Saturday, 5 September 2026

25 साल की सर्विस के बाद फर्जी पाया गया ST सर्टिफिकेट, सुप्रीम कोर्ट ने दी रिटायरमेंट के फायदे देने को मंज़ूरी 5 Sept 2026

25 साल की सर्विस के बाद फर्जी पाया गया ST सर्टिफिकेट, सुप्रीम कोर्ट ने दी रिटायरमेंट के फायदे देने को मंज़ूरी  5 Sept 2026 

 सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (3 सितंबर) को संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए रिटायर्ड कर्मचारी के रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े फायदों को सुरक्षित रखा। इस कर्मचारी का कम्युनिटी सर्टिफिकेट 25 साल से ज़्यादा की सर्विस के बाद अमान्य पाया गया। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने जूनियर इंजीनियर (सिविल) की अपील पर सुनवाई की। उन्हें 1994 में 'टोकरे कोली' अनुसूचित जनजाति (ST) के कम्युनिटी सर्टिफिकेट के आधार पर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ़ ग्रेटर मुंबई में नियुक्त किया गया। बाद में 2020 में स्क्रूटनी कमेटी ने उनके जाति प्रमाण पत्र को अमान्य घोषित कर दिया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस फैसले को सही ठहराया, जिसके बाद रिटायर्ड कर्मचारी ने सुप्रीम कोर्ट में SLP (स्पेशल लीव पिटिशन) दायर की। Also Read - यूनिवर्सिटी शिक्षकों के वेतनमान से खिलवाड़ नहीं कर सकते, UGC नियमों से हटना संभव नहीं: सुप्रीम कोर्ट अपील पर सुनवाई के दौरान, अपीलकर्ता कोर्ट के अंतरिम आदेश के तहत सर्विस में बना रहा और आखिरकार 2025 में रिटायरमेंट की उम्र पूरी होने पर रिटायर हो गया। चूंकि अपीलकर्ता अब रिटायर हो चुका है, इसलिए उसने 'सुरेखा बलजोरसिंह ठाकुर बनाम जाति स्क्रूटनी कमेटी और अन्य (2024)' मामले में कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अपने रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े फायदों को सुरक्षित रखने की मांग की। हालांकि, कोर्ट ने अपीलकर्ता के जाति प्रमाण पत्र को अमान्य घोषित करने वाले स्क्रूटनी कमेटी और हाईकोर्ट के आदेश को सही माना, लेकिन साथ ही यह भी उचित समझा कि अपीलकर्ता को तीन दशकों से अधिक समय तक लगातार सर्विस देने के बदले रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े फायदे मिलने चाहिए। 

 कोर्ट ने कहा, "...मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने और यह ध्यान में रखते हुए कि अपीलकर्ता ने 1994 में रेस्पॉन्डेंट नंबर 3 के साथ सर्विस शुरू की और 30.06.2025 को अपनी रिटायरमेंट की तारीख तक सर्विस में बना रहा - जो कि तीन दशकों से अधिक का समय है - हम यह सुनिश्चित करना उचित समझते हैं कि अपीलकर्ता को उसके रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े फायदों से वंचित न किया जाए।" सुरेखा बलजोरसिंह ठाकुर मामले के अलावा, 'चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, फूड कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया और अन्य' मामले का भी हवाला दिया गया। जगदीश बलराम बहिरा और अन्य (2017) के मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने माना कि, हालांकि आम तौर पर गलत जाति या जनजाति प्रमाण पत्र के आधार पर मिली नौकरी बरकरार नहीं रहती, लेकिन कोर्ट किसी उचित मामले में पूरा न्याय करने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है। 

कोर्ट ने कहा, "इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करने का फैसला करते हैं। इसके अनुसार, अपीलकर्ता द्वारा प्रतिवादी नंबर 3 के साथ 21.10.1994 से 30.06.2025 को उनकी रिटायरमेंट की तारीख तक की गई सेवा को, लागू सेवा नियमों के अनुसार उनके रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े लाभों की गणना और भुगतान के सीमित उद्देश्य के लिए सुरक्षित माना जाएगा।" 

कोर्ट ने स्पष्ट किया, "यह साफ किया जाता है कि यहां दी गई सुरक्षा का मतलब अपीलकर्ता के 'टोकरे कोली' अनुसूचित जनजाति से संबंधित होने के दावे को सही ठहराना या मान्यता देना नहीं होगा। न तो अपीलकर्ता और न ही उनके परिवार का कोई सदस्य अमान्य किए गए जाति प्रमाण पत्र के आधार पर भविष्य में किसी लाभ का दावा करने का हकदार होगा।" नतीजतन, अपील आंशिक रूप से स्वीकार की गई।

 Cause Title: SHIRISH PANDHARINATH PATIL VERSUS THE STATE OF MAHARASHTRA & ORS.


