Monday, 13 April 2026

पत्नी का भविष्य के भरण-पोषण का अधिकार छोड़ने का समझौता सार्वजनिक नीति के खिलाफ, CrPC की धारा 125 के तहत दावा करने से नहीं रोकता

पत्नी का भविष्य के भरण-पोषण का अधिकार छोड़ने का समझौता सार्वजनिक नीति के खिलाफ, CrPC की धारा 125 के तहत दावा करने से नहीं रोकता: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट।

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि कोई भी ऐसा समझौता, जिसमें पत्नी किसी तय रकम के बदले भविष्य में पति से भरण-पोषण का दावा करने का अपना अधिकार छोड़ देती है, वह सार्वजनिक नीति के खिलाफ है। साथ ही यह समझौता उसे CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा करने से नहीं रोक सकता, क्योंकि यह एक कानूनी अधिकार है।

जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल की बेंच ने पति द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए कहा,

"पत्नी द्वारा भरण-पोषण के अधिकार को छोड़ देने से भरण-पोषण के उसके दावे पर कोई असर नहीं पड़ेगा।"

याचिकाकर्ता ने होशियारपुर की फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज द्वारा दिए गए उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें उनकी पत्नी को उसके आवेदन की तारीख से हर महीने ₹6,000 का भरण-पोषण भत्ता देने का आदेश दिया गया।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि पत्नी ने पति के साथ हुए एक समझौते के तहत अपने पिछले, मौजूदा और भविष्य के भरण-पोषण के लिए पहले ही एकमुश्त ₹60,000 की रकम ले ली थी। इस समझौते के तहत उसने प्रभावी रूप से भविष्य में भरण-पोषण का दावा करने का अपना अधिकार छोड़ दिया था।

उन्होंने आगे यह भी तर्क दिया कि पत्नी शारीरिक रूप से सक्षम महिला है और उसने खुद यह स्वीकार किया कि वह एक निजी नौकरानी के तौर पर काम करती है। इसलिए वह अपना भरण-पोषण खुद कर सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि वह दिहाड़ी मजदूर है और हर महीने सिर्फ ₹10,000/- ही कमा पाता है।

दूसरी ओर, पत्नी ने यह स्वीकार किया कि उसने पहले नौकरानी के तौर पर काम किया था, लेकिन उसकी कमाई से उसकी खाने-पीने और कपड़ों जैसी बुनियादी ज़रूरतें भी मुश्किल से ही पूरी हो पाती थीं। इन बातों को ध्यान में रखते हुए बेंच ने कहा कि "अपनी शारीरिक मेहनत के दम पर" गुज़ारा करने की उसकी कोशिश उसे भरण-पोषण का दावा करने से नहीं रोक सकती।

कोर्ट ने इस संबंध में निम्नलिखित टिप्पणी की:

"चूंकि पति अपनी पत्नी को किसी भी तरह का भरण-पोषण नहीं दे रहा था, इसलिए अपनी शारीरिक मेहनत के दम पर गुज़ारा करने की उसकी कोशिश उसे पति से भरण-पोषण का दावा करने से नहीं रोक सकती। न ही यह माना जा सकता है कि वह 'अपना भरण-पोषण खुद करने में असमर्थ' होने की श्रेणी में नहीं आती है। जब तक कोर्ट पति को भरण-पोषण भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं कर देता, तब तक पत्नी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह हाथ पर हाथ धरे बैठी रहे और भूखी मरे।"

पति के इस तर्क के संबंध में कि पत्नी ने भविष्य में भरण-पोषण के अपने अधिकार को छोड़ दिया, बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के 1978 के फैसले 'बाई ताहिरा बनाम अली हुसैन फिदाअली चोथिया' पर भरोसा किया।

इसमें यह कहा गया:

"...पत्नी और पति के बीच किया गया कोई भी समझौता—चाहे वह कोर्ट में दायर किसी समझौते के हिस्से के तौर पर हो या किसी और तरह से—जिसके तहत पत्नी, कुछ रकम मिलने के बदले भविष्य में पति से भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार छोड़ देती है या माफ कर देती है, वह 'लोक नीति' (Public Policy) के खिलाफ है और उसे भरण-पोषण का दावा करने से नहीं रोक सकता।"

