Saturday, 12 September 2026

पति स्वस्थ, सक्षम एवं कार्य करने योग्य होने के बावजूद पत्नी एवं नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण से केवल इस आधार पर बच नहीं सकता कि वर्तमान में उसकी कोई आय नहीं है अथवा वह बेरोजगार है।

 

आवेदिका की ओर से लिखित तर्क


विषय : पति स्वस्थ, सक्षम एवं कार्य करने योग्य होने के बावजूद पत्नी एवं नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण से केवल इस आधार पर बच नहीं सकता कि वर्तमान में उसकी कोई आय नहीं है अथवा वह बेरोजगार है।

1. विधिक स्थिति

यह स्थापित विधि है कि भरण-पोषण का प्रावधान सामाजिक न्याय का उपाय है। इसका उद्देश्य पत्नी एवं बच्चों को आर्थिक असहायता, अभाव, वंचना तथा भटकाव से बचाना है। वर्तमान में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144 के अंतर्गत यह अधिकार प्रवर्तनीय है। पूर्व में यही क्षेत्र दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के अंतर्गत आता था।

केवल यह तथ्य कि पति की वर्तमान आय शून्य बताई गई है, अपने-आप में उसे पत्नी एवं बच्चे के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त नहीं करता। न्यायालय पति की शारीरिक क्षमता, शैक्षणिक योग्यता, कार्य करने की क्षमता, पूर्व रोजगार, पूर्व आय, संपत्ति, जीवन-स्तर तथा वास्तविक earning capacity को देख सकता है।

A. माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्याय-दृष्टांत

1. Bhuwan Mohan Singh v. Meena & Ors.

Criminal Appeal No. 1331 of 2014

निर्णय दिनांक : 15.07.2014

Citation : (2015) 6 SCC 353; AIR 2014 SC 2875

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 125 CrPC का प्रमुख उद्देश्य सामाजिक न्याय प्रदान करना तथा पत्नी एवं बच्चों को destitution और vagrancy से बचाना है। न्यायालय ने यह भी प्रतिपादित किया कि सक्षम पति पत्नी के भरण-पोषण के दायित्व से इस प्रकार बच नहीं सकता कि उसके पास वर्तमान में पर्याप्त आय नहीं है। सक्षम एवं स्वस्थ व्यक्ति को आवश्यकता होने पर शारीरिक श्रम करके भी धन अर्जित करना होगा। न्यायालय ने धारा 125 को केवल तकनीकी प्रावधान न मानकर सामाजिक न्याय का प्रभावी साधन माना। उक्त निर्णय में पूर्ववर्ती निर्णयों, विशेषतः Chaturbhuj v. Sita Bai, को भी स्वीकार किया गया।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

यदि अनावेदक स्वस्थ है, किसी शारीरिक अथवा मानसिक अक्षमता से ग्रस्त नहीं है और कार्य करने में सक्षम है, तो केवल बेरोजगारी का कथन करके वह पत्नी एवं बच्चे के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता।

2. Shamima Farooqui v. Shahid Khan

Criminal Appeal Nos. 564-565 of 2015

निर्णय दिनांक : 06.04.2015

Citation : (2015) 5 SCC 705; (2015) 3 SCC (Civ) 274; (2015) 2 SCC (Cri) 785

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पत्नी के भरण-पोषण के संबंध में पति के दायित्व को अत्यंत स्पष्ट किया। न्यायालय ने माना कि भरण-पोषण की राशि ऐसी होनी चाहिए जिससे पत्नी सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सके। केवल पति की आर्थिक कठिनाई अथवा सेवानिवृत्ति आदि का आधार लेकर भरण-पोषण की राशि को अनुचित रूप से कम नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि पत्नी के वास्तविक जीवन-यापन के खर्च को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

अनावेदक यदि यह कहता है कि वह वर्तमान में कोई आय अर्जित नहीं कर रहा है, तो उसे अपनी वास्तविक आर्थिक स्थिति, कार्य करने की क्षमता तथा आय अर्जित करने में असमर्थता का विश्वसनीय प्रमाण देना होगा। मात्र मौखिक कथन पर्याप्त नहीं है।

3. Reema Salkan v. Sumer Singh Salkan

Civil/Criminal Maintenance Proceedings; Supreme Court

निर्णय वर्ष : 2019

Citation : (2019) 12 SCC 312

इस मामले में पति ने स्वयं को बेरोजगार बताया था। वह उच्च शिक्षित तथा able-bodied व्यक्ति था। सर्वोच्च न्यायालय ने उसके बेरोजगारी के दावे को परिस्थितियों के संदर्भ में देखा। न्यायालय ने पाया कि पति उच्च शिक्षित था, पूर्व में पर्याप्त आय अर्जित करता था और उसके द्वारा बेरोजगार होने का दावा पर्याप्त प्रमाण से समर्थित नहीं था। न्यायालय ने यह सिद्धांत स्वीकार किया कि शिक्षित एवं सक्षम पति केवल बेरोजगारी का दावा करके अपनी पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बाहर नहीं हो सकता। इस प्रकरण में उच्च न्यायालय द्वारा पति की earning capacity के आधार पर notional income का विचार किया गया था; सर्वोच्च न्यायालय ने quantum निर्धारित करते समय पति के पूर्व जीवन-स्तर, पूर्व आय, योग्यता और परिस्थितियों को भी महत्वपूर्ण माना।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

यदि अनावेदक स्वस्थ एवं कार्य करने योग्य है, तो उसकी वर्तमान आय शून्य बताने मात्र से उसकी earning capacity समाप्त नहीं हो जाती।