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सुप्रीम कोर्ट में शुरू होगी कानून, न्याय और कानूनी शिक्षा पर मंथली लेक्चर सीरीज़, CJI ने टीचर्स डे पर बताई योजना 5 Sept 2026

सुप्रीम कोर्ट में शुरू होगी कानून, न्याय और कानूनी शिक्षा पर मंथली लेक्चर सीरीज़, CJI ने टीचर्स डे पर बताई योजना 5 Sept 2026 

 सुप्रीम कोर्ट कानून, न्याय और कानूनी शिक्षा पर एक मंथली लेक्चर सीरीज़ शुरू करने जा रहा है। यह कानूनी सिस्टम और समाज से जुड़े मौजूदा मुद्दों पर चर्चा के लिए एक रेगुलर मंच बनाएगा। इस पहल की घोषणा चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ने शनिवार को टीचर्स डे के मौके पर की। यह सीरीज़ "एक ज़रूरी विचार। हर महीने।" (One important idea. Every month.) थीम पर आधारित होगी। हर सेशन में किसी जाने-माने कानून विशेषज्ञ, स्कॉलर, कानूनी शिक्षाविद या अपने क्षेत्र के एक्सपर्ट का खास लेक्चर होगा। लेक्चर के बाद 'आइडियाज़ डायलॉग' होगा, जिसमें चुने हुए युवा वकील, लॉ स्टूडेंट्स और रिसर्चर चर्चा में हिस्सा ले सकेंगे और सवाल पूछ सकेंगे। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस फ़ॉर्मेट का मकसद पारंपरिक लेक्चर से आगे बढ़कर स्थापित कानूनी संस्थानों और कानूनी समुदाय की युवा पीढ़ी के बीच सार्थक बातचीत को बढ़ावा देना है। यह पहल मौजूदा कानूनी विचारों का स्थायी आर्काइव भी बनाएगी। लेक्चर को प्रोफेशनल तरीके से रिकॉर्ड करने और उनके साथ एडिट किए गए ट्रांसक्रिप्ट और संक्षिप्त 'आइडियाज़ पेपर्स' उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है। कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग भी की जाएगी और देश भर के कानूनी और एकेडमिक समुदाय तक पहुंच बढ़ाने के लिए भारतीय भाषाओं में सारांश उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है। 

लेक्चर सीरीज़ के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने सालाना "सुप्रीम कोर्ट न्याय शिक्षा सम्मान" का प्रस्ताव रखा है। यह कानूनी शिक्षा में बेहतरीन योगदान के लिए दिया जाने वाला गैर-मौद्रिक सम्मान होगा। यह अवॉर्ड हर साल टीचर्स डे के आसपास एक या दो जाने-माने कानूनी शिक्षाविदों को देने का प्रस्ताव है। पहला अवॉर्ड उद्घाटन लेक्चर के बाद दिया जाएगा। लेक्चर सीरीज़ का पहला सेशन सितंबर 2026 में होगा और उसके बाद हर महीने एक सेशन आयोजित किया जाएगा। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस पहल का मकसद कानून और न्याय पर एक स्थायी संस्थागत परंपरा और लंबे समय तक चलने वाला सार्वजनिक संसाधन बनाते हुए, गहरी कानूनी सोच, सार्थक बातचीत और व्यापक भागीदारी को बढ़ावा देना है।


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हत्या की सजा रद्द करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जज की कार्यक्षमता पर उठाए सवाल, मामला एक्टिंग चीफ जस्टिस के समक्ष भेजा

 हत्या की सजा रद्द करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जज की कार्यक्षमता पर उठाए सवाल, मामला एक्टिंग चीफ जस्टिस के समक्ष भेजा 5 Sept 2026 

 मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में दोषसिद्धि रद्द करते हुए विशेष जज के फैसले में गंभीर त्रुटियां पाईं। अदालत ने साक्ष्यों के मूल्यांकन के तरीके पर चिंता जताते हुए विशेष जज, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) दमोह की संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए उपयुक्तता पर गंभीर सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने मामले को उचित निर्णय के लिए कार्यवाहक चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया। 

 जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने FSL रिपोर्ट से जुड़े तथ्यों को गलत तरीके से दर्ज किया और दोषसिद्धि का आदेश ऐसे आधारों पर पारित किया, जो स्पष्ट और अस्तित्व में ही नहीं थे। पीठ ने कहा, “ट्रायल कोर्ट अपने दायित्वों का उचित सावधानी और तत्परता से निर्वहन करने में विफल रही है। साक्ष्य और अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री के मूल्यांकन का तरीका गंभीर चिंता पैदा करता है और विशेष जज की इस तरह के संवेदनशील मामलों से निपटने की उपयुक्तता पर प्रथम दृष्टया सवाल खड़े करता है।” 

एमपी हाईकोर्ट ने CISF कॉन्स्टेबल की सज़ा रद्द की अदालत ने निर्देश दिया कि मामले को कार्यवाहक चीफ जस्टिस के समक्ष रखा जाए ताकि इस संबंध में उचित निर्णय लिया जा सके। मामला हत्या के दोषी ठहराए गए व्यक्ति की अपील से जुड़ा था। अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था और हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। यह भी कहा गया कि विशेष जज ने जिन तीन परिस्थितियों को दोषसिद्धि का आधार बनाया वे एक-दूसरे से जुड़ी नहीं थीं और उनसे अपराध साबित नहीं होता। 

