पादित करना। इस नज़रिए से, अपीलकर्ता संजय शर्मा उर्फ संजय भारद्वाज के पक्ष में एग्जीक्यूटर मिस्टर भूदेव प्रसाद सिंह द्वारा वसीयत के प्रोबेट (probate) के लिए दिया गया आवेदन समय-सीमा के भीतर माना जाता है क्योंकि इसे 31 अगस्त 2005 को दायर किया गया।” इसमें P. Kumarakurubaran v. P. Narayanan, 2025 LiveLaw (SC) 509 मामले का हवाला दिया गया, जिसमें यह तय किया गया कि जब समय-सीमा (limitation) का सवाल विवादित तथ्यों से जुड़ा हो तो ऐसे मुद्दों का फैसला Order VII Rule 11 CPC के चरण में नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने समय-सीमा की अवधि को लेकर विवाद होने के बावजूद मुकदमे को सरसरी तौर पर खारिज करके गलती की, क्योंकि यह तथ्य और कानून का मिला-जुला सवाल है। कोर्ट ने यह फैसला सुनाया, “Order VII Rule 11 और समय-सीमा के सवाल, दोनों ही मामलों में निचली अदालतों के फैसलों और आदेशों को रद्द करना होगा। देवघर जिला अदालत द्वारा 31 जुलाई 2012 को पारित आदेश और झारखंड हाईकोर्ट द्वारा 28 अप्रैल 2022 को पारित फैसले को रद्द किया जाता है। कानून के मामले में स्पष्ट गलती होने के कारण अपील स्वीकार की जाती है। मामले को संबंधित सिविल कोर्ट में कानून के अनुसार आगे बढ़ने के लिए बहाल किया जाता है।” 

Cause title: SANJAY SHARMA @ SANJAY BHARDWAJ VERSUS KRISHNADHAN KHAWARE AND ORS.



भूमि अधिग्रहण कानून के निरस्त होने के बाद जारी हुई अधिसूचना पर कार्रवाई अवैध

भूमि अधिग्रहण कानून के निरस्त होने के बाद जारी हुई अधिसूचना पर कार्रवाई अवैध 2026-07-17 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत जारी अधिसूचना पर भले ही 1 जनवरी 2014 से पहले की तारीख अंकित हो, लेकिन उसका प्रकाशन 1 जनवरी 2014 के बाद हुआ है, तो ऐसी पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू से ही अवैध मानी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुराने कानून के निरस्त होने के बाद उसके तहत नई अधिग्रहण कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।

जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि अधिसूचना पर लिखी तारीख का कोई कानूनी महत्व नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि उसका राजपत्र, समाचार पत्रों और स्थानीय स्तर पर कब प्रकाशन हुआ। इन सभी में सबसे अंतिम प्रकाशन की तारीख ही अधिसूचना के प्रकाशन की प्रभावी तारीख मानी जाएगी।

अदालत ने कहा, "अधिसूचना पर अंकित तारीख अप्रासंगिक है। महत्वपूर्ण उसकी वास्तविक प्रकाशन तिथि है और वही यह तय करेगी कि अधिग्रहण की कार्यवाही कब शुरू हुई।"

मामला लखनऊ के सरोजिनी नगर क्षेत्र स्थित गांव अहमामऊ की भूमि से जुड़ा है। याचिकाकर्ता कंपनी ने वर्ष 2007 में इस भूमि का एक हिस्सा पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से खरीदा था।

भूमि अधिग्रहण के लिए अधिसूचना पर 27 दिसंबर 2013 की तारीख दर्ज थी लेकिन उसका प्रकाशन 2 और 3 जनवरी 2014 को समाचार पत्रों में 4 जनवरी 2014 को राजपत्र में तथा 6 फरवरी 2014 को स्थानीय स्तर पर सार्वजनिक सूचना के रूप में किया गया। इसके बाद जनवरी 2015 में अधिग्रहण की घोषणा जारी की गई और जुलाई 2016 में अवार्ड पारित हुआ जिसे बाद में वर्ष 2022 में संशोधित किया गया।

याचिकाकर्ता का कहना था कि न तो उसकी भूमि का कब्जा लिया गया और न ही उसे मुआवजा दिया गया। साथ ही पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया ऐसे कानून के तहत चलाई गई, जो 1 जनवरी 2014 से निरस्त हो चुका था इसलिए पूरी कार्रवाई शुरू से ही शून्य है।