4. Rajnesh v. Neha & Anr.

Criminal Appeal No. 730 of 2020

निर्णय दिनांक : 04.11.2020

Citation : (2021) 2 SCC 324

यह भरण-पोषण के विषय में वर्तमान समय का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं व्यापक निर्णय है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने maintenance proceedings के लिए विस्तृत guidelines निर्धारित कीं। न्यायालय ने income disclosure affidavit, maintenance determination के factors, विभिन्न कार्यवाहियों में overlapping maintenance तथा बच्चों की शिक्षा एवं आवश्यकताओं सहित अनेक पहलुओं को व्यवस्थित किया। न्यायालय ने यह सिद्धांत स्वीकार किया कि able-bodied husband को पत्नी एवं बच्चों के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त आय अर्जित करने में सक्षम माना जा सकता है और वह अपनी कमाने की क्षमता को जानबूझकर निष्क्रिय करके maintenance liability से बच नहीं सकता।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

अनावेदक की वास्तविक आय स्पष्ट न होने पर न्यायालय उसकी qualification, occupation, previous employment, assets, lifestyle तथा earning capacity को ध्यान में रखकर उचित maintenance निर्धारित कर सकता है।

5. Anju Garg & Anr. v. Deepak Kumar Garg

Civil Appeal/Criminal proceedings concerning maintenance

निर्णय दिनांक : 28.09.2022

Citation : 2022 SCC OnLine SC 1314

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा कि पति का पत्नी एवं नाबालिग बच्चों को आर्थिक सहायता प्रदान करना उसका sacrosanct duty है। यदि पति able-bodied है तो उसे आवश्यकता पड़ने पर physical labour से भी धन अर्जित करना होगा और वह केवल यह कहकर अपने दायित्व से नहीं बच सकता कि उसके पास पर्याप्त आय नहीं है। न्यायालय ने Chaturbhuj v. Sita Bai तथा Bhuwan Mohan Singh v. Meena के सिद्धांतों को लागू किया और माना कि Section 125 CrPC सामाजिक न्याय का प्रावधान है।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

यदि अनावेदक स्वस्थ व्यक्ति है और कोई प्रमाणित अक्षमता नहीं है, तो उसका यह कहना कि “मैं कुछ नहीं कमाता” उसके maintenance obligation का बचाव नहीं हो सकता।

B. माननीय उच्च न्यायालय के न्याय-दृष्टांत

6. Sandeep Kumrawat v. Smt. Antima Kumrawat

High Court of Madhya Pradesh, Bench at Indore

Criminal Revision No. 825 of 2020

निर्णय दिनांक : 19.10.2023

Presiding Judge : Hon'ble Shri Justice Prem Narayan Singh

इस महत्वपूर्ण निर्णय में पति ने स्वयं को बेरोजगार बताया और maintenance कम करने का आग्रह किया। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने उसके तर्क को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि यदि पति कमाने में सक्षम है तो केवल नौकरी छोड़ देने अथवा बेरोजगार होने के आधार पर वह पत्नी एवं बच्चे के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता। न्यायालय ने Shamima Farooqui, Rajnesh v. Neha तथा अन्य सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के सिद्धांतों को लागू किया। विशेष रूप से न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि पति यदि B.Tech/Diploma Engineer जैसे योग्य व्यक्ति होने के बावजूद नौकरी छोड़ देता है, तो केवल नौकरी छोड़ देना maintenance liability से बचने का आधार नहीं बन सकता।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

यदि वर्तमान अनावेदक स्वयं स्वस्थ एवं सक्षम है और उसने अपनी इच्छा से रोजगार नहीं किया है अथवा रोजगार छोड़ दिया है, तो यह उसकी अपनी पसंद है और इसका आर्थिक भार पत्नी एवं बच्चे पर नहीं डाला जा सकता।

7. Kamal v. State of U.P.

Allahabad High Court

Criminal Revision No. 461 of 2023

निर्णय दिनांक : 25.01.2024

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने Anju Garg v. Deepak Kumar Garg के सिद्धांत को लागू करते हुए माना कि स्वस्थ एवं सक्षम पति यदि यह कहे कि उसके पास नौकरी अथवा अन्य स्रोत से कोई आय नहीं है, तब भी वह पत्नी के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त नहीं होता। न्यायालय ने यह भी माना कि यदि पति शारीरिक श्रम भी करे तो वह न्यूनतम मजदूरी अर्जित कर सकता है; अतः पूर्णतः स्वस्थ व्यक्ति द्वारा “मेरी कोई आय नहीं है” का कथन अपने-आप में पर्याप्त बचाव नहीं है।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

अनावेदक को अपनी पत्नी एवं बच्चे के भरण-पोषण के लिए वैध साधनों से आय अर्जित करने का प्रयास करना होगा। बेरोजगारी को पत्नी एवं बच्चे के विरुद्ध हथियार नहीं बनाया जा सकता।

8. Naresh v. Seema

Delhi High Court

Criminal Revision Petition No. 195 of 2024

निर्णय वर्ष : 2024

दिल्ली उच्च न्यायालय ने Anju Garg, Rajnesh, Bhuwan Mohan Singh और Shamima Farooqui के सिद्धांतों को लागू करते हुए कहा कि able-bodied husband अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण के लिए legitimate means से आय अर्जित करने के लिए बाध्य है। पति द्वारा यह कहना कि उसका व्यवसाय बंद हो गया है अथवा वर्तमान में आय का कोई स्रोत नहीं है, अपने-आप में maintenance liability समाप्त नहीं करता।

प्रस्तुत प्रकरण में अनुप्रयोग :

अनावेदक स्वस्थ है तो उसकी earning capacity को ध्यान में रखा जाना चाहिए और पत्नी तथा नाबालिग बच्चे को केवल इसलिए अभाव में नहीं छोड़ा जा सकता कि पति वर्तमान में आय अर्जित नहीं कर रहा है।

3. समेकित विधिक सिद्धांत

उपरोक्त सभी न्याय-दृष्टांतों से निम्न विधिक सिद्धांत पूर्णतः स्थापित होते हैं—

(i) पत्नी एवं नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण करना पति/पिता का वैधानिक दायित्व है।