 जांच एजेंसी पहले करे वीडियो की सत्यता और संदर्भ की पड़ताल हाईकोर्ट ने अभियोजन के गवाह छोटेलाल अहिरवार जो मृतक लोटन लोधी का रिश्तेदार है, उनके बयान की जांच की। उसने बताया कि 22 मार्च 2024 को मृतक अपने घर के चबूतरे पर अपीलकर्ता के साथ बैठा था। मृतक ने उसे शराब खरीदने के लिए पैसे दिए। शराब लेकर लौटने के बाद मृतक और अपीलकर्ता हल्ले के घर की ओर चले गए। अगले दिन मृतक लाखन सिंह के दरवाजे पर मृत पाया गया। पीठ ने गवाह के बयान में कई विसंगतियां पाईं। उसका बयान मृतक के कथित मृत्यु-पूर्व कथन से मेल नहीं खाता था। इसके अलावा घटना 22-23 मार्च 2024 की होने के बावजूद गवाह का बयान 4 मई 2024 को दर्ज किया गया, यानी काफी देरी से। दोषसिद्धि के लिए दूसरी परिस्थिति के तौर पर अपीलकर्ता के घर से तीन नोट और एक मोबाइल बरामद किए जाने पर भरोसा किया गया। हाईकोर्ट ने पाया कि बरामद मोबाइल के संबंध में न तो सिम कार्ड के न होने का उल्लेख था और न ही उसका IMEI नंबर दर्ज किया गया। अदालत ने यह भी पाया कि दस्तावेज पी-24 न तो स्पष्ट था और न ही पढ़ने योग्य। कॉल विवरण में अपीलकर्ता और मृतक के बीच बातचीत का उल्लेख था लेकिन ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं था, जिससे यह साबित हो कि जिस सिम से बातचीत हुई वही बरामद मोबाइल में इस्तेमाल हो रही थी। पीठ ने कहा कि मोबाइल खरीदने का बिल भी साक्ष्य में मौजूद नहीं था। इसलिए सिम कार्ड को अपीलकर्ता या उसके परिवार के किसी सदस्य के मोबाइल से जोड़ने वाला कोई ठोस आधार नहीं था। इसके अलावा, बरामद मोबाइल मृतक का था यह साबित करने के लिए भी कोई साक्ष्य नहीं था। FSL रिपोर्ट को लेकर हाईकोर्ट ने विशेष जज के निष्कर्ष को विशेष रूप से गंभीर माना। विशेष जज ने यह दर्ज किया कि मृतक के कपड़ों पर मानव रक्त मिला, जबकि FSL रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया कि मृतक के कपड़ों पर मानव रक्त के कोई निशान नहीं थे। इसके विपरीत अभियोजन गवाह सात के कपड़ों पर रक्त पाया गया। हाईकोर्ट ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामलों में घटनाओं की पूरी कड़ी स्थापित किए जाने के सिद्धांत को दोहराया। पीठ ने शरद बिरधिचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि परिस्थितियों को ठोस रूप से साबित करना जरूरी है और सभी परिस्थितियां मिलकर ऐसी पूरी कड़ी बनानी चाहिए, जिससे अपराध के अलावा किसी अन्य निष्कर्ष की संभावना न रहे। पीठ ने गवाह सात और गवाह 13 के बयानों की जांच के बाद पाया कि घटनाओं की कड़ी अधूरी थी। बरामद मोबाइल को मृतक से जोड़ने वाला भी कोई ठोस साक्ष्य नहीं था। अदालत ने कहा, “बरामद मोबाइल और बातचीत में इस्तेमाल सिम के बीच कोई ठोस संबंध स्थापित नहीं होने के कारण यह बरामदगी परिस्थितियों की कड़ी में आवश्यक कड़ी स्थापित नहीं करती। जब परिस्थितियों की कड़ी अधूरी है, तब उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन किए बिना दर्ज की गई दोषसिद्धि कानून की नजर में कायम नहीं रह सकती।” हाईकोर्ट ने माना कि विशेष जज ने साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया। इसके चलते हत्या में दोषसिद्धि बरकरार रखना संभव नहीं है। खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि का आदेश रद्द किया और आरोपी को राहत प्रदान की। साथ ही, विशेष जज की कार्यप्रणाली और संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए उनकी उपयुक्तता से जुड़े मुद्दे पर उचित निर्णय के लिए मामला एक्टिंग चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया।


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Wednesday, 2 September 2026

स्वतंत्र प्रैक्टिस करने वाली वकील को सिर्फ पेशे के आधार पर भरणपोषण से वंचित नहीं किया जा सकता

स्वतंत्र प्रैक्टिस करने वाली वकील को सिर्फ पेशे के आधार पर भरणपोषण से वंचित नहीं किया जा सकता: तेलंगाना हाईकोर्ट  24 Aug 2026

तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा है कि सिर्फ अधिवक्ता के रूप में नामांकित होने और स्वतंत्र रूप से वकालत करने से यह साबित नहीं होता कि पत्नी की पर्याप्त स्वतंत्र आय है और उसे हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत भरणपोषण नहीं दिया जाना चाहिए। जस्टिस वाकिति रामकृष्ण रेड्डी ने पत्नी की रिव्यू याचिका मंजूर करते हुए हाईकोर्ट के अक्टूबर 2024 के उस आदेश को वापस ले लिया, जिसमें फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए ₹20,000 प्रतिमाह अंतरिम भरणपोषण को रद्द कर दिया गया था। 

 मामला हैदराबाद की I Additional Family Court में वर्ष 2010 से लंबित वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। वर्ष 2013 में फैमिली कोर्ट ने पत्नी को ₹20,000 और दोनों बेटियों को ₹15,000-₹15,000 प्रतिमाह अंतरिम भरणपोषण देने का आदेश दिया था। पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अक्टूबर 2024 में हाईकोर्ट ने पत्नी का भरणपोषण रद्द कर दिया, जबकि बेटियों के लिए भरणपोषण को उनकी बालिग होने तक बरकरार रखा। इसके बाद पत्नी ने रिव्यू याचिका दाखिल की। 

