Tuesday, 25 March 2025

एनआई एक्ट 148| राशि का 20% जमा करने की शर्त पूर्ण नहीं; असाधारण मामला बनाने पर राहत दी जाती है : सुप्रीम कोर्ट

एनआई एक्ट 148| राशि का 20% जमा करने की शर्त पूर्ण नहीं; असाधारण मामला बनाने पर राहत दी जाती है : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सजा को निलंबित करने की शर्त के रूप में निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 148 के तहत न्यूनतम 20% राशि जमा करना एक पूर्ण नियम नहीं है। न्यायालय ने कहा, जब कोई अपीलीय अदालत एक अभियुक्त की सीआरपीसी की धारा 389 के तहत प्रार्थना पर विचार करती है जिसे निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध के लिए दोषी ठहराया गया है, वह इस पर विचार कर सकती है कि क्या यह एक असाधारण मामला है जिसमें जुर्माना/मुआवजा राशि का 20% जमा करने की शर्त लगाए बिना सजा को निलंबित करने की आवश्यकता है।

जस्टिस अभय एस ओक और जस्टिस पंकज मित्तल की पीठ ने कहा कि यदि अपीलीय अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि यह एक असाधारण मामला है, तो उक्त निष्कर्ष पर पहुंचने के कारणों को दर्ज किया जाना चाहिए। इस मामले में आरोपियों को धारा 138 एनआई एक्ट के तहत दोषी ठहराया गया और अपील में, धारा 148 एनआई अधिनियम पर भरोसा करते हुए, सत्र न्यायालय ने अपीलकर्ताओं को मुआवजे की राशि का 20% जमा करने की शर्त के अधीन धारा 389 सीआरपीसी के तहत राहत दी। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस आदेश पर मुहर लगा दी। हाईकोर्ट के मुताबिक सीआरपीसी की धारा 389 के तहत सजा के निलंबन से राहत अभियुक्त को मुआवज़ा/जुर्माना राशि का न्यूनतम 20% जमा करने का निर्देश देकर ही प्रदान की जा सकती है।

अपील में, अदालत ने सुरिंदर सिंह देसवाल उर्फ कर्नल एसएस देसवाल और अन्य बनाम वीरेंद्र गांधी (2019) 11 SCC 341 मामले में की गई टिप्पणियों पर गौर किया और कहा: "इस न्यायालय का मानना है कि एनआई अधिनियम की धारा 148 की एक उद्देश्यपूर्ण व्याख्या की जानी चाहिए। इसलिए, आम तौर पर, अपीलीय अदालत को धारा 148 में प्रदान की गई जमा राशि की शर्त लगाना उचित होगा। हालांकि, ऐसे मामले में जहां अपीलीय न्यायालय इस बात से संतुष्ट है कि 20% जमा करने की शर्त अन्यायपूर्ण होगी या ऐसी शर्त लगाने से अपीलकर्ता को अपील के अधिकार से वंचित होना पड़ेगा, विशेष रूप से दर्ज किए गए कारणों से अपवाद किया जा सकता है।"

यह तर्क दिया गया कि न तो सत्र न्यायालय के समक्ष और न ही हाईकोर्ट के समक्ष, अपीलकर्ताओं द्वारा कोई दलील दी गई थी कि इन मामलों में एक अपवाद बनाया जा सकता है और जमा की आवश्यकता या राशि का न्यूनतम 20% समाप्त किया जा सकता है। अदालत ने कहा , "जब कोई आरोपी सीआरपीसी की धारा 389 के तहत सजा के निलंबन के लिए आवेदन करता है, तो वह आम तौर पर बिना किसी शर्त के सजा के निलंबन से राहत के लिए आवेदन करता है। इसलिए, जब अपीलकर्ताओं द्वारा एक व्यापक आदेश मांगा जाता है, तो अदालत को विचार करना होगा मामला अपवाद में आता है या नहीं.. इन मामलों में, सत्र न्यायालय और हाईकोर्ट दोनों गलत आधार पर आगे बढ़े हैं कि न्यूनतम 20% राशि जमा करना एक पूर्ण नियम है जो किसी भी अपवाद को समायोजित नहीं करता है।