(ii) पति का स्वस्थ एवं able-bodied होना अत्यंत महत्वपूर्ण परिस्थिति है।

(iii) केवल “मैं बेरोजगार हूँ” अथवा “मेरी कोई आय नहीं है” कहना maintenance से बचने का वैध आधार नहीं है।

(iv) पति को अपनी पत्नी एवं बच्चों के भरण-पोषण हेतु वैध साधनों से आय अर्जित करने का प्रयास करना होगा।

(v) आवश्यकता होने पर सक्षम पति को physical labour से भी आय अर्जित करनी पड़ सकती है।

(vi) maintenance निर्धारित करते समय केवल disclosed income नहीं बल्कि पति की earning capacity, qualification, past employment, previous income, assets, lifestyle एवं सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी देखी जा सकती है।

(vii) पत्नी की आय होने मात्र से भी उसका maintenance claim स्वतः समाप्त नहीं होता; यह देखा जाना आवश्यक है कि वह वास्तव में स्वयं को किस सीमा तक maintain कर सकती है।

(viii) नाबालिग बच्चे का maintenance स्वतंत्र अधिकार है और बच्चे की food, clothing, residence, medical तथा educational requirements पर विशेष रूप से विचार किया जाना आवश्यक है।

4. वर्तमान मामले में निष्कर्ष

अतः यदि वर्तमान प्रकरण में यह तथ्य अभिलेख पर है कि—

1. अनावेदक पति स्वस्थ है;

2. वह किसी ऐसी बीमारी अथवा शारीरिक/मानसिक अक्षमता से ग्रस्त नहीं है जिससे वह कार्य न कर सके;

3. वह कार्य करने योग्य आयु एवं क्षमता में है;

4. उसके पास पर्याप्त शैक्षणिक/व्यावसायिक योग्यता अथवा पूर्व कार्य का अनुभव है;

5. वह अपनी पत्नी एवं नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण नहीं कर रहा है; और

6. उसने अपनी वास्तविक आय अथवा assets का पूर्ण एवं सत्य disclosure नहीं किया है,

तो केवल यह कथन कि “मैं कुछ नहीं कमाता” उसे maintenance liability से मुक्त नहीं करता।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Bhuwan Mohan Singh, Shamima Farooqui, Reema Salkan, Rajnesh v. Neha तथा Anju Garg में प्रतिपादित सिद्धांतों के आलोक में अनावेदक की earning capacity को उसकी वर्तमान घोषित आय से अलग करके देखा जाना आवश्यक है।

अतः माननीय न्यायालय से विनम्र निवेदन है कि अनावेदक के केवल बेरोजगार होने के कथन को स्वीकार न करते हुए उसकी वास्तविक आर्थिक क्षमता, योग्यता, पूर्व रोजगार/आय, संपत्ति, रहन-सहन तथा अन्य परिस्थितियों का समुचित मूल्यांकन किया जाए और आवेदिका पत्नी एवं नाबालिग बच्चे के लिए उचित, न्यायसंगत एवं सम्मानजनक भरण-पोषण राशि निर्धारित की जाए।

प्रार्थना

अतः माननीय न्यायालय से प्रार्थना है कि आवेदिका पत्नी एवं नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण हेतु परिस्थितियों एवं अनावेदक की वास्तविक earning capacity को दृष्टिगत रखते हुए उचित राशि प्रदान करने की कृपा की जाए तथा अनावेदक को केवल बेरोजगारी अथवा आय न होने के कथन के आधार पर उसके वैधानिक दायित्व से मुक्त न किया जाए।

दिनांक : ____________

स्थान : ____________

आवेदिका/आवेदक की ओर से

अधिवक्ता

इसी संबंध में हिमाचल पदेश हाई कोर्ट का एक जजमेंट सितंबर 2026 में भी आया है

Wednesday, 9 September 2026

रिटायरमेंट के बाद गवर्नर की मंजूरी के बिना विभागीय कार्रवाई जारी नहीं रह सकती

 रिटायरमेंट के बाद गवर्नर की मंजूरी के बिना विभागीय कार्रवाई जारी नहीं रह सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-09-09

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ उसकी रिटायरमेंट से पहले शुरू की गई विभागीय कार्रवाई रिटायरमेंट के बाद अपने आप जारी नहीं रह सकती। सिविल सर्विस रेगुलेशंस के रेगुलेशन 351-ए के तहत रिटायरमेंट के बाद ऐसी कार्रवाई जारी रखने और उसके आधार पर कोई सजा देने के लिए गवर्नर की मंजूरी जरूरी है।

जस्टिस अनिल कुमार गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ यूपी बनाम श्री कृष्ण पांडे और भागीरथी जेना बनाम बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के फैसलों के साथ-साथ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले हरिहर भोले नाथ मिश्रा बनाम स्टेट पब्लिक सर्विसेज ट्रिब्यूनल पर भरोसा करते हुए यह फैसला सुनाया।

र्ट ने कहा कि रेगुलेशन 351-ए के तहत सरकारी कर्मचारी की रिटायरमेंट के बाद उसके खिलाफ पहले से शुरू की गई विभागीय कार्रवाई स्वतः जारी नहीं रह सकती। उसके आधार पर कोई दंड भी नहीं दिया जा सकता। यहां तक कि पहले से शुरू की गई कार्रवाई को जारी रखने के लिए भी गवर्नर की मंजूरी आवश्यक है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रेगुलेशन 351-ए के तहत कर्मचारी की रिटायरमेंट के चार साल बाद नई विभागीय कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती। पहले से शुरू कार्रवाई को रिटायरमेंट के बाद जारी रखने के लिए भी गवर्नर की मंजूरी लेना अनिवार्य है।