 पत्नी ने बताया कि वह किसी नौकरी में नहीं थी बल्कि स्वतंत्र रूप से वकालत करती थी, जिससे होने वाली आय नियमित या निश्चित नहीं थी। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि नौकरी से मिलने वाली निश्चित आय और स्वतंत्र प्रैक्टिस से होने वाली अनियमित आय में महत्वपूर्ण अंतर है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 24 के तहत मुख्य सवाल यह है कि वास्तव में उपलब्ध आय पत्नी के भरणपोषण और मुकदमे के खर्च के लिए पर्याप्त है या नहीं। केवल शैक्षणिक योग्यता, पेशेवर स्थिति या कमाने की क्षमता के आधार पर भरणपोषण से इनकार नहीं किया जा सकता। 

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Chaturbhuj v. Sita Bai, Shailja v. Khobbanna और Manish Jain v. Akanksha Jain के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कमाने की क्षमता या कुछ आय होना अपने आप में भरणपोषण से वंचित करने का आधार नहीं है। कोर्ट ने पाया कि उसके पिछले आदेश में पत्नी की वास्तविक आय, उसकी पर्याप्तता और पति की आय एवं आर्थिक क्षमता पर कोई ठोस निष्कर्ष नहीं था। इसके अलावा, Rajnesh v. Neha में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित भरणपोषण संबंधी दिशानिर्देशों पर भी उचित विचार नहीं किया गया था। 

 कोर्ट ने यह भी कहा कि रिवीजनल क्षेत्राधिकार में हाईकोर्ट फैमिली कोर्ट के तथ्यों का नए सिरे से मूल्यांकन नहीं कर सकता, जब तक उसके निष्कर्षों में कोई विकृति या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि न हो। हाईकोर्ट ने रिव्यू याचिका मंजूर करते हुए अक्टूबर 2024 का आदेश वापस ले लिया और पति की सिविल रिवीजन याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही 2013 के फैमिली कोर्ट के अंतरिम भरणपोषण आदेश को उसके मूल रूप में बहाल कर दिया गया। पति को बकाया भरणपोषण की गणना, पहले किए गए भुगतानों और शेष राशि का विवरण तथा Rajnesh v. Neha के अनुसार संपत्ति और देनदारियों का हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया। निर्धारित बकाया राशि का भुगतान 8 सप्ताह के भीतर करने का आदेश दिया गया।



जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्य छिपाना न्याय प्रशासन में दखल, वकील की जिम्मेदारी केवल मुवक्किल तक सीमित नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-09-01

जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्य छिपाना न्याय प्रशासन में दखल, वकील की जिम्मेदारी केवल मुवक्किल तक सीमित नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-09-01 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई वकील अपनी जानकारी में मौजूद महत्वपूर्ण तथ्यों को जानबूझकर छिपाकर अदालत के समक्ष उसके विपरीत स्थिति रखता है तो यह सक्रिय रूप से तथ्य छिपाना है और ऐसा आचरण न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करता है। हालांकि, वास्तविक स्थिति की जानकारी न होने के कारण गलत तथ्य सामने रखना या तथ्यों की गलत व्याख्या करना अलग स्थिति है।

जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने यह टिप्पणी एक कॉलेज की प्रबंध समिति के चुनाव से जुड़े मामले में दो वकीलों के आचरण की जांच करते हुए की। कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाता है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह मामले से जुड़े सभी प्रासंगिक तथ्यों और दस्तावेजों का खुलासा करे।

अदालत ने कहा,

"सक्रिय रूप से तथ्य छिपाने और केवल अनजाने में गलत तथ्य रखने के बीच अंतर है। सक्रिय रूप से तथ्य छिपाने का अर्थ है अदालत को गुमराह करने के लिए सच्चाई को जानबूझकर छिपाना, जबकि जानकारी के अभाव में गलत जानकारी देना अलग स्थिति है।"

मामला नेहरू विद्यापीठ इंटरमीडिएट कॉलेज, रेवतीपुर, गाजीपुर की प्रबंध समिति के चुनाव से जुड़ा है। 5 मई 2026 को हाईकोर्ट ने एक रिट याचिका का निपटारा करते हुए जिला विद्यालय निरीक्षक को दो महीने के भीतर चुनाव कराने का निर्देश दिया। उस समय दोनों पक्षों के वकीलों ने अदालत को बताया कि 2009 में हुए चुनाव में इस्तेमाल मतदाता सूची निर्विवाद है। इसी आधार पर कोर्ट ने उसी सूची को चुनाव के लिए इस्तेमाल करने का निर्देश दिया।

इसके बाद याचिका में प्रतिवादी नंबर छह के रूप में शामिल शिव शंकर सिंह ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की। उन्होंने खुद को निर्वाचित प्रबंधक बताते हुए कहा कि मूल याचिका गलत उद्देश्य से दाखिल की गई। उन्होंने शपथपत्र देकर यह भी कहा कि उन्होंने किसी अधिवक्ता को अपनी ओर से पेश होने के लिए वकालतनामा नहीं दिया और न ही अपनी ओर से कैविएट दाखिल करने का निर्देश दिया।

कैविएट वकील आरसी द्विवेदी ने दाखिल की थी। उनका कहना था कि वकालतनामे पर मौजूद हस्ताक्षर की पुष्टि उन्होंने स्वयं नहीं, बल्कि उनके क्लर्क ने की थी। उनके अनुसार, आवेदक और उसका भतीजा भोला यादव उनके कार्यालय आए, हस्ताक्षर किया हुआ वकालतनामा सौंपा और 2,500 रुपये फीस दी। भोला यादव ने भी शपथपत्र के जरिए इस दावे का समर्थन किया, जबकि आवेदक ने ऐसा नहीं किया।