वहीं विकास प्राधिकरण ने दलील दी कि अधिसूचना पर 27 दिसंबर 2013 की तारीख होने के कारण अधिग्रहण की प्रक्रिया 1 जनवरी 2014 से पहले ही शुरू हो गई। हालांकि वह यह स्वीकार करने से इनकार नहीं कर सका कि अधिसूचना का वास्तविक प्रकाशन नए कानून के लागू होने के बाद हुआ।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया तभी शुरू मानी जाती है, जब अधिसूचना का विधि के अनुसार प्रकाशन किया जाए। केवल सरकारी स्तर पर लिया गया निर्णय या अधिसूचना पर अंकित तारीख पर्याप्त नहीं होती। जब तक उसका निर्धारित तरीके से प्रकाशन नहीं होता तब तक वह केवल कागजों पर लिया गया निर्णय भर है।

पीठ ने कहा कि 1 जनवरी 2014 से उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 लागू हो गया था, जिसके साथ ही वर्ष 1894 का भूमि अधिग्रहण कानून निरस्त हो गया। चूंकि इस मामले में अधिसूचना का पूरा प्रकाशन 1 जनवरी 2014 के बाद हुआ इसलिए पुराने कानून के तहत अधिग्रहण की कार्रवाई वैध रूप से शुरू ही नहीं हुई।

अदालत ने कहा, "यह वस्तुतः 1 जनवरी 2014 के बाद निरस्त हो चुके अधिनियम 1894 के तहत अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने का मामला है। इसलिए संबंधित अधिसूचनाएं और पूरी प्रक्रिया कानून की नजर में शुरू से ही शून्य और अवैध हैं।"

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वर्ष 2013 का कानून भूमि मालिकों को अधिक न्यायसंगत और उचित मुआवजा देने के उद्देश्य से बनाया गया। इसके बावजूद पुराने कानून के तहत कार्रवाई जारी रखकर अधिकारियों ने याचिकाकर्ता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया।

हालांकि अदालत ने सार्वजनिक हित को देखते हुए पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया रद्द नहीं की। अदालत ने कहा कि भूमि का अधिग्रहण सार्वजनिक सड़क निर्माण के लिए प्रस्तावित है और भूमि का हिस्सा भी छोटा है। इसलिए अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वर्ष 2013 के कानून के अनुसार, फैसले की तारीख पर प्रचलित बाजार दर के आधार पर नया मुआवजा निर्धारित किया जाए- हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक संशोधित मुआवजे का निर्धारण कर उसका भुगतान नहीं किया जाता तब तक संबंधित भूमि का कब्जा नहीं लिया जाएगा। साथ ही पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया।

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प्रकरण का विवरण

प्रकरण: Lohia Developers (India) Pvt. Ltd. v. State of Uttar Pradesh & Others

न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ

रिट याचिका क्रमांक: Writ–C No. 2466 of 2023

निर्णय सुरक्षित: 27.05.2026

निर्णय दिनांक: 03.07.2026 (इस निर्णय की प्रमुख कानूनी रिपोर्ट 17 जुलाई 2026 को प्रकाशित हुई)। 

पीठ: न्यायमूर्ति राजन राय एवं न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला। 

वाद के तथ्य

भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 4 की अधिसूचना पर दिनांक 27.12.2013 अंकित थी।

किन्तु उसका राजपत्र (Official Gazette) में प्रकाशन 04.01.2014 को हुआ।

इस बीच 01.01.2014 से Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013 लागू हो चुका था तथा 1894 का अधिनियम निरस्त हो चुका था।

इसके बाद धारा 6 की घोषणा 23.01.2015 तथा पुरस्कार (Award) 13.07.2016 को पारित किया गया। 

विचारणीय प्रश्न

क्या 1894 के निरस्त अधिनियम के अंतर्गत ऐसी अधिसूचना, जिसका प्रकाशन 01.01.2014 के बाद हुआ, वैध मानी जा सकती है?