मामला बलिया के जिला समाज कल्याण अधिकारी कार्यालय में तैनात रहे एक वरिष्ठ लिपिक से जुड़ा था। उनके खिलाफ 11 अगस्त 2005 को विभागीय कार्रवाई शुरू की गई। उन्होंने कुछ जरूरी दस्तावेज मांगे थे, लेकिन उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया। इसके बाद 30 अक्टूबर 2006 को एकतरफा जांच रिपोर्ट पेश कर दी गई।

कार्रवाई पूरी होने से पहले ही कर्मचारी 31 मार्च 2008 को रिटायर हो गए। विभागीय कार्रवाई लंबित होने के कारण उनके सेवानिवृत्ति लाभ भी रोक दिए गए।

बाद में एक आदेश जारी कर उन्हें पिछली तारीख से सेवा से हटाया हुआ माना गया। अपील में यह आदेश रद्द कर दिया गया और रेगुलेशन 351-ए के तहत कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया। इसके बाद सामाजिक कल्याण निदेशक ने 27 दिसंबर 2011 के आदेश से कर्मचारी की 50 प्रतिशत पेंशन स्थायी रूप से रोक दी।

स्टेट पब्लिक सर्विसेज ट्रिब्यूनल ने इस आदेश को रद्द किया। इसके खिलाफ राज्य की ओर से दायर याचिका को हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 15 जनवरी 2014 को गवर्नर की मंजूरी नहीं होने के कारण खारिज कर दिया। इसके बाद सामाजिक कल्याण निदेशक ने 13 फरवरी 2014 को विभागीय कार्रवाई समाप्त कर दी।

इसके बावजूद 15 जनवरी 2015 को उसी विभागीय कार्रवाई के आधार पर एक नया आदेश पारित कर कर्मचारी की पेंशन का दो-तिहाई हिस्सा स्थायी रूप से रोक दिया गया। साथ ही 36,98,603 रुपये की वसूली का भी आदेश दिया गया।

हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से पेश वकील यह नहीं बता सके कि कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के बाद गवर्नर की कोई मंजूरी ली गई थी। न तो विवादित आदेश में ऐसी मंजूरी का उल्लेख था और न ही राज्य के जवाबी हलफनामे में इसका कोई प्रमाण पेश किया गया।

कोर्ट ने कहा कि निदेशक इस तथ्य से पूरी तरह अवगत थे कि गवर्नर की मंजूरी नहीं ली गई। इसके बावजूद उन्होंने उसी कार्रवाई के आधार पर आदेश पारित किया। कोर्ट ने इसे कर्मचारी को परेशान करने और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले उसके वैध लाभों को रोकने की जानबूझकर की गई कोशिश माना।

हाईकोर्ट ने 15 जनवरी 2015 के विवादित आदेश रद्द करते हुए याचिका मंजूर की। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि कर्मचारी को उसके सभी देय रिटायरमेंट लाभ 8 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ आठ सप्ताह के भीतर जारी किए जाएं।

कोर्ट ने कहा कि आदेश की प्रमाणित प्रति संबंधित अधिकारी संख्या तीन के समक्ष पेश किए जाने के आठ सप्ताह के भीतर भुगतान नहीं किया गया तो देय राशि पर 12 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होगा।

साबित करने के लिए पर्याप्त... जाति साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज न होने भर से SC-ST को संवैधानिक लाभ से वंचित नहीं कर सकते: केरल हाईकोर्ट

साबित करने के लिए पर्याप्त... जाति साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज न होने भर से SC-ST को संवैधानिक लाभ से वंचित नहीं कर सकते: केरल हाईकोर्ट 7 Sept 2026 

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC/ST) का सदस्य अपनी जातीय पहचान साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर पाया केवल इस आधार पर उसे संविधान के तहत मिलने वाले लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। इसके लिए राज्य को उसके दावे के विपरीत ठोस और स्वतंत्र साक्ष्य पेश करना होगा। डॉ. जस्टिस ए.के. जयशंकरन नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के. की डिवीजन बेंच ने कहा कि केरल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति सामुदायिक प्रमाणपत्र जारी करने के विनियमन अधिनियम 1996 के तहत जाति दावों की जांच करते समय अधिकारियों को SC-ST सदस्यों से वही प्रमाण का बोझ पूरा करने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, जो सामान्य परिस्थितियों में किसी नागरिक से उसकी सामुदायिक पहचान साबित करने के लिए की जाती है। 

  अदालत रिटायर्ड पोस्टल असिस्टेंट की अपील पर सुनवाई कर रही थी। सिंगल बेंच ने उस कार्रवाई को बरकरार रखा, जिसमें उन्हें मलई पंडारम अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं माना गया। अपीलकर्ता को 1980 में पोस्टमैन के पद पर और 1989 में पोस्टल असिस्टेंट के पद पर अनुसूचित जनजाति आरक्षण के तहत नियुक्ति और पदोन्नति मिली थी। यह लाभ तहसीलदार द्वारा जारी सामुदायिक प्रमाणपत्र के आधार पर मिला था, जिसमें उन्हें मलई पंडारम समुदाय का सदस्य बताया गया। 

बाद में सतर्कता जांच में दावा किया गया कि वह मलई पंडारम नहीं, बल्कि पंडारम (वीर शैव) समुदाय से संबंधित हैं, जिसे अन्य पिछड़ा वर्ग में रखा गया। जांच के आधार पर स्क्रूटिनी कमेटी ने उनका सामुदायिक प्रमाणपत्र रद्द करने सहित कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद सरकार ने उनकी सेवा समाप्त करने और कथित झूठा जाति दावा करने के आरोप में अभियोजन चलाने का आदेश दिया। अपीलकर्ता ने अधिकारियों द्वारा भरोसा किए गए दस्तावेजों और सामग्री में विसंगतियां होने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि सतर्कता रिपोर्ट में मुख्य रूप से उनके मामा के कथित बयान पर भरोसा किया गया, जबकि मामा खुद अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित बताए गए। उन्होंने यह भी बताया कि उनके परिवार के अन्य सदस्यों को अनुसूचित जनजाति की पहचान के आधार पर लाभ मिल चुके हैं। अपीलकर्ता ने अपने खिलाफ इस्तेमाल किए गए मूल दस्तावेज देखने की मांग की थी लेकिन प्रतिकूल आदेश पारित करने से पहले उन्हें ये दस्तावेज नहीं दिखाए गए। 