चूंकि आवेदक वर्ष 2015 से आरसी द्विवेदी को अपना अधिवक्ता नियुक्त करता रहा था इसलिए हाईकोर्ट ने विवादित हस्ताक्षरों को विशेषज्ञ जांच के लिए भेज दिया। 27 जुलाई 2026 की फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी की रिपोर्ट में पाया गया कि कैविएट के साथ दाखिल वकालतनामे पर मौजूद हस्ताक्षर न तो नमूना हस्ताक्षरों से मेल खाते हैं और न ही दो अन्य मामलों में मौजूद वकालतनामों या आवेदक के बैंक रिकॉर्ड में मौजूद हस्ताक्षरों से। रिपोर्ट पर कोई आपत्ति दाखिल नहीं की गई और वह अंतिम हो गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि आवेदक यह साबित करने में असफल रहा कि उसके हस्ताक्षर जाली थे। कोर्ट ने माना कि पुनर्विचार याचिका ऐसे आदेश को वापस लेने के लिए दाखिल की गई, जो आवेदक के अनुकूल नहीं था। इस प्रक्रिया में एक ऐसे वकील को भी कठघरे में खड़ा कर दिया गया, जो एक दशक से अधिक समय से उसका प्रतिनिधित्व कर रहा था।

2009 के चुनाव को निर्विवाद बताने के दावे की भी अदालत ने जांच की। रिकॉर्ड से सामने आया कि संयुक्त शिक्षा निदेशक ने 16 अप्रैल 2016 के आदेश में 2009 के चुनाव को संदिग्ध माना था और नए चुनाव कराने का निर्देश दिया था। उस आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका बाद में सहमति से निष्प्रभावी मानकर खारिज कर दी गई।

इसके अलावा, तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक मालती राय, जिनके बारे में कहा गया कि उन्होंने 2009 में चुनाव कराया, ने 23 जुलाई 2016 को संयुक्त शिक्षा निदेशक को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि उन्होंने ऐसा कोई चुनाव नहीं कराया।

अदालत ने कहा कि लंबे समय से याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील एससी द्विवेदी इन दस्तावेजों और तथ्यों से अनजान होने का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने वकील और उनके मुवक्किल को 25 अक्टूबर 2009 को हुए चुनाव को अंतिम निर्विवाद चुनाव बताने के लिए समान रूप से जिम्मेदार माना।

अदालत ने कहा,

"इस अदालत को यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि मिस्टर एससी द्विवेदी, वकील और उनके मुवक्किल की ओर से तथ्य को सक्रिय रूप से छिपाया गया, जिसके कारण न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप हुआ।"

हाईकोर्ट ने कानूनी पेशे में वकील की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अधिवक्ताओं को केवल मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि मुख्य रूप से अदालत का अधिकारी माना जाता है। उन पर पेशेवर जिम्मेदारी के साथ-साथ अदालत के प्रति भी बड़ी जिम्मेदारी होती है। इस जिम्मेदारी का उल्लंघन न्याय प्रशासन की बुनियाद को प्रभावित करता है और कानूनी व्यवस्था में जनता के भरोसे को नुकसान पहुंचा सकता है।

वहीं, आरसी द्विवेदी के आचरण को अदालत ने अलग माना। कोर्ट के अनुसार, उन्होंने केवल याचिकाकर्ता की ओर से रखे गए दावे को स्वीकार किया और 2009 के चुनाव को संदिग्ध बताने वाले दस्तावेज उनके सामने रिकॉर्ड पर पेश नहीं किए गए। इसलिए अदालत ने उनके आचरण को न तो सक्रिय रूप से तथ्य छिपाना माना और न ही जानबूझकर झूठ बोलना। कार्यालय में हुई प्रक्रियात्मक कमियों के लिए उनकी बिना शर्त माफी को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

वकालतनामे के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत में किसी अधिवक्ता की पेशी की मान्यता पूरी तरह वैध और प्रभावी वकालतनामे के अस्तित्व पर आधारित होती है। जिस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करने का दावा किया जा रहा है उसकी जानकारी या सहमति के बिना वकालतनामा दाखिल करना अदालत के समक्ष गलत प्रस्तुति है।

हाईकोर्ट ने मामले को बार काउंसिल के पास भेजने या अवमानना अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से इनकार किया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता और प्रतिवादी नंबर छह पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। दोनों को यह राशि एक महीने के भीतर हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति में जमा करनी होगी। राशि जमा नहीं करने पर रजिस्ट्रार जनरल को अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया गया।

अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट नियम, 1952 के अध्याय 22 नियम 5 का भी संज्ञान लिया, जिसके तहत केवल आवेदन देकर बिना सहायक शपथपत्र के कैविएट दाखिल की जा सकती है। कोर्ट ने माना कि इस प्रक्रिया का दुरुपयोग संभव है। इसलिए आदेश की प्रति प्रशासनिक स्तर पर चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया, ताकि कैविएट आवेदन के साथ आवेदक का शपथपत्र अनिवार्य करने के लिए नियम में संशोधन पर विचार किया जा सके।

अंततः हाईकोर्ट ने माना कि 2009 का चुनाव निर्विवाद नहीं था। इस आधार पर कोर्ट ने अपने 5 मई 2026 के आदेश की समीक्षा करते हुए उसे वापस ले लिया और मामले को आगे की सुनवाई के लिए सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत के समक्ष रखने का निर्देश दिया।

Monday, 10 August 2026

20 साल तक बाकी रकम जमा न करने के बाद प्रॉपर्टी खरीदने वाला सेल डीड लागू करने की मांग नहीं कर सकता