नतीजतन, कोर्ट ने कहा कि पत्नी द्वारा भरण-पोषण के अधिकार को छोड़ देने से उसका दावा खारिज नहीं हो जाएगा। कोर्ट ने आगे कहा कि पहले ₹60,000 की रकम मिलना उसे अपने अधिकारों का दावा करने से नहीं रोकता, क्योंकि वह रकम पूरी ज़िंदगी के लिए काफी नहीं थी और वह अपर्याप्त थी।

इसके अलावा, बेंच ने ज़रूरी चीज़ों की बढ़ती कीमतों और जीवन-यापन की लागत को ध्यान में रखा और पाया कि फैमिली कोर्ट द्वारा पति की आय का अनुमान ₹20,000 प्रति माह लगाना उचित था।

सिंगल जज ने कहा,

"पति ने खुद माना कि उसने 10+2 (12वीं) तक पढ़ाई की है और उसके पास इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा है। वह स्वस्थ और शारीरिक रूप से सक्षम है। वह एक कुशल कारीगर है और गांव में राजमिस्त्री का काम करता है। राज्य सरकार द्वारा एक कुशल कारीगर के लिए तय की गई न्यूनतम मज़दूरी को देखते हुए उसकी आय का अनुमान ₹20,000 प्रति माह लगाना ज़्यादा नहीं कहा जा सकता।"

इसके साथ ही कोर्ट ने पत्नी की उचित ज़रूरतों—जिसमें उसके भोजन, कपड़े, रहने की जगह और इलाज का खर्च शामिल है—को ध्यान में रखते हुए ₹6,000 प्रति माह की भरण-पोषण राशि को बरकरार रखा। इस प्रकार, याचिका खारिज कर दी गई।

Friday, 10 April 2026

Ex-Parte भरण-पोषण आदेश को चुनौती देने से पहले धारा 145(2) BNSS के तहत रिकॉल अर्जी जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट 5 Apr 2026

Ex-Parte भरण-पोषण आदेश को चुनौती देने से पहले धारा 145(2) BNSS के तहत रिकॉल अर्जी जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट  5 Apr 2026 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि धारा 144 BNSS/धारा 125 CrPC के तहत पारित एकतरफा (ex parte) भरण-पोषण आदेश को चुनौती देने के लिए सीधे हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण (criminal revision) दाखिल नहीं किया जा सकता। जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पहले संबंधित फैमिली कोर्ट या न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 145(2) BNSS/धारा 126(2) CrPC के तहत आवेदन देकर आदेश को निरस्त (recall) कराने का प्रयास करना होगा। 

 मामला क्या था? मामले में पति ने देवरिया की फैमिली कोर्ट द्वारा पारित एकतरफा आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे पत्नी को ₹4,000 और दो नाबालिग बच्चों को ₹2,000-₹2,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट का अवलोकन: कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने विधि अनुसार नोटिस की सेवा के बाद आदेश पारित किया था और पति के पास वैकल्पिक वैधानिक उपाय उपलब्ध था। ऐसे में बिना उस उपाय का उपयोग किए सीधे हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल करना स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि कानून के तहत पक्षकार को पर्याप्त कारण दिखाकर एकतरफा आदेश को निरस्त कराने और मामले की मेरिट पर सुनवाई का अवसर पाने का अधिकार है। आदेश: हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए पति को संबंधित फैमिली कोर्ट के समक्ष जाने का निर्देश दिया। साथ ही, देरी होने की स्थिति में विलंब माफी (condonation of delay) के लिए आवेदन देने की भी अनुमति दी गई।


https://hindi.livelaw.in/allahabad-highcourt/allahabad-high-court-ex-parte-maintenance-order-section-125-crpc-529037

Tuesday, 7 April 2026

S.528 BNSS | विश्वसनीय सबूत आरोपों को गलत साबित कर दें तो आपराधिक कार्यवाही रद्द की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट

S.528 BNSS | विश्वसनीय सबूत आरोपों को गलत साबित कर दें तो आपराधिक कार्यवाही रद्द की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (6 अप्रैल) को फैसला सुनाया कि जहां अभियोजन पक्ष ऐसे विश्वसनीय और अकाट्य सबूतों का खंडन करने में विफल रहता है, जो शिकायत के तथ्यात्मक आधार को प्रभावी ढंग से कमजोर करते हैं, वहां कोर्ट के लिए कार्यवाही रद्द करने की अपनी शक्ति का प्रयोग करना उचित होगा। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने उन अपीलकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की, जिन पर एक बुजुर्ग व्यक्ति पर हमला करने का आरोप था। कोर्ट ने पाया कि CCTV फुटेज काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ, क्योंकि यह शिकायतकर्ता के उस बयान के विपरीत था, जिसका अभियोजन पक्ष ने कोई खंडन नहीं किया था। 

 कोर्ट ने टिप्पणी की, "जहां विश्वसनीय और अकाट्य सबूत स्पष्ट रूप से आरोपों के तथ्यात्मक आधार को गलत साबित कर देते हैं और अभियोजन पक्ष प्रभावी ढंग से उनका खंडन करने में असमर्थ रहता है, वहां अन्याय को रोकने के लिए कोर्ट अपनी अंतर्निहित अधिकारिता का प्रयोग करने में उचित होगा। ऐसा दृष्टिकोण न केवल आरोपी को न्याय दिलाता है, बल्कि उन कार्यवाहियों पर कीमती न्यायिक समय की बर्बादी को भी रोकता है, जिनका उपलब्ध सबूतों के आधार पर, दोषसिद्धि में परिणत होने का कोई उचित अवसर नहीं होता।" 

 यह मामला अक्टूबर, 2022 में कोलकाता के अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में हुए विवाद से जुड़ा है। 77 वर्षीय शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि कई लोगों ने उन पर और उनके परिवार पर हमला किया और उन्हें धमकाया, जिसके परिणामस्वरूप IPC की कई धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई, जिनमें गैर-कानूनी जमावड़ा, चोट पहुंचाना और आपराधिक धमकी शामिल हैं। हालांकि, कलकत्ता हाईकोर्ट ने विशिष्ट आरोपों के अभाव में दो सह-आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही रद्द की थी, लेकिन उसने तीन अपीलकर्ताओं को ऐसी ही राहत देने से इनकार किया, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 

अपील स्वीकार करते हुए जस्टिस मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में CCTV फुटेज की बारीकी से जांच की गई। यह फुटेज अभियोजन पक्ष की अपनी चार्जशीट का ही हिस्सा था। कोर्ट ने पाया कि फुटेज अपीलकर्ताओं के खिलाफ अभियोजन पक्ष के आरोपों का समर्थन नहीं करता। इसके विपरीत, फुटेज से यह साबित हुआ कि अपीलकर्ता हिंसा में शामिल होने के बजाय स्थिति को शांत करने का प्रयास कर रहे थे। अदालत ने टिप्पणी की, “वह फुटेज, जिस पर बहस के दौरान दोनों पक्षकारों ने काफी भरोसा किया, बारीकी से जांच करने पर यह नहीं दिखाता कि अपीलकर्ता किसी भी तरह के हमले या खुले तौर पर आक्रामकता वाले काम में शामिल थे। इस तरह उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की तथ्यात्मक बुनियाद काफी हद तक कमज़ोर हो जाती है। यह सामग्री किसी भी सार्थक तरीके से गलत साबित नहीं हुई। इसका स्वरूप ऐसा है कि इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता, यहां तक कि उस चरण में भी जब अदालत किसी आपराधिक मामले की कार्यवाही को शुरू में ही रद्द करने की याचिका पर विचार कर रही हो।” 

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया 'राजेश अग्रवाल' फैसला प्रदीप कुमार केसरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2025 LiveLaw (SC) 880 में तय किए गए कानून को लागू करते हुए—जिसमें अदालत ने वे कदम बताए, जिन पर हाईकोर्ट को CrPC की धारा 482 (अब BNSS की धारा 528 ) के तहत रद्द करने वाली याचिकाओं की सुनवाई करते समय विचार करना चाहिए—अदालत ने टिप्पणी की कि “ऐसी कार्यवाही को जारी रखना, जबकि उन्हें कथित अपराधों से जोड़ने वाली कोई भी विश्वसनीय सामग्री पूरी तरह से मौजूद नहीं है, आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।” प्रदीप कुमार केसरवानी (उपर्युक्त) मामले में, जो कसौटी तय की गई, वह इस प्रकार थी: 

"(i) पहला चरण: क्या अभियुक्त द्वारा जिस सामग्री पर भरोसा किया गया है, वह ठोस, तर्कसंगत और निर्विवाद है? यानी, क्या वह सामग्री अत्यंत उच्च और त्रुटिहीन गुणवत्ता की है? 