डिवीजन बेंच ने पाया कि अपीलकर्ता की आपत्ति और उसके जवाब पर आदेश पारित करते समय विचार ही नहीं किया गया। अदालत ने राज्य की यह दलील भी खारिज की कि उपलब्ध सामग्री पर्याप्त होने के कारण आपत्ति पर विचार न करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं है। अदालत ने कहा कि 1996 के कानून के नजरिए से भी स्क्रूटिनी कमेटी का दृष्टिकोण सही नहीं था। जाति की गलत जानकारी देकर आरक्षण या अन्य संवैधानिक लाभ हासिल करने के आरोपों की जांच करते समय अधिकारियों को उन सामाजिक कठिनाइयों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए, जिनका सामना SC/ST समुदायों के सदस्यों को अपनी पहचान से जुड़े दस्तावेज हासिल करने में करना पड़ता है। 

 हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जिनमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को पहचान संबंधी दस्तावेजों के अभाव में ही लाभों से वंचित कर दिया जाता है। अदालत ने कहा कि पहचान और जाति प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज हासिल करने में इन समुदायों के लोगों को होने वाली कठिनाइयों को वह अपने समक्ष आने वाले मामलों की संख्या के आधार पर न्यायिक संज्ञान में ले सकती है। अदालत ने कहा कि जाति दावों की जांच करते समय अधिकारियों को समग्र परिस्थितियों पर विचार करते हुए उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इसमें परिवार के अन्य सदस्यों, यहां तक कि विस्तारित परिवार के सदस्यों को सामाजिक सुरक्षा या आरक्षण संबंधी लाभ दिए जाने जैसे पहलुओं को भी देखा जाना चाहिए। डिवीजन बेंच ने कहा कि एक ओर राज्य यह स्वीकार करता है कि SC/ST समुदायों को अन्य नागरिकों के बराबर लाने के लिए सकारात्मक कार्रवाई जरूरी है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं समुदायों के सदस्यों से अपनी पहचान साबित करने के लिए सामान्य नागरिकों के समान कठोर प्रमाण की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि एससी-एसटी सदस्यों को संविधान से मिले लाभों से वंचित करना केवल असाधारण मामलों में उचित होगा, जहां स्पष्ट धोखाधड़ी स्वतंत्र रूप से उपलब्ध सरकारी सामग्री से साबित हो। जहां आवश्यक हो, इसमें उस अधिकारी द्वारा की गई कथित धोखाधड़ी का प्रमाण भी शामिल होना चाहिए, जिसने संबंधित जाति प्रमाणपत्र जारी किया था और जिसके आधार पर व्यक्ति को सेवा संबंधी लाभ मिले। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी दावेदार का अपनी सामुदायिक पहचान साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर पाना, अपने आप में संवैधानिक लाभ छीनने का आधार नहीं हो सकता, जब तक राज्य उसके दावे के विपरीत सकारात्मक और ठोस साक्ष्य पेश न करे। अदालत ने स्क्रूटिनी कमेटी की कार्यवाही और उसके आधार पर सरकार द्वारा पारित आदेश दोनों रद्द कर दिए। कमेटी को मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया गया है। उसे अपीलकर्ता की पहले दी गई आपत्ति और उसके द्वारा पेश की जाने वाली अतिरिक्त सामग्री पर विचार करना होगा तथा उसके खिलाफ इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों के मूल रिकॉर्ड का निरीक्षण करने का अवसर भी देना होगा। नई कार्यवाही हाईकोर्ट के फैसले की प्रति प्राप्त होने से छह महीने के भीतर पूरी करनी होगी। अदालत ने कमेटी को यह भी निर्देश दिया कि वह अपीलकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों पर लागू प्रमाण के बोझ को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणियों को ध्यान में रखे। नई कार्यवाही पूरी होने तक अपीलकर्ता को अस्थायी पेंशन लेते रहने की भी अनुमति दी गई है। डिवीजन बेंच ने इस निर्देश के साथ रिट अपील मंजूर की।


https://hindi.livelaw.in/kerala-high-court/kerala-high-court-dr-justice-ak-jayasankaran-nambiar-justice-preeta-ak-scst-548905

Saturday, 5 September 2026

25 साल की सर्विस के बाद फर्जी पाया गया ST सर्टिफिकेट, सुप्रीम कोर्ट ने दी रिटायरमेंट के फायदे देने को मंज़ूरी 5 Sept 2026