20 साल तक बाकी रकम जमा न करने के बाद प्रॉपर्टी खरीदने वाला सेल डीड लागू करने की मांग नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट 2026-08-10

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि प्रॉपर्टी खरीदने वाला व्यक्ति 20 साल तक बिक्री की बाकी रकम जमा न करने के बाद सेल डीड को लागू करने की मांग नहीं कर सकता।

ऐसा करते हुए कोर्ट ने उस खरीदार को बाकी रकम जमा करने के लिए समय देने वाला आदेश रद्द किया, जिसके पक्ष में 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध का पालन) का मुकदमा तय हुआ था। कोर्ट ने देखा कि उसने बकाया रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने की अर्जी देने में 20 साल का इंतज़ार किया।

राम लाल बनाम जरनैल सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने कहा,

“राम लाल (ऊपर बताया गया) मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला साफ तौर पर वादी-प्रतिवादी के मामले को खारिज करता है, क्योंकि वादी ने तय समय के भीतर बिक्री की बाकी रकम जमा करने में जानबूझकर लापरवाही बरती और बाकी रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने की दूसरी अर्जी देने में लगभग 20 साल से ज़्यादा का इंतज़ार किया।

देरी की अवधि और इस बीच बने हालात 'जजमेंट डेटर' (जिसके खिलाफ फैसला आया है) के पक्ष में हैं। 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' के मुकदमे में कोर्ट को दोनों पक्षों के बीच निष्पक्षता बनाए रखनी होती है। ऊपर बताए गए फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुकदमे का फैसला एक शुरुआती डिक्री (प्रारंभिक आदेश) होती है। जिस कोर्ट ने डिक्री पास की है, उसके पास यह अधिकार है कि वह तय समय के भीतर भुगतान/जमा न करने पर कॉन्ट्रैक्ट/डिक्री को रद्द कर दे या भुगतान/जमा करने की समय-सीमा बढ़ा दे। इस मामले में वादी-प्रतिवादी की ओर से बिक्री की बाकी रकम जमा करने की अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने में बिना किसी ठोस कारण के देरी हुई है।"

प्रतिवादी दुलीराम मौर्य ने 1991 में कुल 25,000 रुपये में ज़मीन बेचने का समझौता किया था, जिसमें से 13,000 रुपये उसी दिन वादी नंदराम ने चुका दिए थे, जिसने प्रॉपर्टी खरीदी थी।

बाकी 12,000 रुपये सेल डीड (बिक्री विलेख) के निष्पादन के समय चुकाए जाने थे। इसके बाद नंदराम ने बिक्री समझौते के 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध का पालन) के लिए मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने 1998 में केस खारिज किया। कोर्ट ने माना कि सेल-डीड (बिक्री विलेख) को पूरा करने के लिए कोई लेन-देन नहीं हुआ और यह एग्रीमेंट असल में डिफेंडेंट द्वारा लिए गए लोन को छिपाने का एक तरीका था।

2003 में वादी की सिविल अपील मंजूर कर ली गई और केस में वादी के पक्ष में फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने डिफेंडेंट को दो महीने के भीतर सेल एग्रीमेंट पूरा करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने वादी-खरीदार को बाकी रकम जमा करने का भी निर्देश दिया।

डिफेंडेंट-विक्रेता ने दूसरी अपील दायर की, जो बिना किसी अंतरिम आदेश के हाईकोर्ट में लंबित रही। इसे सितंबर 2019 में खारिज कर दिया गया। इस बीच वादी-खरीदार ने 6 अगस्त 2012 को फैसले को लागू करवाने की कार्यवाही (एग्जीक्यूशन प्रोसीडिंग्स) शुरू की।

दूसरी अपील खारिज होने के बाद डिफेंडेंट ने स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 28 के तहत एक अर्जी दी ताकि वादी द्वारा शुरू की गई एग्जीक्यूशन प्रोसीडिंग्स को रोका जा सके। वादी ने इसका विरोध किया और 17.11.2025 को बाकी रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने और देरी को माफ करने की अर्जी दी।

संदर्भ के लिए, धारा 28 विक्रेता को उसी केस में, जिसमें स्पेसिफिक परफॉर्मेंस (अनुबंध का पालन) का फैसला सुनाया गया, कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने की अर्जी देने की अनुमति देती है। ऐसा तब किया जा सकता है, जब खरीदार फैसले में तय समय या कोर्ट द्वारा दी गई अतिरिक्त समय-सीमा के भीतर खरीद की रकम का भुगतान न करे।

23 दिसंबर 2025 के आदेश से एग्जीक्यूशन कोर्ट ने डिफेंडेंट की अर्जी खारिज की और 1000 रुपये के खर्च (कॉस्ट) पर बाकी रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने की वादी की अर्जी मंजूर कर ली। इसके खिलाफ डिफेंडेंट-विक्रेता ने रिवीजन याचिका दायर की जिसे खारिज कर दिया गया; इस खारिज आदेश के खिलाफ डिफेंडेंट हाईकोर्ट गया।

डिफेंडेंट-विक्रेता के वकील ने तर्क दिया कि वादी-खरीदार ने फैसले के बाद लगभग नौ साल तक न तो पैसे जमा किए और न ही एग्जीक्यूशन के लिए कोई कदम उठाया, और उसके बाद दायर समय बढ़ाने की अर्जी भी लंबित पड़ी रही। यह कहा गया कि 20 साल से भी अधिक समय बाद जमा करने की अनुमति देना न्याय का मजाक उड़ाने जैसा होगा; चूंकि स्पेसिफिक परफॉर्मेंस एक इक्विटेबल रिलीफ (न्यायसंगत राहत) है, इसलिए कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने या समय बढ़ाने का फैसला करते समय कोर्ट को इक्विटी (निष्पक्षता/न्याय) के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।