(ii) दूसरा चरण: क्या अभियुक्त द्वारा जिस सामग्री पर भरोसा किया गया, वह अभियुक्त पर लगाए गए आरोपों में निहित कथनों को खारिज करती है? यानी, क्या वह सामग्री शिकायत में निहित तथ्यात्मक कथनों को अस्वीकार करने और रद्द करने के लिए पर्याप्त है? यानी, क्या वह सामग्री ऐसी है जो किसी भी समझदार व्यक्ति को आरोपों के तथ्यात्मक आधार को झूठा मानकर खारिज करने और निंदा करने के लिए प्रेरित करे? 

(iii) तीसरा चरण: क्या अभियुक्त द्वारा जिस सामग्री पर भरोसा किया गया, उसका अभियोजन पक्ष/शिकायतकर्ता द्वारा खंडन नहीं किया गया? और/या क्या वह सामग्री ऐसी है, जिसका अभियोजन पक्ष/शिकायतकर्ता द्वारा उचित रूप से खंडन नहीं किया जा सकता है? 

(iv) चौथा चरण: क्या मुकदमे की कार्यवाही को आगे बढ़ाने से न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और क्या इससे न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं होगी? यदि इन सभी चरणों का उत्तर 'हाँ' में है तो हाईकोर्ट की न्यायिक अंतरात्मा को उसे ऐसी आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। ऐसा उसे CrPC की धारा 482 के तहत प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए करना चाहिए।" 

तदनुसार, अपील स्वीकार की गई और लंबित कार्यवाही रद्द की गई।

 Cause Title: SAJAL BOSE VERSUS THE STATE OF WEST BENGAL AND ORS.




Tuesday, 31 March 2026

सिर्फ एक ही पूर्वज होना पर्याप्त नहीं, संपत्ति को संयुक्त परिवार की नहीं माना जा सकता: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट 2026-03-31

सिर्फ एक ही पूर्वज होना पर्याप्त नहीं, संपत्ति को संयुक्त परिवार की नहीं माना जा सकता: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट 2026-03-31 

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया कि केवल यह तथ्य कि सभी पक्ष एक ही पूर्वज से संबंधित हैं, अपने आप में यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि संपत्ति संयुक्त परिवार की है।

जस्टिस विवेक जैन की पीठ ने कहा कि संयुक्त पारिवारिक संपत्ति होने का दावा करने वाले पक्ष पर यह जिम्मेदारी है कि वह इसका प्रथम दृष्टया प्रमाण प्रस्तुत करे।

अदालत ने कहा, *“केवल इसलिए कि मूल पूर्वज महादेव थे, यह नहीं माना जा सकता कि उनके वंशजों के नाम दर्ज कोई भी भूमि संयुक्त परिवार की संपत्ति है, जब तक इसके समर्थन में कोई दस्तावेज प्रस्तुत न किया जाए।”*

यह मामला शहदोल जिले की 8 जमीनों से जुड़ा था, जिसमें याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि वे और प्रतिवादी सभी एक संयुक्त हिंदू परिवार के सदस्य हैं और संपत्ति का कभी बंटवारा नहीं हुआ।

ट्रायल कोर्ट ने प्रारंभिक रूप से याचिकाकर्ताओं के पक्ष में अस्थायी निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) जारी करते हुए प्रतिवादियों को जमीन में हस्तक्षेप या उसे बेचने से रोका था।

हालांकि, अपीलीय अदालत ने इस आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि केवल वंश परंपरा के आधार पर संपत्ति को संयुक्त नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ताओं के पूर्वज संबंधित जमीन पर दर्ज थे या उनका उस पर अधिकार था।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि संयुक्त पारिवारिक संपत्ति साबित करने का भार याचिकाकर्ता पर ही है और केवल सामान्य पूर्वज का होना पर्याप्त आधार नहीं है।