25 साल की सर्विस के बाद फर्जी पाया गया ST सर्टिफिकेट, सुप्रीम कोर्ट ने दी रिटायरमेंट के फायदे देने को मंज़ूरी  5 Sept 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (3 सितंबर) को संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए रिटायर्ड कर्मचारी के रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े फायदों को सुरक्षित रखा। इस कर्मचारी का कम्युनिटी सर्टिफिकेट 25 साल से ज़्यादा की सर्विस के बाद अमान्य पाया गया। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने जूनियर इंजीनियर (सिविल) की अपील पर सुनवाई की। उन्हें 1994 में 'टोकरे कोली' अनुसूचित जनजाति (ST) के कम्युनिटी सर्टिफिकेट के आधार पर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ़ ग्रेटर मुंबई में नियुक्त किया गया। बाद में 2020 में स्क्रूटनी कमेटी ने उनके जाति प्रमाण पत्र को अमान्य घोषित कर दिया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस फैसले को सही ठहराया, जिसके बाद रिटायर्ड कर्मचारी ने सुप्रीम कोर्ट में SLP (स्पेशल लीव पिटिशन) दायर की। Also Read - यूनिवर्सिटी शिक्षकों के वेतनमान से खिलवाड़ नहीं कर सकते, UGC नियमों से हटना संभव नहीं: सुप्रीम कोर्ट अपील पर सुनवाई के दौरान, अपीलकर्ता कोर्ट के अंतरिम आदेश के तहत सर्विस में बना रहा और आखिरकार 2025 में रिटायरमेंट की उम्र पूरी होने पर रिटायर हो गया। चूंकि अपीलकर्ता अब रिटायर हो चुका है, इसलिए उसने 'सुरेखा बलजोरसिंह ठाकुर बनाम जाति स्क्रूटनी कमेटी और अन्य (2024)' मामले में कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अपने रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े फायदों को सुरक्षित रखने की मांग की। हालांकि, कोर्ट ने अपीलकर्ता के जाति प्रमाण पत्र को अमान्य घोषित करने वाले स्क्रूटनी कमेटी और हाईकोर्ट के आदेश को सही माना, लेकिन साथ ही यह भी उचित समझा कि अपीलकर्ता को तीन दशकों से अधिक समय तक लगातार सर्विस देने के बदले रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े फायदे मिलने चाहिए। 

 कोर्ट ने कहा, "...मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने और यह ध्यान में रखते हुए कि अपीलकर्ता ने 1994 में रेस्पॉन्डेंट नंबर 3 के साथ सर्विस शुरू की और 30.06.2025 को अपनी रिटायरमेंट की तारीख तक सर्विस में बना रहा - जो कि तीन दशकों से अधिक का समय है - हम यह सुनिश्चित करना उचित समझते हैं कि अपीलकर्ता को उसके रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े फायदों से वंचित न किया जाए।" सुरेखा बलजोरसिंह ठाकुर मामले के अलावा, 'चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, फूड कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया और अन्य' मामले का भी हवाला दिया गया। जगदीश बलराम बहिरा और अन्य (2017) के मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने माना कि, हालांकि आम तौर पर गलत जाति या जनजाति प्रमाण पत्र के आधार पर मिली नौकरी बरकरार नहीं रहती, लेकिन कोर्ट किसी उचित मामले में पूरा न्याय करने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है। 

कोर्ट ने कहा, "इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करने का फैसला करते हैं। इसके अनुसार, अपीलकर्ता द्वारा प्रतिवादी नंबर 3 के साथ 21.10.1994 से 30.06.2025 को उनकी रिटायरमेंट की तारीख तक की गई सेवा को, लागू सेवा नियमों के अनुसार उनके रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े लाभों की गणना और भुगतान के सीमित उद्देश्य के लिए सुरक्षित माना जाएगा।" 

कोर्ट ने स्पष्ट किया, "यह साफ किया जाता है कि यहां दी गई सुरक्षा का मतलब अपीलकर्ता के 'टोकरे कोली' अनुसूचित जनजाति से संबंधित होने के दावे को सही ठहराना या मान्यता देना नहीं होगा। न तो अपीलकर्ता और न ही उनके परिवार का कोई सदस्य अमान्य किए गए जाति प्रमाण पत्र के आधार पर भविष्य में किसी लाभ का दावा करने का हकदार होगा।" नतीजतन, अपील आंशिक रूप से स्वीकार की गई।

 Cause Title: SHIRISH PANDHARINATH PATIL VERSUS THE STATE OF MAHARASHTRA & ORS.


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सुप्रीम कोर्ट में शुरू होगी कानून, न्याय और कानूनी शिक्षा पर मंथली लेक्चर सीरीज़, CJI ने टीचर्स डे पर बताई योजना 5 Sept 2026

सुप्रीम कोर्ट में शुरू होगी कानून, न्याय और कानूनी शिक्षा पर मंथली लेक्चर सीरीज़, CJI ने टीचर्स डे पर बताई योजना 5 Sept 2026 

 सुप्रीम कोर्ट कानून, न्याय और कानूनी शिक्षा पर एक मंथली लेक्चर सीरीज़ शुरू करने जा रहा है। यह कानूनी सिस्टम और समाज से जुड़े मौजूदा मुद्दों पर चर्चा के लिए एक रेगुलर मंच बनाएगा। इस पहल की घोषणा चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ने शनिवार को टीचर्स डे के मौके पर की। यह सीरीज़ "एक ज़रूरी विचार। हर महीने।" (One important idea. Every month.) थीम पर आधारित होगी। हर सेशन में किसी जाने-माने कानून विशेषज्ञ, स्कॉलर, कानूनी शिक्षाविद या अपने क्षेत्र के एक्सपर्ट का खास लेक्चर होगा। लेक्चर के बाद 'आइडियाज़ डायलॉग' होगा, जिसमें चुने हुए युवा वकील, लॉ स्टूडेंट्स और रिसर्चर चर्चा में हिस्सा ले सकेंगे और सवाल पूछ सकेंगे। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस फ़ॉर्मेट का मकसद पारंपरिक लेक्चर से आगे बढ़कर स्थापित कानूनी संस्थानों और कानूनी समुदाय की युवा पीढ़ी के बीच सार्थक बातचीत को बढ़ावा देना है। यह पहल मौजूदा कानूनी विचारों का स्थायी आर्काइव भी बनाएगी। लेक्चर को प्रोफेशनल तरीके से रिकॉर्ड करने और उनके साथ एडिट किए गए ट्रांसक्रिप्ट और संक्षिप्त 'आइडियाज़ पेपर्स' उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है। कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग भी की जाएगी और देश भर के कानूनी और एकेडमिक समुदाय तक पहुंच बढ़ाने के लिए भारतीय भाषाओं में सारांश उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है। 