इसलिए पीठ ने हाईकोर्ट को मामले पर नये सिरे से विचार करने का निर्देश दिया। जम्बू भंडारी बनाम मप्र राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड - 2023 लाइव लॉ (SC) 776 - 2023 INSC 822 निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881; धारा 148 - आम तौर पर, धारा 148 में दिए गए अनुसार जमा की शर्त लगाना अपीलीय न्यायालय के लिए उचित होगा। हालांकि, ऐसे मामले में जहां अपीलीय न्यायालय संतुष्ट है कि 20% जमा की शर्त अन्यायपूर्ण होगी या ऐसी शर्त लगाना अनुचित होगा। यह अपीलकर्ता को अपील के अधिकार से वंचित करने के बराबर है, विशेष रूप से दर्ज किए गए कारणों से अपवाद किया जा सकता है। (पैरा 5-6)

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973; धारा 389 - निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट , 1881; धारा 148 - जब कोई अपीलीय अदालत एक अभियुक्त की सीआरपीसी की धारा 389 के तहत प्रार्थना पर विचार करती है जिसे निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध के लिए दोषी ठहराया गया है, वह इस पर विचार कर सकती है कि क्या यह एक असाधारण मामला है जिसमें जुर्माना/मुआवजा राशि का 20% जमा करने की शर्त लगाए बिना सजा को निलंबित करने की आवश्यकता है- यदि अपीलीय न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि यह एक असाधारण मामला है, तो उक्त निष्कर्ष पर पहुंचने के कारणों को दर्ज किया जाना चाहिए। जब कोई आरोपी सीआरपीसी की धारा 389 के तहत आवेदन करता है। सजा के निलंबन के लिए, वह आम तौर पर बिना किसी शर्त के सजा के निलंबन से राहत देने के लिए आवेदन करता है। इसलिए, जब अपीलकर्ताओं द्वारा व्यापक आदेश की मांग की जाती है, तो न्यायालय को इस पर विचार करना होगा कि मामला अपवाद में आता है या नहीं। (पैरा 7-10)


https://hindi.livelaw.in/category/news-updates/section-148-ni-act-deposit-of-minimum-20-amount-is-not-an-absolute-rule-can-be-relaxed-if-exceptional-case-is-made-out-supreme-court-237684


Friday, 14 March 2025

एमपी में दो से अधिक संतानों पर बर्खास्तगी पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

मपी में दो से अधिक संतानों पर बर्खास्तगी पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 14/03/2025

MP Highcourt एमपी में सरकारी सेवा में दो से अधिक संतान होने पर बर्खास्तगी पर जबलपुर हाईकोर्ट का महत्त्वपूर्ण निर्णय सामने आया है। इस मामले में मप्र हाईकोर्ट ने एक शिक्षक को राहत दी है। कोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी का आदेश स्थगित कर दिया है। याचिकाकर्ता नसीर खान मैहर में मिडिल स्कूल के शिक्षक थे। दो से अधिक संतान पर सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा याचिकाकर्ता को छह मार्च, 2025 को सेवामुक्त कर दिया गया था जिससे हाईकोर्ट ने राहत दी। सुनवाई के दौरान कोर्ट में पूर्व के समान मामलों के आदेशों का भी हवाला दिया गया।

मप्र हाईकोर्ट MP Highcourt ने दो से अधिक संतान होने के आधार पर सेवा से बर्खास्तगी के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। जस्टिस विशाल मिश्रा की सिंगल बेंच ने आयुक्त लोक शिक्षण, जिला शिक्षा अधिकारी मैहर व अन्य को तलब किया। याचिकाकर्ता नसीर खान के मामले में यह निर्णय दिया गया।

मैहर में मिडिल स्कूल के शिक्षक नसीर खान को सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा 10 मार्च 2000 को जारी परिपत्र के आधार पर 6 मार्च, 2025 को सेवामुक्त कर दिया गया। इसके अनुसार ऐसे उम्मीदवार जिसके दो से अधिक जीवित संतान हैं, जिनमें से एक का जन्म 26 जनवरी, 2001 या उसके बाद हो, वह किसी सेवा या पद पर नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा।

हाईकोर्ट में कहा गया कि इसमें उम्मीदवार लिखा है, जबकि वह 1998 से नौकरी में था। याचिका पर बहस के दौरान हाई कोर्ट के पूर्व के समान मामलों के आदेशों का भी हवाला दिया गया।