Sunday, 29 March 2026

पहले का खरीदार बाद की बिक्री रद्द करने की मांग कर सकता है, बाद के सौदे पहले के अधिकारों को खत्म नहीं कर सकते: दिल्ली हाईकोर्ट 2026-03-29

पहले का खरीदार बाद की बिक्री रद्द करने की मांग कर सकता है, बाद के सौदे पहले के अधिकारों को खत्म नहीं कर सकते: दिल्ली हाईकोर्ट 2026-03-29 

दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि पहले के सौदे के तहत कोई खरीदार उसी विक्रेता द्वारा उसी प्रॉपर्टी की बाद में की गई बिक्री को चुनौती देने और उसे रद्द करवाने का हकदार है। कोर्ट ने इस बात की पुष्टि की कि ऐसे बाद के सौदे पहले के अधिकारों को खत्म नहीं कर सकते।

जस्टिस मिनी पुष्करणा ने अपने 86 पेज के फैसले में यह टिप्पणी की:

“जहां एक ही अचल संपत्ति के दो लगातार ट्रांसफर किए गए हों, वहां कानून में उस ट्रांसफर को प्राथमिकता मिलती है, जो समय के हिसाब से पहले हुआ हो, न कि उस ट्रांसफर को जो बाद में हुआ हो। यह प्रावधान एक लैटिन कहावत — 'qui prior est tempore potior est jure' — को दर्शाता है, जिसका अर्थ है कि जो व्यक्ति समय के हिसाब से पहले और पूर्ववर्ती है, कानून में उसकी स्थिति अधिक मजबूत होती है और उसे कानूनन बेहतर अधिकार प्राप्त होते हैं।”

इस मामले में 'सुबुदिनी कर बनाम श्रीमती सावित्री रानी देब' (2012) मामले का हवाला दिया गया, जिसमें गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 'संपत्ति अंतरण अधिनियम' (Transfer of Property Act) से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया कि जब अलग-अलग समय पर दो व्यक्तियों के पक्ष में समान अधिकार सृजित किए जाते हैं तो जिस व्यक्ति को समय के हिसाब से बढ़त हासिल है, उसे कानून में भी बढ़त मिलनी चाहिए।

हाईकोर्ट पश्चिम दिल्ली स्थित प्रॉपर्टी से जुड़े विवाद के संबंध में दायर अपील पर सुनवाई कर रहा था। इस मामले में प्रॉपर्टी के मूल मालिक ने सबसे पहले वर्ष 1988 में वादी (Plaintiff) के पक्ष में कुछ दस्तावेज निष्पादित किए, जिनमें 'बिक्री का करार' (Agreement to Sell), 'मुख्तारनामा' (Power of Attorney), वसीयत और अन्य सहायक दस्तावेज शामिल थे।

लगभग दो दशक बाद प्रॉपर्टी के सह-मालिकों में से एक की मृत्यु हो जाने पर उसी विक्रेता ने वर्ष 2006 में किसी तीसरे पक्ष (खरीदार) के पक्ष में दस्तावेजों का एक और सेट निष्पादित किया।

बाद वाले खरीदार (अपीलकर्ता) ने निचली अदालत के उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें वर्ष 2006 में किए गए 'बिक्री के करार' को 'शून्य और अमान्य' घोषित कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा:

“प्रस्तुत मामले में दोनों ही पक्षकारों के पास अपने नाम से रजिस्टर्ड 'बिक्री विलेख' (Sale Deed) मौजूद नहीं है। इसके बजाय, दोनों ही पक्ष विवादित प्रॉपर्टी पर अपने अधिकार और हित का दावा करने के लिए अन्य दस्तावेजों पर निर्भर हैं। रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद यह बात स्पष्ट रूप से जाहिर होती है कि प्रतिवादी नंबर 1 का विवादित प्रॉपर्टी पर बेहतर अधिकार है।”

अपीलकर्ता ने यह तर्क दिया कि चूंकि पहले वाला खरीदार (प्रतिवादी नंबर 1) वर्ष 2006 में हुए सौदे का पक्षकार नहीं था, इसलिए उसे उस सौदे या करार को रद्द करवाने की मांग करने का कोई अधिकार नहीं था। हालांकि, कोर्ट ने 'स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट' की धारा 31 का हवाला दिया, जो "किसी भी व्यक्ति" को, जिसे किसी लिखित दस्तावेज़ से नुकसान पहुंच सकता है, उसे रद्द करवाने की अनुमति देती है।

कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि किसी बाद के खरीदार को 'बोना फाइड' (नेक-नीयत) खरीदार माने जाने के लिए उसे यह साबित करना होगा कि उसे पहले हुए कॉन्ट्रैक्ट के बारे में कोई जानकारी नहीं थी - चाहे वह जानकारी प्रत्यक्ष हो, अप्रत्यक्ष हो या आरोपित हो।

कोर्ट ने कहा,

"...जहां कोई बाद का खरीदार सिर्फ़ बेचने वाले के बयानों पर भरोसा करता है और प्रॉपर्टी में मौजूद अन्य अधिकारों के बारे में आगे कोई जांच-पड़ताल करने से परहेज़ करता है तो वह 'मान ली गई जानकारी' (Deemed Notice) के परिणामों से बच नहीं सकता... चूंकि अपीलकर्ता खुद यह स्वीकार करता है कि उसने सिर्फ़ प्रतिवादी नंबर 2 के मौखिक आश्वासनों पर भरोसा किया। साथ ही खुद संबंधित अधिकारियों से रिकॉर्ड की जांच कभी नहीं की, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उसने 18 अगस्त, 2006 के 'बिक्री के समझौते' (Agreement to Sell) में शामिल होने से पहले उचित सावधानी बरती थी।"

इस प्रकार, कोर्ट ने पहले खरीदार के पक्ष में दिए गए फ़ैसले को बरकरार रखा और अपील खारिज की।

Case title: Rajeev Miglani v. Urmil Gujral & Anr.

Monday, 23 March 2026

केवल एक ही वारिस हो और कोई प्रतिस्पर्धी दावा न हो, वहां उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए ज़मानत की आवश्यकता नहीं

केवल एक ही वारिस हो और कोई प्रतिस्पर्धी दावा न हो, वहां उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए ज़मानत की आवश्यकता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट  2026-03-22 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 375 के तहत उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने के लिए ज़मानत की शर्त हर मामले में बिना सोचे-समझे नहीं लगाई जा सकती। कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में केवल एक ही वारिस हो, या किसी एक वारिस को प्रमाण पत्र जारी करने पर कोई आपत्ति न हो, वहां ऐसी शर्तें नहीं लगाई जानी चाहिए।

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 372 उन आवेदनों के बारे में बताती है, जो उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए ज़िला जज के समक्ष किए जा सकते हैं। धारा 373 ऐसे आवेदनों की प्रक्रिया बताती है और धारा 374 आवेदन की सामग्री बताती है।

अधिनियम की धारा 375 ज़िला जज को यह अधिकार देती है कि वह ऐसे मामलों में, जिन्हें वह उचित समझे, प्रमाण पत्र प्राप्त करने वाले व्यक्ति पर बॉन्ड के रूप में सुरक्षा संबंधी शर्तें लगा सके।

अधिनियम की धारा 375 का हवाला देते हुए जस्टिस मनीष कुमार निगम ने कहा,

“कोई शर्त तब लगाई जाती है, जब कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि यह किसी भी उद्देश्य के लिए आवश्यक है, जिसमें किसी ऋण का भुगतान, कोई अन्य दावेदार, वैधानिक अधिकारियों को कोई बकाया आदि शामिल हैं। हालांकि, किसी शर्त को लगाने पर विचार प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। किसी शर्त पर बिना सोचे-समझे ज़ोर नहीं दिया जा सकता, विशेष रूप से ऐसी स्थितियों में जहाँ लाभार्थी एकमात्र लाभार्थी हो, या अन्य उपयुक्त मामलों में, यदि लाभार्थी मृतक का स्वाभाविक वारिस हो और अन्य दावेदारों की ओर से कोई आपत्ति न हो।”

याचिकाकर्ता और प्रतिवादी सगी बहनें हैं और अपनी माँ की कानूनी वारिस हैं। वादी-याचिकाकर्ता ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 372 के तहत एक मामला दायर किया, जिसमें अपने पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने की प्रार्थना की गई। प्रतिवादी उपस्थित हुई और उसने याचिकाकर्ता के पक्ष में अपनी सहमति दी। तदनुसार, सिविल जज ने आवेदन स्वीकार की और निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता उस राशि के लिए एक सुरक्षा बॉन्ड और एक व्यक्तिगत बॉन्ड जमा करती है, जिसके लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी किया जा रहा है तो उसे प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाए।