वादी के वकील ने कहा कि धारा 28 के तहत डिक्री-होल्डर समय बढ़ाने की मांग भी कर सकता है। यह बताया गया कि 2012 में जब एग्जीक्यूशन (डिक्री लागू करने की प्रक्रिया) शुरू हुई, तब दी गई अर्ज़ी पेंडिंग रही और दूसरी अपील पर फ़ैसले का इंतज़ार करते हुए एग्जीक्यूशन पर ज़ोर नहीं दिया गया। यह तर्क दिया गया कि 2003 की डिक्री 2019 के दूसरे अपीलीय फ़ैसले में मिल गई, इसलिए समय की गिनती 2003 से नहीं की जा सकती।

वादी के इस तर्क को खारिज करते हुए कि एग्जीक्यूशन लिमिटेशन एक्ट के तहत तय बारह साल की अवधि के भीतर है, कोर्ट ने कहा:

“यह तर्क पूरी तरह से गलतफहमी पर आधारित है, क्योंकि यह 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध के पालन) का मामला है, जिसमें पहली अपीलीय अदालत ने 22.11.2003 को वादी-प्रतिवादी के पक्ष में डिक्री पारित की थी और उसे बिक्री की बाकी रकम जमा करने के लिए एक महीने का समय दिया था।”

दूसरी अपील के रिकॉर्ड को देखते हुए कोर्ट ने पाया कि इसे कभी स्वीकार नहीं किया गया, कानून का कोई अहम सवाल तय नहीं किया गया और कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया गया।

“वादी-प्रतिवादी न तो दूसरी अपीलीय अदालत के सामने पेश हुआ और न ही दूसरी अपील का विरोध किया। वह बस बाहर से कार्यवाही देखता रहा।”

कोर्ट ने यह भी देखा कि 2012 की एग्जीक्यूशन कार्यवाही में समय बढ़ाने की जो अर्ज़ी दी गई, उसे न तो मंज़ूरी मिली और न ही उस पर ज़ोर दिया गया और दूसरी अर्ज़ी 2025 में आई, यानी दूसरी अपील खारिज होने के छह साल बाद। कोर्ट ने माना कि इससे पता चलता है कि वादी न तो डिक्री को लागू करवाने में दिलचस्पी रखता था और न ही सौदे के अपने हिस्से को पूरा करने के लिए तैयार था।

मर्जर (डिक्री के विलय) के मुद्दे पर हालांकि कोर्ट ने माना कि 2003 की डिक्री 23 सितंबर 2019 के दूसरे अपीलीय फ़ैसले में मिल गई, लेकिन यह भी कहा कि इससे वादी को कोई मदद नहीं मिली, क्योंकि उस तारीख से भी गिनती करने पर समय बढ़ाने की दूसरी अर्ज़ी 17 नवंबर 2025 को आई, जबकि पहली अर्ज़ी पर कभी ज़ोर नहीं दिया गया।

कोर्ट ने आगे कहा,

“निचली दोनों अदालतें इस मामले में निष्पक्षता बनाए रखने में नाकाम रहीं और उन्होंने गलत तरीके से यह दर्ज किया कि दूसरी अपील पेंडिंग होने के कारण डिक्री को लागू करवाने में वादी-प्रतिवादी की कोई गलती नहीं थी।”

कोर्ट ने विक्रेता की अर्ज़ी मंज़ूर करते हुए उसे निर्देश दिया कि वह 3.7.1991 के बिक्री समझौते के तहत खरीदार से मिली अग्रिम राशि को उसे प्राप्त होने की तारीख से 6% ब्याज के साथ एक महीने के भीतर जमा करे।

Case Title: Duliram Maurya v. Nandram

Tuesday, 21 July 2026

संयुक्त हिंदू परिवार का सदस्य अपने पैसे से अलग संपत्ति खरीद सकता है; दूसरे सह-उत्तराधिकारी उस पर अपना हक नहीं जता सकते

संयुक्त हिंदू परिवार का सदस्य अपने पैसे से अलग संपत्ति खरीद सकता है; दूसरे सह-उत्तराधिकारी उस पर अपना हक नहीं जता सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट  2026-07-20


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ संयुक्त हिंदू परिवार होने से यह नहीं माना जा सकता कि कोई खास ज़मीन संयुक्त परिवार की संपत्ति है।

कोर्ट ने कहा कि संयुक्त हिंदू परिवार का कोई सदस्य अपने नाम पर अलग से संपत्ति खरीद और रख सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे सदस्य को ज़मीन पर सह-स्वामित्व का अधिकार तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक वे यह साबित न कर दें कि वह ज़मीन संयुक्त परिवार के फंड से खरीदी गई।

यह विवाद बस्ती ज़िले के बारो गाँव में खाता नंबर 277 के तीन प्लॉट से जुड़ा था। चकबंदी प्रक्रिया के शुरुआती साल में ये प्लॉट सिर्फ़ याचिकाकर्ताओं (चेताई के बेटे) के नाम पर 'सिरदार' के तौर पर दर्ज थे।