न्यायालय का निर्णय

उच्च न्यायालय ने कहा कि—

1. भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही धारा 4 की विधिवत प्रकाशित अधिसूचना से प्रारम्भ होती है।

2. केवल अधिसूचना पर पुरानी तिथि अंकित होने से कार्यवाही वैध नहीं हो जाती।

3. प्रकाशन (Publication) की तिथि ही निर्णायक है।

4. यदि अधिसूचना का प्रकाशन 01.01.2014 के बाद हुआ है, तो वह निरस्त अधिनियम के अंतर्गत जारी मानी जाएगी।

5. ऐसी सम्पूर्ण अधिग्रहण कार्यवाही Void ab initio (प्रारम्भ से ही शून्य) होगी। 

न्यायालय द्वारा अपनाए गए प्रमुख सिद्धांत

भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही धारा 4 की अधिसूचना से प्रारम्भ होती है।

प्रकाशन के बिना अधिसूचना प्रभावी नहीं होती।

निरस्त कानून के अंतर्गत बाद में प्रकाशित अधिसूचना कोई वैधानिक अधिकार उत्पन्न नहीं कर सकती।

सामान्य धाराएँ अधिनियम, 1897 की धारा 6 केवल उन्हीं कार्यवाहियों को बचाती है जो निरसन से पहले विधिसम्मत रूप से प्रारम्भ हो चुकी हों। 

सर्वोच्च न्यायालय के जिन निर्णयों पर भरोसा किया गया

Indrapuri Griha Nirman Sahkari Samiti Ltd. v. State of Rajasthan, (1975) 4 SCC 296

Laxman Lal v. State of Rajasthan, (2013) 3 SCC 764

V.K.M. Kattha Industries (P) Ltd. v. State of Haryana, (2013) 9 SCC 338

Khub Chand v. State of Rajasthan, AIR 1967 SC 1704 

वाद में उद्धृत करने योग्य निष्कर्ष

> "भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के निरस्त हो जाने के पश्चात यदि धारा 4 की अधिसूचना का प्रकाशन किया जाता है, तो केवल उस पर पूर्व की तिथि अंकित होने से अधिग्रहण कार्यवाही वैध नहीं हो जाती। ऐसी कार्यवाही प्रारम्भ से ही शून्य (Void ab initio) है।" 



Thursday, 9 July 2026

पुराने मालिक के नाम बिजली बिल और हाउस टैक्स जमा करने वाला प्रतिकूल कब्जे से मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता

पुराने मालिक के नाम बिजली बिल और हाउस टैक्स जमा करने वाला प्रतिकूल कब्जे से मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-07-09 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति पर प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) के आधार पर मालिकाना हक का दावा करता है, लेकिन उसी संपत्ति के बिजली बिल और हाउस टैक्स पुराने मालिक के नाम से जमा करता रहता है, तो यह उसके द्वारा पुराने मालिक के स्वामित्व को स्वीकार करना माना जाएगा। ऐसे में प्रतिकूल कब्जे के आधार पर स्वामित्व का दावा टिक नहीं सकता।

जस्टिस संदीप जैन ने यह टिप्पणी गाजियाबाद स्थित एक मकान पर प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) मांगने वाली अपील खारिज करते हुए की।

याचिकाकर्ता का दावा था कि वह वर्ष 1996 से मकान पर खुले, निरंतर और विरोधात्मक (Hostile) कब्जे में है। अपने दावे के समर्थन में उसने शस्त्र लाइसेंस, वाहन पंजीकरण, गैस कनेक्शन, टेलीफोन, बीमा पॉलिसी, मतदाता पहचान पत्र, आयकर रिकॉर्ड और कंपनी रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज प्रस्तुत किए, जिनमें विवादित मकान का पता दर्ज था।

हालांकि, अदालत ने पाया कि बिजली बिल और संपत्ति कर लगातार पूर्व मालिक कैप्टन विनोद कुमार के नाम पर ही जमा किए जा रहे थे। कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार भुगतान करना स्वयं पूर्व मालिक के स्वामित्व को स्वीकार करने के बराबर है, जिससे प्रतिकूल कब्जे का दावा स्वतः कमजोर हो जाता है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी सरकारी दस्तावेज में किसी संपत्ति का पता दर्ज होना उस व्यक्ति के स्वामित्व का प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि किरायेदार, लाइसेंसी या किसी रिश्तेदार के साथ रहने वाला व्यक्ति भी उसी पते का उपयोग कर ऐसे दस्तावेज प्राप्त कर सकता है।

अदालत ने आगे कहा कि प्रतिकूल कब्जे का दावा करने वाले व्यक्ति को यह साबित करना होता है कि वह संपत्ति पर कब, कैसे, किस आधार पर, खुले, निरंतर और वास्तविक मालिक के विरोध में 12 वर्ष से अधिक समय तक कब्जे में रहा, तथा इसकी जानकारी वास्तविक मालिक को भी थी। वर्तमान मामले में वादी इन आवश्यक तत्वों को साबित करने में असफल रहा।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी और कहा कि वादी का प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक का दावा कानूनन स्वीकार नहीं किया जा सकता।