इस शर्त को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

अदालत ने टिप्पणी की,

“ISA की धारा 375 को देखने से यह साफ़ पता चलता है कि सिक्योरिटी/ज़मानत/क्षतिपूर्ति बॉन्ड की शर्त लगाने का मकसद उन लोगों को क्षतिपूर्ति देना या उनके हितों की रक्षा करना है, जो कर्ज़ और सिक्योरिटी के पूरे या किसी हिस्से के हकदार हो सकते हैं।”

यह मानते हुए कि यह शर्त सभी मामलों में बिना सोचे-समझे लागू नहीं की जा सकती, अदालत ने फ़ैसला दिया कि चूंकि सर्टिफ़िकेट लेने वाला केवल एक ही वारिस था और दूसरी बेटी ने याचिकाकर्ता के पक्ष में अपनी सहमति दी थी, इसलिए बॉन्ड की शर्त लगाने का कोई औचित्य नहीं था।

याचिकाकर्ता को बिना ज़मानत के उत्तराधिकार सर्टिफ़िकेट जारी करने का निर्देश देते हुए अदालत ने रिट याचिका स्वीकार की।

Case Title: Smt. Alka Singhania Versus Smt. Shilpi Agarwal 2026 LiveLaw (AB) 120

Monday, 16 March 2026

चार्जशीट दाखिल होते ही नौकरी से हटाना सही नहीं

चार्जशीट दाखिल होते ही नौकरी से हटाना सही नहीं: मध्य प्रदेश हाइकोर्ट 2026-03-16 

मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि किसी आपराधिक मामले में केवल चार्जशीट दाखिल होने के आधार पर सरकारी कर्मचारी को स्वतः सेवा से बर्खास्त नहीं किया जा सकता।

अदालत ने एक होमगार्ड सैनिक को सेवा से हटाने का आदेश रद्द कर दिया।

जस्टिस आशीष श्रोती की पीठ ने कहा कि किसी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करते समय संबंधित प्राधिकारी को आरोपों की गंभीरता और उपलब्ध प्रारंभिक साक्ष्यों का आकलन करना जरूरी है। केवल FIR दर्ज होने और चालान पेश होने के आधार पर सेवा से हटाना उचित नहीं है।

मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ उसकी पत्नी ने क्रूरता, सार्वजनिक स्थान पर अश्लील कृत्य और धमकी देने सहित भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं तथा दहेज प्रतिषेध कानून की धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया था।

याचिकाकर्ता ने मध्य प्रदेश होमगार्ड नियम, 2016 के अनुसार FIR दर्ज होने की सूचना जिला कमांडेंट को दी।

इसके बाद उसे कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा गया कि नियमों के तहत उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए।

याचिकाकर्ता ने अपने जवाब में FIR दर्ज होने की परिस्थितियों की जानकारी दी लेकिन इसके बावजूद जनवरी में आदेश जारी कर उसे सेवा से हटा दिया गया।

अदालत ने कहा कि नियमों के अनुसार यदि किसी होमगार्ड के खिलाफ कोई अपराध दर्ज होता है तो उसे 48 घंटे के भीतर जिला कमांडेंट को इसकी सूचना देनी होती है। साथ ही किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से पहले कर्मचारी को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाना आवश्यक है।

हाइकोर्ट ने कहा कि दंड तय करते समय प्राधिकारी को आरोपों की गंभीरता और उनके समर्थन में उपलब्ध सामग्री पर विचार करना चाहिए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यहां तक कि यदि किसी कर्मचारी को दोषी ठहराया भी जाता है, तब भी हर मामले में सेवा से बर्खास्त करना अनिवार्य नियम नहीं है।

अदालत ने कहा कि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता अभी दोषी सिद्ध नहीं हुआ है और केवल FIR दर्ज हुई तथा चालान पेश किया गया। ऐसे में सेवा से हटाने का आदेश नियमों के अनुरूप नहीं है।

इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने सेवा से हटाने का आदेश रद्द करते हुए मामले को जिला कमांडेंट के पास वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि अदालत की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए नया आदेश पारित किया जाए।