चेताई के भाई प्रतिवादी नंबर 2 और 3 (जगलल और फौजदार) ने यू.पी. चकबंदी अधिनियम, 1953 की धारा 9-A(2) के तहत आपत्ति दर्ज कराई और खुद को सह-काश्तकार के तौर पर दर्ज करने की मांग की। उनका दावा था कि यह ज़मीन मूल रूप से घिरऊ ने खरीदी थी। उनकी मौत के बाद यह उनकी विधवा श्रीमती झिनका उर्फ़ छोटका के नाम पर दर्ज हुई और उनकी मौत के बाद चेताई, जगलल और फौजदार को संयुक्त रूप से मिली, लेकिन इसे गलत तरीके से सिर्फ़ चेताई के नाम पर दर्ज कर दिया गया।

याचिकाकर्ताओं (जो चेताई के वारिस हैं) ने कहा कि यह ज़मीन नई थी और चेताई ने इसे अपने भाइयों से अलग होने के बाद अकेले खरीदा था। उन्होंने कहा कि श्रीमती झिनका की किसी ज़मीन से इसका कोई संबंध या निरंतरता नहीं थी और संयुक्त परिवार के फंड से इसे खरीदने का कोई दावा भी नहीं किया गया।

चकबंदी अधिकारी ने 30.5.1978 को आपत्ति स्वीकार की और प्रतिवादी नंबर 2 और 3 को एक-तिहाई हिस्से के साथ सह-काश्तकार के तौर पर दर्ज किया। अधिकारी का मानना था कि चेताई का नाम 'कर्ता खानदान' (परिवार के मुखिया) के तौर पर दर्ज किया गया। एक्ट की धारा 11(1) के तहत अपील पर कंसोलिडेशन के असिस्टेंट सेटलमेंट ऑफिसर ने उस आदेश रद्द किया और निर्देश दिया कि खाता केवल याचिकाकर्ताओं के नाम पर दर्ज किया जाए। उन्होंने पाया कि रेवेन्यू एंट्री में कोई निरंतरता या एकरूपता नहीं थी और परिवार के अलग होने के बाद सेटलमेंट चेताई के पक्ष में किया गया।

कंसोलिडेशन के डिप्टी डायरेक्टर ने एक्ट की धारा 48 के तहत प्रतिवादी नंबर 2 और 3 द्वारा दायर रिवीजन याचिका स्वीकार की, अपीलीय आदेश रद्द किया और कंसोलिडेशन ऑफिसर के आदेश को बहाल किया। याचिकाकर्ताओं ने रिवीजन आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

जस्टिस चंद्र कुमार राय ने कहा,

“अपीलीय अदालत ने भी यह तथ्य दर्ज किया कि परिवार के अलग होने के बाद, सेटलमेंट याचिकाकर्ताओं के पिता चेताई के पक्ष में किया गया था, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि चेताई का नाम 'कर्ता खानदान' (परिवार के मुखिया) के रूप में दर्ज किया गया था।”

अदालत ने माना कि रेवेन्यू एंट्री, खतौनी में दर्ज अवधि और एंट्री में निरंतरता व एकरूपता के अभाव के आधार पर अपीलीय अथॉरिटी द्वारा दर्ज तथ्यों को कंसोलिडेशन के डिप्टी डायरेक्टर ने सही तरीके से नहीं पलटा था। अदालत ने गौर किया कि रिवीजन आदेश में 1348 फसली की एंट्री की अवधि एक साल बताई गई थी, जबकि रिट याचिका के साथ संलग्न 1348 फसली की खतौनी में अवधि नौ साल दिखाई गई थी। अदालत ने माना कि इस आधार पर रिवीजन आदेश को बरकरार नहीं रखा जा सकता है।

अदालत ने आगे कहा कि 1979 में कंसोलिडेशन के डिप्टी डायरेक्टर के पास मौजूद रिवीजन की शक्ति सीमित थी। “साल 1979 में, U.P.C.H. एक्ट की धारा 48 के तहत कंसोलिडेशन के डिप्टी डायरेक्टर का अधिकार क्षेत्र सीमित था, क्योंकि U.P.C.H. एक्ट की धारा 48 में संशोधन करके 10.11.1980 से उन्हें ज़्यादा अधिकार दिए गए थे।”

कोर्ट ने 'राम चंद्र दुबे और अन्य बनाम डिप्टी डायरेक्टर ऑफ़ कंसोलिडेशन, देवरिया और अन्य' के मामले का हवाला दिया, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि संयुक्त हिंदू परिवार का कोई सदस्य, भले ही वह संयुक्त परिवार का हिस्सा हो, अलग संपत्ति रख सकता है जो पूरी तरह से उसकी अपनी हो और जिसमें कोपार्सनरी (संयुक्त उत्तराधिकार वाले परिवार) का कोई अन्य सदस्य कोई अधिकार हासिल न कर सके।

कोर्ट ने 'बाला चरण और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य' मामले का भी हवाला दिया, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि भले ही संयुक्त परिवार होने का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन संयुक्त परिवार की संपत्ति होने का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

इन फैसलों को लागू करते हुए, कोर्ट ने कहा कि यह साबित करने की ज़िम्मेदारी प्रतिवादी नंबर 2 और 3 की थी कि विवादित ज़मीन संयुक्त परिवार की संपत्ति से हासिल की गई थी, जिसे वे साबित नहीं कर पाए; इसलिए उन्हें सह-काश्तकारी (co-tenancy) का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

रिट याचिका को मंज़ूरी देते हुए, कोर्ट ने 17.8.1979 के रिविज़नल आदेश को रद्द कर दिया और 29.12.1978 के अपीलीय आदेश को बरकरार रखा। खर्च के बारे में कोई आदेश नहीं दिया गया।

Case Title: Pardeshi v. D.D.C and others