लेक्चर सीरीज़ के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने सालाना "सुप्रीम कोर्ट न्याय शिक्षा सम्मान" का प्रस्ताव रखा है। यह कानूनी शिक्षा में बेहतरीन योगदान के लिए दिया जाने वाला गैर-मौद्रिक सम्मान होगा। यह अवॉर्ड हर साल टीचर्स डे के आसपास एक या दो जाने-माने कानूनी शिक्षाविदों को देने का प्रस्ताव है। पहला अवॉर्ड उद्घाटन लेक्चर के बाद दिया जाएगा। लेक्चर सीरीज़ का पहला सेशन सितंबर 2026 में होगा और उसके बाद हर महीने एक सेशन आयोजित किया जाएगा। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस पहल का मकसद कानून और न्याय पर एक स्थायी संस्थागत परंपरा और लंबे समय तक चलने वाला सार्वजनिक संसाधन बनाते हुए, गहरी कानूनी सोच, सार्थक बातचीत और व्यापक भागीदारी को बढ़ावा देना है।


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हत्या की सजा रद्द करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जज की कार्यक्षमता पर उठाए सवाल, मामला एक्टिंग चीफ जस्टिस के समक्ष भेजा

 हत्या की सजा रद्द करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जज की कार्यक्षमता पर उठाए सवाल, मामला एक्टिंग चीफ जस्टिस के समक्ष भेजा 5 Sept 2026 

 मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में दोषसिद्धि रद्द करते हुए विशेष जज के फैसले में गंभीर त्रुटियां पाईं। अदालत ने साक्ष्यों के मूल्यांकन के तरीके पर चिंता जताते हुए विशेष जज, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) दमोह की संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए उपयुक्तता पर गंभीर सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने मामले को उचित निर्णय के लिए कार्यवाहक चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया। 

 जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने FSL रिपोर्ट से जुड़े तथ्यों को गलत तरीके से दर्ज किया और दोषसिद्धि का आदेश ऐसे आधारों पर पारित किया, जो स्पष्ट और अस्तित्व में ही नहीं थे। पीठ ने कहा, “ट्रायल कोर्ट अपने दायित्वों का उचित सावधानी और तत्परता से निर्वहन करने में विफल रही है। साक्ष्य और अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री के मूल्यांकन का तरीका गंभीर चिंता पैदा करता है और विशेष जज की इस तरह के संवेदनशील मामलों से निपटने की उपयुक्तता पर प्रथम दृष्टया सवाल खड़े करता है।” 

एमपी हाईकोर्ट ने CISF कॉन्स्टेबल की सज़ा रद्द की अदालत ने निर्देश दिया कि मामले को कार्यवाहक चीफ जस्टिस के समक्ष रखा जाए ताकि इस संबंध में उचित निर्णय लिया जा सके। मामला हत्या के दोषी ठहराए गए व्यक्ति की अपील से जुड़ा था। अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था और हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। यह भी कहा गया कि विशेष जज ने जिन तीन परिस्थितियों को दोषसिद्धि का आधार बनाया वे एक-दूसरे से जुड़ी नहीं थीं और उनसे अपराध साबित नहीं होता। 

 जांच एजेंसी पहले करे वीडियो की सत्यता और संदर्भ की पड़ताल हाईकोर्ट ने अभियोजन के गवाह छोटेलाल अहिरवार जो मृतक लोटन लोधी का रिश्तेदार है, उनके बयान की जांच की। उसने बताया कि 22 मार्च 2024 को मृतक अपने घर के चबूतरे पर अपीलकर्ता के साथ बैठा था। मृतक ने उसे शराब खरीदने के लिए पैसे दिए। शराब लेकर लौटने के बाद मृतक और अपीलकर्ता हल्ले के घर की ओर चले गए। अगले दिन मृतक लाखन सिंह के दरवाजे पर मृत पाया गया। पीठ ने गवाह के बयान में कई विसंगतियां पाईं। उसका बयान मृतक के कथित मृत्यु-पूर्व कथन से मेल नहीं खाता था। इसके अलावा घटना 22-23 मार्च 2024 की होने के बावजूद गवाह का बयान 4 मई 2024 को दर्ज किया गया, यानी काफी देरी से। दोषसिद्धि के लिए दूसरी परिस्थिति के तौर पर अपीलकर्ता के घर से तीन नोट और एक मोबाइल बरामद किए जाने पर भरोसा किया गया। हाईकोर्ट ने पाया कि बरामद मोबाइल के संबंध में न तो सिम कार्ड के न होने का उल्लेख था और न ही उसका IMEI नंबर दर्ज किया गया। अदालत ने यह भी पाया कि दस्तावेज पी-24 न तो स्पष्ट था और न ही पढ़ने योग्य। कॉल विवरण में अपीलकर्ता और मृतक के बीच बातचीत का उल्लेख था लेकिन ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं था, जिससे यह साबित हो कि जिस सिम से बातचीत हुई वही बरामद मोबाइल में इस्तेमाल हो रही थी। पीठ ने कहा कि मोबाइल खरीदने का बिल भी साक्ष्य में मौजूद नहीं था। इसलिए सिम कार्ड को अपीलकर्ता या उसके परिवार के किसी सदस्य के मोबाइल से जोड़ने वाला कोई ठोस आधार नहीं था। इसके अलावा, बरामद मोबाइल मृतक का था यह साबित करने के लिए भी कोई साक्ष्य नहीं था। FSL रिपोर्ट को लेकर हाईकोर्ट ने विशेष जज के निष्कर्ष को विशेष रूप से गंभीर माना। विशेष जज ने यह दर्ज किया कि मृतक के कपड़ों पर मानव रक्त मिला, जबकि FSL रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया कि मृतक के कपड़ों पर मानव रक्त के कोई निशान नहीं थे। इसके विपरीत अभियोजन गवाह सात के कपड़ों पर रक्त पाया गया। हाईकोर्ट ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामलों में घटनाओं की पूरी कड़ी स्थापित किए जाने के सिद्धांत को दोहराया। पीठ ने शरद बिरधिचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि परिस्थितियों को ठोस रूप से साबित करना जरूरी है और सभी परिस्थितियां मिलकर ऐसी पूरी कड़ी बनानी चाहिए, जिससे अपराध के अलावा किसी अन्य निष्कर्ष की संभावना न रहे। पीठ ने गवाह सात और गवाह 13 के बयानों की जांच के बाद पाया कि घटनाओं की कड़ी अधूरी थी। बरामद मोबाइल को मृतक से जोड़ने वाला भी कोई ठोस साक्ष्य नहीं था। अदालत ने कहा, “बरामद मोबाइल और बातचीत में इस्तेमाल सिम के बीच कोई ठोस संबंध स्थापित नहीं होने के कारण यह बरामदगी परिस्थितियों की कड़ी में आवश्यक कड़ी स्थापित नहीं करती। जब परिस्थितियों की कड़ी अधूरी है, तब उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन किए बिना दर्ज की गई दोषसिद्धि कानून की नजर में कायम नहीं रह सकती।” हाईकोर्ट ने माना कि विशेष जज ने साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया। इसके चलते हत्या में दोषसिद्धि बरकरार रखना संभव नहीं है। खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि का आदेश रद्द किया और आरोपी को राहत प्रदान की। साथ ही, विशेष जज की कार्यप्रणाली और संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए उनकी उपयुक्तता से जुड़े मुद्दे पर उचित निर्णय के लिए मामला एक्टिंग चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया।


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Wednesday, 2 September 2026

स्वतंत्र प्रैक्टिस करने वाली वकील को सिर्फ पेशे के आधार पर भरणपोषण से वंचित नहीं किया जा सकता

स्वतंत्र प्रैक्टिस करने वाली वकील को सिर्फ पेशे के आधार पर भरणपोषण से वंचित नहीं किया जा सकता: तेलंगाना हाईकोर्ट  24 Aug 2026

तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा है कि सिर्फ अधिवक्ता के रूप में नामांकित होने और स्वतंत्र रूप से वकालत करने से यह साबित नहीं होता कि पत्नी की पर्याप्त स्वतंत्र आय है और उसे हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत भरणपोषण नहीं दिया जाना चाहिए। जस्टिस वाकिति रामकृष्ण रेड्डी ने पत्नी की रिव्यू याचिका मंजूर करते हुए हाईकोर्ट के अक्टूबर 2024 के उस आदेश को वापस ले लिया, जिसमें फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए ₹20,000 प्रतिमाह अंतरिम भरणपोषण को रद्द कर दिया गया था। 

 मामला हैदराबाद की I Additional Family Court में वर्ष 2010 से लंबित वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। वर्ष 2013 में फैमिली कोर्ट ने पत्नी को ₹20,000 और दोनों बेटियों को ₹15,000-₹15,000 प्रतिमाह अंतरिम भरणपोषण देने का आदेश दिया था। पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अक्टूबर 2024 में हाईकोर्ट ने पत्नी का भरणपोषण रद्द कर दिया, जबकि बेटियों के लिए भरणपोषण को उनकी बालिग होने तक बरकरार रखा। इसके बाद पत्नी ने रिव्यू याचिका दाखिल की। 

 पत्नी ने बताया कि वह किसी नौकरी में नहीं थी बल्कि स्वतंत्र रूप से वकालत करती थी, जिससे होने वाली आय नियमित या निश्चित नहीं थी। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि नौकरी से मिलने वाली निश्चित आय और स्वतंत्र प्रैक्टिस से होने वाली अनियमित आय में महत्वपूर्ण अंतर है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 24 के तहत मुख्य सवाल यह है कि वास्तव में उपलब्ध आय पत्नी के भरणपोषण और मुकदमे के खर्च के लिए पर्याप्त है या नहीं। केवल शैक्षणिक योग्यता, पेशेवर स्थिति या कमाने की क्षमता के आधार पर भरणपोषण से इनकार नहीं किया जा सकता। 

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Chaturbhuj v. Sita Bai, Shailja v. Khobbanna और Manish Jain v. Akanksha Jain के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कमाने की क्षमता या कुछ आय होना अपने आप में भरणपोषण से वंचित करने का आधार नहीं है। कोर्ट ने पाया कि उसके पिछले आदेश में पत्नी की वास्तविक आय, उसकी पर्याप्तता और पति की आय एवं आर्थिक क्षमता पर कोई ठोस निष्कर्ष नहीं था। इसके अलावा, Rajnesh v. Neha में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित भरणपोषण संबंधी दिशानिर्देशों पर भी उचित विचार नहीं किया गया था। 

 कोर्ट ने यह भी कहा कि रिवीजनल क्षेत्राधिकार में हाईकोर्ट फैमिली कोर्ट के तथ्यों का नए सिरे से मूल्यांकन नहीं कर सकता, जब तक उसके निष्कर्षों में कोई विकृति या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि न हो। हाईकोर्ट ने रिव्यू याचिका मंजूर करते हुए अक्टूबर 2024 का आदेश वापस ले लिया और पति की सिविल रिवीजन याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही 2013 के फैमिली कोर्ट के अंतरिम भरणपोषण आदेश को उसके मूल रूप में बहाल कर दिया गया। पति को बकाया भरणपोषण की गणना, पहले किए गए भुगतानों और शेष राशि का विवरण तथा Rajnesh v. Neha के अनुसार संपत्ति और देनदारियों का हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया। निर्धारित बकाया राशि का भुगतान 8 सप्ताह के भीतर करने का आदेश दिया गया।